सेवानिवृत्त मीडियाकर्मी भी अपना हक लेने के लिए मीडिया मालिकों के खिलाफ मैदान में कूदे

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर अवमानना के केस में माननीय सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, उसके बाद अख़बार कार्यालयों से अपनी सेवा से निवृत हो चुके वर्कर भी अब इस लड़ाई में कूद पड़े हैं। जाहिर है, मालिकान ने अभी तक जो पैसा दिया है, वह मजीठिया के अनुसार नहीं दिया है। पिछले दिनों पटना के कुछ रिटायर वर्करों ने अखबार मालिकानों पर अपना दावा लिखित रूप से ठोंका। सूत्र बताते हैं कि इनकी संख्या बारह के करीब है। इस कड़ी में आगे कुछ और लोगों के जुड़ने की उम्मीद है और आशा की जानी चाहिए कि यह आग धीरे धीरे पूरे देश में लगेगी।

मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ 2008 की जनवरी से मिलना तय हुआ है। तत्कालीन जारी गैजेट में इसका उल्लेख भी है कि वर्कर के बेसिक वेतन का 30 प्रतिशत 2008 से 10 नवम्बर 2011 तक देना है। फिर 11 नवम्बर 2011 से लेकर आज तक मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन मिलना है। इनसे अलग एक बात और जो माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अख़बार मालिकानों से दोबारा कही है, वह यह है कि अख़बार मालिकानों को अपने यहाँ हर हाल में 7 फरवरी 2014 से वर्करों को देने वाली सैलरी को मजीठिया के हिसाब से लागू करना ही है।

जिस अख़बार ने इसे लागू नहीं किया और जुलाई में मिली वेतन पर्ची के साथ उसका कोई वर्कर यदि कोर्ट में चला गया तो वह माननीय सुप्रीम कोर्ट की अवमानना में जेल जायेगा। बस वर्कर को यह साबित करना होगा कि अख़बार समूह किस ग्रेड में है और वह किस ग्रेड का वेतन अपने वर्कर को दे रहा है। ग्रेड साबित करने के लिए अख़बार का वार्षिक टर्नओवर देना होगा। अगर अख़बार या समूह का टर्नओवर 1000 करोड़ है, तो वह ए ग्रेड में  आएगा। 500 से 1000 के बीच का है, तो बी ग्रेड में आएगा। मेरा मानना है, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, पंजाब केसरी, प्रभात खबर, अमर उजाला आदि ए ग्रेड में आएंगे।

जो भी अख़बार कर्मचारी रिटायर हुए हैं, वे इस उपरोक्त साल और मजीठिया के हिसाब से एक अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्हें और कितनी राशि मिलेगी। मेरा तो सीधा मानना है कि ज़िन्दगी भर में कोई अख़बार कर्मी अगर रिटायर होने के बाद 5 से 7 या 10 लाख रूपए जोड़ता है, तो इस समयावधि में आने वाले वर्कर और अच्छी रकम पाने के हकदार होते हैं। बस उन्हें कोर्ट में लड़ना होगा, क्योंकि कोर्ट का यह आदेश है कि जो केस में जायेगा, वही मजीठिया पायेगा। भले ही मालिकान या उनके प्यादे वर्कर को गलत तरह से समझाते हैं, पर वे जानते हैं कि उनकी जान दिनों दिन सांसत में फंसती ही जा रही है। रिटायर वर्कर का क्या जाना है, वे सब कुछ ले चुके हैं। उन्हें केस लगाकर जो भी मिलेगा, बोनस ही होगा वह भी ज़िन्दगी भर की कमाई से 2 या 3 गुना ज्यादा।

मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वर्कर को सैलरी हालिया माह में नहीं मिली, तो उसके मालिकानों को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। माननीय सुप्रीम कोर्ट की बात अगर याद हो तो उन्होंने अख़बार मालिकानों को स्पष्ट तौर पर यह कह दिया है कि उन्हें वह एक मौका दे रहे हैं और मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से उन्हें अपने यहाँ हर हाल में वेतन लागू कर देना है। इसके लिए कोर्ट ने तारीख भी फिर से स्पष्ट कर दी है यानि 7 फरवरी 2014 से यह मान्य होगी। वर्कर के वकील अब इस लाइन पर आगे बढ़ रहे हैं और तैयारियों में जुटे हैं कि आगे मालिकानों को कैसे गिरफ्त में लिया जाए!

अब यह भी तय है कि जिन वर्करों को कंपनी ने 7 फरवरी 2014 के बाद चाहे जिस बहाने से निकाला है, वे सीधे तौर पर अवमानना के केस में अपनी सैलरी स्लिप दिखाकर कोर्ट जा सकते हैं कि यह रही मेरी सैलरी स्लिप और मुझे इसका लाभ अब भी नहीं मिला है। यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है कि जिन लोगों ने अवमानना का केस माननीय सुप्रीम कोर्ट में किया था, उनमें बहुत से ऐसे थे, जिन्होंने 20जे के कंसेंट पर साइन नहीं किया था। इस आधार पर भी कोर्ट मालिकानों को अवमानना का दोषी करार दे सकता है। जरूरत है सही तरह से कोर्ट में अपनी बात रखने की और कोर्ट को समझाने की। यदि ऐसा हुआ, तो भी मालिकान जेल जा सकते हैं। कुल मिलाकर मजीठिया का जिन्न अख़बार मालिकानों को फ़िलहाल तो जकड़े ही रहेगा। वर्कर और उनके वकील गुरिल्ला युद्ध की तरह हमेशा तैयारी करते रहेंगे। इससे मुक्ति तभी मिलेगी, जब मालिकान अपने यहाँ सही तौर पर मजीठिया के अनुसार वेतन लागू कर देंगे।

मजीठिया क्रन्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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