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आज के अखबार : नहीं बताते कि महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री चुनने में भाजपा को पापड़ बेलने पड़ रहे हैं और क्यों?  

संजय कुमार सिंह

1. मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए प्रधानमंत्री मोदी के निर्णय को मानूंगा (हिन्दुस्तान टाइम्स)

2.शिन्दे ने कहा कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री का निर्णय अंतिम होगा अब फडणविस का महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनना तय (टाइम्स ऑफ इंडिया)

3. शिन्दे ने कहा कि भाजपा मुख्यमंत्री चुनने के लिए स्वतंत्र है और इस तरह मुश्किल खत्म हुई (द हिन्दू)

4. अब शिन्दे बोले – मुख्यमंत्री पर मोदी-शाह का फैसला मंजूर (अमर उजाला)

5. मैं बाधा नहीं हूं, हमारी ओर से कोई मुश्किल नहीं : शिन्दे ने भाजपा के मुख्यमंत्री के लिए रास्ता साफ कर दिया (इंडियन एक्सप्रेस)

ये शीर्षक कल (गुरुवार, 28 नवंबर 2024) के अखबारों की खबरों के हैं और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिन्दे के हवाले से छपवाई गई इन खबरों का मकसद और संदेश यही था कि भाजपा गठबंधन को मुख्यमंत्री चुनने में कोई दिक्कत नहीं है, सब चंगा सी। राज्य में भाजपा की जीत का सेहरा (वह चाहे जैसे हासिल हुई हो) पूर्व घोषणा के अनुसार देवन्द्र फडणविस के सिर ही होगा। इस लिहाज से आज के अखबारों में इससे संबंधित कोई खबर नहीं होनी चाहिये थी या आज यह खबर होनी चाहिये थी देवेन्द्र फडणविस इस दिन, इतने बजे सपथ लेगें। आप जानते हैं कि जब बहुमत स्पष्ट नहीं था तो राज्यपाल को नीन्द से जगाकर शपथग्रहण करवाया जा चुका है (यह अलग बात है कि बाद में उन्होंने राज्यपाल रहना स्वीकार नहीं किया)। ऐसे में अमर उजाला ने कल छापा था कि नए सीएम की शपथ 30 नवंबर को या एक दिसंबर को हो सकती है। आज के अखबारों में छपा है कि शपथग्रहण एक या दो को हो सकती है। विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है वह मु्ददा ही नहीं है।

इस संबंध में जागरण डॉट कॉम  की एक खबर दिलचस्प है। “विधानसभा का कार्यकाल 26 नवंबर को समाप्त होने वाला है, ऐसे में विधानमंडल और महायुति के सूत्रों ने कहा कि 26 नवंबर से पहले नई सरकार बनाने या नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण की कोई संवैधानिक आवश्यकता नहीं है। यह धारणा गलत है कि सीएम नहीं बना तो 26 नवंबर की मध्यरात्रि के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाएगा”। खबर में आगे कहा गया है, “अतीत में भी होता रहा है”। और फिर एएनआई के सूत्रों के अनुसार, “अतीत में मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह अक्सर विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद किया जाता था। 10वीं विधानसभा का कार्यकाल 19 अक्टूबर 2004 को समाप्त हुआ था। 11वीं विधानसभा के नए मुख्यमंत्री ने 1 नवंबर 2004 को शपथ ली थी”। जाहिर है, यह जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे वाला मामला है पर सच यह है कि चुनाव पहले या समय से क्यों नहीं कराये गये। इस मुद्दे को खत्म करने के लिए (असल में भ्रम फैलाने के लिए) एएनआई के सूत्रों की खबर जागरण डॉट कॉम ने दे रखी है।  

कमजोर हुई है भाजपा  

आज द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, महाराष्ट्र की बैठक मुख्यमंत्री का निर्णय किये बगैर खत्म हो गई। उपशीर्षक है, महायुति नेताओं ने अमित शाह, जेपी नड्डा के साथ देर रात बैठक की। आज एक और बैठक की संभावना है। पोर्टफोलियो आवंटन पर कोई फैसला नहीं हुआ है और शिन्दे ने राजधानी में अपनी पार्टी के सांसदों की बैठक की। जाहिर है, मुख्यमंत्री के मामले में निर्णय नहीं हो पाया है और चूंकि भाजपा आलाकमान चाहता है कि फडणविस मुख्यमंत्री बनें तो संभव है कि वही बनेंगे लेकिन मामला आसान नहीं है और भाजपा आलाकमान के पसीने छूटते दिख रहे हैं लेकिन आज पहले पन्ने पर ऐसी कोई खबर नहीं है जिससे आपको भाजपा की इस लाचारी का पता चले। कहने की जरूरत नहीं है कि यह अपने पूर्व सहयोगी, शिवसेना के भाजपा से अलग होने के बाद महाराष्ट्र में भाजपा की राजनीति का नतीजा है। बैलट पत्रों, माफ कीजियेगा ईवीएम ने भाजपा को जीत जरूर दिला दी है पर वह कमजोर हुई है। उसके सहयोगी उससे अलग हुए हैं। भाजपा ने सत्ता में बने रहने के लिए जो सब किया है उसमें वाशिंग मशीन का बेशर्म उपयोग और किसी को भी पार्टी में शामिल कर लेना और पद देना शामिल है। ऐसे में उसे जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा रहा है उसे छिपाकर मीडिया सब कुछ हरा-हरा दिखा रहा है।

कहने की जरूरत नहीं है अपने कारनामों से चुनाव हारने के कगार पर खड़ी भाजपा ने बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं जैसे नारे दिये, चुनाव आयोग ने इसे रोकने की जरूरत नहीं समझी और जनता को फर्क नहीं पड़ा (मतदान का प्रतिशत और वोटों की संख्या बढ़ना असामान्य है) तब भी मुख्यमंत्री चुनने में पसीने छूट रहे हैं – यह खबर नहीं छपी जबकि शिन्दे को अपनी पार्टी तोड़ने या बंटने का फल मिला और न सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा बल्कि इसे उदारता के रूप में दिखाना भी पड़ा। यह अलग बात है सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के वसूलों से और आज द हिन्दू की खबर तथा शपथग्रहण की तारीख तय न होने, इसमें देर होने से सब साफ है। गोदी वाले नहीं बतायें तब भी। ऐसे में चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने वाली भाजपा आगे क्या सब कर सकती है उसे सोचकर डर लगता है पर सोचे कौन? अखबार वाले बतायेंगे नहीं, टेलीविजन चैनल वाले उसपर चर्चा नहीं करेंगे।

ऐसे में आज के शीर्षक से समझिये कि भाजपा की असफलता या कमजोरी को कैसे छिपाया गया है। मामला शीर्षक से ही स्पष्ट है (अनुवाद मेरा)। द हिन्दू का शीर्षक ऊपर लिख चुका हूं जो रह गये वो इस तरह है  :

1. दि एशियन एज

महायुती के तीन शिखर के नेताओं ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का चुनाव करने के लिए बैठक की

2. हिन्दुस्तान टाइम्स

सत्ता करार पक्की करने के लिए महायुती नेताओं ने (अमित) शाह से मुलाकात की। इसके साथ एक खबर है, (हेमंत) सोरन ने झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, इस मौके पर इंडिया गठबंधन के नेता मौजूद रहे। चंपई चच्चा ने पार्टी नहीं छोड़ी होती तो मंत्री बनते पर  

3. नवोदय टाइम्स

महाराष्ट्र को लेकर शाह से फाइनल बातचीत।

ये तो हुई भाजपा को मजबूत और लोकप्रिय दिखाने की कोशिश, उसका असर और स्तर। आप जानते हैं कि भाजपा अपनी लोकप्रियता के लिए कट्टर हिन्दुत्व पर आश्रित है और इसकी आड़ में सत्ता मिलने के बाद खूब कमाये हैं और वह इलेक्टोरल बांड से लेकर अदाणी को संरक्षण देने तक से है। बाबरी मस्जिद मामले में भाजपा की राजनीति को समझने-बूझने के बाद कांग्रेस ने 1991 का प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू किया। इसके अनुसार 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। यदि कोई इस एक्ट का उल्लंघन करने का प्रयास करता है तो उसे जुर्माना और तीन साल तक की जेल भी हो सकती है। आप समझ सकते हैं कि इसका मकसद रोज खड़े हो सकने वाले विवाद को खत्म कर विकास के काम करना है। नरेन्द्र मोदी की सरकार आये दिन होने वाले चुनाव से तो परेशान है पर ऐसे धार्मिक मामलों से कोई दिक्कत नहीं है। इनके समर्थक सब हिन्दू की ही तरह सोचते-समझते और काम करते हैं। धर्मनिरपेक्ष होना यहां गाली है और किसी को भी न सिर्फ हिन्दू विरोधी बल्कि देश विरोधी कह देना सबसे आसान। इस कारण 1991 के प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट के बावजूद लोग अदालत में गये और उनपर जुर्माना लगाने की बजाय यह रास्ता निकाल दिया गया कि पूजा स्थल को बदला न जाये सर्वेक्षण तो हो ही सकता है। इस तरह यह कानून लगभग बेमतलब रहा और सर्वेक्षण का परिणाम आप देख रहे हैं।

पंच परमेश्वर अब कहानियों में ही रह गया है वरना आदर्श स्थिति यह होती कि हिन्दू जज (और वकील भी) इस कानून के बाद ऐसे धार्मिक मामलों से अलग हो जाते और किसी तीसरे को फैसला करने देते। पर राजनीति ऐसी आदर्श स्थिति होने देती तो यह नहीं कहा जाता कि मतपेटियां लूट ली जाती थीं और ईवीएम के अंडे देने पर चुप्पी नहीं साधी जाती। इसलिए यह सब हो रहा है और इसमें संविधान संकट में है। मीडिया यह सब नहीं बताता तो विपक्ष के नेता को बताना पड़ रहा है और अपेक्षा यह है कि वे उसके लिए ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। उनकी पार्टी का बैंक खाता ऐन चुनाव के समय फ्रीज कर दिया गया और चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की तब भी। ऐसे में स्थिति बहुत बुरी है और अखबारों की भूमिका बहुत बड़ी। अखबारों ने भाजपा की इस और तमाम कमजोरियों को नजरअंदाज किया है, विपक्ष का साथ नहीं दिया है और सर्वेक्षण के मामलों को बड़ी खबर बता रहा है जबकि ऐसे सर्वेक्षण की इजाजत नहीं होनी चाहिये।

इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट में आज संभल मस्जिद सर्वेक्षण के खिलाफ याचिका की सुनवाई होगी। बाबरी मस्जिद मामले में जो सब हुआ उसे जानने-समझने वाले यही कहेंगे कि ऐसे सर्वेक्षणों का कोई मतलब नहीं है लेकिन जिन्हें संविधान से मतलब नहीं है उनके लिए यह मुद्दा है और जब घृणा फैलाने वाले भाषणों पर रोक नहीं है उसके लिए सजा नहीं है तो ऐसे मामलों में क्या होगा से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट में तमाम मामलों पर सुनवाई नहीं हो पाती है पर कुछ मामले जल्द सुन लिये जाते हैं। और यह जमाने से चल रहा है। चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस के बावजूद। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि मस्जिद पैनल की मांग है कि सर्वेक्षण रिपोर्ट को सील रखा जाये। देखना है फैसला क्या आता है और आगे-आगे क्या होता है। उधर अमर उजाला में पहले पन्ने पर एक खबर है, फिर दहशत फैलाने की कोशिश, मिठाई की दुकान के सामने धमाका, एक घायल।

अदाणी को यह संरक्षण किसलिये?

खबरों के लिहाज से एक दिलचस्प और जरूरी मामला अदाणी का भी है। दि एशियन एज में एक खबर है, अदाणी मामले में हंगामे से संसद तीसरे दिन भी नहीं चली (वक्फ विधेयक पर) जेपीसी का कार्यकाल बढ़ा। मुझे लगता है कि यह बड़ा मामला है और किसी मुद्दे पर संसद का लगातार तीन दिन नहीं चल पाना बड़ी खबर भी है। लेकिन अखबार ने अपनी खबर में हाईलाइट करके बताया है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदस्यों से अपील की है कि सदन की कार्यवाही चलने दी जाये और ऐसे मुद्दे नहीं उठाये जायें जो लोकसभा के लिए प्रासंगिक विषय नहीं हैं। यहां मुद्दा यह है कि सदन के सदस्य अगर किसी विषय पर चर्चा चाहते हैं तो वह लोकसभा के लिए प्रासंगिक कैसे नहीं है? उसपर एक दिन चर्चा करने की बजाय तीन दिन कार्यवाही स्थगित करना कैसी बुद्धिमानी है? और सदन (या सरकार) के लिए कौन से विषय प्रासंगिक हैं यह कैसे तय होगा? आज ही पहले पन्ने पर खबर है, विदेशमंत्री ने प्रधानमंत्री को बांग्लादेश के बारे में जानकारी दी, आज संसद में बोलने की संभावना। कुल मिलाकर देश के सबसे बड़े पूंजीपति पर आरोप है कि उसने झूठ बोलकर, तथ्यों को छिपाकर विदेशी पूंजी बाजार से धन उगाहने की कोशिश की। इसमें पकड़ा गया है – उसपर चर्चा नहीं हो रही है और बांग्लादेश के बारे में विदेश मंत्री ने प्रधानमंत्री को जो बताया है वह संसद में बताया जायेगा। देश-दुनिया को कोई बात बताने के लिए जरूरी नहीं है कि प्रधानमंत्री संसद में बोलें पर वे बोलेंगे। प्रेस कांफ्रेंस नहीं करेंगे, टीवी पर नहीं बोलेंगे। लेकिन अदाणी पर चर्चा नहीं होगी। समझना मुश्किल है। पर खबर तो है ही।

डीजीपी को सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी

टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर ये सब खबरें नहीं है। लीड उत्तर प्रदेश पुलिस को सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी है और वह भी ऐसी वैसी नहीं – वरना हम (ऐसे) आदेश पारित करेंगे कि डीजीपी जीवन भर याद करेंगे। मुझे लगता है कि चेतावनी अगर दी भी गई है तो इस तरह नहीं छपनी चाहिये। आखिर डीजीपी के बच्चे सुप्रीम कोर्ट (या व्यवस्था) के बारे में क्या राय बनायेंगे। डीजीपी का पद बहुत बड़ा है, राज्य में सबसे बड़ा। अगर वह कुछ कर रहा है तो अपने विवेक से करेगा, मुख्यमंत्री या सरकार की सलाह (या दबाव) पर किया होगा और यह उसकी नौकरी है। अगर वह दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की तरह हर मुद्दे पर उपराज्यपाल से भिड़ जाये तो आम तौर पर उसे अच्छा नहीं माना गया था और मिलजुल कर काम करने की सलाह दी गई थी। ऐसे में डीजीपी अगर सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और अपनी नौकरी बचाये हुए हैं (फिर भी रिटायर हो जायेंगे और सेवा विस्तार राज्य सरकार नहीं करती है) तो सुप्रीम कोर्ट की यह चेतावनी इस नौकरी या भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के बारे में युवाओं को उलझन में डालेगी। चेतावनी सुप्रीम कोर्ट के लिए जरूरी हो सकती है वरना उसके आदेशों का हश्र पटाखों पर प्रतिबंध की तरह होता है लेकिन वह इसके लिए अगर जीवन भर याद रखने वाला आदेश न दे (खबर तो नहीं ही है) तो इस चेतावनी से कौन डरेगा? इसीलिए मेरा मानना है कि अखबारों की जिम्मेदारी बड़ी है।

सौ साल पुरानी किताब

विक्रेता के सूत्रों के अनुसार यह संस्करण 2021 का है, कीमत 1500 रुपये है और लेखक दीवान बहादुर हर बिलास सारदा हैं। खबर में बताया गया है, अंग्रेजों के शासनकाल में अजमेर नगर पालिका के एक कमिश्नर थे हरबिलास सारदा। उन्होंने पांच किताबें लिखी थीं इनमें एक हिन्दू श्रेष्टता भी है। इस किताब में 460 पन्ने हैं और मुझे शक है कि 1911 में छपी किसी किताब के मूल या पहले संस्करण में इतने पन्ने होंगे। अगर यह सब सही भी हो तो खबर के साथ यह फोटो भ्रम फैलाती है।

अजमेर दरगाह पर ‘विभाजक’ एजंडा

द टेलीग्राफ में आज पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, दरगाह को निशाना बनाने वाले ‘विभाजक’ एजंडा से अजमेर की नाराजगी। इसके ऊपर एक फोटो का शीर्षक है, प्रधानमंत्री से एक अपील और उन्हें एक रिमाइंडर। इस फोटो का कैप्शन है, नरेन्द्र मोदी द्वारा 23 जनवरी 2024 को पोस्ट एक तस्वीर में दिख रहा है कि वे एक चादर सौंप रहे हैं जो अजमेर शरफ दरगाह में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती क दरगाह पर चढ़ाया जायेगा। खबर के अनुसार अजमेर दरगाह के पुश्तैनी प्रशासक और इसके खादिमों की एक संस्था ने स्थानीय अदालत में दायर एक अपील की आलोचना की है जिसमें यह मांग की गई है कि ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह को मंदिर घोषित कर दिया जाये। कहा गया है कि दक्षिण-पंथी ताकतें मुसलमानों को अलग-थलग करने और देश के सांप्रदायिक सद्भाव को बाधित करने की कोशिश कर रही हैं। नवोदय टाइम्स में इस मांग के आधार का विवरण दिया गया है। इसका शीर्षक है, सौ साल पुरानी किताब, जिससे निकली दरगाह के नीचे मंदिर की कहानी। इसके साथ जिस किताब की तस्वीर छपी है वह सौ साल पुरानी नहीं हो सकती है। पर वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है। सौ साल पहले अगर ऐसी कोई (दूसरी भी) किताब थी तो उसपर अगर 1991 के पूजा स्थल कानून के समय और उसके बाद अब तक नहीं बोला गया तो अब बोलने का कोई मतलब नहीं है। अब इसपर सुनवाई का मतलब समझना भी मुश्किल नहीं है। इस खबर के साथ छपी एक छोटी सी खबर का शीर्षक है, सस्ती लोकप्रियता पाने का स्टंट : सैयद नसीरूद्दीन चिश्ती। मेरा मानना है कि यह स्टंट तो मुकदमा करने वाले का हो सकता है पर बड़ा खेल तो उस परिवार का है जिसने एक ऐसे व्यक्ति को देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए आगे कर दिया जो कहता है कि उसका कोई नहीं है। बाद में पता चला कि उसका पूरा परिवार है और अगर अपना बच्चा नहीं है तो जय शाह है। ऐसे सहयोगी या प्रिय पात्र हैं जिसकी सहायता में वह कुछ भी कर सकता है और करने की छूट पा ली है। अभी जो नहीं समझ रहे हैं वो जब समझेंगे तब तक देर हो चुकी होगी।   

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