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आज के अखबार : ना पाकिस्तान को श्रेय दिया न लोकतंत्र को ‘गेट ऑफ’ कहना सुर्खियों में है  

संजय कुमार सिंह

चुनाव आयोग, तृण मूल कांग्रेस के प्रतिनिधियों की मुलाकात में जो हुआ वह सरकार से लोकतंत्र को निकाल देना है। आज अखबारों में यह खबर निर्विवाद लीड होनी चाहिए थी। ऐसा तो नहीं है लेकिन सभी अखबारों में पहले पन्ने पर है। कुछेक में सामान्य खबर की तरह। ऐसे में द टेलीग्राफ की प्रस्तुति फिर उल्लेखनीय है। बंगाल चुनाव में हंगामा, मनमानी की शुरुआत की खबर के साथ युद्ध विराम की खबर को इस तरह पेश किया है। नहीं कहा जा सकता है कि स्थिति जो दिखाई गई है उससे अलग है। बंगाल में चुनाव के मामले में तो कोई विवाद ही नहीं है। युद्धविराम की सूचना के साथ यह भी बताया गया है कि वेबनान ने हमला किया, स्ट्रेट में मामला सरल नहीं है। मुझे लगता है कि यही खबर है। आज यही दो खबरें बड़ी हैं और टेलीग्राफ ने दोनों को समान महत्व दिया है। अमर उजाला में चुनाव आयोग की खबर इस पहले पन्ने पर नहीं है। युद्ध विराम की खबर भी भ्रम फैलाने वाली है। अमर उजाला का यह पहला पन्ना देखिए। लगता है, युद्ध और इसके प्रभावों से अलग देसी खबरों के लिए एक और पहला पन्ना बनाया गया है। देसी खबरें उसी में हैं और तृणमूल वाली खबर उसी पन्ने पर है। इन खबरों या अखबार के पहले पन्ने के ऊपर वाले हिस्से में परस्पर विरोधी खबरें हैं। पहली खबर है, जंग थम गई और उसके साथ ही खबर है इजराइल ने हमला किया और होर्मुज जलमार्ग फिर बंद हो गया। इसके बावजूद जंग थम गई तो पूछना पड़ेगा थमना किसे कहते हैं। लेकिन  पत्रकारिता पर दबाव और उसमें घुस आई राजनीति के बाद यह सब पूछना बेमतलब है। जो मिल रहा है उसी का आनंद लीजिए। स्थिति यह है कि नवोदय टाइम्स ने दोनों खबरें छापी हैं। शीर्षक एक शब्द, सीजफायर है …. लेकिन लेबनान पर हमले को लेकर बिफरा ईरान समझौता तोड़ने की धमकी दी, होर्मुज किया बंद। इसके बावजूद सीजफायर का कोई मतलब नहीं है लेकिन खबर है। देशबन्धु में इस खबर या इसके आधार पर कोई निर्णय लेने की बजाय सहमति की खबर है। युद्ध विराम हुआ या नहीं की बजाय अमेरिकी राष्ट्रपति के ऐलान की घोषणा की है या सूचना दी है। तीसरा शीर्षक है, पाकिस्तान ने जो काम किया वो भारत को करना चाहिए था : राशिद अल्वी। शीर्षक की चौथी लाइन है – भारत सरकार की विदेश नीति सबसे ज्यादा फेल हुई है। इसके बावजूद देश में जो चल रहा है वह लोकतंत्र को खत्म करने या देश पर कब्जा करने की कोशिश है।

इसलिए आज सबसे बड़ी खबर यह है कि चुनाव आयोग बेलगाम और बदतमीज हो गया है। पक्षपाती तो है ही, निष्पक्ष कई साल से नहीं है। चुनाव में लेवल प्लेइंग फील्ड होता ही नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को अपने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड बनाया है लेकिन नवोदय टाइम्स की खबर का शीर्षक मामले पर लीपा-पोती करने वाला है और चुनाव आयोग का पक्ष बताता लगता है। इंडियन एक्सप्रेस में यह दो कॉलम के किसी सामान्य खबर  की तरह है। दि एशियन एज में यह सिंगल कॉलम की खबर है। इसके साथ ही छह कॉलम का एक शीर्षक है, भगवा विस्तार के बीच दीदी के मुस्लिम आधार को बांटने की कोशिश। नवोदय टाइम्स ने खबर तो चार कॉलम में छापी है लेकिन शीर्षक लिजलिजा है। निर्वाचन आयोग-टीएमसी ने लगाए एक-दूसरे पर आरोप। उपशीर्षक है, बंगाल चुनाव से पहले पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने की आयोग से मुलाकात। जाहिर है कि पार्टी के प्रतिनिधिमंडल में वरिष्ठ सांसद रहे होंगे। सबका अपने क्षेत्र में काम करने का अच्छा-खासा रिकार्ड है और इनमें किसी की भी छवि भाजपा के गालीबाज सांसदों से कई गुना बेहतर है। फिर भी खबर यह है कि दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर आरोप लगाए तो यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि आरोप क्या है। टीएमसी का आरोप है सांसदों के प्रतनिधिमंडल को ‘गेट ऑफ’ कहना। जी हां, बंगाल में चुनाव है, ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। उनकी नियुक्ति क्यों और कैसे हुई है सबको पता है। उनके काम को देखते हुए पहली बार किसी चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था और उसे सरकार के दो प्रतिनिधियों – लोकसभा अध्यक्ष तथा राज्यसभा के सभापति ने खारिज कर दिया है। दोनों सरकार के प्रतिनिधि नहीं होते हैं फिर भी मैंने लिखा है तो अकारण नहीं है। अभी उसके विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है। ऐसे में मुख्य चुनाव आयु्क्त या उनके नेतृत्व में पूरा आयोग तृणमूल पार्टी से नाराज हो सकता है लेकिन ‘गेट ऑफ’ कहना अधिकारों का दुरुपयोग है और चुनाव आयोग के अधिकार संविधान से आते हैं, सरकार से नहीं। लेकिन व्यवहार बता रहा है कि सरकार के समर्थन या संरक्षण का असर है। इसलिए खबर और शीर्षक यह नहीं हो सकती है जो नवोदय टाइम्स में है। 

देशबन्धु में यह खबर दो कॉलम में है और शीर्षक वैसे ही ठंडा है। टीएमसी व चुनाव आयोग की बैठक में नोकझोंक। मुझे नहीं लगता है कि यह नोकझोंक है। नोकझोंक किसी तीसरी जगह में हो सकती है। चुनाव आयोग का चुनाव आयोग के दफ्तर में गेट ऑफ कहना यानी निकल जाइए – बदतमीजी है, अपमान है। चुनाव आयोग का दफ्तर, चुनाव और अधिकारी भी चुनाव आयोग नहीं हैं।  देश के हैं, देश के खर्चे से चलते-पलते हैं और सांसदों को अपमानित करने का कोई अधिकार नहीं है। उसमें चले जाइए, निकल जाइए कहना तो अतिथि का भी अपमान है। संस्कारों की बात करने वाली पार्टी का पंसदीदा चुनाव आयोग अतिथि को निकल जाइए कहे तो कहना पड़ेगा कि वह जगह उसकी नहीं है। और उसकी है तो उतनी ही जितनी देश की है, सांसदों की है, जन प्रतिनिधियों की है। इसलिए यह शीर्षक भी ठीक नहीं है जो खबर है उसके लिहाज से बेहद लचर। मुझे लगता है कि इसका कारण हिन्दी में चीजों को सरलीकृत करने की आम प्रवृत्ति भी हो सकता है हालांकि यह मामला पर्याप्त गंभीर है और सरलीकृत करने लायक तो बिल्कुल नहीं है। आपको सरकार का विरोध नहीं करना है मत कीजिए, डर लगता है डरिए लेकिन जो कहिए वह सच हो। सच ही बताना चाहिए। पक्का नहीं हो तो चुप रह सकते हैं। कोई आप पर दबाव डाल सकता है कि ऐसा कहो या ऐसा मत कहो लेकिन कोई यह दबाव नहीं डाल सकता है कि इस मुद्दे पर कुछ तो बोलो। मेरे ख्याल से इसीकारण अब ना कोई पेट्रोल महंगा होने पर कुछ कहता है ना डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत पर। वित्त मंत्री ने जो कहा वह अपनी जगह है लेकिन उनका कहना अपवाद है वे घोषित रूप से सरकार के साथ हैं।

अमिताभ बच्चन ने 2012 में पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर तंज कसते हुए एक ट्वीट किया था। उन्होंने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा था कि अब गाड़ी चलाने के बजाय 2-4 रुपये का पेट्रोल डालकर उसे आग लगा देनी चाहिए। इसी तरह, अभिनेत्री जूही चावला ने 2013 में ट्वीट कर कहा था, “थैंक गॉड, अपुन के अंडरवियर का नाम ‘डॉलर’ है। ‘रुपया’ होता तो बार-बार गिरता रहता”। यह तब की बात है जब डॉलर के मुकाबले रुपया 60 के पार गया था। अभी 95 के करीब है। लेकिन उनपर कोई दबाव नहीं डाल सकता है कि फिर वैसा ट्वीट करें या कहें कि अंडरवीयर नेक टाई बन गई है टोपी बनने का इंतजार कर रही हूं। स्पष्ट है कि आम आदमी, प्रचारक और प्रवक्ता की बात अलग होती है। पत्रकार का काम है सच बताना। नहीं बता सके तो चुप रहे, दूसरा सच बताए। आज कई अखबार इस लिहाज से चूक गए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, चुनाव आयोग-तृणमूल कांग्रेस की बैठक में शब्दों के जहरीले वाण चले। इस खबर का इंट्रो है, सांसद चीखे : चुनाव आयोग; मुख्य चुनाव आयुक्त ने हमसे कहा : बाहर निकलिए। मुझे लगता है कि यह सच्चाई के काफी करीब है जबकि हिन्दी के अखबारों में चुनाव आयुक्त को बचाने की कोशिश दिखाई दे रही है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक भी ऐसा ही है, टीएमसी के सांसदों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त से हमसे कहा गेट लॉस्ट; चुनाव आयुक्त ने सीधी बात से हमला किया। खास बात यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने सात मिनट में ही कह दिया, गेस्ट लॉस्ट और सीधी बात के नाम पर जो कहा या किया वह एक्स पर एक पोस्ट के रूप में भी सार्वजनिक है, “चुनाव आयोग की तृणमूल कांग्रेस को दो टूक – पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव : भय रहित, हिंसा रहित, धमकी रहित, प्रलोभन रहित,  छापा रहित, बूथ एवं सोर्स जामिंग होकर ही रहेंगे। इंडियन एक्सप्रेस ने इसी को सीधी बात लिखा है। हालांकि सोशल मीडिया पर इसके लिए चुनाव आयोग की आलोचना ही हो रही है। द हिन्दू में यह खबर दो कॉलम में किसी सामान्य खबर की तरह है और शीर्षक है, चुनाव आयोग और तृणमूल के बीच बैठक कटुतापूर्ण माहौल में समाप्त हुई। कहने की जरूरत नहीं है कि बोफर्स घोटाले पर तरह-तरह के खुलासे करने वाले इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू के इस सरकार के साथ अलग ही संबंध हैं और वह अक्सर दिखता रहता है। हालांकि, आज हिन्दुस्तान टाइम्स भी पीछे नहीं है। यहां यह पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर दो कॉलम की सामान्य खबर की तरह है। इसका शीर्षक है, ईसी के स्ट्रेट टॉक (सीधी बात) के बाद  टीएमसी ने पलटवार किया। खबर इस प्रकार है, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच बुधवार को नई दिल्ली में हुई बैठक ने एक तीखे टकराव को जन्म दिया। इसमें चुनाव आयोग द्वारा अभूतपूर्व हमला किया गया और राजनीतिक दल ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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