
संजय कुमार सिंह
जेल में बंद मुख्य मंत्री ने सीबीआई पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया, पत्नी ने ट्वीट किया। आज के अखबारों में पहले पन्ने पर दोनों बातें शीर्षक में नहीं हैं। हालांकि, दोनों खबरें भी एक-एक अखबार में ही हैं। आप कह सकते हैं कि यही क्या कम है। आपको पता चला? नहीं चला तो इमरजेंसी को कोसिये। यही नया फैशन (या पैशन) है। वरना स्पेक्ट्रम नीलामी रिजर्व मूल्य 96 हजार करोड़ के मुकाबले 12 हजार करोड़ से भी कम में हुई है। पहले पन्ने पर खबर भी नहीं है। द टेलीग्राफ की इस खबर का शीर्षक हो सकता था, स्पेक्ट्रम नीलामी में रिजर्व प्राइस का 12 प्रतिशत ही मिला या सिर्फ 12 प्रतिशत में स्पेक्ट्रम नीलाम या ऐसा ही कुछ। कोई भक्त भी शीर्षक लगाता तो लिखता स्पेक्ट्रम नीलामी में उम्मीद से 84 हजार करोड़ कम मिले। यह शीर्षक ऐसा है कि कोई खबर पढ़ेगा ही नहीं कि सरकार को 11340 करोड़ मिले तो हम क्या करें। और बहुमत से चुनी ईमानदार सरकार के राज में सब ठीक ही है, बहुत मिले।

आज ज्यादातर अखबारों में ओम बिरला के लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने की खबर लीड है। संख्या के लिहाज से यह पहले से तय था और होना ही था। नवोदय टाइम्स में कल यही लीड था। इसलिये बिरला अध्यक्ष बने यह कोई नई बात नहीं है। खबर यह है कि पद स्वीकार करने के बाद उन्हें खरी-खोटी सुननी पड़ी या सुनाई गई। यही नहीं, 49 साल बाद इमरजेंसी पर प्रस्ताव आया, भी खबर है। इसी तरह केजरीवाल सीबीआई की हिरासत में भेजे गये, यह खबर तो है लेकिन यह शीर्षक नहीं है कि उन्होंने सीबीआई पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया है। कल अगर 49 साल पुरानी इमरजेंसी को याद किया गया तो एक मुख्यमंत्री को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने की स्थितियां बनते समय सीबीआई द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाना इमरजेंसी की ज्यादतियों से बुरा है। तब किसी निर्वाचित और पदेन मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई थी।
अगर कोई यह कहना चाहे कि तब ऐसा कोई मुख्यमंत्री नहीं था तो मैं सरकार से ज्यादा आम आदमी पार्टी की बात पर यकीन करूंगा कि उन्हें फंसाया गया है। ऐसा इसलिए कि भिन्न दलों के तमाम राजनीतिक जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, वाशिंग मशीन पार्टी में हैं। कुल मिलाकर, लग रहा है कि केजरीवाल को झूठ बोलकर गिरफ्तार किया गया है और सरकार की कोशिश है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें जमानत न मिले ताकि उनके भ्रष्ट होने के आरोपों को पुख्ता कहने का आधार बने। हालांकि अभी मुद्दा वह नहीं है, मुद्दा यह है कि अखबारों ने इसे शीर्षक नहीं बनाया। कल ही इमरजेंसी को कोसा गया – तब भी नहीं। आज नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, आपातकाल पर भिड़ंत से सत्र की शुरुआत। उपशीर्षक है, स्पीकर ने आपात काल की निन्दा का प्रस्ताव पढ़ा, विपक्ष का जोरदार विरोध।
बिरला के स्पीकर चुने जाने की खबर अलग दो कॉलम में है। इसका शीर्षक है, ध्वनिमत से स्पीकर चुने गये बिरला। उपशीर्षक है, पिछले कार्यकाल की सहारना की और आगे के लिए वैसे ही उम्मीद जताई। अखबार ने लीड के साथ एक्स पर प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी छापी है, “मुझे खुशी है कि लोकसभा अध्यक्ष महोदय ने आपातकाल की कड़ी निन्दा की, उस दौरान की गई ज्यादतियों को रेखांकित किया और लोकतंत्र का किस प्रकार गला घोंटा गया, उसका भी उल्लेख किया। आपातकाल के दौरान पीड़ित सभी लोगों के सम्मान में सदस्यों का सदन में मौन खड़े होना भी एक अद्भुत भाव प्रदर्शन था”। इसके साथ ही केजरीवाल को सीबीआई हिरासत में भेजे जाने की खबर तथा उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल का ट्वीट है, पूरा तंत्र यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि केजरीवाल जेल से बाहर न आयें। यह कानून नहीं है, यह तानाशाही है, यह आपातकाल है। नवोदय टाइम्स ने ओम बिरला को बधाई देते हुए राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने जो कहा उसे भी दो कॉलम में छापा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने ओम बिरला के अध्यक्ष चुने जाने की खबर को लीड नहीं बनाया है। यह सेकेंड लीड है। केजरीवाल को सीबीआई हिरासत में भेजे जाने की खबर लीड है। इसका शीर्षक है, सीबीआई को मुख्यमंत्री की तीन दिन की हिरासत मिली। इंट्रो है, यह कहना गलत है कि मैंने सिसोदिया का नाम लिया है। इस खबर की खास बातों का शीर्षक है, जमानत पर हाईकोर्ट की रोक के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट से वापस ली गई। आप जानते हैं कि उन्हें राउज एवेन्यू कोर्ट से नियमित जमानत मिल गई थी लेकिन ईडी की अपील पर हाईकोर्ट ने जमानत के आदेश की प्रति के बिना स्टे कर दिया। केजरीवाल ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अदालत ने हाईकोर्ट के रुख को असामान्य मानते हुए अपील स्वीकार कर ली थी और उसपर सुनवाई होती उससे पहले ही पहले से जेल में बंद मुख्यमंत्री की तीन दिन की हिरासत का आदेश सीबीआई को कोर्ट से मिल गया। सेकेंड लीड लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने पर है। इसका शीर्षक है, ओम बिरला दूसरी बार ध्वनिमत से स्पीकर चुने गए। विपक्ष ने मतदान के लिए जोर नहीं दिया। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, इमरजेंसी विरोधी प्रस्ताव ने कांग्रेस को अलग-थलग कर दिया।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने खास बातों में बताया है, केजरीवाल को हिरासत में रखने की मांग करते हुए सीबीआई ने दावा किया कि मुख्यमंत्री दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं। इसलिए दोनों की आमने-सामने की पूछताछ जरूरी है। केजरीवाल ने स्वंय अदालत को संबोधित किया और इनकार कि ऐसा कोई बयान दिया है जिसमें शराब नीति घोटाले का पूरा आरोप सिसोदिया पर डाल दिया है। उन्होने कहा, मैंने कहा था कि सिसोदिया निर्दोष हैं, आम आदमी पार्टी निर्दोष है, मैं निर्दोष हूं। पर सीबीआई की योजना मीडिया में हमें बदनाम करने की है। कृपया दर्ज करें कि सीबीआई सूत्रों ने फर्जी खबर फैलाई है। अदालत केजरीवाल की इस बात से सहमत हुई कि उन्होंने कभी भी सिसोदिया को फंसाने की कोशिश नहीं की है। तब आम आदमी पार्टी ने कहा कि सीबीआई झूठ बोलती पकड़ी गई है।
द टेलीग्राफ में आज लीड का शीर्षक है, “जनता की आवाज को मत रोकिये : विपक्ष”। इसका फ्लैग शीर्षक है, स्पीकर बिरला को ‘दमन’ और ‘निलंबन’ के खिलाफ ज्ञान दिया गया। केजरीवाल वाली खबर का शीर्षक है – अब सीबीआई ने केजरीवाल को हिरासत में लिया। इंडियन एक्सप्रेस में बिरला को दूसरा कार्यकाल मिलने की खबर लीड है। इसके साथ राहुल गांधी ने जो कहा वह शीर्षक में है। लोकसभा अध्यक्ष ने इंदिरागांधी और इमरजेंसी के दाग को याद किया। कांग्रेस सांसदों ने विरोध किया। यहां एक खबर का शीर्षक है, मतों का विभाजन नहीं हुआ लेकिन सदन में विभाजन गहरा है।
इंडियन एक्सप्रेस में केजरीवाल को सीबीआई की हिरासत में लिये जाने की खबर दो कॉलम में है। शीर्षक है, केजरीवाल सीबीआई हिरासत में, जब उन्होंने एजेंसी के दावे को गलत बताया तो अदालत ने मुख्यमंत्री का समर्थन किया। उपशीर्षक में बताया गया है कि उन्होंने ऐसा कहने से इनकार किया कि उत्पाद नीति के लिए सिसोदिया जिम्मेदार हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल के खिलाफ पेड़ काटने के आदेश देने का एक मामला चर्चा में है। इंडियन एक्सप्रेस ने आज केजरीवाल की खबर के साथ इसे सिंगल कॉलम में छापा है और बताया है कि दिल्ली सरकार को अवमानना नोटिस दी गई है। इसके अनुसार लीपा पोती का काम चालू है और डीडीए के वीसी को साफ-साफ कहना चाहिये कि एलजी ने पेड़ काटने के आदेश दिये हैं या नहीं। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, डीडीए बड़े लोगों को बचा रहा है।
आज की एक और बड़ी खबर पश्चिम बंगाल से है। विधानसभा उपचुनाव जीते दो विधायकों का आरोप है कि उन्हें शपथ नहीं दिलाई जा रही है। खबर के अनुसार शपथ राज्यपाल को दिलाना है और वे चाहते हैं कि राजभवन में शपथ ग्रहण समारोह हो जबकि विधायकों का शपथग्रहण विधानसभा में होना चाहिये। इसके लिए राज्यपाल को विधानसभा में आना होगा और वे इसके लिए तैयार नहीं हैं। लिहाजा दोनों नवनिर्वाचित विधायक विधानसभा के दरवाजे पर राज्यपाल के इंतजार में बैठ हैं और इस आशय की तख्ती लिये हुए हैं। इमरजेंसी में विधायकों का यह हाल हुआ हो, मुझे तो याद नहीं है। पर दिलचस्प यह है कि अब यह खबर भी नहीं है। इमरजेंसी में खबरें सेंसर हो जाती थीं इंडियन एक्सप्रेस जगह खाली छोड़ देता था अब ऐसा नहीं है। आधे पन्ने का विज्ञापन है सो अलग। मेरे साथ अखबारों में यह फोटो कैप्शन के साथ हिन्दुस्तान टाइम्स में और द हिन्दू में चार कॉलम की खबर फोटो के साथ है।
आज की कुछ खास खबरें
1. उत्तराखंड के भाजपा नेता ने किशोरी से बलात्कार और हत्या में सहायता की; पार्टी से बर्खास्त।
(आप जानते हैं कि भाजपा को 1975 की इमरजेंसी की ज्यादतियों से अभी भी तकलीफ है। लेकिन मुझे 1975 से पहले और 2014 के बाद से अभी तक भाजपा नेताओं को दंगाई, बलात्कारी आदि होने की खबरें ज्यादा मिली है। कांग्रेस के समय में एनडी तिवारी जैसे मामले थे जो भाजपा में वरुण गांधी तक के खिलाफ हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस में किसी बलात्कारी को संरक्षण सुरक्षा का मामला ध्यान में नहीं आता है लेकिन भाजपा में किसी बलात्कारी के खिलाफ कार्रवाई बहुत कम सुनने को मिलती है और आज शायद इसीलिए यह पहले पन्ने पर है।)
2. नीट मामले में प्राचार्य को रोका गया
3. जांच : नीट लीक के बिहार के सरगना ने उत्तर प्रदेश के पेपर सॉल्विंग गैंग से गठजोड़ किया।
4. टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, अमेरिका ने कहा है कि उसने पन्नून की हत्या की साजिश की जांच के संबंध में भारत से अपडेट मांगा है। खबर के अनुसार भारत में चल रही जांच के अपडेट के लिए अमेरिका भारत पर लगातार दबाव डालता रहा है इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, अमेरिका ने कहा है कि भारत संस्थागत सुधार पर नजर रख रहा है।
(भारत में रहते हुए आपको यहां के संचार माध्यमों से इस मामले की जांच या संस्थागत सुधार का कोई आभास है? दूसरी ओर, यह तो पता ही होगा कि कई विदेशी पत्रकारों की देश निकाला दिया जा चुका है। नोट कीजिये, इमरजेंसी की ज्यादती बुरी थी।)
5. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और सरकार के संबंध खराब चल रहे हैं। राजभवन की एक महिला कर्मचारी द्वारा उत्पीड़न की शिकायत के बाद मुख्यमंत्री समेत राज्य के मंत्री 2 मई के बाद से राजभवन जाने से बचते रहे हैं।
6. नोबल विजेता अमर्त्य सेन ने कहा है कि चुनाव नतीजों से पता चलता है कि भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं है।
7. नई दूरसंचार नीति : नौ से ज्यादा सिम रखे तो दो लाख तक जुर्माना
(लैंड लाइन के जमाने में दो-तीन फोन रखना शौक, विलासिता, दिखावा कुछ भी हो सकता था। अब घर, ऑफिस और साथ रखने के लिए जब एक ही फोन है तो दूसरे की जरूरत सामान्य स्थितियों में लगभग नहीं है। मोबाइल आने से पहले घर पर दो लैंडलाइन होने पर तब एक वरिष्ठ और अब दिवंगत पत्रकार ने मुझसे पूछा था कि दो फोन रखना दो पत्नी रखने की तरह नहीं है? बाद में मोबाइल आया तो मुझे उनकी बात याद रही हालांकि, कभी दूसरे फोन की जरूरत नहीं पड़ी। मेरे पास एक ही नंबर है। ऐसे में सरकार नौ नंबर रखने की इजाजत क्यों दे रही है, राम जाने और नौ की इजाजत है ही तो 900 से क्या बिगड़ जायेगा, मैं नहीं जानता। फिर भी सच यह है कि अब परेशान करने वाले फोन की संख्या बहुत बढ़ गई है। डीएनडी का कोई मतलब नहीं है। बीच में ट्रू कॉलर बता देता था कि कोई प्रचारक है पर अब नए नंबरों से इतने फोन आते हैं कि हिसाब नहीं रखा जा सकता।
ऐसे ही एक फोन कॉल से मुझे पता चला कि मेरे नाम से एचडीएफसी बैंक का कोई क्रेडिट कार्ड जारी है जो मुझे मिला नहीं है। मैं इस्तेमाल नहीं करता। पर बैंक से शिकायत किये 15 दिन हो गये। बैंक ने कह दिया कि आपको जो मेल आया है वह फिशिंग होगा। जबकि मैं फोन कॉल की शिकायत कर रहा था, सारे नंबर समय के साथ दिये हैं। साइबर अपराध तो दर्ज ही कराना मुश्किल था। दर्ज हुआ पर कोई पावती नहीं मिली। राम जानें।
अमर उजाला में आज पहले पन्ने पर छपी खबर में बताया गया है कि ग्राहकों की मंजूरी के बिना कारोबारी संदेश भेजे तो कार्रवाई होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा नियम पहले भी होगा और यह पूरी तरह नया नहीं होगा। पुराने नियम से क्या कार्रवाई हुई है, हम सब जानते ही हैं।
स्पेक्ट्रम नीलामी आज की सबसे महत्वपूर्ण खबर द टेलीग्राफ में बिजनेस पेज पर है। इसके अनुसार स्पेक्ट्रम की नीलामी से 11340 करोड़ रुपए मिले। मुझे टूजी घोटाले की याद आई जो एक लाख 76 हजार करोड़ का बताया गया था और तबके सीएजी की मदद ली गई थी। उन्हें बाद में ईनाम भी दिया गया। पर अदालत में मुकदमा नहीं टिका। यही नहीं, बाद में कभी कोई जी इस कीमत में नहीं बिका। अब चाहे स्थिति बदल गई हो और पहले बाले को बदनाम करने का संघी तरीका मानकर छोड़ भी दिया जाये तो आज की खबर है कि जिस नीलामी के लिए सरकार को 12 हजार करोड़ रुपये भी नहीं मिले उसके लिए 96238 करोड़ रुपये अनुमानित (सच पूछिये तो रिजर्व) मूल्य था। कायदे से रिजर्व प्राइस से कम में बेचना ही नहीं चाहिये और यह तय होना चाहिये कि रिजर्व प्राइस से कम में किसकी अनुमति से बेचा गया और इसमें कोई खेल है कि नहीं। आखिर रिजर्व प्राइस की भी कोई इज्जत तो होनी ही चाहिये। पर अब यह सब खबर नहीं है। केजरीवाल के 100 या 1000 करोड़ के अदृश्य घोटाले के अलावा कुछ दिख ही नहीं रहा है। संभव है कि रिजर्व प्राइस का अनुमान लगाने वाले वही लोग हों जो तय नहीं कर पा रहे हैं कि दिल्ली का एक्साइज घोटाला 100 करोड़ का है या हजार का। अभी भी वैसे ही अनुमान लगा रहे हों या अनुमान वैसे ही ज्यादा हो। फिर भी रिजर्व प्राइस तो रिजर्व ही रहेगी। तब सरकार को रिजर्व प्राइस कम रखने के लिए बदनाम किया गया। अब मीडिया में खबर भी नहीं है। इमरजेंसी बुरी थी। अभी सब चंगा सी।


