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श्रद्धा का विकृत रूप देख गणेश जी खुद ऐसे भक्तो को विसर्जन करने से रोक देते

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गणपति का विसर्जन अजमेर में एक नई धार्मिक गाथा लिख गया। हिन्दी तिथियों के चलते विसर्जन रविवार की दोपहर से शुरू होकर सोमवार की सुबह तक खत्म हो जाना था। इसके बाद श्राद्ध पक्ष शुरू होना था परंतु रविवार की सुबह से सोमवार की देर रात तक लगातार धार्मिक नगरी कहे जाने वाले इस शहर में धर्म और धर्म के नाम पर कानून का जमकर मखौल उड़ता रहा। पुलिस प्रशासन नाम की संस्थाएं मानों शहर में थी ही नहीं। गणेश जी की प्रतिमा विसर्जन के लिए शहर के हर गली मौहल्ले से सुभाष उद्यान तक लगातार आ रही भीड़ ने राह चलते लोगों पर इतनी गुलाल उड़ाई जितनी होली पर भी नहीं उड़ाई जाती। शहर की सड़कें गुलाबी रंग से रंग गई।

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गणपति का विसर्जन अजमेर में एक नई धार्मिक गाथा लिख गया। हिन्दी तिथियों के चलते विसर्जन रविवार की दोपहर से शुरू होकर सोमवार की सुबह तक खत्म हो जाना था। इसके बाद श्राद्ध पक्ष शुरू होना था परंतु रविवार की सुबह से सोमवार की देर रात तक लगातार धार्मिक नगरी कहे जाने वाले इस शहर में धर्म और धर्म के नाम पर कानून का जमकर मखौल उड़ता रहा। पुलिस प्रशासन नाम की संस्थाएं मानों शहर में थी ही नहीं। गणेश जी की प्रतिमा विसर्जन के लिए शहर के हर गली मौहल्ले से सुभाष उद्यान तक लगातार आ रही भीड़ ने राह चलते लोगों पर इतनी गुलाल उड़ाई जितनी होली पर भी नहीं उड़ाई जाती। शहर की सड़कें गुलाबी रंग से रंग गई।

हिन्दी फिल्मों और राजस्थानी के भड़कीले गानों पर नशे में नाचते, पटाखे चलाते, राहगीरों पर फब्तियां कसते इन गणपतियों को देखकर भी कोई कार्यवाही करना तो दूर उन्हें टोकने तक से परहेज कर पुलिस के सिपाही इस तरफ से ऐसे विमुख हो रहे थे मानों आधिकारिक लाइसेंसधारी ऐसा कर रहे हों।

महाराष्ट्र खासकर मुंबई की नकल करते गणेशोत्सव को अजमेरवासियों ने अपना तो लिया परंतु गणेश चौथ से अनन्त चौदस तक के इन ग्यारह दिनों में धर्म से ज्यादा मौज-मस्ती नजर आ रही थी। अपने घर के पीछे भी कुछ बेरोजगार युवाओं ने टेंट, पर्दे लगाकर गणपति जी बिठाए थे। भजन के नाम पर रात एक डेढ़ बजे तक तेज आवाज में क्या कुछ नहीं बजाया। कल यानि इतवार को गणपति विसर्जन की एक रात पहले दारू के नशे में गणेश भक्तों ने गणेश प्रतिमा के सामने ही एक-दूसरे की मां-बहन से मौखिक तौर पर अपने अंतरंग संबंधों को जमकर नवाजा। कई बार गुत्थमगुत्था होते-होते बची।

मुंबई में श्रद्धालु गणेश जी की विदाई के समय इतने भावुक हो जाते हैं कि उनकी आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं। अपने आराध्य से विछोह मुंबइकरों के लिए काफी पीड़ादायक होता है। गणपति से बिछुड़ने की बात सोचकर ही उनका मन उदास हो जाता है। इसके उलट अजमेर में जो माहौल रहा उससे ऐसा लग रहा था कि मानों गणेश जी की विदाई से दुख नहीं बल्कि पिण्ड छुड़ाने की खुशी मनाई जा रही हो। विदाई में पटाखे चलाए जा रहे थे। हंसते-खेलते मुटिठयां भर भरकर गुलाल उछाली जा रही थी। जुलूस के जुलूस उमड़ रहे थे। ठेलों से लेकर ट्रकों तक पर डीजे और जनरेटर पर हिन्दी फिल्मों और राजस्थानी के भड़कीले गीत तेज आवाज में बजाए जा रहे थे। इन पर नाचते युवक-युवतियों के हाव भाव बता रहे थे कि उन्हें कोई भारी खुशी मिल गई है। कई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते के अंदाज में अश्लील फब्तियां और हरकतों से भी नहीं चूक रहे थे। कई नशे में चूर थे। राहगीरों खासकर महिलाओं और युवतियों पर गुलाल फेंक कर मजा लेने वालों की भी कमी नहीं थी।

शहर में करीब आठ हजार छोटी-बड़ी गणेश प्रतिमाएं सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित कर महोत्सव मनाया गया। एक भी स्थान पर नियम कायदे से बिजली नहीं ली गई। किसी ने बिजली के लिए सब मीटर काम में नहीं लिया। सड़क से गुजर रह बिजली की लाइनों से तार खींचे, हाइवोल्टेज की सोडियम और हेलोजन लाइटें और रंग बिरंगी लड़ियां लगाई, तेज आवाज में बड़े-बड़े साउण्ड सिस्टम लगाए और अजमेर विद्युत वितरण निगम को अपने मुख्यालय पर कहीं बिजली चोरी नजर नहीं आई।

विसर्जन के पूरे दो दिन शहर में जगह-जगह जाम के हालात बनते रहे। मर्जी आई जहां विसर्जन का काफिला रोककर नाचने लग जाना, गुलाल उड़ाना आम बात हो गई। अजमेर पुलिस के सिपाही मूक दर्शक की तरह खडे़ रहे। उनके पास एक सधा सधाया मासूम सा जवाब जो होता है किसी ने शिकायत ही नहीं की। दिखाई दे कर भी उन्हें कुछ नहीं दिखता। इस बार भी नहीं दिखना था। ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण की बड़ी-बड़ी बातें डीजे के साउंड में गुलालों के साथ उड़ती रहीं।

श्रद्धा का विकृत रूप सुभाष उद्यान में नजर आया। अजमेर नगर निगम ने प्रतिमा विसर्जन के लिए वहां एक कुण्ड बनवा दिया है। सुभाष उद्यान से लगती ही ऐतिहासिक आनासागर झील है। चार-पांच साल पहले स्थायी लोक अदालत ने एक जनहित याचिका पर फैसला देते हुए केमिकल और प्लास्टर ऑफ पेरिस के खतरों से बचाव के तर्क पर आनासागर में प्रतिमाएं विसर्जन पर रोक लगा दी है। ऐसे में नगर निगम ने यह कुण्ड बना दिया। नवरा़त्रा में दुर्गा और गणेश प्रतिमाएं यहां विसर्जित की जाती है, बाकी दिन यह बच्चों के मनोरंजन के लिए बोटिंग के काम आता है। सुभाष कुण्ड में प्रतिमा विसर्जन करने वालों को यह होश ही नहीं था कि जिस आराध्य की प्रतिमा विसर्जित कर रहे हैं, उसी आराध्य की जमीन पर पड़ी प्रतिमाओं पर पैर रखकर वे विसर्जन की औपचारिकता निभा रहे हैं। धर्म की इससे विकृति और उपेक्षा शायद ही कहीं नजर आए। यदि एक बारगी गणेश जी साक्षात वहां होते तो शायद खुद अपने ऐसे भक्तो को उनकी ऐसी भक्ति, ऐसी पूजा, ऐसे महोत्सव और ऐसा विसर्जन करने से खुद रोक देते।

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राजेंद्र हाड़ा
[email protected]

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1 Comment

1 Comment

  1. anu

    September 11, 2014 at 10:00 am

    Maharshtra ka tayohar to apna liya par mansikta me badlaaw nahi dikhaya.tasveere dekh kar man dukhi ho raha hai kaha hai hindu dharam ka jhanda buland karne wale ab……………..This is Shame for Ajmer people……shameeeeeeeeee only shame for rajesthan people as well

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