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आज के अखबार : बजट की तैयारियों पर सरकारी बैठक की खबर को प्रचार जैसी ‘प्रमुखता’ नहीं

संजय कुमार सिंह

चुनाव नियमों में संशोधन को लेकर कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट गई – खबर को सिर्फ द हिन्दू ने लीड बनाया है। इसमें बताया गया है कि मतदान केंद्रों के सीसीटीवी कैमरा फुटेज और उम्मीदवारों की वीडियो रिकार्डिंग तक जनता की पहुंच को प्रतिबंधित करने वाला संशोधन तब आया है जब हाईकोर्ट ने हरियाणा विधानसभा चुनाव से संबंधित सामग्री को जारी करने का आदेश दिया था। यह खबर सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर है। इसी तरह मानवाधिकार आयोग की नियुक्तियों पर कांग्रेस को एतराज की खबर भी ढूंढ़नी पड़ रही है। हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, नवोदय टाइम्स और अमर उजाला में है। कइयों में चुनाव आयोग की सफाई भी है कि उसने वोटर लिस्ट से संबंधित डाटा क्यों हटा दिया। जवाब वही घिसा-पिटा है – प्रक्रिया के तहत किया गया। मतदाताओं की संख्या बढ़ना सामान्य है आदि।  

आज के अखबारों में एक खबर, बजट की तैयारियों पर है। अलग अखबारों के अनुसार इसमें पूंजी जुटाने पर मंथन हुआ, घटती विकास दर पर चिन्ता जताई गई। प्रधानमंत्री ने अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों के सुझावों को सुना लेकिन यह खबर अखबारों में प्रमुखता से नहीं है। द टेलीग्राफ में तो बिजनेस पेज पर भी नहीं और बिजनेस अखबारों की बात करूं तो द हिन्दू बिजनेस लाइन की आज की लीड का शीर्षक है, भारत में बीमा की पहुंच वित्त वर्ष 24 में कम हुई पर घनत्व बढ़ा। इसके तकनीकी मतलब को छोड़ दिया जाये तो खबर में बताया गया है कि बीमा घनत्व का मतलब प्रति व्यक्ति प्रीमियम बढ़ गया है। यह कारोबार व्यवसाय के लिहाज से भले अच्छा हो सच्चाई यह है कि बीमा महंगा होने के कारण भी हुआ होगा। अगर लोग ज्यादा प्रीमियम देकर ज्यादा बीमारियां कवर करवा रहें हैं तो यह उनकी मजबूरी भी हो सकती है क्योंकि जो बीमा करवा रहा है वह नहीं चाहेगा कि भविष्य में दिक्कत हो। वैसे भी, मौजूद बीमारियां बताते जायें तो प्रीमियम बढ़ता जाता है और अब मौजूद बीमारियों को छिपाने की गुंजाइश कम हो गई है। इस कारण बीमा राशि नहीं मिलने के मामले सर्वविदित हैं। ऐसे में मुझे लगता है कि यह बीमा कराने वालों की मजबूरी है।

जहां तक बीमा महंगा होने की बात है, आप जानते हैं कि स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराना सरकार का काम है। दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में सरकारें यह काम जरूरत भर कर भी रही हैं लेकिन बिहार जैसे राज्य में जहां यह सुविधा व्यावहारिक तौर पर नहीं के बराबर है वहां बीमा मजबूरी है और प्रीमियम दिल्ली के मुकाबले कम। कुल मिलाकर, सरकार यह सुविधा संतोषजनक ढंग से मुहैया करा रही होती तो बीमा कराने की जरूरत ही नहीं थी। पर मुफ्त स्वास्थ्य सेवा (उपयोग और जरूरत योग्य) मुहैया कराना तो दूर सरकार बीमा कराने वालों से बीमा प्रीमियम पर भारी जीएसटी लेती है और इसे कम करने की कांग्रेस की मांग पर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई है और जीएसटी कौंसिल की पिछली बैठक में भी इस मुद्दे को टाल दिये जाने की खबर थी।

मिन्ट की आज की लीड का शीर्षक है, “ग्रामीण भारत मंदी को नहीं मान रहा सो छोटे पैके की भरमार”। इसका संबंध मेरे साथ घटी एक घटना से भी है। हुआ यह कि हाल में पीने के लिये मिले दूध में बोर्नविटा जैसा कुछ मिला हुआ था। पूछने पर पता चला कि उसका एक पाउच किसी और चीज के साथ मुफ्त में आया था। इससे मुझे बोर्नविटा का स्वाद याद आ गया और फिर पीने का मन हुआ लेकिन बाजार में उसका छोटा पैक या पाउच मिल ही नहीं रहा है। जो मिला वह 280 रुपये का है और मेरी जरूरत या तलब ऐसी नहीं थी कि मैं इतने पैसे खर्च करता। ऐसा भी नहीं है कि बाकी के किसी को दे दूं तो बहुत भला हो जायेगा। इसलिए मैंने इरादा त्याग दिया। ऐसे में छोटे पैक का अपना महत्व है और बाजार देखने वालों ने इसकी भरमार कर दी है। तो खबर यह भी है कि लोग गैर जरूरी चीजें खरीदने से बच रहे हैं और यह आम आदमी की कमाई कम होने से है। आज के इन दो बिजनेस अखबारों में एक, बिजनेस लाइन में बजट की तैयारी वाली खबर है। इसका शीर्षक है, प्रधानमंत्री मोदी के साथ बजट पूर्व बैठक में अर्थशास्त्रियों का प्रमुख सुझाव खेती की उत्पादकता बढ़ाना, रोजगार के मौके बनाना था।

हिन्दुस्तान टाइम्स में आज यह खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री के साथ बजट पूर्व चर्चा में शुल्क दर जीडीपी की राह। टाइम्स ऑफ इंडिया में आज यह खबर लीड है। इसका शीर्षक है, पूर्व बजट बैठक में विकास दर को फिर से 7-8% करने पर फोकस। इस खबर का इंट्रो है, प्रधानमंत्री, अर्थशास्त्रियों ने रोजगार, कौशल, कृषि में तेजी पर चर्चा की। नवोदय टाइम्स ने इस खबर का शीर्षक लगाया है, पूंजी जुटाने पर मंथन। दि एशियन एज में आज इस खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री  अर्थशास्त्रियों से मिले, बजट, आर्थिक विकास पर विचार जाना। फ्लैग शीर्षक के अनुसार, चर्चा इस पर भी हुई कि खपत कैसे बढ़े और रोजगार, सुधार कैसे हों। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर छपी सिंगल कॉलम की एक खबर के अनुसार भारत के गैर कृषि अनैपचारिक क्षेत्र में रोजगार 10 प्रतिशत बढ़े हैं। एनएसओ के अनुसार यह 2023-24 में हुआ है। पूंजी जुटाने पर मंथन नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है पर मुद्दा यह है कि भारत में पूंजी लगायेगा कौन और किसलिये। जो हालत हैं और देश जैसे चल रहा है उसमें यह उम्मीद शायद ही किसी को हो कि स्थिति हाल-फिलहाल ठीक होने वाली है या मौजूदा व्यवस्था में ठीक हो सकेगी।

इंडियन एक्सप्रेस में फ्लैग शीर्षक है, नीति आयोग ने अर्थशास्त्रियों को आमंत्रित किया। बजट से पहले प्रधानमंत्री ने उच्च विकास के लिए गहरे और निर्भीक सुधारों की जरूरत बताई। उपशीर्षक है, अर्थशास्त्रियों ने कहा, मांग में वृद्धि के लिए, आयकर की दर कम की जाये, महिलाओं को नौकरी पर रखने को प्रोत्साहन दिया जाये। आप जानते हैं कि अर्थव्यवस्था की खराब हालत का कारण मुख्य रूप से देश में व्यवसाय-कारोबार करना मुश्किल कर दिया जाना है। नियमों में ऐसे संशोधन किये गये हैं जिससे बैंक में खाता खोलना हो या विदेशी चंदा लेना हो या मौके पर कुछ कमाई कर लेन के लिए शेल कंपनी चलाना मुश्किल हो गया है। नोटबंदी और इन सबका नतीजा यह हुआ कि बैंक के बैंक बंद हो गये, उनका विलय कराना पड़ा उसे ठीक करने की बजाय बैंक में चालू खाता रखना ना सिर्फ मुश्किल हुआ है, बल्कि महंगा हुआ है। सरकार नहीं चाहती या नियम ऐसे हैं कि आप दुकान खोल कर तभी बैठे रह सकते हैं जब नियमित काम करें। किसी दिन (जब मौका मिला) काम करने की उम्मीद में चलने वाली दुकानें बंद हो गई हैं या उन्हें बंद होने के लिए मजबूर किया गया है।

ऐसे में विदेशी निवेश आयेगा कहां से और भारत में कौन अपना पैसा इस अनिश्चित माहौल में जोखिम में डालेगा। अदाणी का मामला आप जानते हैं। इससे विदेश में यही संदेश गया है कि कारोबार व्यवसाय का माहौल नहीं है। रिश्वत के बिना काम नहीं हो सकता। बीमा प्रीमियम का मामला आप ऊपर पढ़ चुके हैं और पुरानी कारों का बाजार आप जानते हैं। उसपर 18 प्रतिशत टैक्स। अव्वल तो टैक्स किसपर लगेगा, किस दर से कैसे लगेगा यह घोषणा से की स्पष्ट नहीं है। टेलीविजन चैनल वालों ने वित्त मंत्री से समझने की कोशिश की पर वे भी नहीं समझा पाईं। कम से कम मैं तो समझ नहीं पाया। बाद में समझने की कोशिशों से यह स्पष्ट हो गया कि नियमों को सीधा सरल रखने की जगह इतना उलझा दिया गया है कि कोई भी कभी भी अलग व्याख्या करके किसी को भी फंसा सकता है। ऐसे माहौल में कौन व्यवसाय करना चाहेगा। खास कर तब जब कई लोग फंसकर आत्महत्या कर चुके हैं। कुछ लोगों को विदेश भागना पड़ा है। 10 साल में ऐसा कोई आश्वासन नहीं है कि विदेश भागे लोग वापस आ सकें न उद्योग व्यवसाय को सहायता का कई उदाहरण है। उदाहरण तो जीएसटी नियमों से लोगों को परेशान करने के हैं। अच्छे भले व्यवसाय बंद और बीमार हो गये। उनके मुकाबले शुरू हुए नए व्यवसायों की संख्या वैसी नहीं है और न उनका नाम। सरकारी नीति व्यवसायियों को दूहने की है और इसमें कमी आना तो दूर, पुरानी कार पर टैक्स लगाने का तरीका बाताता है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा टैक्स की वसूली की जाये उसमें सारी प्रतिभा लगी हुई है। इसके लिए नियम मुश्किल हो रहे हैं, लाल फीताशाही के नुकसान हैं लेकिन सब बेमतलब। इलेक्टोरल बांड से वैसे वसूली की शिकायतों पर कार्रवाई का कोई उदाहरण नहीं है और वाशिंग मशीन पार्टी की छवि बनी हुई है।

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