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आज के अखबार : सरकारी खबरों से भरे हैं फिर भी राहुल गांधी का विमान रोकने का कारण नहीं है

संजय कुमार सिंह

सोशल मीडिया पर कल खबर थी कि झारखंड में राहुल गांधी का विमान दो घंटे तक रोका गया। बाद में जैसे को तैसा वाली खबर आई, तकनीकी खराबी के कारण प्रधानमंत्री का विमान दो घंटे रुका रहा। मुझे लगता है कि विपक्ष के नेता का विमान चुनाव प्रचार के समय दो घंटा रुका रहा (यानी नेता और पार्टी का दो घंटा खराब हुआ)। इसलिये यह बड़ा मामला है और इसका कारण स्पष्ट किया ही जाना चाहिये। लेकिन विमान में तकनीकी खराबी के कारण अगर प्रधानमंत्री को भी दो घंटा खराब करना पड़े तो ईश्वर का धन्यवाद कहना चाहिये कि खराबी तब आई जब विमान जमीन पर था। मैं समझ रहा था कि दोनों घटनाएं पर्याप्त गंभीर है और इनका राजनीतिक महत्व भी है इसलिए इसपर सरकारी स्पष्टीकरण आज किसी न किसी अखबार में पहले पन्ने पर मिलेगा। इंडियन एक्सप्रेस में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिन्दे का इंटरव्यू है। नवोदय टाइम्स में तीन कॉलम का शीर्षक है, पाक को झटका, पीओके नहीं जाएगी चैंपियंस ट्रॉफी। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में दो कॉलम में शिन्दे के इंटरव्यू वाली खबर के बराबर में सेकेंड या थर्ड लीड है। शीर्षक और स्पष्ट है, भारतीय बोर्ड के विरोध के बाद पाकिस्तान ने पीओके को चैम्पियन्स ट्रॉफी के दौरे से अलग किया। उपशीर्षक है, जय शाह ने आईसीसी से कहा – पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड की इटीनरी अस्वीकार्य है; अब सिर्फ मेजबान शहरों का दौरा होगा। उम्मीद है, आप जानते होंगे कि जय शाह केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बेटे हैं और यह खेल में राजनीति घुसेड़ने का मामला है। यह राजनीति संघ परिवार की हो या जय शाह की खेल भावना के खिलाफ है और मैं क्रिकेट नहीं देखता फिर भी ऐसी खबर बुरी लगती है। मुझे लगता है कि खेल में राजनीति की ऐसी फूहड़ खबर खेल पेज पर भी छपने लायक नहीं है। और आज यह अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है। 

खबर की बात करूं तो आज टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में और अमर उजाला में तीन कॉलम की खबर है, गुजरात के पोरबंदर में 3500 करोड़ रुपये की 700 किलो ड्रग्स पकड़ी। आप जानते हैं कि बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल के जरिये होने वाले तथाकथित घुसपैठ पर प्रधानमंत्री कितना परेशान हैं। लेकिन गुजरात के जरिये नशे की तस्करी पर उनकी परेशानी का पता नहीं चलता है और इसी कारण खबर को भी महत्व नहीं मिलता है। यह अलग बात है कि दोनों को रोकना केंद्र सरकार का ही काम है। फिर भी, बंदरगाह पर नशे की खेप पहुंच जाने के बाद क्या हुआ महीनों बाद भी पता नहीं चला। अब खबर है कि गुजरात में समुद्र के रास्ते तस्करी पर शिकंजा कसा है। दिल्ली में भी 900 करोड़ की कोकीन जब्त हुई है। कहने की जरूरत नहीं है कि तस्करी से अगर नशा दिल्ली तक पहुंच जा रहा है तो सीमा पार करने से लेकर दिल्ली तक के रास्ते में चौकसी ठीक नहीं है या बेहतर करने की जरूरत है। पर वह मुद्दा नहीं है। हो भी कैसे जब चुनाव के समय घुसपैठ मुद्दा होता है और उससे बात बन जाती हो।

आज इन दोनों खबरों के मुकाबले झांसी के अस्पताल में आग लगने और उसमें 10 बच्चों के मर जाने की खबर काफी दर्दनाक है। अमर उजाला में यह लीड है लेकिन मेरे किसी और अखबार में इस खबर को इतना महत्व नहीं दिया गया है। मुझे नहीं लगता कि ऐसी घटना एक बार हो जाये तो फिर नहीं हो उसके लिए कुछ करने की इच्छाशक्ति हमारी सरकार में है और वह ऐसा कुछ करती है। नशे की कई खेप गुजरात में पकड़े जाने के बाद अब सुमद्र में ही नशे की खेप को पकड़ लिया जाना सुखद खबर है। यह हर क्षेत्र में होना चाहिये और कुछ भी बुरा हो, उसका प्रभाव पड़े उससे पहले उसे रोकने की कोशिश होनी चाहिये। जहां तक लापरवाही और दुर्घटना रोकने की बात है, प्रधानमंत्री के मामले में पूरी सावधानी बरती जाती है और अमर उजाला की खबर के अनुसार, पीएम आदिवासी नेता बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर कार्यक्रम में हिस्सा लेने बिहार के जमुई गये थे। वहां वायुसेना के विशेष विमान में तकनीकी खराबी के कारण प्रधानमंत्री को दो घंटे तक झारखंड के देवघर में इंतजार करना पड़ा। खबर के अनुसार प्रधानमंत्री के दो घंटे तक हवाई अड्डे पर मौजूद रहने के कारण पूरे वायु क्षेत्र को नो फ्लाई जोन घोषित कर दिया गया था।

संभव है राहुल गांधी का विमान इसी कारण नहीं उड़ पाया हो या रोक कर रखा गया हो। पर मुद्दा यह है कि प्रधानमंत्री के हवाई अड्डे पर होने के कारण अगर काफी बड़े क्षेत्र को नो फ्लाई जोन घोषित करना पड़े और बहुत सारे लोगों को परेशानी हो तो कोई कारण नहीं है कि प्रधानमंत्री को हवाई अड्डे पर रोका जाये। उन्हें कहीं और ले जाया जा सकता है जहां वे बेहतर स्थिति में सुरक्षित रहें। अपना काम चाहे न कर पायें दूसरों को काम करने से तो न रोका जाये। यह सामान्य शिष्टाचार होना चाहिये और प्रधानमंत्री को खुद सुनिश्चित करना चाहिये कि उनके लिए या उनके कारण किसी और को परेशान नहीं होना वड़े। लेकिन प्रधानमंत्री (और व्यवस्था) को अगर विपक्ष के नेता का ख्याल नहीं हो तो आम आदमी का क्या ख्याल होगा। आज अमर उजाला में एक और खबर ध्यान खींचने वाली है – शाह के हेलीकॉप्टर की आयोग ने ली तलाशी। अगर खबर इतनी ही होती तो कोई खास बात नहीं थी। उपशीर्षक है, शेयर किया वीडियो, गृहमंत्री बोले – भाजपा का निष्पक्ष चुनाव में विश्वास। मन की बात को खबर बनाया जाये तो यह नहीं पूछा जायेगा कि पहले के चुनाव में प्रधानमंत्री के विमान से काला बक्सा ले जाये जाने और एक मामले में अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई पर वे क्या कहते हैं।

अमित शाह ने अब जो कहा है वह उ्दधव ठाकरे के वीडियो और एतराज के बाद कहा है और यह दिखाने की कोशिश है कि उनकी भी जांच होती है और यह सामान्य है। सच्चाई यह है कि उद्धव ठाकरे प्रधानमंत्री के मामले में पिछले दो ज्ञात उदाहरणों के आलोक में बात कर रहे थे क्योंकि मंत्रियों और भाजपा नेताओं के विमान की जांच की खबर आम तौर पर नहीं होती है। यह स्थापित सत्य है। इसका जवाब अब जांच करने से नहीं मिलेगा। जो होना था हो चुका। उसके बाद सरकार चाहती तो नेताओं की जांच की औपचारिकता छोड़ देती। उद्धव ठाकरे का मतलब यही रहा होगा कि प्रधानमंत्री अगर जांच से मुक्त हैं तो विपक्षी नेताओं को भी होना चाहिये। लेकिन अब उसे मुद्दा बनाया जा रहा है और प्रचारकों की मदद से भले संदेश बदल जाये लेकिन लोग मामला समझते हैं। अखबारों का काम नहीं है कि वे सरकार की सेवा में बिछ जायें। अमर उजाला ने अगर उद्धव ठाकरे की खबर को पहले पन्ने पर नहीं छापा था तो इसे छापने का कोई मतलब नहीं है और सरकारी यात्रा व दौरे पर यात्रा करने वाले मंत्री या प्रधानमंत्री के सैकड़ों दौरे में दो चार की जांच हो या नहीं हो, कोई मतलब नहीं है। मतलब इसका है कि प्रधानमंत्री के विमान से जो काला बक्सा उतरा उसमें पूरी-सब्जी थी तो बताने में क्या दिक्कत है। इसी तरह, अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई हो गई तो उन्हें डराने का काम हो गया और यह नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री रहने तक काम करेगा। कर रहा है तभी तो अभी तक किसी अधिकारी ने ये वीडियो नहीं डाला है कि देखो हमने प्रधानमंत्री की भी जांच की।  

खासकर तब जब राहुल गांधी या विपक्ष के आरोपों को अखबारों में जगह नहीं मिलती है। आप जानते हैं कि मणिपुर के छह थाना क्षेत्रों में फिर से आफस्पा (एएफएसपीए) लागू कर दिया गया है। इसपर मणिपुर कांग्रेस अध्यक्ष के मेघचंद्र सिंह ने कहा है और आज यह सिर्फ द टेलीग्राफ का कोट है, “मणिपुर के छह थाना क्षेत्रों में फिर से आफस्पा (एएफएसपीए) लागू किया जाना उनकी (भाजपा की) अपनी डबल इंजन सरकार की पूर्ण नाकामी का स्पष्ट लक्षण है।” कहने की जरूरत नहीं है कि भिन्न कारणों से इस समय यह दिल्ली में भी छपने लायक है। लेकिन क्या कहीं किसी पहले पन्ने पर दिखी? यही नहीं, द टेलीग्राफ ने बताया है कि बंटेंगे तो कटेंगे नारे ने भाजपा और उसके सहयोगियों को बांट दिया है। आप जानते हैं कि डबल इंजन वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नारे, बंटेंगे तो कटेंगे को महाराष्ट्र में पसंद नहीं किया गया है। प्रधानमंत्री ने इसका बेहतर रूप, एक हैं तो सेफ हैं का नारा दिया। सच है कि इसकी भी आलोचना हुई। आज की तारीख में भाजपा के पास महाराष्ट्र में चुनाव लड़ने के लिये मुद्दा नहीं है। द टेलीग्राफ की लीड के शीर्षक, बंटेंगे ने भाजपा और इसके सहयोगियों को बांट दिया से पता चलता है कि राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लड़ने के लिहाज से भाजपा कितनी कमजोर या परिपक्व है।

वैसे तो महाराष्ट्र में भाजपा की पूरी राजनीति ही दांव पर है और 2019 में सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलने, सहयोगी पार्टी शिवसेना के अलग हो जाने के बाद भाजपा ने जो किया और उसके पक्ष में संवैधानिक संस्थाओं ने जो किया या उनसे करवाया गया वह भी कम दिलचस्प नहीं है। अभी वह मुद्दा नहीं है पर सच यह है कि उद्धव ठाकरे प्रधानमंत्री पर आरोप लगा चुके हैं और प्रधानमंत्री मुख्य न्यायाधीश के घर गणेश चतुर्थी की पूजा का वीडियो सोशल मीडिया पर जारी करके अपनी कोशिश सार्वजनिक कर चुके हैं। यही नहीं, झारखंड की बजाय बिहार के जमुई में बिरसा मुंडा के वंशजों को सम्मानित करना और वंशवाद के खिलाफ उनके पुराने बयान, बिना मांग दिल्ली के सरायकालेखां चौक का नाम बिरसा मुंडा के नाम पर करने का कितना फायदा भाजपा को मिलेगा यह तो समय ही बतायेगा। लेकिन राहुल गांधी का एक आरोप दि एशियन एज में चार कॉलम में छपा है जो दूसरे अखबारों में नहीं है। आरोप है, प्रधानमंत्री अरबपतियों की सेवा करते हैं।

दूसरी ओर, दि एशियन एज ने प्रधानमंत्री के किये को प्रचारित करने के लिए लीड बनाया है लेकिन शीर्षक का स्तर नहीं है। दि एशियन एज की आज की लीड का शीर्षक है, पहले की कांग्रेस सरकारों ने आदिवासियों को न्याय नहीं दिया। यहां मुद्दा यह है कि अगर ऐसा है और वाकई ऐसा हुआ है तभी तो कांग्रेस चुनाव हार गई थी आप को सत्ता मिली थी। जब आप सत्ता में रहे तो क्या किया और किसे क्या दिया? अगर दिया भी तो ऐन चुनाव के दौरान और कांग्रेस पर आरोप। प्रधानमंत्री कांग्रेस पर आरोप लगाते रहे हैं और चुनाव आयोग ने न तो पिछली बार कार्रवाई की और ना इस बार करने के मूड में लगता है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री के आरोप ही नहीं उनका घटियापन भी बढ़ता जा रहा है जिसे अखबारों का पूरा सहयोग मिलता दिख रहा है। आज इस खबर को हिन्दुस्तान टाइम्स ने भी लीड बनाया है। द हिन्दू की लीड मेरे सभी अखबारों से अलग, श्रीलंका चुनाव की है। वहां 14 नवंबर को मतदान हुए थे और बगैर किसी शोर के 15 को नतीजे आ गये जो आज के अखबारों में छप गया। हम अपने महान ईवीएम के रहते मतदान के कई दिनों बाद नतीजे पाते हैं और हमारे अखबारों में दूसरे देशों के चुनाव की खबर नहीं छपती है ताकि किसी का ध्यान इस ओर नहीं जाय। या सबलोग यही मान कर बैठे रहें कि देश की सारी समस्याओं की जड़ आबादी है। और नरेन्द्र मोदी की जादू की छड़ी इसी कारण नहीं चलती है या इसी कारण मनमाना नतीजा देती है।   

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