
इस बीच इधर ‘क्लीन चिट’ उधर जमानत या वह भी नहीं का मुद्दा भी गौरतलब है
संजय कुमार सिंह
मैंने कल यहां लिखा था कि अखबारों ने उपराष्ट्रपति और राज्यसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी की खबर को महत्व नहीं दिया था। अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिये जाने के बाद आज यह खबर लगभग सभी अखबारों में लीड तो है ही। बहुमत की ताकत का प्रचार कर रहे जज साब की खबर लिये जाने की खबर भी आज सेकेंड लीड है। एक साथ विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता से जुड़ी इन दोनों खबरों से भाजपा की राजनीति को झटका तो लगना ही है। ईवीएम के खिलाफ आरोपों को लोकप्रियता से ढंकने की कोशिशों को जोरदार ठोकर भी लगा है। आगे क्या होगा से महत्वपूर्ण यह है कि हिन्दुत्व की आड़ में सत्ता पर कब्जा कर मनमानी करने की कोशिशों और सभी संवैधानिक संस्थाओं की खराब होती छवि पर स्वतंत्र होने का भरोसा बनने की संभवाना दिख रही है। यह भाजपा, संघ परिवार तथा नरेन्द्र मोदी व उनके सलाहकारों की 10 साल की कोशिशों के बावजूद है। इन कोशिशों में मीडिया को विज्ञापन का लालच देकर नियंत्रित करना, जो लालच में नहीं आये उन्हें मित्रों को खरीदवा देना और तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर अपने लोगों को बैठाकर या दूसरे तरीकों से नियंत्रित करना, बदले में ईनाम देना, झूठे आरोप लगाना और सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग सब शामिल है। ऐसे में आज लगभग सभी अखबारों में लीड और सेकेंड लीड सरकार के खिलाफ होना मायने रखता है। आज की खबर यही है और यह अखबारों में नहीं छपने वाली, चैनलों पर नहीं बताया जाने वाला है। हेडलाइन मैनेजमेंट की सफलता के बावजूद।
आज अखबारों में मजबूरी में ये दोनों खबरें तो हैं पर साथ में भाजपा का बचाव भी है। आज उसे देखना दिलचस्प होगा। इंडियन एक्सप्रेस में उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की खबर लीड है। इसका फ्लैग शीर्षक है, विपक्ष ने कहा, (लोकसभा) अध्यक्ष के रूप में धनखड़ पक्षपाती हैं, यह लोकतंत्र के लिए लड़ाई है। मुख्य शीर्षक है, उन्हें सरकार की आवाज कहते हुए विपक्ष ने उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया; भाजपा ने कहा पद का असम्मान है। कहने की जरूरत नहीं है कि उपराष्ट्रपति के खिलाफ अपनी तरह का यह पहला प्रस्ताव है और यूं ही नहीं होगा। ऐसे में उनका पद पर रहना पद का असम्मान है या बने रहना असम्मान है या पद पर रहते हुए उनका आचरण पद के अनुकूल नहीं था – ये मुद्दे महत्वपूर्ण हैं तो भाजपा पद के सम्मान से जोड़कर उनके आचरण का बचाव कर रही है। अखबार ने उसे शीर्षक में जोड़कर आरोप के बराबर महत्व दिया है या उसे कमजोर करने की कोशिश की है। जो भी हो, यह कदम औपचारिक है और विपक्ष के पास इतनी संख्या नहीं है कि उन्हें हटाया जा सके। लेकिन जिससे निष्पक्ष होने की अपेक्षा उसके बारे में सांसद कह रहे हैं कि वे सरकार के साथ पक्षपात करते हैं तो सरकार को भी क्या जरूरत है कि ऐसे आरोपी व्यक्ति को पद पर रखे। लेकिन यही भाजपा की राजनीति है वरना किसी पूर्व तड़ी पार को गृहमंत्री बनाने की क्या जरूरत थी और इतनी बड़ी आबादी में कोई दूसरा इस लायक नहीं मिला तो संभव है भाजपा के पास धनखड़ का विकल्प नहीं हो और यह वैसे ही है जैसे नरेन्द्र मोदी का नहीं है। एक पार्टी के रूप में जनता को तय करना है कि यह भाजपा की अच्छाई है या बुराई। मीडिया का काम है कि वह जनता को इस बारे में जागरूक करे।
भाजपा और नरेन्द्र मोदी की राजनीति यह भी है कि वे राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं के बारे में कहते हैं कि जमानत पर हैं। आप जानते हैं कि उनके मामलों में उन्हें क्लीन चिट मिली हुई है और दोनों इसी देश की उसी न्याय व्यवस्था का कमाल है लेकिन भाजपा के खिलाफ मामला हो तो तर्क दलील कुछ होते हैं विपक्ष का मामला हो तो सब बदल जाते हैं। हालांकि, अभी यह मुद्दा नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के उपशीर्षक में यह भी बताया गया है कि किन दलों ने खुद को इस नोटिस से दूर रखा और यह भी कि मुख्य सवाल है, प्रस्ताव स्वीकार किया जायेगा कि नहीं। पर मुझे नहीं लगता है कि यह सब मुद्दा है। मुद्दा यह है कि पहली बार किस उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया है भले ही यह पहली बार किसी राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री को दही-चीनी खिलाने की तरह ‘सामान्य’ हो। आज की दूसरी बड़ी खबर दो कॉलम में है, अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले जज के भाषण पर हंगामा, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से विवरण मांगा। टाइम्स ऑफ इंडिया में शीर्षक सीधा सरल है, विपक्ष ने पहली बार उपराष्ट्रपति को हटाने का नोटिस दिया। इससे संबंधित खास बातों के बॉक्स का शीर्षक है, विपक्ष के पास संख्या नहीं है। इसके साथ उपराष्ट्रपति को हटाने का तरीका बताया गया है। और इसमें पहला है प्रस्ताव को स्वीकार किया जाना और बहुत संभावना है कि प्रस्ताव को स्वीकार ही नहीं किया जाये । अगर स्वीकार कर लिया जायेगा तो से राज्यसभा में बहुमत से पास होना होगा और हो जाये तो फिर लोक सभा में भी। विपक्ष के पास इतनी संख्या नहीं है और पास होने की संभावना नहीं है। इसीलिए ऐसा प्रस्ताव रोज-रोज नहीं आता है। और आया है यही महत्वपूर्ण है। वरना इस खबर का भी क्या महत्व था? आज सभी अखबारों में लीड क्यों है। हाईकोर्ट के जज वाली खबर यहां सेकेंड लीड है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर चार कॉलम की लीड है। सीधा-सरल शीर्षक है, राज्यसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए विपक्ष ने नोटिस दिया। उपशीर्षक है, संसद में शत्रुता बढ़ी। यहां हाईलाइट करके यह भी बताया गया है कि विपक्ष के नोटिस में क्या कहा गया है। यह भी बताया गया है कि सरकार का क्या कहना है। जवाब किरण रिजिजू का है जो उपराष्ट्रपति या उनपर आरोप लगाने वाले मल्लिकार्जुन खरगे के मुकाबले कितने अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। हो सकता है यह महत्वपूर्ण भी नहीं हो पर एक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा की कार्यशैली का हिस्सा तो है ही। इसलिए रेखांकित भी किया जाना चाहिये और यह इसलिए भी जरूरी है कि भाजपा ने कांग्रेस और सोनिया गांधी पर जॉर्ज सोरोस से करीबी होने का आरोप लगाया और कांग्रेस के लिए काम करने वालों ने कुछ ही घंटों में भाजपा नेताओं और उनके बच्चों के नाम उजागर कर दिये जिन्हें जॉर्ज सोरोस से मदद मिलती है। ना तो भाजपा के आरोपों में इतना दम होता है और न बचाव में। अखबार क्या छापते हैं और क्या नहीं तथा इसमें पहले पन्ने पर क्या हो – यह उनका मामला है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में मूल खबर के साथ तीन कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, विपक्ष ने कहा धनखड़ ‘पक्षपाती, अनुचित’ हैं; विपक्ष ने कहा कि कदम ‘अफसोसनाक’ है। जज साब की खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर तीन कॉलम में है। द हिन्दू में शीर्षक और तगड़ा है, सीधा-सपाट, इंडिया की मांग, धनखड़ को राज्य सभा अध्यक्ष के पद से हटाया जाये। यहां जज साब की खबर तीन कॉलम के लीड के बराबर दो कॉलम में है और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री की फोटो के साथ एक खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री मोदी सुब्रमण्य भारती की संग्रहित कृतियों का लोकार्पण करेंगे। जज साब वाली खबर में जज साब की फोटो भी लगी है। इस तरह प्रधानमंत्री किसी और की कृतियों का लोकार्पण करेंगे इसलिए उनकी फोटो छपी है तो दूसरी खबर में जज साब के कारनामों का विवरण मांगा गया है इसलिए उनकी फोटो छपी है। प्रधानमंत्री और जज साब बराबर लग रहे हैं जबकि ऐसा है नहीं। लेकिन मामला हिन्दुत्व का है और गणित ठीक होने के बावजूद उसमें मैं जरा कमजोर हूं। खास तौर से एंटायर पॉलिटिकल साइंस की राजनीति के गणित में। जहां तक राजनीति की बात है, द हिन्दू में अंदर एक खबर होने की सूचना है, लालू यादव ने इंडिया ब्लॉक के नेता के रूप में ममता बनर्जी का समर्थन किया।
यहां यह दिलचस्प है कि कांग्रेस पर आरोप लगाकर, उसके खिलाफ झूठ बोलकर और उसे बदनाम करके सत्ता में आये नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम ने वर्षों राहुल गांधी को पप्पू साबित करने पर न सिर्फ खर्च किया बल्कि पूरी ताकत लगाई गई। अब लगता है कि नरेन्द्र मोदी जानते थे कि सरकारी पदों के ईनाम और ईडी-सबीआई की शाखा वाली उनकी राजनीति में टक्कर राहुल गांधी से ही मिल सकती है। इसलिए उन्होंने राहुल गांधी को कमजोर करने के हर संभव उपाय किये और प्रियंका गांधी की सुरक्षा खत्म करके उनका बंगला लेकर राहुल गांधी को और कमजोर किया। लेकिन राहुल गांधी पर कोई असर नहीं हुआ। वे अड़े रहे-डटे रहे। नतीजा सामने है। नरेन्द्र मोदी की सीटें कम हुईं और नीतिश कुमार की बैशाखी काम आ रह है। नीतिश कुमार इंडिया गठबंधन में आये-गये राहुल गांधी पर कोई फर्क नहीं पड़ा, ममता बनर्जी अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में मंत्री रह चुकी हैं। शरद पवार और ममता भी कांग्रेस छोड़कर गई हैं। ऐसे में वे या ये सब कुछ कर सकते तो किये होते या किसने रोका था। अब राहुल गांधी सबको साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं, अरविन्द केजरीवाल को भी नहीं छोड़ा तो राहुल गांधी ने किसी को रोका भी नहीं है। पर प्रचार यह किया जा रहा है कि इंडिया गठबंधन में नेतृत्व की लड़ाई है। होगी। पर बाकी लोगों को राहुल गांधी ने तो नहीं रोका था – भारत यात्रा करने से या नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार के विरोधियों को एकजुट करने से। बहुतों ने वह श्रम किया भ नहीं लेकिन मीडिया चाहता और बताता है कि राहुल गांधी कमजोर हैं, उनका समर्थन नहीं है और वे किसी को रोक रहे हैं। जो किसी तरह से सही नहीं लगता है। हो तो मीडिया को अपना काम जरा और स्पष्ट रूप से करना चाहिये। राहुल गांधी का कुछ बिगड़ नहीं रहा है।
अंग्रेजी के मेरे दो अखबारों, दि एशियन एज और द टेलीग्राफ में उपराष्ट्रपति को पद से हटाने के प्रस्ताव की खबर लीड नहीं है। दि एशियन एज में यह खबर लीड के नीचे चार कॉलम में है और जज साब वाली खबर पुतिन से हाथ मिलाते रक्षा मंत्री की तीन कॉलम वाली फोटो के नीचे दो कॉलम में है। दि एशियन एज की लीड बताती है कि सोरोस और अदाणी के मुद्दे पर भाजपा औऱ कांग्रेस भिड़े; संसद स्थगति। बेशक यह खबर लीड लायक है पर संसद तो कई दिनों से रोज स्थगित हो रही है और अदाणी के मुद्द पर ही हो रही है और उसमें सोरोस का मुद्दा नया जुड़ा है। यह लीड इस कारण है या किसी उपराष्ट्रपति के खिलाफ पहली बार विपक्ष में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया उसे लीड नहीं बनाने के लिए – यह समझना किसी के लिए भी मुश्किल होगा और सामान्य तौर पर यह मुद्दा होता भी नहीं है लेकिन हेडलाइन मैनेजमेंट के दौर में बात अलग है।
टेलीग्राफ ने जज साब की खबर को लीड बनाया है। फ्लैग शीर्षक है, ‘घृणा फैलाने वाला’ जज का भाषण और महाभियोग सुप्रीम कोर्ट तथा सरकार के लिए परीक्षा है। कहने की जरूरत नहीं है कि मामला ऐसा ही है और ऐसे ही देखा जाना चाहिये खासकर तब जब पहले के कई मामलों में कार्रवाई नहीं हुी है और जज साब ने अगर अब बोला है तो पहले के उदाहरण भी उनके दिमाग में होंगे और उनके खिलाफ कार्रवाई हुई तो यह दलील दी जायेगी कि जब आम लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो अब क्यों जब आरोपी जज हैं और अब तो यही मुद्दा है पर उसे महत्वपूर्ण नहीं रहने दिया जायेगा। पर यह सब तो बाद की बाद है। आज तो मैं यहां खबरों की प्रस्तुति की बात कर रहा हूं। और कहा जा सकता है कि आम तौर पर इस खबर की प्रस्तुति वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिये। जहां तक राज्यसभा अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति का मामला है उसमें महत्वपूर्ण यही है कि पहली बार पेश किया गया है जबकि जज साब की कारस्तानी ज्यादा खरतनाक और खतरे के संकेत हैं। इसीलिये द टेलीग्राफ का मुख्य शीर्षक है, आपका सम्मान और उससे भी ज्यादा दांव पर है। राज्यसभा के उपाध्यक्ष या उपराष्ट्रपति की खबर यहां चार कॉलम में टॉप बॉक्स है।
नवोदय टाइम्स की लीड धनखड़ पर है। शीर्षक है, धनखड़ के खिलाफ विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस। उपशीर्षक में बताया गया है कि इसपर 60 नेताओं के (ही) दस्तखत हैं और उनपर पक्षपातपूर्ण आचरण का आरोप है। यहां जज साब की खबर टॉप बॉक्स है। सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, अनुच्छेद 67 की व्याख्या पर ही टिका है नोटिस का भविष्य। एक अन्य खबर का शीर्षक है, यहां अंपायर ही कर रहा है पक्षपात। यह आरोप कांग्रेस नेता जयराम रमेश का है। अमर उजाला में मामला ज्यादा स्पष्ट है। पांच कॉलम की लीड का शीर्षक है, राज्यसभा के सभापति धनखड़ के खिलाफ विपक्ष ने दिया अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस। उपशीर्षक है, सभापति पर पक्षपातपूर्ण रवैये और सत्तापक्ष की पैरवी का आरोप, हस्ताक्षर करने वालों में कांग्रेस, सपा, तृणमूल, द्रमुक, राजद, टीएमसी, माकपा, भाकपा के 60 सांसद शामिल हैं, लेकिन खरगे व सोनिया गांधी के दस्तखत शामिल नहीं हैं। इसके साथ एक खबर का लाल रिवर्स में शीर्षक है, प्रस्ताव पारित होने की उम्मीद शून्य। अमर उजाला ने रिजिजू की उस खबर को पहले पन्ने पर लीड के साथ छापा है जिसकी चर्चा मैं द हिन्दू में अंदर के पन्ने पर होने की सूचना के साथ कर चुका हूं। मुझे लगता है कि भाजपा ने काम किसी वरिष्ठ नेता से कराया होता तो इसके छपने की संभावना बनती लेकिन भाजपा का कौन वरिष्ठ नेता यह काम कर सकता है वह मैं भी नहीं जानता या अनुमान लगा सकता हूं।
रिजिजू ने कहा है कि कांग्रेस नेतृत्व और सोरोस की सांठगांठ के खुलासे से विपक्ष बौखलाया। मैं पहले कह चुका हूं कि सोरोस की साठगांठ के आरोप का कोई मतलब नहीं है और अगर है तो सोरोस या सोनिया गांधी या दोनों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई। ऐसे आरोप का क्या मतलब जिसमें कार्रवाई की जरूरत न हो। यहां शेल कंपनियों और विदेशी संस्थाओं से चंदा का मामला उल्लेखनीय है। नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले कहते थे कि भारत में भ्रष्टाचार से कमाया गया पैसा शेल कंपनियों के जरिये भारतीय कंपनियों में निवेश कर दिया जाता है और वे इसे रोक देंगे। सत्ता में आने के बाद उनने लाखों शेल कंपनियां बंद कराईं पर अंबानी की कंपनियों में 20,000 करोड़ का निवेश किसका है पता नहीं चल रहा है। सरकार की दिलचस्पी नहीं है। आरोप तो यही है कि माधवी पुरी बुच को इसी लिए सेबी का प्रमुख बनाया गया है और यह भी कि वह पैसा उन्हीं का है। जिसका भी हो, अदाणी के यहां निवेश है तो पता नहीं लगाना और लाखों शेल कंपनियां बंद होने का नुकसान व परेशानी। इसपर सवाल उठाने वालों के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें जेल भेजा जाना – साधारण नहीं है। जवाब में सोरोस से संबंध का आरोप वैसे तो कुछ नहीं है लेकिन कांग्रेस के नेताओं ने भाजपा नेताओं और उनके बच्चे से भी सोरोस के संबंध बताये हैं उसपर आज के अखबारों में पहले पन्ने पर तो कुछ नहीं है। जहां तक विदेशी चंदे औऱ दान की बात है, प्रधानमंत्री उसके लिए पीएम केयर्स खोल चुके हैं जो आरटीआई के तहत सूचनाएं नहीं देता, सबकुछ सरकारी होने के बावजूद निजी बताया जाता है उसमें न जाने किससे-किससे पैसे लिये गये हैं। यही नहीं विदेशी चंदे से एनजीओ या गैर सरकारी संगठन चलाने और जनसेवा के काम करने वाले संघठनों को नियंत्रण में रखने के उद्देश्य से चंदा लेने के नियम ऐसे बना दिये गये हैं कि कइयों के लाइसेंस रद्द हो चुके हैं और कई बंद हो चुके हैं। इससे रोजगार और पैसे – दोनों का नुकसान है लेकिन सोरोस को चंदा देने और उनसे लेने पर रोक नहीं है। फिर भी सोनिया गांधी उनसे करीब है या उनकी किसी संस्था को चंदा या दान मिला है तो अपराध हो गया जिसका संज्ञान अभी तक नहीं लिया गया है।
फिर भी, रिजिजू बहुमत की बात कर रहे हैं और बहुमत पर आरोप है कि वह ईवीएम और चुनाव आयोग की मेहरबानी से जुगाड़ा गया है। इन खबरों के बीच और इस स्थिति में अमर उजाला ने आज पांच कॉलम का शीर्षक लगाया है, चोकसी की 2500 करोड़ की संपत्तियां बेचने की प्रक्रिया शुरू। खबर में बताया गया है कि यह 13,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी और उससे जुड़ा मनी लांड्रिंग का मामला है। आप जानते हैं कि मनी लांड्रिंग के कितने बड़े और कितने पुराने मामले में कई राजनेता और निर्विाचित प्रतिनिधि जेल हो आये और 13,000 करोड़ के घोटाले के आरोपी के खिलाफ प्रक्रिया अब शुरू हो रही है तो पांच कॉलम में छपी है। क्योंकि जयश्रीराम और जो राम को लाये हैं छाये हुए हैं।


