
संजय कुमार सिंह
नरेन्द्र मोदी की सरकार शुरू से विरोध की हर आवाज को कुचलती रही है और इसकी शुरुआत की ‘घोषणा’ आकार पटेल को उनकी किताब के लिए परेशान किये जाने से हो गई थी। अंग्रेजी में लिखी आकार पटेल की किताब के नाम का भाव हिन्दी में, ‘नरेन्द्र मोदी की सरकार कितने की पड़ी’ है। कायदे से इसे हिन्दी के पाठकों के लिए भी उपलब्ध होना चाहिये लेकिन लेखक को परेशान किये जाने के बाद हिन्दी का कौन प्रकाशक इसमें निवेश करेगा और चुनाव परिणाम अगर ईवीएम से प्रभावित नहीं हैं तो यह भी मान लेना चाहिये कि हिन्दी में इसके पाठक नहीं है। पर वह अलग मुद्दा है। आज मुद्दा यह है कि विरोध और विपक्ष से निपटने का सत्ता का अपना अंदाज होता है। इंदिरा गांधी ने उसके लिए इमरजेंसी लगाने की जरूरत समझी और संवैधानिक उपाय किये तो उसका भारी विरोध हुआ। नरेन्द्र मोदी अभी भी इमरजेंसी को याद करते हैं और उनकी सरकार में संसद में लोकसभा अध्यक्ष को संभवतः 2024 में यह याद दिलाना पड़ा था कि 1975 की इमरजेंसी की चर्चा हो सकती है तो 2016 की नोटबंदी की चर्चा करने से आप क्यों रोकते हैं। दरअसल यह अघोषित इमरजेंसी की स्थिति है और घोषित इमरजेंसी का विरोध करने वाली किताबें 2019 तक आई और एक के लेखक को तो पद्म पुरस्कार भी मिला। अभी सेना प्रमुखों की किताब रोक दी गई है।
अघोषित इमरजेंसी 10 साल चल चुकी और अभी भी लोकप्रिय है। इमरजेंसी लगाने का उनका निर्णय उसके बाद के चुनाव में उनकी हार का कारण बना तो चुनाव जीतने वाले लोग ढाई साल में ही निपट गये। उसके बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी फिर भारी मतों से जीतती रहीं। संजय गांधी के निधन उनकी विधवा का इंदिरा गांधी के परिवार से अलग होना और फिर भाजपा में शामिल हो जाना, इंदिरा गांधी की हत्या और फिर राजीव गांधी की हत्या के बाद कोई ऐसा कारण नहीं था कि गांधी परिवार राजनीति में रहता। रही सही कसर सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देकर पूरी हो गई। उसके बाद हिन्दुत्व के उभार का असर हुआ और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उनकी रणनीति यह रही कि सबसे सक्षम विरोधी को राजनीतिक रूप से खत्म कर दो। पर वह होना नहीं था नहीं हुआ। उसकी अलग लंबी कहानी है। इमरजेंसी के बाद कांग्रेस ने अगर विरोध से निपटने का तरीका विकसित किया तो वोट हासिल करने वाले काम भी किये। फिर भी झूठे और खर्चीले प्रचार की बदौलत नरेन्द्र मोदी अगर सत्ता में आ गये तो वे अपने छोटे-मोटे हर विरोधी को खत्म करने की रणनीति में लग गये। उसपर मैं लिखता रहा हूं पर अभी यह संसद में विपक्ष के नेता और विपक्षी दल के अध्यक्ष तक पहुंच चुका है।
संसद परिषद में भीड़ और धक्का मुक्की में विपक्षी दल के 83 वर्षीय अध्यक्ष का गिर जाना और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर खबर के रूप में आपको जैसे मिली हो या नहीं मिली हो, गंभीर तथ्य है। उल्लेखनीय है कि भाजपा का यह आरोप होता था कि कांग्रेस गांधी परिवार की पार्टी है, चुनाव नहीं होते हैं, उनकी पार्टी अनुशासित है आदि। अब स्थिति अलग है। भाजपा का पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है, चुनाव याद नहीं है और कांग्रेस अध्यक्ष को भाजपा के सबसे बड़े और काबिल नेता जगदीप धनखड़ नहीं झेल पा रहे हैं। ऐसे में चुनावी जीत में ईवीएम की भूमिका से लेकर पक्षपाती चुनाव आयोग और परमात्मा प्रेषित प्रधानमंत्री के शासन काल में परमात्मा से पूछ कर फैसला करने वाले जजों ने देश का जितना नुकसान किया है उसे बता पाने वाले लोगों की संख्या बहुत कम रह गई है। विरोधियों का जो हाल हुआ है उसमें कोई हिम्मत भी नहीं करेगा। संसद में कल जो सब हुआ वह विपक्ष से निपटने के सरकारी तरीके के कारण तो है ही संभव है यह सब अदाणी पर चर्चा रोकने की मजबूरी में हुआ हो। इस पृष्ठभूमि में आज के अखबारों की खबर और शीर्षक उतने गंभीर और गहरे नहीं हैं जितने होने चाहिये थे। अगर ऐसा हेडलाइन मैनेजमेंट के कारण है तो आप जानते हैं कि सरकार के पहले सक्षम विरोधी, मीडिया को लगभग खरीद लिया गया है। सबों ने बहुत पहले से हथियार डाल रखे हैं। आइये अब आपको आज की लीड का शीर्षक बता दूं। द टेलीग्राफ में यह पांच कॉलम की लीड है। फ्लैग शीर्षक है, अंबेडकर मामले में विरोध संसद तक पहुंचा फ्री फॉर ऑल और एफआईआर तक कहानी पहुंच गई है। मुख्य शीर्षक है, कुंग फु पंगा। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक भी छोटा सा है, अंबेडकर के नाम पर। फ्लैग शीर्षक है, संसद में हमले के आरोपों के बाद विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच विभाजन और गहरा हुआ। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड चार कॉलम में है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, संसद में दोनों पक्षों ने हमले के आरोप लगाये टकराव ने बदसूरत रूप लिया।
टाइम्स ऑफ इंडिया में चार कॉलम का विज्ञापन और चार कॉलम की लीड है। शीर्षक है, अंबेडकर विवाद शारीरिक हुआ; भाजपा कांग्रेस ने एक-दूसरे पर आरोप लगाये। इंट्रो है, राहुल (गांधी) ने दो सांसदों को जख्मी किया; आगे लिखा है, विपक्ष के नेता ने आरोपों से इनकार किया। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर और प्रस्तुति से लगता है कि सांसदों में तू–तू मैं–मैं का स्तर क्या है। राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर का आधार क्या है और इससे भाजपा राजनीतिक स्तर पर क्या हासिल कर सकती है या विरोधियों विपक्षियों को कुचलने की उसकी राजनीति किस तरफ जा रही है। मुझे लगता है कि कल की स्थिति ऐसी थी जिसमें किसी का कोई नियंत्रण नहीं था। आगे भी यही चलता रहा तो स्थिति और खराब होगी तथा राजनीति का स्तर तो गिरेगा ही, सार्वजनिक भी होगा। फिलहाल टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार भाजपा के घायल सांसदों में एक प्रताप षाड़ंगी ने कहा है, मैं सीढ़ियों के पास खड़ा था, राहुल गांधी आये और एक सांसद को धक्का दिया जो मुझपर गिर गये और मैं जख्मी हो गया। राहुल गांधी ने कहा है, मैं अंदर जाने की कोशिश कर रहा था (भाजपा सांसद गेट पर खड़े थे, जैसा प्रह्लाद षाड़ंगी ने कहा है पर यह मुद्दा नहीं है)…. लेकिन भाजपा सांसद मुझे रोकने की कोशिश कर रहे थे। उनलोगों ने मुझे धक्का देकर दूर कर दिया और मुझे धमकी दी। किरेन रिजिजू ने कहा है, क्या आपने अन्य सांसदों को पीटने के लिए कराटे, कुंगफु सीखा है? संसद लड़ाई की जगह नहीं है।
कहने की जरूरत नहीं है कि किरण रिजिजू अपनी कुंठा निकाल रहे हैं और संसद में लड़ाई तो कई दिनों से चल रही है और अगर किसी ने कुंग फु सीखा है तो भले उसका उपयोग हमले के लिए नहीं करे, बचाव में तो करेगा ही। अंत में मल्लिकार्जुन खरगे का कहा आया है, …. मुझे जमीन पर बैठने के लिए मजबूर किया गया । इनमें कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच – समझना मुश्किल है लेकिन भारतीय राजनीति में झूठ की शुरुआत किसने की, जानना मुश्किल नहीं है। आज की इन खबरों के साथ एक जरूरी खबर यह भी है कि राज्य सभा के डिप्टी चेयरमैन ने धनखड़ को हटाने के नोटिस को खारिज कर दिया। यह तो पता ही था कि नोटिस देने वालों के साथ संख्या बल नहीं है फिर भी नोटिस को खारिज किया जाना खबर तो है ही। द हिन्दू ने इसे चार कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ छापा है और राज्यसभा के उपसभापति, पूर्व पत्रकार (जिनके नीतिश कुमार के साथ दल बदलने की चर्चा नहीं होती है) हरिवंश की फोटो भी है।
द हिन्दू में लीड का शीर्षक है, अंबेडकर के ‘अपमान’ पर सांसद संसद के बाहर भिड़े। उपशीर्षक में बताया गया है कि भाजपा के दो सांसद जख्मी हुए हैं; गंभीर रूप से जख्मी करने, जान खतरे में डालने (राहुल वहां थे यह अपनी जान खतरे में डालने का मामला हो ही सकता है, बाकी के खिलाफ एफआईआर नहीं होनी थी नहीं हुई), आपराधिक ताकत का उपयोग करने के लिए राहुल के खिलाफ एफआईआर; कांग्रेस के सांसदों ने कहा कि सत्तारूढ़ दल के सांसदों ने उनसे जबदस्ती की, जवाबी शिकायत दायर की गई है। जो भी हो, द हिन्दू के इस शीर्षक से साफ है (और कल वीडियो सबने देखा है) कि सत्तारूढ़ दल के सांसद (संसद भवन का) रास्ता रोके खड़े थे। मैंने पहले भी लिखा है कि वह मुद्दा ही नहीं था। द हिन्दू के शीर्षक और उपशीर्षक से यही लगता है कि मामला प्रवेश द्वार घेर कर खड़े रहना धक्का–मुक्की करना या होने देने का मामला है तथा इसी में लगी चोट को मुद्दा बनाया गया है और विपक्ष के नेता के खिलाफ एफआईआर हुई है। आपराधिक ताकत के उपयोग का मामला शायद मल्लिकार्जुन खरगे पर नहीं है लेकिन इस उम्र में भीड़ में जाकर वे खुद के नुकसान को तो आमंत्रण देते ही हैं। आपराधिक ताकत के उपयोग पर याद आया, बहुत पुरानी बात है ट्रेन में टोमैटे सॉस का शैशे खुल नहीं रहा था और जितना खुला उतना शॉस निकालने के लिए पर्याप्त नहीं था पर जवानी के दिनों में मैंने उसपर पूरा जोर लगा दिया जिससे सॉस तो निकल गया पर बिखर कर दूसरे यात्रियों के कपड़ों पर लग गया। मुझे अपनी गलती पर शर्मिन्दगी हुई और मैंने माफी मांग ली। आज समझ में आया कि सहयात्री मुझ पर एफआईआर करा सकते थे और संभव है मैं दोषी मान लिया जाता क्योंकि मेरे पास बचाव में कहने के लिए तो कुछ था ही। मैंने ताकत तो लगाई ही थी और उससे अपराध तो हो ही चुका था।
इसपर मुझे याद आया कि बलात्कार के सबूत मांगे जाते हैं और जहां सबूत था वहां कह दिया गया कि ब्लैकमेल करने के लिए वीडियो बनाया गया था और एक मामले में जब वीडियो स्टिंग का था तो आरोपी ने कह दिया कि वह एक नाटक का रिहर्सल कर रहा था जो कहा गया है वह नाटक का स्क्रिप्ट है। इसलिये कल संसद में जो हुआ और राहुल गांधी पर जो आरोप है उसका वीडियो नहीं है। वैसे ही जैसे अंबेडकर के बारे में अमित शाह ने जो कहा है उसे रिकार्ड से निकाल कर कहा जा सकता है कि आपत्तजिनक अंश रिकार्ड में नहीं है इसलिए कहे ही नहीं गये। विपक्ष भले इसे नहीं माने पर यह रिकार्ड में है क्योंकि कहने वाले इसे आपत्तिजनक नहीं मानते और बात इतनी ही नहीं है वे कहते हैं और कल अखबारों ने बताया था कि कांग्रेस ने अंबेडकर का अपमान किया है और कल दोनों पक्ष लगभग यही कर रहे थे – एक दूसरे से माफी मांगने की मांग। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार को आगे बढ़ना होता, काम करना होता तो माफी मांगने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिये थी। पर उस दिशा में कोई प्रयास होता भी नहीं दिखता है क्योंकि यही रणनीति है – सत्ता में बने रहने का। उपाय सारे करो – जीत ईवीएम से भी हो तो कोई समझ नहीं पाये। यह सब चल इस लिये जा रहा है कि ज्यादातर अखबार पहले के मुकाबले सजग रहना तो छोड़िये चापलूस हो गये हैं। मैं यहां उसी के उदाहरण पेश करता हूं।
नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, संसद परिसर में धक्का मुक्की। उपशीर्षक है, भाजपा के दो सांसद घायल, राहुल पर एफआईआर, कांग्रेस ने भी दी शिकायत। मुझे लगता है कि इसमें भाजपा के दो सांसदों के घायल होने के बाद सबसे गंभीर तथ्य राहुल के खिलाफ एफआईआर है। ऊपर मैं लिख चुका हूं कि कैसे वह राहुल गांधी को डैमज करने की नरेन्द्र मोदी की सोची समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी के सभी विरोधियों को भिन्न उपायों से नियंत्रित और निष्प्रभावी किया जा चुका है। कुछ पद के लालच में पलट गये कुछ को ईडी-सीबीआई ने वाशिंग मशीन में धो दिया है। अकेले राहुल गांधी उनके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा लेने में सक्षम साबित हुए हैं। और तब नरेन्द्र मोदी को पूछना पड़ा था, ईवीएम जिन्दा है कि मर गया। दूसरी ओर, राहुल गांधी के अन्य समर्थक क्षेत्रीय स्तर पर ही प्रभावी हैं इसलिए राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी और भाजपा के निशाने पर रहे हैं। अंबेडकर के मुद्दे पर भी राहुल गांधी ही सही विरोध दे पायेंगे और राजनीतिक फायदा उठा पायेंग या भाजपा का नुकसान पहुंचा सकेंगे। वरना भाजपा तो कांग्रेस को भी अंबेडकर विरोधी बता ही रही है। इसमें मल्लिकार्जुन खरगे की शिकायत का लापता होना भी महत्वपूर्ण है। यह अलग बात है कि भाजपा ने अपनी राजनीति से अब प्रियंका को भी मैदान में बुला लिया है और उसकी मुश्किलें बढ़ने वाली ही हैं।
मैं इस मामले में बहुत स्पष्ट हूं और यकीन से कह सकता हूं कि भाजपा की राजनीति मीडिया के सहयोग से चल रही है। यह मीडिया में उसके लोगों के भरे होने के कारण तो है ही, विज्ञापन और दूसरे प्रलोभन भी हो सकते हैं। मुझे तौर पर एक हद तक संतुलित दिखने वाले नवोदय टाइम्स में आज लीड के साथ छपी खबरों का शीर्षक देखिये 1) दोनों घायल सांसद आईसीयू में, सारंगी को लगे टांके इसके साथ राजनाथ सिंह की अस्पताल में फोटो भी है। 2) राहुल ने बुजुर्ग सांसद को धक्का दिया : दुबे। बुजुर्ग सांसद उड़ीशा में वीचएपी के प्रमुख रहे हैं। उन्हीं दिनों ग्राहम स्टेन्स को उनके बच्चों के साथ जिन्दा जला दिया गया था। आरोप वीएचपी के एक कार्यकर्ता पर था और मामला साबित नहीं हुआ। इसलिए षारंगी जीत कर आये तो मंत्री बनाये गये थे। उनके सादे जीवन की तारीफ हुई पर कुछ ही समय में मंत्रिमंडल से हटा दिये गये। इस बुजुर्ग सांसद के मुकाबले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पर भी आरोप है उसकी खबर यहां या वैसे भी नहीं है। 3) भाजपा सांसदों ने की धक्का-मुक्की : राहुल, शीर्षक उनके इस आरोप के मुकाबले बहुत हल्का है कि उन्हें धक्का दिया गया। यही नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार प्रताप षाडंगी ने कहा है राहुल गांधी ने उन्हें धक्का दिया जबकि यहां राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें धक्का देकर अलग कर दिया गया। बहुत संभावना है कि इस धक्का मुक्की में प्रताप सारंगी वैसे ही गिर गये होंगे जैसे खरगे। लेकिन सारंगी का गिरना महत्वपूर्ण है, खरगे का गिरना नहीं और गिराने वाले राहुल गांधी जबरन जबकि इसका कोई वीडियो नहीं है।
भाजपा के इरादों का पता नवोदय टाइम्स की चौथी खबर, “नेता प्रतिपक्ष के पद पर रहने लायक नहीं हैं हैं राहुल : भाजपा”। राजनीति में यह लायक कैसे तय होता है? वंशवाद के खिलाफ नरेन्द्र मोदी के बयान याद हैं। यह सब तब था जब इंदिरा नेहरू परिवार का आधा और ठीक आधा भाजपा में है। भाजपा ने किस योग्यता पर किसे मंत्री बनाया है और किसे नहीं बनाया या हटा दिया वह सब छिपा हुआ नहीं है। जहां तक राहुल गांधी की बात है, वे नरेन्द्र मोदी से पुराने सांसद हैं, एक चुनाव क्षेत्र छोड़िये, तीन जगह से जीत-जिता चुके हैं और और शिक्षा, योग्यता, सौंदर्य, शीरिरिक शैष्ठव से लेकर उम्र तक के लिहाज से नरेन्द्र मोदी से कई गुना बेहतर हैं और मतदाताओं ने पसंद किया है। दूसरी ओर, संसद में सांसदों के बीच मार-पीट की यह स्थिति पहले नहीं थी। भाजपा के सत्ता में रहने पर हुई है और कांग्रेस के पास लोकसभा में इससे ज्यादा सीटें रहीं हैं तब ऐसा नहीं हुआ और अभी हो रहा है तो सिर्फ इसलिए कि भाजपा यही चाहती है उसकी राजनीति ही ऐसी है। उसमें समझना अखबार वालों को था। पर कैच देम यंग खेलों में भले न हो, अखबारों में हो चुका है।
नवोदय टाइम्स की पांचवीं खबर का शीर्षक है, शाह के बयान से ध्यान भटकाने की साजिश। मुझे लगता है कि इसे लीड का उपशीर्षक बनाया जा सकता था। धक्का मुक्की भाजपा सांसदों के बिना हो ही नहीं सकती थी और सत्तारूढ़ दल से ऐसे विरोध की अपेक्षा कोई नहीं करता, पहले भी नहीं हुआ है। तो क्यों नहीं माना जाये कि धक्का मुक्की ध्यान बंटाने की साजिश है। वैसे भी, जब कह देने भर से शीर्षक बनता रहा है तो यहां पर्याप्त आधार है। आप देख सकते हैं कि इन खबरों और शीर्षक में कांग्रेस या विपक्ष के शीर्षक क्या और कैसे हैं। सबसे महत्वपूर्ण खबर (या शीर्षक) कोने में सिंगल कॉलम में है। यह भी राहुल गांधी पर आरोप ही है और इतना गंभीर है कि मुझे सिंगल कॉलम में छापने का कोई मतलब समझ में नहीं आया। जो भी हो आज की खबरों से नवोदय टाइम्स को देखा समझा जा सका। आगे जब मौका मिलेगा मैं दूसरे अखबारों की प्रस्तुति की चर्चा करता रहूंगा। मेरा मानना है कि यह सब राहुल गांधी की छवि खराब करने की कोशिश का हिस्सा है और सोची समझी योजना का भाग।
कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार की इस राजनीति में प्रशासन का जो हाल है सो है ही खबरें भी राजनीतिक रंग में रगी छपती हैं। वरना देशद्रोह के मामले में चार साल से जेल में बंद उमर खालिद को शादी में शामिल होने के लिए मिली जमानत को उनके एक मित्र ने बेहद प्यासे को दो बूंद पानी की तरह कहा है पर यह खबर सिर्फ द टेलीग्राफ में है। ठीक है कि उसपर देशद्रोह का मामला है तो डर लगना चाहिये या विरोधियों को यह कहने का मौका मिल जाता है कि देशद्रोह के आरोपी का समर्थन कर रहे हैं पर अब तो साबित हो चुका है कि यह सरकार लोगों को जेल में रखने के लिए कानून का दुरुपयोग कर रही है। जमानत मिलने की खबर उसपर प्रतिक्रिया की खबर तो राम रहीम सिंह को बार-बार जमानत मिलने की खबर की टक्कर में आ ही जाती है। सरकार की गढ़ी खबरों या कहानियों के कारण आज जो खबर पिट गई वह यह कि दिल्ली में प्रदूषण फिर बढ़ने और दिसंबर की इस तारीख को 20 साल में सबसे ज्यादा होने की खबर है।
ऐसे समय में अमर उजाला की आज की लीड है, मर्यादा तार-तार संसद परिसर में धक्का मुक्की, भाजपा के दो सांसद जख्मी… राहुल पर केस दर्ज, कांग्रेस ने भी दी शिकायत। उपशीर्षक है, प्रताप सारंगी व मुकेश राजपूत आरएमएल के आईसीयू में भर्ती, राहुल खरगे बोले – भाजपा सांसदों ने धक्का दिया। तीन कॉलम में चार लाइन की एक खबर का शीर्षक है, महिला सांसद ने भी राहुल पर लगाया बदसलूकी का आरोप। इस शीर्षक में भी और उसे तीन कॉलम में फैलाने का काम पत्रकारिता है या कुछ और मैं तय नहीं कर सकता। रेखांकित कर रहा हूं। यूं शुरू हुआ विवाद शीर्षक के तहत लिखा है, कांग्रेसी सांसदों के प्रदर्शन के दौरान भाजपा सांसद भी मकर द्वार यानी संसद के प्रवेश द्वार पर प्रदर्शन कर रहे थे। तथ्य यह है कि तमाम वीडियो चैनलों पर सबने देखा है कि कांग्रेस के सांसद अंबेडकर की मूर्ति से मार्च करते हुए आ रहे थे। सत्तारूढ दल के सांसद मकर द्वारा घेरे खड़े थे। क्यों? इसकी चिन्ता किसी को नहीं है। सत्तारूढ़ दल वपक्ष को संसद में प्रवेश करने से रोक कर आंदोलन करे तो उसका मतलब क्या होता है – यह सब सोचने् का समय नहीं है। वीडियो में दिखा और उसकी चर्चा भी हुई कि सत्तारूढ़ दल के ये सदस्य लाठी वाले बैनर, झंडे लिये हुए थे। अभी तक ऐसा नहीं होता था। इस लिहाज से, ‘यूं शुरू हुआ विवाद’ खबर कम, भ्रम फैलाने का काम ज्यादा करता है। जाहिर है ऐसी खबर लिखने के लिए सभी वीडियो को भी देखना चाहिये और अपनी राय की जगह सूचनाओं को रखा जाना चाहिये। अमर उजाला और उसके रिपोर्टर के पास यह सब कितना उपलब्ध है उसकी जानकारी के बिना मैं उसी की बात कर रहा हूं जो छपा है और मैंने देखा है (शुद्ध बेरोजगारी के समय में)।
अमर उजाला की सूचना है, भाजपा ने हत्या के प्रयास का भी आरोप लगाया था। दो कॉलम और लगभग दूने फौन्ट साइज में एक शीर्षक है, डॉक्टर बोले सारंगी के सिर से बहा खून, पांच टांके लगे। इसपर मुझे खुद को लगी चोट याद आई और शायद उसी से मेरी पत्रकारिता निष्पक्ष या भाजपा विरोधी आप जैसे देखिये हो गई है। जब मैंने जनसत्ता ज्वायन किया था तो हड़ताल हुई। अरुण शौरी अभियान चला रहे थे कि बोफर्स पर खुलासे से परेशान कांग्रेस ने हड़ताल करवाई है और एक दिन हड़ताड़ियों गैर हड़तालियों की भिड़ंत में मेरा सिर फट गया। मित्र विनीत नारायण टांके लगवा रहे थे। उनका एक हाथ मेरी टुड्ढी पर था दूसरा ऊपर। नीचे वाले हाथ में खून भर रहा था टांका लग रहा था। जब टांके लग गये तो मैंने विनीत से पूछा कितने लगे, विनीत ने बहुत कम बताया और मैंने उनसे कहा कि इतने टांके तो मैंने गिन लिये। हालांकि तब मेरी उम्र प्रह्लाद सारंगी से बहुत कम थी और ग्राहम्स स्टेन्स व उनके बच्चों को जिन्दा नहीं जलाया गया था। बाद में मैंने अच्छी भली नौकरी छोड़ दी तो इसीलिए कि जो पत्रकारिता हो रही थी वह मुझे नहीं करनी थी। बाद में मैंने अनुवाद करना तय किया और अब जो लिखता हूं वह सोशल मीडिया पर और गिनती के मीडिया वेबसाइट पर ही पढ़ा जा सकता है।


