
संजय कुमार सिंह
आज के ज्यादातर अखबारों की लीड बताती है कि संसद में सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच चल रहा टकराव खत्म हो गया है और संविधान पर चर्चा के लिए सहमति बनी है। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों की लीड किसानों के दिल्ली कूच और इस कारण कल नोएडा में जाम की खबर है। इसमें भी शीर्षक वह नहीं है जो होना चाहिये था। अमर उजाला का शीर्षक है, भीषण जाम के बाद माने किसान सात दिन टाला दिल्ली कूच। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, दिन भर जोर आजमाइश। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों शीर्षक में सत्ता की ताकत और उसके दुरुपयोग को कम करके दिखाया गया है। किसान मान गये क्योंकि उनके पास विकल्प नहीं था, मजबूरी थी। दूसरा शीर्षक तो अविश्वनीय है। किसान राज सत्ता से क्या जोर आजमाइश कर पायेंगे वह भी वर्षों बाद। खबर तो यही है कि किसान आज भी देश की राजधानी में नहीं घुस सकते, सत्ता उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है और किसानों की मांग के बगैर उनके लिये जो कानून बनाये गये थे वो भले दबाव में वापस ले लिये गये पर उनके लिए कुछ खास नहीं किया गया है। नकद जरूर बांटे जा रहे हैं पर वह दूसरी सरकार देती है तो रेवड़ी कहलाती है। आदि आदि। इन बातों को शीर्षक में चाशनी लगाकर कहा गया है।
संसद में टकराव खत्म का मामला भी वैसा ही है। मुद्दा अदाणी से जुड़े मामलों की चर्चा का था। अमेरिका में उनपर लगे आरोपों का था। हिन्दुओं और हिन्दुत्व का भला करने आई सरकार ने एक राजकीय सेठ बनाया है और उसी के लिए काम करती नजर आ रही है। उसपर लग रहे आरोपों पर चर्चा की मांग विपक्ष ने की लेकिन उसे अनसुना किया गया। कई दिनों तक, संसद नहीं चलने की कीमत पर। इसलिए आज शीर्षक यह भी हो सकता था, विपक्ष को झुकना पड़ा सरकार ने अदाणी पर चर्चा की मांग नहीं मानी, संविधान पर चर्चा के लिए सहमति। यहां भी टकराव खत्म हुआ, गतिरोध टला जैसी बातें से लगता है कि विपक्ष कोई नाजायज मांग कर रहा था और सरकार उसे समझाने या दबाने में कामयाब रही है। यह निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं सरकार का प्रचार करने वाली पत्रकारिता लग रही है। वरना आज लीड के लिये और भी खबरें हो सकती थी और लीड न होती तो पहले पन्ने पर होनी ही चाहिये थी। लेकिन ऐसी खबरों को पहले पन्ने पर रखने (प्रमुखता देने) से सरकार बुरा मान जाती है इसलिए वे पहले पन्ने पर नहीं हैं।
2014 में सरकार बदलने के बाद से अखबारों की ज्यादातर खबरों और पहले पन्ने की लगभग सभी खबरों से सरकार की छवि बनाई जाती है। विपक्ष के आरोप लगभग नहीं होते हैं और वो भी बमुश्किल कभी-कभी किसी-किसी अखबार में होते हैं जो खबरों का संतुलन बनाये रखने के लिए जरूरी है। अपवाद कुछ ही अखबार हैं। ऐसे में एक तरफ ईवीएम पर आरोप है, गड़बड़ी के सबूत और उदाहरण हैं, भाजपा ने ही इन्हें पहले लोकतंत्र के खिलाफ बताया था और अब इसकी रक्षा करने पर तुली है। ऐसे में खबर थी जो मुझे पहले पन्ने पर नहीं दिखी कि महाराष्ट्र के एक गांव के लोगों ने तय किया है कि ईवीएम की जांच के लिए वे पुनर्मतदान करायेंगे और लोग वैसे ही इस बार मतपत्रों से वोट डालेंगे। गिनती के बाद पता चल जायेगा कि ईवीएम के नतीजे सही हैं कि नहीं। ईवीएम के खिलाफ तमाम शिकायतों और सबूतों के बावजूद चुनाव आयोग अगर अपने आरोपों के आधार पर (पुराने तमाम तथ्यों को नजरअंदाज करके) एफआईआर करा सकता है तो लोगों को हक है और उनकी मजबूरी है कि वे ईवीएम को गलत साबित करें। इसके लिए पुनर्मतदान का आईडिया सही और व्यावहारिक है। चुनाव आयोग हमेशा की तरह कह सकता है कि इस चुनाव को उसने नहीं कराया इसलिए इसके नतीजों के बारे में उसे कुछ नहीं कहना है और नतीजे उसी के चुनाव के मान्य होंगे। लेकिन लोगों को राय बनाने में आसानी होती जो ईवीएम से संबंधित खबरों को ठीक से नहीं छापने और व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी के प्रचार के कारण ऐसी हो गई है कि सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी भी उसी से प्रभावित लगी। उन्हें न्याय मांगने और न्याय करने से ज्यादा चिन्ता न्याय मांगने के कारण की थी। मतलब कोई मजबूरी में न्याय न मांगे तो उसके साथ अन्याय हुआ ही नहीं।
आप जानते हैं कि ईवीएम के खिलाफ शिकायत भाजपा ने इसका प्रयोग शुरू होने के साथ ही कर दी थी। उसके बाद आरोप लगा कि 2014 के चुनाव उसी से जीते गये, 2019 में भी इसका उपयोग और दिल्ली में भाजपा क्यों नहीं जीत पा रही है इसका कारण यह बताया जा चुका है कि इसमें उसे कामयाबी नहीं मिल पा रही है। यह सब अखबारों में छपता रहा है पर शिकायतें कभी नहीं हुईं। उल्टे 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें कम हुईं तो प्रधानमंत्री ने यह पूछकर कि ईवीएम जिन्दा है कि मर गया – उसका समर्थन और प्रचार किया। बिना कहे यह संकेत दिया कि ईवीएम सेट होते तो सीटें कम होतीं। यहां इसपर चर्चा नहीं हो सकती है लेकिन तथ्य है कि हरियाणा चुनाव नतीजे से भी लगा कि ईवीएम ने अपना काम किया और जिन्दा है तथा महाराष्ट्र में तो कोई बात ही नहीं है। ऐसे में अगर को मतपत्रों से पुनर्मतदान करके जांचना चाह रहा था तो परेशान होने की जरूरत कहां है, ईवीएम तो ठीक है। नतीजा वही आता तो ईवीएम से आया है। लेकिन परेशानी और कर्फ्यू लगाना अपने आप में काफी है और प्रचारक मीडिया ने इस खबर को महत्व नहीं देकर बाकी काम कर दिया है। तथ्य यह है कि बार-बार की शिकायतों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हार जाते हैं तो ईवीएम पर आरोप लगाते हैं जीतते हैं तो ईवीएम ठीक होता है।
ऐसे में जनता के पास अपनी बात रखने का एक तरीका यह पुनर्मतदान तो था ही। मैं इस मतदान और ईवीएम के नतीजों का इंतजार कर रहा था। आज पता चला कि वहां कर्फ्यू लगा दिया गया है और मतदान हो सकने की स्थितियां ही नहीं रहने दी गई हैं। वह भी तब जब कोई तनाव या हिंसा नहीं है। द हिन्दू में प्रकाशित एक खबर के अनुसार किसी अनाम अधिकारी ने कहा है कि यह एक मॉक प्रयास ही हो सकता है क्योंकि चुनाव आयोग ही चुनाव कराने वाली जिम्मेदार संस्था है। कहने की जरूरत नहीं है कि तमाम ‘गैर जिम्मेदार’ संस्थाओं के एक्जिट पोल पर दुनिया कान लगाये रहती है और इस बार तो आरोप है कि उसमें भी खेल किया गया और करोड़ों के वारे-न्यारे हुए। ना उसे पहले रोका गया ना बाद में किसी जांच की खबर है लेकिन एक गांव में पुनर्मतदान रोकने का क्या मतलब? वैसे भी, रोक कौन रहा है जब महाराष्ट्र में अभी सरकार ही नहीं बनी है। पूरा मामला इसलिए भी दिलचस्प है कि यह खबर होते हुए भी पहले पन्ने पर नहीं है। द हिन्दू की खबर से लगता है कि यह सब एसपी के आदेश से हुआ है और ईवीएम चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और उसके बाद सरकारी अफसर की निगरानी में रहते हैं। ईवीएम के बारे में शुरू से कहा जाता रहा है कि अधिकारियों की मिलीभगत से सेटिंग औऱ छेड़छाड़ संभव है। ऐसे में एसपी का अपने स्तर पर यह निर्णय भी महत्वपूर्ण है लेकिन यह सब ठीक से छपता होता तो सुप्रीम कोर्ट के जज की राय भी कुछ अलग होती।
पाठकों की जानकारी के लिए यहां द हिन्दू की खबर के कंप्यूटर अनुवाद का संपादित रूप पेश है। इसके अनुसार, पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 5 दिसंबर तक गांव में कर्फ्यू लगा दिया है। मतदान के लिए छुट्टी एक दिन मिलती है – पांच दिन का कर्फ्यू राज सत्ता की ताकत है और सुनिश्चित करेगा कि जो भी इस तरह ईवीएम को गलत साबित करने की कोशिश करे, गांव के लोग उसके खिलाफ हो जाएं कि पांच दिन का कर्फ्यू लग जायेगा। बाकी तो जो है सो तो हइये है। मुंबई डेटलाइन से स्नेहल मुथा की खबर इस प्रकार है। इसमें नाम गलत हो सकते हैं क्योंकि मुझे उनका कोई अंदाजा नहीं है और जांचने के लिए ऐसी खबर देने में देर करना उचित नहीं है। “हाल ही में महाराष्ट्र राज्य विधानसभा चुनाव के दौरान अपने गांव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के कामकाज पर अविश्वास व्यक्त करते हुए, सोलापुर जिले के मालशिरस तहसील के एक छोटे से गांव मरकडवाड़ी के लोगों ने मंगलवार (3 दिसंबर 2024) को मतपत्रों का उपयोग करके “पुनर्मतदान” कराने का फैसला किया है। खबर के अनुसार अनाम वरिष्ठ अधिकारी ने यह भी कहा कि संदेह के मामले में उपलब्ध कानूनी उपाय चुनाव याचिका है।” (चुनाव याचिकाओं का हश्र, उसपर सरकारी बचाव और टिप्पणियां कम दिलचस्प नहीं हैं पर वह अलग मुद्दा है)।
मालशिरस में 13,147 वोट के अंतर से जीतने के बावजूद, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नवनिर्वाचित विधायक उत्तमराव जानकर ने मांग की थी कि मतपत्रों का उपयोग करके मतदान कराया जाए क्योंकि वह मरकडवाड़ी गांव में बढ़त हासिल करने में विफल रहे थे। उनका मानना है कि गांव के मतदाता उनके प्रति सबसे ज्यादा निष्ठावान हैं, जिन्होंने पिछले चुनावों में लगातार उन्हें गांव में बढ़त दिलाई थी। इस बार श्री जानकर के प्रतिद्वंद्वी भाजपा के राम सतपुते को 1,003 वोट मिले जबकि उन्हें केवल 843 वोट मिले। गांव में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 1,900 है। नाम न बताने की शर्त पर एक ग्रामीण ने कहा कि यह अविश्वसनीय है कि श्री जानकर को गांव में उनकी लोकप्रियता के बावजूद बढ़त नहीं मिली।” जातिगत समीकरण भी है। जानकर धनगर समुदाय से आते हैं, यह गांव भी धनगर बहुल है। ग्रामीणों ने ग्राम पंचायत स्तर पर एकजुट होकर तहसीलदार से दोबारा चुनाव कराने की अपील की थी।” उनकी मांग को ठुकरा दिया गया, इसलिए ग्रामीणों ने खुद ही चुनाव कराने का फैसला किया है। हालांकि, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 के तहत मरकडवाड़ी गांव में कर्फ्यू लगा दिया गया है। गांव में कम से कम 50 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। “हमने एहतियाती कदम उठाए हैं। हमने ग्रामीणों को यह भी समझाया है कि क्या वैध है और क्या अवैध है और उनके कार्यों के क्या परिणाम हो सकते हैं।
सोलापुर के पुलिस अधीक्षक अतुल कुलकर्णी ने कहा, “निषेधात्मक आदेश लागू हैं; अगर लोग फिर भी एक साथ आते हैं तो कानून लागू किया जाएगा।” इसपर श्री जनकर का कहना है, “हम बस यह जांच कर रहे हैं कि वोट कहां गए, क्या ईवीएम में कोई गलती है और प्रशासन इस तरह की कवायद का विरोध क्यों कर रहा है। वे लोगों में डर पैदा कर रहे हैं, लेकिन चाहे कुछ भी हो, चुनाव कराए जाएंगे।” कहने की जरूरत नहीं है कि पुनर्मतदान कराने वालों के पास विकल्प नहीं है और इस माहौल में मतदान वैसा नहीं होगा जैसा पहले हुआ है और इसकी कामयाबी संदिग्ध हो जायेगी। मुद्दा यह है कि सरकार और उसके समर्थकों या प्रशासन को परेशान होने की क्या जरूरत थी। आखिर पुनर्मतदान तो होते रहते हैं। कोई उम्मीदवार अपनी जानकारी के लिए करवाना चाहता है तो क्या दिक्कत है? दूसरी ओर ईवीएम ठीक है तो भाजपा को बचाव करने की क्या जरूरत है? भाजपा परेशान क्यों है? इसपर श्री सतपुते के एक कार्यकर्ता और भाजपा समर्थक का अपना दृष्टिकोण था, “सतपुते ने योग्यता के आधार पर वोट हासिल किए। उन्होंने इस गांव के लिए धन का प्रबंध किया है और लोगों ने उसी आधार पर वोट दिया। इसका ईवीएम से कोई लेना-देना नहीं है।”
बांग्लादेश पर चुप्पी क्यों?
आप समझ सकते हैं कि पुनर्मतदान के अनूठे निर्णय की खबर को महत्व नहीं देना और फिर कर्फ्यू लगाये जाने की खबर का भी वही हश्र होना सामान्य नहीं है और मीडिया पैसे के बल पर यह सब कर रहा है तो अदाणी पर चर्चा नहीं होने और उसकी खबर का शीर्षक कितना मायने रखता है। ऐसे में आज द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से : बांग्लादेश मामले में चुप क्यों हैं? इस शीर्षक का फ्लैग शीर्षक है, ममता बनर्जी का सवाल और संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा बल की मांग ने पड़ोसी को नाराज किया। उन्होंने कहा है कि 10 दिन से वहां चल रही हिंसा और अराजकता के मद्देनजर केंद्र को चाहिये कि संयुक्त राष्ट्र से शांति सेना स्थापित करने के लिए कहे। खबर के अनुसार मुख्यमंत्री के एस सुझाव और टिप्पणी से बांग्लादेश के भिन्न क्षेत्रों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। लेकिन मेरा मुद्दा यह है कि दिल्ली के अखबारों में यह खबर इसी प्रमुखता से क्यों नहीं है? याद कीजिये कि झारखंड में चुनाव के समय प्रधानमंत्री ने घुसपैठ को मुद्दा बनाया था, ईडी का छापा भी पड़ा और खबर आ रही है कि वहां हिन्दू प्रतिड़ित किये जा रहे हैं। अगर ऐसा है तो प्रधानमंत्री क्या कर रहे हैं क्या वे हिन्दुओं को घुसपैठिया कह रहे थे या उनके कहने का मतलब था कि बांग्लादेश के बहुसंख्यक हिन्दू वहां से भाग कर यहां अल्पसंख्यक बनने, बुलडोजर न्याय पाने के लिए घुसपैठ कर रहे हैं। अव्वल तो इसे प्रधानमंत्री को ही स्पष्ट करना चाहिये पर वे ऐसा नहीं करते हैं और अखबार भी उन्हें ऐसी कोई जरूरत नहीं बताते हैं।
गतिरोध खत्म होने की खुशी
इसके अलावा, आज मेरे सभी अखबारों में गतिरोध खत्म होने की खुशी टपक रही है। हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड का शीर्षक है, भाजपा ने महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री का चुनाव करने के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किये। इसके ऊपर किसानों के मार्च और उन्हें सीमा पर रोक दिये जाने की खबर को आंदोलन लिखकर उनके साथ भी न्याय करने की कोशिश की गई है। कैप्शन में लिखा है कि वे अपनी मांगों के समर्थन में दिल्ली जाना चाहते थे, उन्हें सीमा पर रोक दिया गया। इसी तस्वीर का शीर्षक है, नोएडा में किसानों के आंदोलन से यातायात बाधित। अमर उजाला में पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, “प्रदर्शन करें, पर लोगों को असुविधा न होने पाये : सुप्रीम कोर्ट”। अभी मैं इस विस्तार में नहीं जाउंगा कि आज यह खबर चार कॉलम में कैसे और क्यों है। अभी तो इतना ही बताना है कि किसानों की मांग सरकार ने मान ली होती तो उन्हें आंदोलन करने की जरूरत ही नहीं थी। अगर सरकार ने यह कहा होता कि फलां तारीख को बात करेंगे तो उन्हें बिना बुलाये आने की जरूरत ही नहीं थी। पर सुप्रीम कोर्ट सारी अपेक्षा जनता से करे तो लगता है कि वह भी सरकार के साथ है और प्रधानमंत्री ने मुख्य न्यायाधीश के साथ पूजा करके यही बताने, दिखाने या करने की कोशिश की थी। सुप्रीम कोर्ट को जनता के साथ होना चाहिये। पूर्व मुख्य न्यायाधीश की भावनाओं का ख्याल रखते हुए कहा जाना चाहिये कि सरकार अपना ख्याल रख लेगी, उसे संरक्षण देना असंवैधानिक है और जनता का ख्याल रखना जरूरी।
जीएसटी और राजस्व हानि
इंडियन एक्सप्रेस में आज खबर है कि सिगरेट पर 35 प्रतिशत जीएसटी लगाने का विचार चल रहा है। वैसे यह ज्यादा लग सकता है लेकिन सिगरेट जैसे अस्वास्थ्यकर और गैर जरूरी उत्पादों पर ज्यादा टैक्स लगाने का रिवाज है। देश में जीएसटी लागू होने के बाद सिगरेट जैसे उत्पादों के लिए अलग से ज्यादा टैक्स का कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया जिससे ये उत्पादें सस्ती बिकीं और इनका सेवन करने वालों को स्वास्थ्य का नुकसान हुआ। देश को राजस्व की हानि हुई। सस्ती होने के कारण नये लोगों (खासकर किशोरों) को इसकी लत लगना आसान रहा और उसका नुकसान होगा तथा होता रहेगा। स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे। कई बजट से पहले किया है। पर सरकार की नीतियों के कारण गैर सरकारी संगठनों के लिए काम करना मुश्किल हो गया लेकिन सिगरेट सस्ती बिकती रही। मीडिया का काम है कि जनता को इन बातों की जानकारी दे पर अब यह सब नहीं होता है और आंचल मैगजीन ने अपनी खबर में लिखा है कि यह देश में जीएसटी लागू करने के बाद पहली बार होगा और इसमें सात साल गुजर चुके हैं जबकि इसे पहले ही होना चाहिये था। यह सरकार के लिए राजस्व के नुकसान का भी मामला है और इसमें देरी से सरकार को नुकसान हुआ पर उसकी चिन्ता कौन करे जब सरकार अपनी कुर्सी बचाने की चिन्ता में ही दुबली हुए जा रही हैं। और वाशिंग मशीन का धुंआधार उपयोग हो रहा है।
इधर-उधर की खास खबरें
दि एशियन एज की खास खबर, “सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में ग्रैप-4 के प्रतिबंधों में छूट से इनकार किया” पांच कॉलम में छपी है। इससे लगता है कि दिल्ली में प्रदूषण रोकने की पूरी कवायद दिल्ली के लिए, दिल्ली की ओर से दिल्ली में ही है जबकि एनसीआर में काम नहीं होगा तो दिल्ली कोई द्वीप नहीं है और राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास न हो तो भी पूरे एनसीआर के लिए काम किया जाएगा तभी दिल्ली सांस लेने लायक रहेगी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को लीड बनाया है और शीर्षक में वह भी है जो दि एशियन एज में उपशीर्षक में है। खबर के अनुसार सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि ग्रैप फोर के प्रतिबंध वीरवार तक जारी रहेंगे, हवा की गुणवत्ता बेहतर हुई तभी प्रतिबंधों में छूट दी जायेगी। द हिन्दू में भी संसद में गतिरोध टला लीड बनाया है। नवोदय टाइम्स के पहले पन्ने की प्रमुख खबरें हैं, कांग्रेस प्रतनिधिमंडल को संभल जाने से रोका, बिहार में स्वास्थ्य अधिकारी भर्ती परीक्षा रद्दा, 37 गिरफ्तार। एक और खबर दिलचस्प है यह है कि जब पूरा मीडिया यह बताने में लगा है कि महाराष्ट्र में सब ठीक है और आज भी ऐसी खबर पहले पन्ने पर है तो सूचना यह है कि मुख्यमंत्री कल तय होगा। यह उस पार्टी का हाल है जो प्रधानमंत्री पहले से तय करके चुनाव लड़ती थी और उसका चला होता तो पूरी व्यवस्था ऐसी ही हो गई होती और जब उसे उम्मीदवारों का नाम पक्का होता है तो दूसरे दलों से पूछती है और अपना पक्का न हो तो ऐसे चुप्पी साध लेती है जैसे सांप सूंघ गया हो। पार्टी या राजनीति के लिहाज से यह सामान्य हो सकता है लेकिन मीडिया, प्रचारक और ट्रोल सेना को फॉलो कीजिये। मुफ्त के मनोरंजन का अच्छा जुगाड़ है।
द हिन्दू की खबर का लिंक – https://www.thehindu.com/elections/maharashtra-assembly/maharashtra-village-plans-a-re-election-with-ballot-paper-police-impose-curfew/article68939405.ece


