रंगनाथ सिंह-
जब देश का नेता विपक्ष विदेशी ताकतों से मिल जाए तो कोई क्या करे! अमेरिका ने वेनेजुएला में जो किया वह किसी फिल्म जैसा है। यकीन नहीं होता मगर वह हो चुका है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को अगवा करने के कुकृत्य को नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त विपक्षी नेता मचाडो ने “स्वतंत्रता की घड़ी का आगमन” बताया है। दूसरा कोई क्या रोए, जब किसी देश का नेता विपक्ष ही विदेशी ताकतों से मिल जाए!
हमारे पड़ोसी देश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई प्रधानमंत्री का तख्तापलट कराकर एक मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त कठपुतली को सत्ता दी गयी। कठपुतली सलाहकार के बाद भी सत्ता लंदन से दो दशक बाद लौटे नेता विपक्ष को गद्दी मिलने की पूरी संभावना है क्योंकि सबसे बड़ी पार्टी के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध है! दूसरे पड़ोसी देश में वहाँ के सबसे लोकप्रिय नेता और प्रधानमंत्री ढाई साल से जेल में बन्द हैं क्योंकि चुनाव हारने के बाद विपक्ष ने सेना के तलवे चाट लिये। सेना ने अमेरिका के।
अब देखना है कि नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त विपक्षी नेता मचाडो अमेरिकी कठपुतली बनकर सत्ता पाती हैं या जनता उनके खिलाफ सड़क पर आती है।
भारत भाग्यशाली है कि अभी यहाँ के निजाम से नाराज अमेरिकी सांसद, जर्मन सांसद, ब्रिटिश सांसद इत्यादि केवल लेटर लिख रहे हैं और बयान जारी कर रहे हैं। सेना उतारने की शायद उन्हें जरूरत न पड़े। अमेरिका पहले ही भारत पर टैरिफ हमला कर चुका है और हमारे पड़ोस के दो देशों की सेनाएँ उनके पैरोल पर हैं जो भारत के आर्थिक और सामरिक विकास की रफ्तार को उसी तरह रोकती रहेंगी जैसे पिछले 77 साल से रोकती आ रही हैं।
यह भी खबर है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण कर के न्यूयॉर्क में रखा गया है। दावा किया गया है कि उन पर न्यूयॉर्क में कथित मुकदमा चलाया जाएगा। अब देखना है कि न्यूयॉर्क के नए मेयर जबानी विरोध की खानापूर्ति से आगे बढ़कर मादुरो की रिहाई के लिए क्या करते हैं!
लातिन अमेरिकी देशों की सबसे बड़ी कमजोरी है उनकी आपसी फूट। जब तक ये सारे देश मिलकर एक बड़ा दक्षिण अमेरिकी राज्य नहीं बना लेते तब तक उनके छोटे-छोटे देशों में उत्तरी अमेरिका की सेना इसी तरह निर्लज्ज तख्तापलट कराती रहेगी। फुटबॉल प्रेमियों को यह जानना चाहिए कि दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटिना ने इस तख्तापलट का समर्थन किया है।
गुलजारियत में जीने वालों को यह जानना चाहिए कि उनके पास वेनेजुएला से जुड़ी सटीक जानकारी पहुँचना लगभग नामुमकिन हो चुका है क्योंकि वो जितने भी चैनल से सूचना पाते हैं उन सभी पर अमेरिकी टेक इंडस्ट्री का कंट्रोल है। जिन एजेंसियों से भारत के समाचार पत्र और चैनल न्यूज लेते हैं वो सभी यूरोप-अमेरिका-ब्रिटेन के कंट्रोल में हैं। भारत की किसी मीडिया कंपनी ने अपना इंटरनेशनल नेटवर्क नहीं बनाया है।
इंग्लिश मीडिया का बड़ा हिस्सा अमेरिका-यूरोप द्वारा कंट्रोल होता है। वेनेजुएला के एक अखबार को पढ़ने का प्रयास किया तो उसने मादुरो को अथॉरिटैरियन बताते हुए अमेरिकी कार्रवाई को अनुचित बताते हुए अब “लोकतंत्र की बहाली” सुनिश्चित किए जाने की माँग की है। यानी अखबार को तख्तापलट से ज्यादा चिन्ता “लोकतंत्र” की है जिसे बहाल कराने में अमेरिकी सेना को पीएचडी प्राप्त है।
ब्रिटिश एजेंसी रॉयटर ने एक प्रोपगैण्डा जारी किया है जिसमें यह बताया गया है कि अमेरिकी सेना ने यह दुस्साहसिक कारनामा कैसे किया! यानी कहानी किसी देश के राष्ट्रपति को अगवा करने से बदलकर अमेरिकी सेना और सीआईए के शौर्य में बदल गयी है! यहाँ भारत में एक वर्ग इस बात पर नाराज है कि भारत पर चार युद्ध थोप चुके देश और अनगिनत आतंकी हमलों के सूत्रधार देश को निगेटिव लाइट में दिखायी जाने वाली फिल्म क्यों बनायी जा रही है! वहाँ नामी एजेंसी तख्तापलट के अगले ही दिन आक्रमाणकारियों की शौर्य गाथा लिखने में लग गयी है।
यह भी ध्यान रखें कि वेनेजुएला, बांग्लादेश और पाकिस्तान में वहाँ के सबसे लोकप्रिय नेताओं को भगाकर सत्ता अमेरिका के चरणों में समर्पित करने वाले गद्दारों में एक बात कॉमन है कि वे सभी खुद को 100 प्रतिशत परफेक्ट लोकतंत्र के तलबगार बताते हैं। दुनिया में कहीं भी कोई भी तंत्र 100 प्रतिशत प्योर नहीं है मगर ऐसे यूटोपिया का झांसा देकर अवाम को विदेशी ताकतों की गुलामी के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाता है।
सौ की सीधी बात ये है कि दुनिया का इतिहास सत्य से नहीं शक्ति से लिखा जाता रहा है। शक्ति-प्रदर्शन में जो चूक गया उसका सत्य बताने के लिए कोई जिन्दा नहीं बचता। जो युद्ध हार गये उन्हें इतिहास ने खलनायक की तरह प्रस्तुत किया और जो जीत गये वही नायक कहलाए। हालाँकि एलजीबीटीक्यू समाज शायद मेरे बयान से सहमत न हो मगर हर किसी को सहमत करना सम्भव भी नहीं है, तो जो है सो है।
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