अभिषेक श्रीवास्तव-
दिल्ली की हिन्दी अकादमी को तीन साल बाद रेवड़ियों के भाव सम्मान बांटने की याद आई है, जब विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। अद्भुत है कि अकादमी की लंबी सूची में उसके ही भूतपूर्व कारिंदे भी शामिल हैं। बहरहाल, इस रेवड़ी में बेईमानी की एक ऐसी दास्तान छुपी है जो लोगों की स्मृति से बाहर हो चुकी है। इसलिए याद दिलाना बनता है। वैसे भी, आम आदमी पार्टी “रेवड़ी पर चर्चा” चलाना चाहती है, तो एक इधर से भी…
संतोष कोली! नाम याद होगा कुछ लोगों को! अरविन्द केजरीवाल के एनजीओ ‘परिवर्तन’ की शुरुआती स्टाफ थी संतोष, जो सुंदरनगरी में राशन और पीडीएस की लड़ाई का 2002 से नेतृत्व कर रही थी। अरविन्द और मनीष का सारा सामाजिक आंदोलन संतोष के बगैर कामयाब होकर राजनीति तक नहीं पहुँच पाता, यह बात बहुत से लोग जानते मानते हैं। उसी आम कार्यकर्ता संतोष कोली के नाम पर हिन्दी अकादमी में एक नया पुरस्कार शुरू किया गया है जो बीते तीन साल में तीन लेखिकाओं को दिया जाना घोषित हुआ है: ममता कालिया, मैत्रेयी पुष्पा, और अनामिका जी।
ममता जी, मैत्रेयी जी और अनामिका जी को ऊपर वाली तस्वीर देख लेनी चाहिए। यह संतोष की माँ कलावती की तस्वीर है। संतोष दिल्ली का चुनाव लड़ने वाली थी सीमापुरी से 2013 में, उसके ठीक पहले सड़क हादसे में उसकी मौत हो गई। केजरीवाल आदि ने कहा कि मौत नहीं, हत्या है और उसके पीछे राशन माफिया का हाथ बताया गया। संतोष के परिवार ने जब सीबीआइ जांच की मांग की तो उस पारी में 49 दिन के मुख्यमंत्री रहे अरविन्द ने केस सीबीआइ को रिफर ही नहीं किया। वे संतोष के घर भी नहीं गए, बल्कि सोमनाथ भारती को बचाने के लिए धरने पर बैठ गए। बाद में अनुसूचित जाति आयोग के दबाव में सीबीआइ के पास जांच गई। उसका क्या हुआ, कोई खबर नहीं है। कोई बता सके तो बेहतर।
हादसे के समय संतोष के परिवार का कहना था कि अरविन्द के बारे में वह कुछ ऐसा जानती थी जिससे अरविन्द उससे तल्ख रहने लगे थे। उस दिन वह ऑफिस नहीं जा रही थी, लेकिन जबरन उसे अरविन्द के घर कौशांबी बुलाया गया। कौशांबी मेट्रो के पास बाइक हादसा ऐसा भयावह हुआ कि कोई सुराग ही नहीं बचा। संतोष तो जलकर खाक हो गई, दिलचस्प है कि बाइक चलाने वाला बच गया। उसके परिवार ने केजरीवाल और उनके लोगों पर हत्या का शक जताया, FIR करवाई, प्रेस कांफ्रेंस की, लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। चूंकि संतोष के परिवार के साथ केवल मनोज तिवारी, कपिल मिश्रा जैसे कुछ भाजपाई लोग थे तो मामला राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार हो गया और दिल्ली के भाजपा-विरोधी लिबरल तबके ने आज तक चूँ भी नहीं की।
अचानक संतोष की याद ग्यारह साल बाद दिल्ली सरकार को आई है, तो अपनी कथित साजिश, लापरवाही, बेरुखी या नाइंसाफी पर वह हिन्दी लेखिकाओं की आड़ लेना चाह रही है। इसलिए संतोष की स्मृति में सम्मान के लिए तीन नाम घोषित किए गए हैं। सवाल है कि संतोष की याद अब हिन्दी अकादमी यानी दिल्ली सरकार को क्यों आई है? और बैक डेट में पुरस्कार क्यों घोषित किए गए हैं?
इसलिए क्योंकि संतोष की माँ ने जो रिवीजन पिटिशन दिल्ली हाइकोर्ट में डालकर अरविन्द आदि के खिलाफ फिर से FIR करवाने की मांग की थी वह याचिका अंततः बीते अक्टूबर (2024) में खारिज कर दी गई। इस तरह संतोष के नाम का सरकारी इस्तेमाल करने का रास्ता साफ हो गया। यदि पहले उसके नाम पर सम्मान घोषित किया जाता तो न्यायिक जांच और याचिका का मुद्दा फंस जाता। अब कोई नहीं बोलेगा, बशर्ते संतोष का परिवार फिर से मुद्दे को जिंदा न कर दे।
कोई बोले या न बोले, हमारे लिए सवाल यह है कि हमारी प्रिय और आदरणीय लेखिकाएं (मैत्रेयी जी, अनामिका जी और ममता जी) महज 28 साल की उम्र में मार दी गई एक संभावनाशील, जुझारू, आंदोलनकारी दलित महिला के नाम पर सम्मान लेकर उसकी हत्या की साजिश पर पर्दा डालने वालों में शामिल होना स्वीकार करेंगी या नहीं?
मैंने किसी भी सम्मानित लेखिका को जान बूझ कर टैग नहीं किया है। यह सवाल किसी के ऊपर निजी हमले का नहीं है, हिन्दी वालों की सामूहिक नैतिकता का है। आपको यदि लगता है कि यह सवाल अहम है, तो आप खुद इन लेखिकाओं तक मेरी बात पहुंचा सकते हैं।


