हरीश रावत को पत्रकार उमेश कुमार के सौदेबाज़ होने का यकीन था, उमेश पहले भी विधायकों की ऐसी सौदेबाजी कर चुके हैं

तेजतर्रार पत्रकार राहुल कोटियाल ने सत्याग्रह डॉट कॉम में उत्तराखंड स्टिंग प्रकरण पर एक लंबा विश्लेषणात्मक लेख लिखा है जिससे पता चलता है कि यह पहला ऐसा स्टिंग है जिसमें स्टिंग करने वाला, स्टिंग कराने वाला और जिसका स्टिंग किया गया, तीनों ही बुरी तरह एक्सपोज हुए. हरीश रावत की तो थू थू हो ही रही है, उससे कम थू थू उमेश कुमार और हरक सिंह रावत की भी नहीं हो रही. इस स्टिंग के जरिए उलटे उमेश कुमार के ‘ओरीजनल’ व्यक्तित्व का ‘स्टिंग’ सबके सामने प्रसारित हो गया है. उमेश लंबे समय से पत्रकारिता की आड़ में दलाली, सौदेबाजी व ब्लैकमेलिंग किया करता है, इस स्टिंग से यह खुद ब खुद साबित हो रहा है. इसके बारे में विस्तार से बता रही है यह रिपोर्ट. राहुल कोटियाल की इस विशेष रिपोर्ट को सत्याग्रह डॉट कॉम से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

हरीश रावत को ही नहीं, उत्तराखंड वाला स्टिंग दूसरों को भी बेनकाब करता है

-राहुल कोटियाल-

उत्तराखंड में चल रही राजनीतिक अस्थिरता इन दिनों देश भर में चर्चाओं में है. इसी अस्थिरता के बीच मुख्यमंत्री हरीश रावत का एक स्टिंग ऑपरेशन भी सामने आया है. यह शायद पहला ही मौका है जब किसी व्यक्ति का मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए स्टिंग हुआ हो. इस स्टिंग में हरीश रावत कांग्रेस से बागी हुए विधायकों को वापस लाने के लिए पैसे और मंत्रिपद देने की हामी भरते नजर आते हैं. स्टिंग में ऐसी कई बातें हैं जो बताती है कि हरीश रावत अपनी सरकार बचाने के लिए असंवैधानिक और आपराधिक तरीके अपनाने को भी तैयार हैं. लेकिन यह स्टिंग ऑपरेशन सिर्फ हरीश रावत को ही बेनकाब नहीं करता. लगभग 24 मिनट का यह स्टिंग हरीश रावत के साथ ही पत्रकार उमेश कुमार पर भी कई सवाल उठता है जिन्होंने यह स्टिंग किया है. साथ ही इस स्टिंग को सार्वजनिक करने वाले कांग्रेस के बागी विधायक हरक सिंह रावत स्वयं भी इस स्टिंग में कई तरीकों से फंसते नजर आ रहे हैं. यानी इस स्टिंग से जुड़े जो तीन मुख्य पक्ष हैं, वे तीनों ही विवादों से घिरे हुए हैं. स्टिंग ऑपरेशन में नज़र आने वाली इन तीनों पक्षों की विवादास्पद भूमिका को एक-एक कर समझते हैं:

हरीश रावत

तीन दिन पहले ही राष्ट्रपति शासन लगने के चलते मुख्यमंत्री से पूर्व मुख्यमंत्री हो चुके हरीश रावत की विवादास्पद भूमिका किसी से छिपी नहीं है. स्टिंग से यह साफ़ पता लगता है कि भले ही वे स्वयं विधायकों को खरीदने की पेशकश नहीं कर रहे लेकिन पत्रकार द्वारा ऐसी पेशकश करने पर वे इसके लिए पूरी तरह से तैयार जरूर हैं. पैसों की व्यवस्था करने के साथ ही वे विधायकों को जनता के पैसे की खुली लूट का भी न्यौता देते दिख रहे हैं. स्टिंग में वे कह रहे हैं कि उनका साथ देने वाले विधायक चाहें तो ‘अपने विभागों से जो चाहे कमा लें. हम आंखे बंद कर लेंगे.’ हरीश रावत ने भले ही इस वीडियो को फर्जी बताया है लेकिन चड़ीगढ़ स्थित फॉरेंसिक लैब इस स्टिंग के सही होने की पुष्टि कर चुकी है. साथ ही हरीश रावत ने अपना बचाव करने के लिए स्टिंग करने वाले पत्रकार पर ही काई आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि, ‘यह पत्रकार ब्लैकमेलिंग के लिए कुख्यात हैं और इनका आपराधिक रिकॉर्ड किसी से छिपा नहीं है.’ ऐसे में सवाल हरीश रावत पर भी उठता है. जिस वक्त उत्तराखंड सरकार पर अस्तित्व का संकट छाया हुआ था, जब मुख्यमंत्री का एक-एक मिनट विधानसभा पर आए संवैधानिक संकट को दूर करने के लिए समर्पित होना चाहिए था, ऐसे समय में हरीश रावत लगभग आधे घंटे तक एक ऐसे पत्रकार से बातें कर ही क्यों रहे थे जो उनकी नज़र में ‘ब्लैकमेलर’ और आपराधिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति है.

उमेश कुमार

उमेश कुमार को जानने वालों के अनुसार वे लगभग 14 साल पहले उत्तराखंड आए थे. तब उनका छोटा-मोटा प्रॉपर्टी का व्यवसाय हुआ करता था. लेकिन आज उमेश कुमार एक करोडपति हैं और ‘समाचार प्लस’ नाम के एक स्थानीय चैनल के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ भी हैं. उमेश उत्तराखंड के लगभग सभी मुख्यमंत्रियों के करीबी माने जाते रहे हैं. सिर्फ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को छोड़कर. निशंक ने तो उमेश कुमार की संपत्तियों की कुर्की के आदेश तक जारी कर दिए थे. निशंक के मुख्यमंत्री रहते हुए उमेश कुमार भूमिगत रहे और उन्हें उत्तराखंड में तभी देखा गया जब भुवन चंद्र खंडूरी दोबारा मुख्यमंत्री बने. उमेश कुमार पर लगभग 18 आपराधिक मामले भी दर्ज हुए जिनमें फिरौती मांगने से लेकर धोखाधड़ी जैसे अपराध शामिल थे. लेकिन समय-समय पर सरकार ने ही इन मामलों को ‘जनहित’ में वापस ले लिया. उमेश कुमार की पृष्ठभूमि से इतर यदि सिर्फ इस स्टिंग के संदर्भ में उनकी भूमिका देखी जाए तो भी उन पर कई सवाल उठते हैं. आम तौर पर स्टिंग ऑपरेशन असली पहचान छिपाकर किये जाते हैं. देश के सभी चर्चित स्टिंग असली पहचान को गुप्त रखकर ही किये गए हैं. यदि बतौर पत्रकार उस व्यक्ति से मिला जाए जिसका स्टिंग करना हो तो वह व्यक्ति कभी भी सौदे-बाजी की बातें नहीं करेगा. इसीलिए अधिकतर स्टिंग ऑपरेशन तभी कामयाब होते हैं जब पत्रकार अपनी पहचान छिपाकर, एक सौदेबाज़ बनकर स्टिंग करता है. लेकिन उमेश कुमार का मामला बिलकुल अलग है. हरीश रावत पहले से ही उमेश कुमार को जानते थे. वे यह भी जानते थे कि उमेश एक पत्रकार हैं. फिर भी वे उनसे सौदेबाज़ी कर रहे हैं. इससे साफ़ है कि कम-से-कम हरीश रावत को तो उमेश कुमार के सौदेबाज़ होने का यकीन था. इसके साथ ही स्टिंग में कही गई बातें भी यह साबित करती हैं कि उमेश कुमार पहले भी विधायकों की ऐसी सौदेबाजी में शामिल रहे हैं. स्टिंग में ही एक जगह वे हरीश रावत से कहते हैं ‘भाई साहब पिछली बार की तरह नहीं होना चाहिए. कमिटमेंट पूरा होना चाहिए. पिछली बार वाला इनका (हरक सिंह रावत का) पूरा नही हुआ था. ‘इंदिरा जी (हृदयेश) का पूरा हुआ था इनका नहीं हुआ.’ उमेश कुमार की इन बातों से साफ़ है कि वे पहले भी मुख्यमंत्री से विधायकों की खरीद-फरोख्त में शामिल रहे हैं. इस बात की पुष्टि अलग से हरक सिंह रावत के बयान से भी होती है. स्टिंग सार्वजनिक होने बाद पत्रकारों ने जब हरक सिंह रावत से पूछा कि स्टिंग में ‘पिछले कमिटमेंट’ की बात का क्या मतलब है, तो हरक सिंह रावत का कहना था कि पिछली बार भी मंत्रालय देने की बात हुई थी और वह बात उमेश कुमार ने ही करवाई थी. यानी उमेश कुमार हरक सिंह रावत के लिए पहले भी ऐसी सांठ-गांठ करते रहे हैं. इस स्टिंग के सार्वजनिक होने का तरीका भी उमेश कुमार को संदेह के घेरे में खड़ा करता है. एक पत्रकार यदि इतना बड़ा कोई स्टिंग कर लेता है तो वह सबसे पहले उसे अपने चैनल पर चलाता है. लेकिन उमेश कुमार ने हंगामा मंचाने वाले इस स्टिंग को अपने चैनल की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करने के बजाय कांग्रेस के बागी विधायकों तक पहुंचा दिया.

हरक सिंह रावत

इस पूरे मामले में हरक सिंह रावत अपनी ही बातों में फंसते नज़र आते हैं. यदि वे कहते कि यह स्टिंग उन्होंने ही करवाया है और स्टिंग में जो बातें वे हरीश रावत से कर रहे हैं वे सिर्फ सच्चाई सामने लाने के लिए सुनियोजित तरीके से कही जा रही हैं, तो उन पर उंगली उठाना मुश्किल था. लेकिन हरक सिंह रावत ने पत्रकारों को बताया कि उन्होंने न तो यह स्टिंग करवाया है और न ही उन्हें इसकी पहले से कोई जानकारी थी. उनका यह कहना ही उन पर कई सवाल खड़े करता है. पहला सवाल तो यही उठता है कि 23 मार्च को जब यह स्टिंग ऑपरेशन किया गया उस दिन हरक सिंह रावत समेत कांग्रेस के सभी बागी विधायक गुडगांव के एक होटल में थे और सभी मीडिया वालों से दूर थे. ऐसे में सिर्फ उमेश कुमार के ही संपर्क में हरक सिंह रावत कैसे थे? दूसरा सवाल स्टिंग के दौरान हरक सिंह रावत की हरीश रावत से हुई बातचीत पर उठता है. 24 मिनट के स्टिंग के दौरान उमेश कुमार ने दो बार हरक सिंह रावत को फ़ोन मिलाया और उनकी हरीश रावत से बात करवाई. इस बातचीत का ऑडियो भी सार्वजनिक हुआ है. पहली बार हुई यह बातचीत इस तरह शुरू होती है:

हरीश रावत: हेल्लो
हरक सिंह रावत: हां भाई साहब नमस्कार
हरीश रावत: नमस्कार नमस्कार
हरक सिंह रावत: जी
हरीश रावत: कितना गुस्सा नीचे आया?
हरक सिंह रावत: नहीं भाई साहब सब नार्मल है. भाई साहब मैंने उमेश को सब बता दिया है. उमेश आपसे बात कर लेगा.

स्टिंग के बाद हरक सिंह रावत ने बयान दिया था कि हरीश रावत ने उमेश कुमार के जरिये बागी विधायकों को खरीदने की कोशिश की है. लेकिन इस बातचीत से साफ़ है कि हरीश रावत पैसों की पेशकश नहीं कर रहे थे बल्कि हरक सिंह रावत स्वयं ही पहले कह रहे हैं कि उन्होंने उमेश को सब बता दिया है. अब यदि हरक सिंह रावत नहीं जानते थे कि यह स्टिंग हो रहा है तो साफ़ है कि वे उमेश के जरिये हरीश रावत से पैसे और मंत्रिपद सचमुच ही मांग रहे थे. स्टिंग के दौरान जब दूसरी बार उमेश कुमार फ़ोन मिलाते हैं तो वे हरक सिंह रावत से कहते हैं, ‘भाईसाहब ‘मोर ओर लेस बात हो गई है. ठीक है. बाकी मैं आपको आके बताता हूं.’ इससे साफ़ है कि उमेश कुमार हरक सिंह रावत से बात करने के बाद ही हरीश रावत से सौदेबाजी के लिए पहुंचे थे और इसके पूरा होते ही उमेश ने उन्हें फ़ोन करके बताया कि ‘भाईसाहब बात हो गई है.’ इतना कहने के साथ ही वे हरक सिंह रावत की दोबारा हरीश रावत से भी बात करवाते हैं. इस बातचीत में हरीश रावत कहते हैं, ‘मेरे लिए तो तुम सस्ते में निपट गए. मैं तो छोटे भाई की तरह से सभी तुमको देकर के जाना चाहता था. मैं तो सभी से कहता था कि उससे (हरक सिंह रावत से) ज्यादा कोई एनर्जेटिक है ही नहीं. चलो, ये तो सस्ती बात है.’ इन दोनों ही बातचीतों से साफ़ है कि खरीद-फरोख्त की यह पूरी पेशकश हरीश रावत की तरफ से नहीं बल्कि दूसरी तरफ से की गई थी. और हरक सिंह रावत का यह कहना अगर सच है कि उन्हें स्टिंग की जानकारी नहीं थी, तो इसका मतलब यह है कि वे सच में ही इस खरीद-फरोख्त में शामिल थे. स्टिंग के वीडियो में उमेश कुमार यह भी कह रहे हैं कि ‘पिछली बार कमिटमेंट पूरा नहीं हुआ था.’ इस ‘कमिटमेंट’ के बारे में हरक सिंह रावत ने बयान दिया है कि पिछली बार भी उन्हें मनचाहा विभाग देने की बात कही गई थी लेकिन अंततः दिया नहीं गया था. साथ ही हरक सिंह रावत ने यह भी कहा है कि पिछली बार भी उमेश कुमार ने ही हरीश रावत से बातचीत की थी. इससे पता चलता है कि उमेश कुमार पहले भी हरक सिंह रावत और अन्य विधायकों को मनचाहे विभाग का मंत्री बनाने के लिए हरीश रावत से बात कर चुके हैं. कैबिनेट के फैसलों में एक कथित पत्रकार का बिचौलिए के रूप में काम करना सिर्फ उस पत्रकार और उसकी पत्रकारिता पर ही नहीं बल्कि पूरी कैबिनेट पर भी सवाल खड़े करता है. 24 मिनट का यह स्टिंग, स्टिंग के बाद आए हरीश रावत और हरक सिंह रावत के बयान, उमेश कुमार की पृष्ठभूमि और इस स्टिंग में उनकी भूमिका. इन सभी को साथ में देखने से यह समझ आता है कि स्टिंग में शामिल ये तीनों ही पक्ष ऐसे हमाम में खड़े हैं, जहां कपड़े पहने हुए कोई भी नजर नहीं आता.

साभार : सत्याग्रह डॉट कॉम


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