
आज खबर सिर्फ टेलीग्राफ में है! ट्रूडो के बयान के तुरंत बाद विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को तड़के (या देर रात) कहा: “आज हमने जो सुना है, वह इस बात की पुष्टि करता है जो हम लगातार कहते आ रहे हैं – कनाडा ने भारत और भारतीय राजनयिकों के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों के समर्थन में हमें कोई सबूत नहीं दिया है।” इसके बावजूद पांच अखबारों की लीड है – नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की बैधता बरकरार। बाकी दो लीड तो और लचर हैं। इनकी जगह हरियाणा चुनाव और संबंधित शिकायतों वाली याचिका खारिज किये जाने की खबर न्याय की देवी को बदलने का फॉलोअप भी हो जाता।
संजय कुमार सिंह
आज मेरे आठ अखबारों में से पांच की लीड एक ही है। सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की बैधता बरकरार रखी है। इसका मतलब यह भी है कि आज कोई बड़ी (अच्छी) खबर नहीं है। खोजी पत्रकारिता और ऐसी खबरें अब होती नहीं हैं, सरकार विरोधी खबरें छपती नहीं हैं पर खबरें ऐसी ही हैं तो पहला पन्ना नीरस होना ही था। इसे कुछ खास या अलग बनाने के लिए दि एशियन एज ने नायब सिंह सैनी के शपथग्रहण की खबर को लीड बनाया है। इसके साथ एक अलग खबर से यह भी बताया है कि शपथग्रहण के मौके पर असल में राजग ने शक्ति प्रदर्शन किया। लेकिन इन दोनों खबरों में कहीं भी यह हाईलाइट नहीं किया गया है कि मंत्रिमंडल में दो महिला मंत्री वंशवाद से आती हैं। अमर उजाला ने पहली बार दो महिला मंत्री शीर्षक से अलग हाइलाइट की हुई खबर छापी है। इसमें बताया गया है कि दोनों पूर्व कांग्रेसी नेताओं की वंशज हैं। एक पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल की बेटी है और दूसरी पूर्व केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी है। बंसीलाल के बारे में अखबार ने लिखा है कि वे कांग्रेसी दिग्गज रहे पूर्व सीएम बंसी लाल की पोती हैं। दूसरी महिला मंत्री आरती के बारे में बताया गया है कि वे केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी हैं जो राव वीरेन्द्र सिंह के पुत्र हैं और कांग्रेस से बगावत करके मुख्यमंत्री बने थे। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर अलग से दो कॉलम में है और यही शीर्षक है।
कहने की जरूरत नहीं है कि आरएसएस के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए बन रही भाजपा की सरकारों में वंशवाद तो है ही और इसमें कांग्रेसियों की मौजूदगी से भी एतराज नहीं है। लेकिन कांग्रेस में वंशवाद का नरेन्द्र मोदी जो विरोध करते रहे हैं और इसी मीडिया ने उसका जो प्रचार किया है वह आप जानते हैं। यह इस तथ्य के बावजूद था कि नेहरू-गांधी परिवार का आधा वंश भाजपा में जमाने से है, रहा है। पर वह अलग मुद्दा है। आज की दूसरी लीड अमर उजाला में है। इसका शीर्षक है, त्रूदो की कथनी और करनी में अंतर, सियासी कारणों से दे रहे भारत विरोधी तत्वों को समर्थन। उपशीर्षक है, विदेश मंत्रालय ने कहा – गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई गिरोह के बदमाशों की गिरफ्तारी के अग्रह समेत भारत के 26 प्रत्यर्पण अनुरोधों को कनाडा सरकार ने किया अनदेखा। दोनों खबरें या कहिये कि भारत सरकार का यह पक्ष हिन्दुस्तान टाइम्स में भी है। तीन कॉलम में नई दिल्ली का पलटवार : त्रूदो के निराधार आरोपों से टकराव शुरू हुआ। इसके साथ दो कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, पन्नूं मामला सीसी-1 अब सरकारी कर्मचारी नहीं है : विदेश मंत्रालय।
यहां उल्लेखनीय है कि अमर उजाला और टाइम्स ऑफ इंडिया में आज ही एक खबर है, शेख हसीना के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी। अमर उजाला ने अपनी छोटी सी इस खबर में लिखा है, भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा, हसीना को लेकर सरकार के रुख में कोई बदलाव नहीं है। मतलब भारत शेख हसीना को संरक्षण देता रहेगा पर चाहता है कि कनाडा लारेंस बिश्नोई के गिरोह के ‘बदमाशों’ को गिरफ्तार कर भारत को सौंप दे। यहां यह दिलचस्प है कि जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई अगर जेल से अपराध कर रहा है तो इसलिए कि उसे जेल में फोन और दूसरी सुविधाएं उपलब्ध हैं। भारत में उसके सहयोगियों के साथ बुलडोजर न्याय नहीं हो रहा है। सरकार इसका जवाब नहीं दे रही है पर जिसे वह बदमाश कह रही है उसका प्रत्यपर्पण चाहिये जबकि बैंकों का पैसा लेकर भागे लोगों को भारत सरकार के अनापत्ति प्रमाणपत्र से या के बिना दूसरे देशों की नागरिकता मिल गई है। उनके प्रत्यपर्ण की चाहे जितनी कोशिशें हुई हों या नहीं हुई हों, दस साल में कामयाबी नहीं मिली और वह मुद्दा भी नहीं बना। जेल में बंद कोई अपराधी विदेश में अपने गुर्गों से अपराध करवा सकता है तो वहां के अपराध के लिए वहां की सरकार गुर्गे के खिलाफ कार्रवाई करेगी ही उसमें प्रत्यर्पण शामिल नहीं है। और वहां किये गये अपराध की सजा वहीं मिलेगी। मुद्दा यह है कि जेल में बंद अपराधी के गुर्गे हैं जो दूसरे देश में अपराध कर रहे हैं। वहां के नागरिकों के खिलाफ कर रहे है। इसमें भारत सरकार की भूमिका क्या है और जहां अपराध हो रहा है उसके अधिकार क्या हैं – बताने की जरूरत नहीं है। फिर भी मामले को बिला वजह उलझाया जा रहा है। संभव है इसका कारण यह भी हो कि बचाव में कुछ और नहीं है। इसे समझना भी अखबारों (संपादकों) का काम है। मेरी चिन्ता ऐसी सरकारी कार्रवाई का समर्थन औऱ उसे प्रचार देना है। मुझे लगता है कि अमर उजाला ने अपनी इस कार्रवाई से यही किया है।
इसका अंदेशा द टेलीग्राफ की आज की लीड से भी होता है। शीर्षक है, भारत ने सबूतों की पुष्टि की। फ्लैग शीर्षक है, त्रूदो की लापरवाह कार्रवाई से संबंधों को नुकसान पहुंचा है: दिल्ली। नई दिल्ली डेटलाइन से अनीता जोशुआ की खबर में कहा गया है, भारत ने गुरुवार को कनाडा के विदेशी हस्तक्षेप आयोग के समक्ष प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के बयान का इस्तेमाल अपने इस दावे को सही साबित करने के लिए किया कि ओटावा के पास पिछले साल जून में कनाडा में खालिस्तानी कार्यकर्ता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत सरकार की संलिप्तता के सबूत नहीं हैं। ट्रूडो के बयान के तुरंत बाद, विदेश मंत्रालय ने गुरुवार की तड़के कहा: “आज हमने जो सुना है, वह इस बात की पुष्टि करता है जो हम लगातार कहते आ रहे हैं – कनाडा ने भारत और भारतीय राजनयिकों के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों के समर्थन में हमें कोई सबूत नहीं दिया है।” इसमें आगे कहा गया है, “इस लापरवाही से भारत-कनाडा संबंधों को जो नुकसान पहुंचा है, उसकी जिम्मेदारी अकेले प्रधानमंत्री ट्रूडो की है।” मंत्रालय जिस बात पर भरोसा कर रहा था, वह निज्जर हत्याकांड पर ट्रूडो की प्रारंभिक टिप्पणी थी, जिसमें उन्होंने कहा था: “उस समय यह मुख्य रूप से खुफिया जानकारी थी, न कि ठोस साक्ष्य।” लगता है अमर उजाला की कल की खबर इसी सूचना पर आधारित थी। मैंने कल वीडियो जैसे ठोस साक्ष्य का जिक्र किया था।
जो लोग इस मामले को नहीं जानते हैं उनकी सहूलियत के लिए पेश है अमेरिका में रह रहे पत्रकार मित्र अजीत शाही की फेसबुक पोस्ट का यह अंश, “नरेंद्र मोदी ने वो कर दिखाया जो पिछले किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया था। भारत के एक सरकारी अधिकारी को एफबीआई द्वारा वांछित बना दिया। इस अधिकारी का नाम विकास यादव है। ये भारत की गुप्तचर एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) में काम करता था। अमेरिका और कनाडा में सिखों की हत्या का ज़िम्मा विकास यादव के सर था। विकास यादव ने निखिल गुप्ता नाम के एक आदमी को पकड़ा। गुप्ता ड्रग्स का ग़ैर-क़ानूनी धंधा करता था। उसने यूरोप के शहर प्राग में एक भाड़े के हत्यारे को पकड़ा। गुप्ता को मालूम नहीं था कि जिसे वो भाड़े का हत्यारा समझ रहा था वो दरअसल अमेरिका का एक गुप्त एजेंट था। गुप्ता ने इस एजेंट को अमेरिका में पंद्रह हज़ार डॉलर भी अग्रिम दिलवा डाले। ये सारा प्रकरण अमेरिका की एफबीआई ने अपने कैमरे में क़ैद कर लिया। ये पिछले साल की बात है।
कुछ हफ़्तों बाद जब गुप्ता कथित हत्यारे से मिलने प्राग पहुँचा तो उसे एयरपोर्ट पर वहाँ की पुलिस ने पकड़ लिया। उसे वहाँ से छुड़वाने के लिए मोदी ने जी-जान लगा दिया। मगर दो महीने पहले प्राग की अदालत ने निखिल गुप्ता को अमेरिकी सरकार के हवाले कर दिया। अब निखिल गुप्ता अमेरिका की जेल में है। उस पर हत्या की साज़िश के आरोप का मुक़दमा शुरू होने वाला है। जब ट्रायल शुरू होगा तो पता चलेगा कि उसने अपने इक़बालिया बयान में क्या-क्या राज़ खोले हैं। आज अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने एलान किया है कि अब निखिल गुप्ता के साथ साथ विकास यादव भी उसी केस में आरोपी है। एफबीआई ने नोटिस जारी कर दी है कि उसे विकास यादव की तलाश है। इन दिनों भारत की एक टीम अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में है।” आज यहां अखबारों में छपा है कि संबंधित अधिकारी अब भारत सरकार की सेवा में नहीं है। खबर के अनुसार अमेरिकी दस्तावेजों में यह व्यक्ति सीसी1 के रूप में दर्ज है (इंडियन एक्सप्रेस)। आप समझ सकते हैं कि भारत सरकार के लिए इस मामले में इतना कहना भर पर्याप्त नहीं है।
यह अलग बात है कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस संबंध में अमरिका की ‘संतुष्टि’ को सेकेंड लीड बनाया है। शीर्षक है, अमेरिका ने कहा वह पन्नूं मामले की जांच में भारत के सहयोग से संतुष्ट है। अखबार में इसके साथ भारत सरकार के अन्य आरोप भी छपे हैं। लेकिन कनाडा के आरोपों के समक्ष कल की लीपा पोती के बाद अब ये कोशिश दमदार होती तो सभी अखबारों में होती जैसी अमूमन अच्छी खबरें होती हैं। यह खबर अन्य अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं है। मित्र अजीत शाही ने आज अपनी एक अलग फेसबुक पोस्ट में यह भी लिखा है कि मोदी के गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए जब कोई नेगेटिव ख़बर आती थी तो कुछ ही घंटों के अंदर कहीं न कहीं बम धमाका हो जाता था या फिर मुसलमानों की गिरफ़्तारी हो जाती थी और ख़बर बदल जाती थी। अब जबकि मोदी की सरकार पर कनाडा में हिंसा और जबरन वसूली के लिए भारतीय राजनयिकों का इस्तेमाल करने का आरोप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लग रहा है, अचानक भारतीय हवाई जहाज़ों को कई बम धमकियाँ मिल गईं और ख़बर पलट गई।
हेडलाइन मैनेजमेंट – विमान में बम की अफवाह
आज द टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार यह धंधा जारी है। सिंगल कॉलम की खबर के अनुसार ऐसे संदेशों से गुरुवार को 13 और उड़ानें प्रभावित हुई हैं। अजीत शाही की फेसबुक पोस्ट इसलिए उल्लेखनीय है। अमर उजाला की कल और आज की खबरों से लग रहा है कि सिखों की हत्या और कोशिश के मामले में भारत को जब लगा कि मामला नियंत्रण में आ गया है तो आज विमानों में बम होने की झूठी खबर और उसका फॉलो अप (अजीत की सूचना के साथ या बिना) कम महत्वपूर्ण हो गया है। आज के अखबारों में द हिन्दू में सिंगल कॉलम की एक खबर बताती है कि बम होने की फर्जी सूचना देने वालों को पांच साल की जेल और विमान यात्रा से प्रतिबंधित करने के प्रावधान पर विचार चल रहा है। मुझे लगता है कि जब देश में लाखों लोग विमान में चढ़े बिना मर जाते हैं, अपने नेता के समर्थन में विमान अपहरण किया जा चुका है (और उसका ईनाम भी मिला है), लोकोपकार करने वाले लोग बच्चों को विमान यात्रा करवाकर पुण्य कमाते हैं तब इस खबर का कोई खास मतलब नहीं है। विमान यात्री किसी बेरोजगार से यह काम करा लेगा। बदले में उसे ढंग का एक काम या विरोध करके जेल जाने का मौका मिल जायेगा। जेल में रहकर पांच साल मुफ्त खाना मिलेगा और विमान पर उसे चढ़ना ही नहीं है। इस ‘सजा’ की योजना से भी लगता है कि बम होने की अफवाह उड़ाने वाले लोग साधारण नहीं होते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त 17 घंटे तक फंसे रहे
आज जब पहले पन्ने पर ढंग की खबरें नहीं हैं तो टाइम्स ऑफ इंडिया में तीन कॉलम में छपी खबर दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने पर हो सकती थी। खबर के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त 12 हजार फीट की ऊंचाई पर ठंड में गर्म कपड़ों के बिना एक खाली घर में 17 घंटे तक फंसे रहे। रात के खाने में इंस्टैट नूडल से काम चलाना पड़ा। विदेश मंत्री के पाकिस्तान दौर के बाद कल की खबरों से लग रहा था कि भारत पाकिस्तान संबंध में एक नई शुरुआत हो सकती है। आज के अखबारों में ऐसा कुछ नहीं है। दूसरी बड़ी या महत्वुपूर्ण खबर नहीं है तब भी। दि एशियन एज की एक खबर के अनुसार सरकार ने कहा है कि हम पाकिस्तान के साथ क्रिकेट संबंध शुरू नहीं कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने टॉप पर दो कॉलम की खबर छापी है। इसके अनुसार पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाजशरीफ ने कहा है कि पुरानी बातें भूलने का समय है। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा है कि हम 75 साल बर्बाद कर चुके हैं और यह महत्वपूर्ण है कि अगले 75 साल भी बेकार न जायें। आज जब दूसरी महत्वपूर्ण खबरें नहीं हैं तो ये खबरें किसी और अखबार में नहीं दिखीं।
बहराइच हिन्सा और पुलिस मुठभेड़ के बाद
आज पहले पन्ने पर हो सकने वाली खबरों में एक खबर नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, बहराइच हिन्सा पुलिस मुठभेड़ के बाद पांच आरोपी गिरफ्तार। एक खबर यह भी है कि आरोपी अब्दुल हमीद की बेटी रुखसार ने पिता और दो भाइयों को मुठभेड़ में मारने की आशंका जताई थी। रुखसार के पति और उसके भाई (देवर) को पहले गिरफ्तार किया जा चुका था। यह वैसे ही है कि आपके घर भीड़ की हिंसा हो, हिंसा करने वाले एक प्रमुख व्यक्ति की हत्या हो जाये और हत्या के मामले में आपकी बहन, बहनोई और उसके भाई को गिरफ्तार कर लिया जाये। अगले दिन आपको और आपके पिता को भी गिरफ्तार कर लिया जाये। इसमें भीड़ की हिंसा के खिलाफ कोई कार्रवाई तो नहीं ही है बचाव में अगर परिवार के किसी सदस्य ने गोली चलाई (या कुछ नहीं किया) तो पूरे परिवार के पुरुषों को गिरफ्तार कर लिया गया। इससे जाहिर है कि मौके बे मौके सड़क पर और मस्जिद के पास डीजे लगाकर गालियां देने वालों को रोकने की तो योजना नहीं है उससे आतंकित रहने वालों को सरकारी भरोसा या आश्वासन देने की भी कोई कोशिश नहीं है। मैं ऐसे मामले फॉलो नहीं करता। इसलिए क्या हुआ, मुझे पता नहीं है लेकिन मैं यही जानकर आतंकित हूं कि जिसके घर हिंसा हुई उसके घर के सभी पुरुषों को गिरफ्तार कर लिया गया। यह पंजाब में आतंकवाद के समय होता था और इसका वर्णन सीमा सुरक्षा बल के एक पूर्व अधिकारी ने अपनी किताब में किया है।
हरियाणा चुनाव से जुड़ी याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट की ही खबर लीड बनानी थी तो मुझे लगता है कि आम लोगों की दिलचस्पी की खबर हरियाणा चुनाव से जुड़ी याचिका वाली है। भास्कर डॉट कॉम के अनुसार कांग्रेस की ओर से दायर याचिका में वोटिंग-काउंटिंग के दौरान ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाकर 20 विधानसभा सीटों पर दोबारा चुनाव कराने की मांग की गई थी। कांग्रेस ने इस याचिका पर जल्द से जल्द सुनवाई करने की गुहार लगाई थी। इस पर आज सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा, ‘ऐसी याचिका दायर करने पर आप पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। आप कागजात सौंपिए, हम देखेंगे।’ यहां तक की खबर और शीर्षक से मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली गई या खारिज कर दी गई। जो भी हो, 2019 के लोकसभा चुनाव से संबंधित एक निजी विश्वविद्यालय के अनुसंधान और उसकी रिपोर्ट लीक होने का बाद जो सब हुआ (या नहीं हुआ) उससे संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में गया कि नहीं और गया तो क्या हुआ मुझे पता नहीं है। लेकिन इस बार तो आरोप बहुत गंभीर है और चुनाव आयोग का जवाब या तो नहीं है या फिर बेहद लचर। दोनों ही स्थितियों में इस मामले में जलद सुनवाई की कांग्रेस की मांग सही थी और यह यह नोटबंदी जैसे मामलों से अलग है जब समय निकल गया और फैसला हुआ ही नहीं। बाद में सरकार की तरफ से कहा गया कि ये मुद्दे अब अकादमिक हो गए हैं। …. ये मुद्दे अकादमिक हैं और इनके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं।” इस तरह नोटबंदी से हुई परेशानी और उसका मकसद हासिल होने या नहीं होने के मामले पर विचार ही नहीं हुआ। सरकार मनमानी करके निकल गई और अब अगर चुनाव आयोग कर रहा हो तो उसपर सुनवाई नहीं हो रही है। 2019 से 2024 खत्म होने को आ गया।
न्याय की देवी को जब संविधान पकड़ा दिया गया है
दैनिक भास्कर की खबर में आगे लिखा है, मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए पूछा, ‘क्या आप चाहते हैं कि हम चुनी हुई नई सरकार का शपथग्रहण रोक दें? ‘यह सवाल तब किया गया जब याचिका में कहा गया था कि कुछ पोलिंग स्टेशन पर वोटिंग और काउंटिंग के दौरान ही ईवीएम की गड़बड़ी पकड़ ली गई थी। मौके पर मौजूद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ईवीएम की गड़बड़ी को वहां मौजूद चुनाव अधिकारी को बताया भी था, लेकिन कांग्रेस के लोग ज्यादा नहीं थे, इसलिए उनकी सुनवाई नहीं हुई। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि हरियाणा की 20 सीटों पर ईवीएम में गड़बड़ी की संभावना है। उन पर दोबारा चुनाव कराए जाएं। चुनाव आयोग ने वोटिंग के बाद काउंटिंग के एक दिन पहले तक वोटिंग प्रतिशत को लगातार अपडेट किया था। इसके अलावा वोटों का प्रतिशत बाद में बढ़ाये जाने तथा गिनती में वोटों की संख्या कम-ज्यादा होने जैसे मामले हैं लेकिन चुनाव आयोग इनका ठोस बिन्दुवार जवाब देने की बजाय इधर-उधर की बात करता है और अखबार खबर नहीं देते हैं। सुप्रीम कोर्ट में मामला खारिज हो जाने से लगता है कि आरोपों में दम नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि कई मामलों में ऐसा जानबूझकर भी किया-कराया जाता है पर वह अलग मामला है। इसका मकसद होता है कि कोर्ट से मामला खारिज होने का लाभ उठाया जा सके। लेकिन इसमें चुनाव आयोग सत्तारूढ़ दल के साथ पक्षपात कर रहा हो तो क्या संविधान में कोई उपाय ही नहीं है? यह सवाल इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि न्याय की देवी को अब संविधान पकड़ा दिया गया है। संसद में पहले ही सेंगोल लगाया जा चुका है। क्या यह सब इतिहास में दर्ज होने भर के लिए है?


