
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों ने पहले पन्ने पर प्रमुखता से नहीं बताया है कि व्हिप के बावजूद भाजपा के 20 से ज्यादा सांसद कल ‘गायब’ रहे। नवोदय टाइम्स में यह छोटी सी खबर है जबकि अमर उजाला में बोल्ड में शीर्षक भर है – बाकी अंदर के पन्ने पर ‘जारी’ है। व्हिप के बावजूद 20 सदस्य नहीं आये यह खबर पहले पन्ने पर कम से कम दो कॉलम की होनी ही चाहिये थी। खासकर इसलिए कि आज मेरे आठ में से सात अखबारों की लीड एक देश, एक चुनाव का विधेयक ‘पेश’ कर दिये जाने की खबर है। पर किसी ने शीर्षक में, उपशीर्षक में या वैसे हाईलाइट करके नहीं बताया है कि व्हिप के बावजूद ऐसा हुआ। हिन्दुस्तान टाइम्स ने मुख्य खबर को लीड बनाया है उसके साथ तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, एक देश एक चुनाव दो तिहाई बहुमत जुटाने की सरकार की योग्यता की जांच करेगा। इस खबर के अनुसार, यह दो तिहाई बहुमत जुटाने की सरकार की योग्यता की जांच हो सकती है। अनुच्चेद 368 के तहत लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। विपक्ष की मांग पर मतदान हुआ और बिल पेश किये गये लेकिन संविधान संशोधन के लिए आवश्यक 362 वोट के मुकाबले काफी कम हैं और 20 अनुपस्थित सांसदों के रहने पर भी विधेयक पास नहीं होता। दूसरी ओर, विपक्ष विधेयक को गिराने के लिए आवश्यक 179 वोट के मुकाबले 198 वोट जुटा पाया। इस तरह यह सरकार के लिए काफी शर्मनाक स्थिति है और अखबारों ने इसीलिए इसे महत्व नहीं दिया है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर और शीर्षक से लगता है कि इसलिए विधेयक को विचार विमर्श के लिए जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) के पास भेजा जाना तय है। इसीलिये आज खबर यह भी है कि, “विधेयक पर विपक्षी दलों के विरोध के बीच, गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि जब मंत्रिमंडल में चर्चा के लिए विधेयक आया था, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं मंशा जताई थी कि इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के विचार के लिए भेजा जाना चाहिए”। दूसरी ओर, अमर उजाला ने समझाया है कि इस कानून से क्या बदल जायेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर की खास बातों के बॉक्स का शीर्षक बनाया है, व्हिप के बावजूद 20 विधायक गैरहाजिर रहे। व्हिप के बावजूद संसद में उपस्थित नहीं रहने के लिए भाजपा ने अपने जिन सांसदों को नोटिस भेजा है उनमें केंद्रीय मंत्री शामिल हैं। लाइव हिन्दुस्तान डॉट कॉम की खबर के अनुसार इनमें प्रमुख नाम हैं, जगदंबिका पाल, शांतुनु ठाकुर, बीएस राघवेंद्र, गिरिराज सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, विजय बघेल, भागीरथ चौधरी, उदयराजे भोंसले, जयंत कुमार रॉय और जगन्नाथ सरकार। इनमें एक, भागीरथ चौधरी मंत्री हैं और प्रधानमंत्री के प्रोग्राम में जयपुर में थे। आजतक डॉट इन के अनुसार, लोकसभा में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने यह बिल पेश किया। लोकसभा में जोरदार हंगामे के बीच बात डिविजन तक पहुंची और इसके बाद ये बिल सदन में पेश हो सका। एक देश, एक चुनाव पर राजनीतिक दलों के सुर अलग-अलग सुनाई दिए। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने यह बिल सदन में पेश करने का प्रस्ताव किया। कांग्रेस से लेकर तमाम विरोधी पार्टियों ने इस बिल का विरोध किया। शिवसेना और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) जैसे एनडीए के घटक दल खुलकर बिल के पक्ष में खड़े नजर आए। यह बिल डिविजन के बाद पेश हुआ और इसके बाद जेपीसी को भेज दिया गया।
आप समझ सकते हैं कि जो हुआ वह सामान्य नहीं है। एनडीटीवी ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि आज मतदान के दौरान भाजपा के 20 से अधिक सांसद अनुपस्थित थे। बीजेपी ने पहले ही अपने लोकसभा सांसदों को तीन लाइन की व्हिप जारी की थी, जिसमें उन्हें सदन में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया था। कांग्रेस ने कहा है कि बिल के पक्ष में पर्याप्त समर्थन होता, तो ऐसा नहीं होता। ज़ीन्यूज इंडिया डॉट कॉम ने आज व्हिप का मतलब भी बताया है। खबर के अनुसार, ‘व्हिप’ एक राजनीतिक शब्द है, जिसका इस्तेमाल आम तौर पर संसदीय और विधानमंडलीय प्रक्रियाओं में किया जाता है। यह एक ऐसा तंत्र है, जो पार्टी के सदस्यों को पार्टी के दिशा-निर्देशों और नीतियों का पालन करने की बात कहता है। इसके अलावा व्हिप का इस्तेमाल महत्वपूर्ण मतदान या बहसों के दौरान पार्टी अनुशासन बनाए रखने के लिए किया जाता है। व्हिप का मकसद यह यकीन बनाना होता है कि पार्टी के सभी सदस्य पार्टी की नीतियों का समर्थन करें और वोटिंग के समय एकजुट रहें। इसके बावजूद 20 सदस्यों का नहीं होना मायने रखता है भले विधेयक को पेश किए जाने के पक्ष में 269 वोट, जबकि विरोध में 198 वोट पड़े।
आज के अखबारों में इसी बात को महत्व दिया गया है और इस तरह यह प्रचारित करने की कोशिश की गई है जबकि भाजपा जैसी पार्टी के 20 सदस्यों का व्हिप के बावजूद उपस्थित नहीं होना मायने रखता है। इसीलिये नोटिस भी भेजे गये हैं और इनमें गिरिराज सिंह के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया भी हैं तो समझा जा सकता है कि व्हिप नहीं मानने वाले लोग कौन और कैसे हैं। कोई कारण नहीं है कि अखबार इस महत्वपूर्ण खबर को छिपाये या अंदर के पन्ने पर छापें। हालांकि मैं अंदर के पन्ने नहीं देखता हूं और मेरा मानना है कि पहले पन्ने ही लचर होता है तो अंदर क्या उम्मीद। हालांकि, वह अलग मुद्दा है। जहां तक हेडलाइन मैनेजमेंट की बात है, एबीपी लाइव डॉट कॉम के अनुसार एक देश एक कानून लागू भी हो गया तो बिल पास हो भी गया तो 2034 से पहले देश में नहीं हो सकते एक साथ चुनाव। इसका कारण यह है कि विधेयक में कहा गया है कि 2029 के आम चुनाव के बाद लोकसभा की पहली बैठक के दौरान राष्ट्रपति एक देश एक चुनाव के समय का ऐलान करेंगे। इसके बावजूद आज यह प्रचार पर्याप्त है कि 2029 के चुनाव एक साथ होंगे। जागरण डॉट कॉम की 13 दिसंबर की खबर है, क्या 2029 में होंगे एक साथ चुनाव? पढ़िए वन नेशन-वन इलेक्शन से जुड़े हर सवाल का जवाब।
इसमें कहा गया है, नरेंद्र मोदी सरकार एक बार फिर इस परंपरा को शुरू करने जा रही है। अगर सब कुछ ठीक रहा, तो 2029 में पहली बार देश में एक साथ चुनाव होंगे। लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनावों के लिए देश एक साथ वोट डालने निकलेगा। हालांकि, अगला ही पैराग्राफ कहता है, लेकिन ये सुनने में जितना आसान लग रहा है, उतना है नहीं। केंद्र सरकार को इसके लिए संविधान में जरूरी संशोधन करने पड़ेंगे और इसके लिए उसे दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। इसके बाद अगर राज्यों की सहमति की जरूरत पड़ी, तो विपक्षी दलों के नेतृत्व वाले राज्य अड़चन पैदा करेंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि यह एक मुश्किल और गैर जरूरी कवायद है लेकिन इसका मकसद है दूसरे मुद्दों से ध्यान भटकाना। इसलिए आज ही खबर है, “कांग्रेस ने संविधान से किया छल परिवार की जागीर माना : (अमित) शाह”। अमर उजाला में यह लीड के साथ तीन कॉलम का शीर्षक है। नवोदय टाइम्स में तीन कॉलम कॉलम का शीर्षक है, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से हुई थी तुष्टिकरण की शुरुआत।
द टेलीग्राफ ने अमित शाह की इस चाल को ध्रुवीकरण का कोड कहा है और चार कॉलम की इस लीड का फ्लैग शीर्षक है, शाह की नजर राज्यों के जरिये यूसीसी पर, मुस्लिम पर्सनल लॉ पर हमला। इंडियन एक्सप्रेस में अमित शाह की खबर चार कॉलम में है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, “सभी भाजपा शासित राज्यों में यूसीसी होगा, कांग्रेस सीमा बढ़ाकर मुसलमानों को कोटा देना चाहती है :शाह। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर टॉप पर तीन कॉलम में है। शीर्षक हिन्दी में इस तरह होगा, भाजपा सरकारें सभी राज्यों में जल्दी ही यूसीसी लायेंगी। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड के साथ है और शीर्षक है, “कांग्रेस 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा हटाकर मुसलमानों को कोटा देना चाहती हैं”। आप जानते हैं कि राहुल गांधी ने दलितों के लिए कहा है और अगर उन्हें लगता है कि मुसलमानों को भी देना चाहिये तो देंगे ही और देना भी चाहिये। संविधान यही कहता है। मंत्री सबके लिए काम करने की शपथ लेते हैं और धर्म विशेष के लिए काम करते हैं या धर्म विशेष के खिलाफ बोलते हैं। इसीलिए राहुल गांधी ने संविधान की रक्षा का मुद्दा उठाया है और अमित शाह उससे हिन्दुत्व की अपनी राजनीति को होने वाला नुकसान समझते हैं औऱ भाजपा को मुसलिम समर्थक बताना चाहते हैं जबकि उसमें कुछ अनुचित नहीं है और सबको पता है।
अंत में ईवीएम
भाजपा यह सब करके भी चुनाव जीत जा रही है और ईवीएम का जोरदार बचाव कर रही है तो शक ईवीएम पर है और ईवीएम का बचाव भी आज फिर किया गया है। शुरुआत उमर अब्दुल्ला ने की, फिर अभिषेक बनर्जी और आज अमित शाह ने। तीनों दिन खबर पहले पन्ने पर छपी और जो नहीं छपी वो मैं ऊपर बता चुका हूं। अमर उजाला में आज छपी खबर के अनुसार अमित शाह ने कहा है, हारे तो ईवीएम का रोना, जीते तो नये कपड़े पहन ली शपथ। मुझे लगता है कि भाजपा ईवीएम से जबरदस्त फायदे में है और इसीलिए इसका गैर जरूरी बचाव करती है। तथ्य यह है कि देश में आम चुनावों में ईवीएम का उपयोग 2004 में शुरू हुआ था और 2004 व 2009 में कांग्रेस को बहुमत मिला जब सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गईं और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। तब भाजपा ईवीएम का विरोध करती थी और ईवीएम के खिलाफ भाजपा नेताओं की दो किताबें हैं। किताब में यही कहा गया है कि ईवीएम को किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में सेट किया जा सकता है और सभी तो नहीं, पर कुछ ही मतदान केंद्रों के ईवीएम से कई विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों के नतीजे बदले जा सकते हैं। चुनाव आयोग जो तब कहता था वह अब भी कहता है और अब नतीजों से साबित हो चुका है कि भाजपा के आरोप सही थे। लेकिन लाभ भाजपा को है इसलिए भाजपा इसकी चर्चा भर से परेशान हो जाती है और कांग्रेस या राहुल गांधी पर आरोप लगाने लगती है। चुनाव आयोग का कहना है कि ईवीएम मशीनें सुरक्षा में रहती हैं, उनकी निगरानी की जाती है और इसलिए छेड़छाड़ या सेंटिंग संभव नहीं है। यह 2010 में ही साबित किया जा चुका है कि मिलीभगत से यह संभव है।
ऐसे में 2014 के बाद के नतीजे वैसे ही हैं। जहां जिसकी सरकार वही जीत गया। कुछ अपवाद भी होंगे। यह अलग बात है कि भाजपा हार कर भी सरकार बना लेती रही है और महाराष्ट्र इसका उदाहरण है। भाजपा ने पांच साल सत्ता में रहने के लिए क्या नहीं किया और तमाम अनैतिक व अनुचित काम करके संवैधानिक संस्थाओं की मदद से सत्ता में बनी रही और चुनाव जीत गई। भले श्रेय रेवड़ी बांटने को दिया गया पर ईवीएम की सेटिंग भी तो संभव है। अमित शाह ने आज महाराष्ट्र के साथ झारखंड का उदाहरण दिया है और आप जानते हैं कि यहां जिसकी सरकार थी वही जीती। इससे संभावना दोनों है कि यहां जो सत्ता में था उसने ईवीएम का उपयोग अपने पक्ष में किया। वैसे भी झारखंड में कांग्रेस गठबंधन के हारने की उम्मीद नहीं थी और मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी का नुकसान व फायदा होना ही थी। इसी तरह महाराष्ट्र में भाजपा ने जो किया उसका नुकसान तो नहीं हुआ औऱ उम्मीद के बावजूद वह जीत गई तो शक मजबूत होता है कि खेल ईवीएम से हुआ है। अगर ऐसा नहीं है तो मतदाताओं पर भी शक कर सकते हैं। पर मैं नहीं करता। इसमें दिलचस्प यह भी है कि राहुल गांधी को विरोध करने के लिए उकसाया जाता है और दिख रहा है कि वे वैसे विरोध नहीं करते हैं जैसे दूसरे लोग करते हैं और कम करने पर भी जो हो रहा है आप दो दिन से देख रहे हैं। अगर उन्होंने अखिलेश यादव की तरह कहा होता कि लोकसभा में 80 सीट जीतने पर भी ईवीएम हटाने का आह्वान करूंगा तो क्या होता आप सोच सकते हैं। अखिलेश यादव ने यह भी कहा है कि ईवीएम से जीतकर ईवीएम हटाउंगा। उसके बाद अमित शाह ने जो कहा है उसका कोई मतलब नहीं है लेकिन अमर उजाला ने उसे महत्व देने के लिए दो कॉलम का शीर्षक लगाया है। हाईलाइट किया है। यह अलग बात है कि अखिलेश यादव ने जो कहा है उसे उतना महत्व नहीं मिला जितना उमर अब्दुल्ला, अभिषेक बनर्जी या अमित शाह के कहे को दिया जाता रहा है। मतलब साफ है और जब हर हिन्दू हिन्दू की तरह बात करने लगे तो लोकतंत्र और चुनाव का मतलब वैसे ही नहीं रह जायेगा।


