
संजय कुमार सिंह
आज के सभी अखबारों की लीड एक ही है – कोलकाता में डॉक्टर के साथ बलात्कर और हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। निश्चित रूप से यह कानून का मामला है और मैं कानून का जानकार नहीं हूं और कानून पर लिखना मेरा काम भी नहीं है। पर आज चूंकि सभी अखबारों में यही निर्विवाद रूप से लीड है तो जाहिर है यह बड़ी खबर है और निर्विवाद रूप से खबर ही है। मैं इसके खबर वाले रूप पर चर्चा कर रहा हूं और इसमें सुप्रीम कोर्ट के अधिकार या सम्मान की कोई बात नहीं है। यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट से संबंधित खबरों को या किसी खबर को लीड बनाने का रिवाज नहीं है। इसलिए लीड बनाना या नहीं बनाना भी सुप्रीम कोर्ट के सम्मान का मामला नहीं है। मुझे लगता है कि आज चंपई सोरेन का मामला ज्यादा महत्वपूर्ण था और खबर वह है। उन्होंने अपनी बात ट्वीटर पर साझा की है, उससे पहले उन्होंने जो कहा और किया तथा ट्वीटर पर उनकी बात साझा करने के बाद जो सब हुआ वह राजनीति है और घटिया राजनीति या राजनीतिकों के घटिया होने का मामला है इसलिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। बंगाल का मामला भी रानजीति का हिस्सा ही है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लिया जाना उसी राजनीति की परिणति है जो इन दिनों देश में चल रही है। राजनीति के लिहाज से खबर दोनों बड़ी है और दोनों पहले पन्ने पर है इसलिए कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। आइये अब यह देखें कि खबर क्या है।
मेरे सात अखबारों में सिर्फ कोलकाता के द टेलीग्राफ में यह लीड नहीं है या सिंगल कॉलम की खबर है। टेलीग्राफ ने आठ कॉलम के एक फ्लैग शीर्षक के तहत तीन खबरें छापी हैं और इनमें सुप्रीम कोर्ट की खबर एक और अकेली सिंगल कॉलम की खबर है। इनमें तीन कॉलम की एक फोटो है जिसका कैप्शन हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, रविवार की शाम साल्ट लेक स्टेडियम के बाहर प्रदर्शन में ईस्ट बंगाल और मोहन बगान के झंडे तिरंगे के साथ लहरा रहे हैं। पहली खबर का शीर्षक है, पीड़िता के हक में : मोहन बगान। कलकत्ता डेटलाइन से स्नेहल सेनगुप्ता और मोनालिसा चौधरी की बाईलाइन वाली यह खबर इस प्रकार है, आरजी कर अस्पताल में 9 अगस्त को एक स्नातकोत्तर प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या को लेकर आक्रोश नए अवरोधों को तोड़ रहा है। शहर के शीर्ष फुटबॉल क्लबों ने 31 वर्षीय पीड़िता और उसके परिवार के लिए शीघ्र न्याय की मांग करने के लिए अपनी जानी-मानी प्रतिद्वंद्विता को किनारे कर दिया है। मोहन बागान, ईस्ट बंगाल और मोहम्मडन स्पोर्टिंग के हजारों समर्थकों ने रविवार को साल्ट लेक स्टेडियम के सामने एक रैली की, जिससे ईएम बाईपास पर बेलेघाटा क्रॉसिंग और वीआईपी रोड फ्लाईओवर के दक्षिणी छोर के बीच का रास्ता चार घंटे से अधिक समय तक अवरुद्ध रहा।
प्रदर्शनकारी दोपहर साढ़े तीन बजे से ही स्टेडियम के वीआईपी गेट के सामने जमा होने लगे थे। ईएम बाईपास की नाकेबंदी एक घंटे बाद शुरू हुई, जो चरणों में जारी रही क्योंकि पुलिस द्वारा हटाए गए लोगों की जगह नए समूहों ने ले ली। रात 8.45 बजे तक बाईपास के दोनों किनारों को साफ कर दिया गया, जिसके बाद वाहन फिर से चलने लगे। गुस्साए प्रदर्शनकारियों में अधिकांश अपने क्लब की जर्सी में थे। इनलोगों ने मारी गई जूनियर डॉक्टर के लिए न्याय की मांग करते हुए नारे लगाए और पूछा कि अब तक केवल एक व्यक्ति को गिरफ्तार क्यों किया गया है। दूसरी खबर का शीर्षक है, “न्याय मांगने के लिए ममता के पुलिसियों ने तृणमूल के सांसद को बुलाया”। तीसरी, सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, “सबसे दुर्लभ कदम के तहत, सुप्रीम कोर्ट ने आरजी कार का मामला हाथ में लिया”। इससे आप समझ सकते हैं कि बलात्कार और हत्या का विरोध हर कोई कर रहा है और उसमें पार्टी, जाति, गिरोह या गुट के आधार पर भेदभाव नहीं है। इसका पता आधी रात के बाद हुए प्रदर्शन तथा टेलीग्राफ में उसकी रिपोर्टिंग तथा प्रस्तुति से भी चल रहा था और तब भी मैंने लिखा था बंगाल का समाज हमारे समाज जैसा नहीं है या अलग है और यह शुरू से दिख रहा है। इस कांड के बहाने तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को घेरने की भाजपाई कोशिशें साफ दिख रही थीं और उन्हें कामयाबी चाहे मिली हो पर वह काम तृणमूल के लोग भी कर रहे हैं।
भाजपा समर्थक अगर यह प्रचारित करने की कोशिश कर रहे थे कि ममता बनर्जी किसी को बचा रही हैं, राज्य पुलिस निष्पक्षता के साथ कुशलता से काम नहीं कर रही है तो वह सब धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा है। भाजपायी कोशिशों का असर (हिन्दी पट्टी के) एंकर, संपादक, पत्रकार, चैनल मालिक सब के काम में दिख रहा है और कुछ निष्पक्ष या भाजपा विरोधी पत्रकार भी जोश में आ गये, यह भी किसी से छिपा नहीं है। 9 तारीख को हत्या के बाद मुख्य अभियुक्त को 12 घंटे के अंदर गिरफ्तार कर लिया गया, हाईकोर्ट के आदेश पर जांच सीबीआई को सौंपी जा चुकी है, सरकार के कथित ढीले रुख के खिलाफ प्रदर्शन और तोड़फोड़ हो चुका है। कुल मिलाकर, जिसे जो ठीक लगा किया। गुस्सा था, निकाला। कार्रवाई चल रही है। हर मामले में। यही लोकतंत्र है और व्यवस्था ऐसी ही होनी चाहिये। मैं तो कहूंगा कि आदर्श स्थिति है और प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की तो यह उनका मामला है और इसमें सरकार या राजनीति नहीं देखा जाना चाहिये। कार्रवाई हो ही रही है। दूसरी ओर, देहरादून में बस में बलात्कार के मामले में सत्तारूढ़ पार्टी के लोग बोलेंगे नहीं क्योंकि बोले तो मुख्यधारा की राजनीति से उनकी पार्टी ही अलग कर देगी। दूसरों को मतलब नहीं है, और सबको पता है कि उनकी इच्छा और समर्थन से सत्ता में बैठे लोग ‘हिन्दुओं को मजबूत कर रहे हैं’। सरकार का विरोध करने पर तो राहुल गांधी नहीं बचे कोई आम आदमी क्या कर सकेगा। विनेश जैसी पहलवान और ब्रजभूषण सिंह जैसे सांसद तथा कुश्ती संघ के अध्यक्ष का मामला भी सामने है। समाज ने जो किया वह अपनी जगह। मैं तो कहूंगा कि वापस आने पर जो स्वागत हुआ उसकी खबर भी दबा दी गई।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और तब लिया है जब बहुत सारे मामलों में कम से कम मैं निराश हुआ हूं। हालांकि, अमर उजाला की खबर के अनुसार, …. वकील उज्ज्वल गौड़ व रोहित पांडे और तेलंगाना की डॉ. मोनिका सिंह ने शुक्रवार को चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर मामले का स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह किया था। मैं कई अन्य मामलों (जैसे सेबी प्रमुख) में स्वतः संज्ञान लिये जाने की उम्मीद कर रहा था पर मैंने कोई चिट्ठी नहीं लिखी है। इसलिए मुझे वास्तविक स्थिति मालूम नहीं है और अखबरों की ही तरह मुझे भी इस खबर से आश्चर्य हो रहा है। हालांकि, ऐसा शीर्षक सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया का है, “सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता मामले को हाथ में लिया, चिकित्सकों की सुरक्षा के मामले में नजर डाल सकती है”। जो भी हो, मैंने कल लिखा था कि आईएमए डॉक्टर की सुरक्षा की मांग कर रहा है, यह तो ठीक है लेकिन सरकार या सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है कि वह डॉक्टर के मामले को प्राथमिकता दे या सुप्रीम कोर्ट उनकी मांग पर ध्यान दे। सुप्रीम कोर्ट के लिए सब एक हैं और सुप्रीम कोर्ट को तो यह देखना चाहिये कि जो आईएमए के तहत संगठित नहीं हैं उनकी हालत क्या है या कैसी होगी और इनमें बिना छुट्टी, बिना साप्ताहिक अवकाश रोज 12 घंटे काम करने वाले सुरक्षा कर्मी भी हैं और अब तो उनमें भी महिलायें भी होंगी। यौन उत्पीड़न के मामले में जो कार्रवाई हुआ है उसे हमने देखा है।
जहां तक कोलकाता मामले की बात है, कल तक की खबरों के अनुसार स्थिति यह थी
1. कोलकाता पुलिस ने भाजपा नेता लॉकेट चटर्जी और दो डॉक्टर – कुणाल सरकार तथा सुवर्णो गोस्वामी को फ़ेक न्यूज़ फैलाने के लिए तलब किया है। बलात्कार और हत्या की शिकार प्रशिक्षु डॉक्टर की पहचान उजागर करने के मामले में भाजपा नेता लॉकेट चटर्जी को भी तलब किया गया है। टीएमसी सांसद सुखेंदु शेखर रे को भी बंगाल पुलिस ने समन भेजा है।
2. इन्हीं खबरों को प्रचारित प्रसारित करने वाले केंद्र सरकार के समर्थक लोगों, प्रचारकों, चैनलों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है, यह गौरतलब है। पर यही लोग कह रहे हैं कि ममता बनर्जी की पुलिस पार्टी के खिलाफ काम करने वालों के खिलाफ हो गई है. द टेलीग्राफ का शीर्षक ऐसा ही है। ऐसा कहने-बोलने वाले और भी लोग हैं।
3. आधी रात के प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़ करने वालों की पहचान से संबंधित रिपोर्ट इंडियन एक्सप्रेस में छपी है। इनमें तृणमूल के दो कार्यकर्ता, कई किशोर और युवा तथा कुछ महिलाएं शामिल हैं। इन्हें गिरफ्तार किया गया है। कुल 76 तस्वीरें जारी की गई हैं 30 लोगों को गिरफ्तार किया है। 15 लोगों के परिवारों से बात चीत में इंडियन एक्सप्रेस को पता चला है कि वे विरोध प्रदर्शन के लिये निकले थे।
4. टीएमसी सांसद सुखेंदु शेखर रे ने सवाल उठाया था कि खोजी कुत्ता तीन दिन बाद क्यों भेजा गया? पुलिस का कहना है कि खोजी कुत्ते को 9 तारीख को ही भेजा गया था। तीन दिन बाद यानी 12 तारीख को दुबारा भेजा गया था। इससे तृणमूल कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र का तो पता चलता ही है, पुलिस को स्वतंत्रता पूर्वक काम करने के लिए मिली आजादी की पुष्टि भी होती है। पर इसका महत्व भक्त और प्रचारक क्या जानें।
5. एक खबर पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर दावे की भी थी अब पता तल रहा है कि वह राजनीति थी।
मुझे लगता है कि इस मामले में जांच संतोषजनक न भी हो तो बंगाल का समाज उपयुक्त कार्रवाई करवा लेने में सक्षम है पर सेबी के भ्रष्टाचार और अदाणी के यहां 20,000 करोड़ रुपये के निवेश के मामले में कार्रवाई नहीं होना और उसे देखना ज्यादा जरूरी है क्योंकि इसी की कमाई से केंद्र सरकार कई राज्यों की सरकार गिरा सकती है। जो हालात हैं उसमें कई विधायक-सांसद दल बदल कर सकते हैं। इतना सब हो सकने के बाद मैं आपको अखबारों का हाल बताऊं कि देहरादून में बलात्कार की खबर आज द टेलीग्राफ के अलावा इंडियन एक्सप्रेस, द हिन्दू और अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। खबर के अनुसार 16 साल की लड़की के साथ पांच जनों ने सामूहिक बलात्कार किया। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का शीर्षक है, देहरादून आईएसबीटी पर अवयस्क के साथ पांच लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया इनमें तीन सरकारी कर्मचारी हैं। क्या बस यात्रियों, अवयस्कों की सुरक्षा की जरूरत नहीं है या यह संतोषजनक है। पर स्थिति यह है कि खबर ही नहीं छपी है। इसी तरह, पिक अप में सवार 12 मजदूरों की मौत हो गई, 28 लोग घायल हैं। इसमें मुद्दा यह है कि ये लोग पिक अप से यात्रा क्यों कर रहे थे। जाहिर है, साधनों की कमी है पर देखने और रोकने वाले कहां हैं? कुछ नहीं हुआ पर मेरठ की यह खबर सभी अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। सबकी अपनी प्राथमिकता या पसंद है। सबको यह अधिकार है कि अपने ही लाभार्थी (या ग्राहक या वोटर) की सेवा करे। कोलकाता में ऐसा नहीं हो पाया। फिर भी सुप्रीम कोर्ट को उसी मामले की चिन्ता है।
आज ही हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी एक खबर के अनुसार, मोहम्मद युनूस ने कहा है कि शेख हसीना के शासन के दौरान बाग्लादेश की सभी संस्थाएं नष्ट कर दी गईं। आप जानते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री तीसरी बार चुने गये हैं तो शेख हसीना चौथी बार चुनी गई हैं। ऐसी लोकप्रिय नेता के सत्ता से हटने के बाद जो पता चल रहा है वही हालत हमारे अपने यहां तो नहीं है? कैसे पता चलेगा? कौन क्या कर सकता है, उसे करना नहीं चाहिये? अगर आप अभी तक मान रहे थे कि अपने यहां सब ठीक है या जो खराब है उसे देखने के लिए सुप्रीम कोर्ट है तो क्या आज के बाद उसपर सोचने-समझने की की जरूरत है? खासकर तब जब आज ही इंडियन एक्सप्रेस में लीड के साथ यह भी खबर है कि, 70 पद्म विजेताओं ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि देश भर में चिकित्सकों के प्रदर्शन के कारण जो चिन्ताजनक स्थिति बनी है उसपर निजी तौर पर ध्यान दें और हस्तक्षेप करें। डॉक्टर का मामला है, उससे देश भर में परेशानी है तो सबको चिन्ता है पर देहरादून में बस में जिसके साथ बलात्कार हुआ उसकी चिन्ता कौन करेगा और उत्तर प्रदेश में बलात्कार इतना आम है तो वहां के समाज को बंगाल जैसा नहीं होना चाहिये? कैसे होगा? मनीष सिसोदिया जो शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम कर रहे थे, 17 महीने जेल रहकर आये हैं। उनके ईक इंटरव्यू सोशस मीडिया पर हैं। वे कह रहे है कि देश भर में वसूली चल रही है। कारोबारियों को परेशान किया जा रहा है। इस कारण उद्योग धंधे चौपट हो रहे हैं। इलेक्टोरल बांड का उदाहरण है, पीएमएलए के दुरुपयोग का मामला है और सब कोलकाता के बलात्कार तथा हत्या कांड से पुराने हैं। इनकी चिन्ता कब होगी? कौन करेगा?
ऐसी हालत में आज कुछ अखबारों में जो खबरें हैं और दूसरे अखबारों में जो नहीं हैं वो अलग परेशान करने वाली हैं – उदाहरण के लिए लैटरल एंट्री के विज्ञापन पर कोई खबर नहीं है। नवोदय टाइम्स की खबर से लगता है कि इसे आरक्षण खत्म करने की दिशा में देखा जा रहा और राहुल गांधी ने आरोप लाया है कि यह यह आरएसएस के जरिये लोक सेवकों की भर्ती का मामला है। भाजपा ने इस पर राहुल गांधी पर पलटवार किया है इसलिए दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर खबर नहीं होगी और यहां पलटवार में क्या कहा वह अंदर के पन्ने पर है। डबल इंजन वाले राज्य में सामूहिक बलात्कार की खबर है और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने गुजरात में 188 हिन्दू शरणार्थियों को नगरिकता प्रमाणपत्र दिये और कहा, तुष्टिकरण की नीति के कारण शरणार्थियों को नहीं दी गई नागरिकता। अमर उजाला में टॉप पर खबर है, महज 29 मिनट में साहिबाबाद से मेरठ पहुंची नमो भारत रैपिड रेल। और दूसरी, दवा की ओवरडोज लेकर एम्स के न्यूरोसर्जन ने की खुदकुशी। सुसाइड नोट जो मिला है उसके अनुसार पारिवारिक कारणों से परेशान थे। पर जिन्हें नौकरी नहीं है, पेंशन नहीं मिलती उनकी परेशानी कौन सोचेगा? इंडियन एक्सप्रेस की खबर है, जम्मू और कश्मीर पुलिस ने गृह मंत्रालय से कहा है कि कनेक्टिविटी के मामले हैं नए कानून को लागू करने के लिए जियो को एनैबल किया जाये। टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर है, बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफडीआई के निवेश के लिए वार्ता, योजना की राजनीतिक व्यवहार्यता पर विचार किया जा रहा है। इलेक्टोरल बांड के खुलासे के बाद आप चंदा दे धंधा ले के मामले जानते हैं। ऐसी कंपनियों ने जो काम किया है वह भी सर्वविदित है। इसके अलावा भारतीय व्यावसायियों को वसूली के लिए परेशान किये जाने के उदाहरण भी हैं। ऐसे में बीमा क्षेत्र की जरूरत इसीलिए है कि इलाज की सरकारी सुविधा नहीं है, सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था नहीं है आदि। वाहनों का बीमा कानूनन जरूरी है और सबपर जीएसटी लगता है। एफडीआई मतलब इस स्थिति का लाभ विदेशी निवेशक उठायेगा और स्थिति खराब है, बीमा जरूरी है क्योंकि सरकार अपना काम नहीं कर रही है या ठीक से नहीं किया है। विपक्ष इसका विरोध करे या नहीं करे, जनता को इसकी जरूरत पर सवाल उठाना चाहिये पर वह रिवाज नहीं है। और जो व्यवस्था बनेगी उसमें सरकार अपनी नालायकी से पैसे कमायेगी और नालायकी के लिए सत्तारूढ़ दल को चंदा मिलेगा। पहले अखबारों में खबरें नहीं छपती थीं अब छप रही हैं तो कौन ध्यान दे रहा है या क्या फर्क पड़ना है।


