
संजय कुमार सिंह
सीईसी (मुख्य चुनाव आयुक्त) के चयन में जल्दबाजी और आधी रात की कार्रवाई का कारण सबको पता है और उसे बताने की जरूरत नहीं है। अखबारों के लिए यह मामला खबर नहीं था और कल मैं इस पर लिख चुका हूं। दरअसल चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित एक पुराने मामले पर कल सुनवाई होनी थी और पुराने चुनाव आयुक्त के रिटायर होने के बाद नये की नियुक्ति से पहले कायदे से सरकार को इसका इंतजार करना चाहिये था। इसलिए भी कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति में जल्दी नहीं थी तो चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में जल्दी क्यों। अखबारों ने कायदे से खबर नहीं दी, तब भी यह सबको पता था। दूसरी ओर, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करने वाले पैनल के संबंध में सरकारी व्यवस्था के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं थीं। उसपर समय रहते सुनवाई नहीं हो पाई और सरकार ने अपनी मनमानी जारी रखी। शीघ्र सुनवाई की अपील के बावजूद सुप्रीम कोर्ट जनता की अपील सुन नहीं पाया कार्रवाई तो छोड़िये। ‘आधी रात की कार्रवाई’ जैसी खबर थी वैसे छपी नहीं। कल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हो पाई, नव नियुक्त मुख्य़ चुनाव आयुक्त ने कार्यभार संभाल लिया। अगली तारीख आज-कल की नहीं, खबर के अनुसार होली की छुट्टी के बाद पड़ेगी। अभी तय नहीं है। सब मिलाकर यह एक बड़ा मामला है जिसे हमलोग खबर भी कह सकते हैं। आज यह खबर अखबारों में नहीं है। कम से कम वैसे तो नहीं ही, जैसे होनी चाहिये थी या 2014 से पहले होती थी। पहले विपक्षी नेताओं के आरोप भी अखबारों में तान दिये जाते थे। मैंने कल बताया था कि राहुल गांधी का बयान सिंगल कॉलम में छपा था।
मोटे तौर पर मामला यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करने वाले तीन लोगों के पैनल में से मुख्य न्यायाधीश को निकाल दिये जाने और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उंगली उठने के तमाम मामलों के बावजूद देश के सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में समय रहते सुनवाई नहीं हो पाई। वह भी तब जब इस मामले में अगर कोई कार्रवाई हो सकती है तो वह सुप्रीम कोर्ट में ही। जनता की अदालत में तो 2029 में होनी है और आरोप है कि उसी की तैयारी में यह सब हो रहा है। मौजूदा अदालती व्यवस्था में यह मामला टलता रहा है और सरकार ने 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले तक के लिए पसंदीदा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कर चुकी है। सब कुछ सार्वजनिक होने के बावजूद विवादास्पद नियम के तहत, एक सदस्य के विरोध के बावजूद चुने गये मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यभार ग्रहण के बाद सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई क्या होगी वह अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन कल इस मामले में सुनवाई नहीं होने और कुछ अनुकूल आदेश नहीं आने से निष्पक्ष चुनाव आयोग चाहने वालों को भारी झटका लगा है और आपके लिए मेरी खबर यही है कि इसपर अखबारों में पहले पन्ने पर कोई खबर नहीं है। द हिन्दू अपवाद है। खबर यही है कि सुनवाई नहीं हुई जिसकी उम्मीद सबको थी। भारतीय जनता पार्टी पर यह आरोप है कि वह संविधान बदलना चाहती है। जवाब में नरेन्द्र मोदी बताते हैं कि कांग्रेस सरकार ने कितनी बार संविधान संशोधन किया है। दूसरी ओर, सच्चाई यह है कि सत्ता में आने से पहले ईवीएम का विरोध करने वाली पार्टी अब उसका बचाव करती है, ईवीएम का दुरुपयोग किये जा सकने की शिकायतों पर कार्रवाई या जांच नहीं हुई है और 2023 के कानून के अनुसार नियुक्त चुनाव आयुक्त काम करने और आरोपों का जवाब देने की बजाय अपनी घटिया शायरी के लिए जाने गये। दूसरी ओर इस नियम के खिलाफ दायर मुकदमों पर सुनवाई नहीं हो पाई और नये मुख्य चुनाव आयुक्त की भी नियुक्ति हो गई। अभी तक जैसे फैसले आये हैं उसमें लगता नहीं है कि इस मामले में कुछ होना है। इसलिए आज जो खबर छपी है वह वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिये थी।
असल में, सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षा है कि वह सरकार की मनमानी पर रोक लगायेगी। अभी तक उसने निराश किया है और स्थिति लगातार खराब हुई है, उम्मीद कम हो रही है सो अलग। हालांकि, अभी भी समय है और स्थिति को ठीक करने की कार्रवाई की जा सकती है। दूसरी ओर, प्रयागराज में संगम का पानी प्रदूषित होने की खबर गलत होने का कोई कारण नहीं है और जितनी भीड़ है जितने लोगों के स्नान करने का दावा किया गया है उसमें पानी गंदा हो जाना स्वाभाविक भी है। ऐसे में अखबारों की जिम्मेदारी थी कि वे जनता को सच्चाई बताते और यकीन दिलाते कि प्रदूषित पानी में आस्था की डुबकी महंगी पड़ सकती है और इससे मोक्ष मिलने की कोई गुंजाइश हो भी तो तरीका खतरनाक और जोखिम भरा है। पर अखबारों ने दोनों काम नहीं किया। उल्टे मुख्यमंत्री का राजनीतिक बयान छापा है जो इस तथ्य से काफी दूर है और लोगों की आस्था का राजनीतिक लाभ लेने के प्रयास के अलावा कुछ नहीं है। इससे न सिर्फ इलाहाबाद में, रेलवे स्टेशनों पर और राजमार्गों पर भीड़ लग गई है और जिनका कुम्भ नहाने से कोई संबंध नहीं है वो भी परेशान हो रहे हैं। इनमें प्रयागराज के नागरिक शामिल हैं जो पूरे शहर में अप्रत्याशित भीड़ होने से तरह-तरह की परेशानियां झेल रहे हैं और ना शहर से निकल सकते हैं ना किसी को बुला सकते हैं। ऐसे में अखबार अपना काम भूल कर राजनीति कर रहे हैं।
पहले पन्ने पर खबर नहीं होने का एक कारण यह भी हो सकता है कि आज कई अखबारों में पहले पन्ने पर चार कॉलम का सरकारी विज्ञापन है जो दिल्ली के मुख्यमंत्री के शपथग्रहण समारोह का निमंत्रण है। दि एशियन एज में यह विज्ञापन नहीं है और सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त, चुनाव आयुक्तों के चुनाव के खिलाफ अपील को मध्य मार्च में सूचीबद्ध किया। द हिन्दू में भी विज्ञापन नहीं है और यह खबर चार कॉलम में छपी है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के कानून को चुनौती (देने वाली याचिकाओं) पर सुनवाई की अपील टाल दी। अमर उजाला में आज आधे पन्ने का विज्ञापन और आधे पन्ने में दिल्ली में अब रेखा राज से संबंधित खबरें हैं। नवोदय टाइम्स में भी आधे पन्ने का विज्ञापन है और आधे में ‘रेखा राज’ की खबर के अलावा जो खबर छपी है उसका शीर्षक है, “संक्रमित व्यक्ति का इलाज संभव, संक्रमित सोच का नहीं : योगी”। यह प्रयागराज में गंगा का पानी प्रदूषित होने की रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री की टिप्पणी का शीर्षक है और चार कॉलम में छपा है। लेकिन चुनाव आयुक्त से संबंधित सुनवाई न हो पाने की खबर नहीं है। कल आपने पढ़ा था कि अमर उजाला ने सुप्रीम कोर्ट के नैतिक भाषण को भी खबर के रूप में छापा था और शाम में द वायर की खबर दिखी जिसका शीर्षक था, सुप्रीम कोर्ट नैतिकता झाड़ रहा है न्याय अभी भी दुर्लभ है। अंग्रेजी में इसके लिए इल्यूजिव शब्द का प्रयोग किया गया है जो दुर्लभ के मुकाबले ज्यादा सटीक है। इसका सही मतलब होगा, ललचा कर निकल जाता है। मुख्य रूप से इसका भाव यह नहीं है कि किन्हीं कारणों से न्याय नहीं मिलता है बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि काम तो ऐसे चल रहा है जैसे सब ठीक हो पर उसमें न्याय कहीं रह जा रहा है। इसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री पद के लिए चुनी गई रेखा गुप्ता के पुराने ट्वीट याद किये जा सकते हैं जो कल वायरल थे। एक तरफ सरकार रेखा गुप्ता जैसे गालीबाजों को संरक्षण, प्रोत्साहन दे रही है दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट पैसे देकर गाली सुनने वालों के बीच कुछ अश्लील बोलकर घर चलाने (या लोकप्रियता कमाने) वालों को नैतिकता का पाठ पढ़ा रहा है। अखबार उसी को महत्व दे रहे हैं इसे नहीं कि न्याय इल्यूजिव है।
द वायर की रिपोर्ट सौरव दास की है। इसमें उन्होंने लिखा है, “भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ह्रास पहले से ही हो रहा है। न्यायिक नैतिक पुलिसिंग और व्यापक सेंसरशिप की संभावित व्यवस्था तथा उसे संभव किये जाने से इस गिरावट को गति ही मिलेगी। वैसे भी, सुप्रीम कोर्ट का काम यह नहीं है कि नैतिकता का पाठ पढ़ाये या उसके नियम बनाये। अदालत को इससे अलग होकर सामाजिक मूल्यों के संरक्षक की भूमिका निभाने के प्रलोभन से बचना चाहिए। इसकी बजाय, उसे न्याय वितरण में सुधार करने और संवैधानिक सिद्धांतों के साथ असंगत कानूनों जैसे कि दिल्ली सेवा अधिनियम, 2023 की चुनौतियों की सुनवाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की नैतिकता और अतिशयता को एक तरफ रखते हुए, न्यायमूर्ति सूर्यकांत की ओटीटी विनियमन के बारे में “कुछ करने” की स्पष्ट इच्छा अधिक चिंताजनक है। बेंच ने इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए अगली सुनवाई में भारत के अटॉर्नी-जनरल और भारत के सॉलिसिटर जनरल को बुलाया है। यह बेहद परेशान करने वाला है।” खबरों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर सुनवाई टलने का कारण यह भी है कि सरकारी वकील ने दूसरी अदालत में व्यस्त होने का कारण बताया। यह अलग बात है कि सॉलिसिटर जनरल की इस दलील पर याचिकाकर्ता ने आपत्ति जताई और कहा कि सरकारी पैनल में और भी 17 अधिकारी हैं। इस लिए मामला सिस्टम का लगता है पर वह मेरा विषय नहीं है।
जो लोग मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और उससे संबंधित मामले को नहीं जानते हैं उनके लिए समाचार एजेंसी भाषा की यह खबर ठीक रहेगी। 12 फरवरी की इस खबर के अनुसार, 2023 के कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति के खिलाफ दायर याचिका के बारे में अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि मामले पर तत्काल सुनवाई होनी चाहिए क्योंकि मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार 18 फरवरी को सेवानिवृत्त होने वाले हैं और सरकार 2023 के कानून के तहत नए मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कर सकती है। इसपर पीठ ने कहा था, “हम मामले की सुनवाई के लिए 19 फरवरी की तारीख तय रहे हैं। यदि इस बीच कुछ भी होता है, तो उसके परिणामों का सामना करना होगा।” अभी तक की स्थिति से लगता है कि सरकार को इसकी परवाह नहीं है और वह अपनी उम्मीद में ठीक भी लग रही है। ऐसे कई मामले हैं जिनपर फैसला नहीं हो पा रहा है क्योंकि सरकार अपना पक्ष नहीं रख रही है। सरकार की इस अनैतिकता पर सुप्रीम कोर्ट को कुछ करना चाहिये लेकिन सुप्रीम कोर्ट की दशा चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस के बाद भी ठीक नहीं हुई है। इस लिहज से मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और 2023 का संबंधित अधिनियम पर्याप्त गंभीर है। अब टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए तृणमूल कांग्रेस की सांसद ने अधिनियम में संवैधानिक खामियों का आरोप लगाया और अंतर्निहित संवैधानिक सुरक्षा उपायों के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त / चुनाव आयुक्त के चयन/नियुक्ति के वैकल्पिक मॉडल का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि विवादित अधिनियम “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार संस्था के स्वतंत्र कामकाज को हड़पने का जानबूझकर किया गया प्रयास है और सीधे तौर पर बुनियादी संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है”।
आज इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स में भी आधे पन्ने का सरकारी विज्ञापन है। सुप्रीम कोर्ट की खबर तो नहीं है लेकिन तमाम सराकारी खबरें हैं और इनमें गंगा का पानी प्रदूषित होने पर मुख्यमंत्री योगी की टिप्पणी शामिल है। मुझे लगता है कि सरकारी प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट से सहमत नहीं होने का कोई कारण नहीं है और मुख्यमंत्री जो भी कहें बिना सबूत वह रिपोर्ट से बड़ी खबर नहीं हो सकती है। फिर भी उसे प्रमुखता मिली है। द हिन्दू में आज एक खबर मुडा मामले में कर्नाटक के मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी को क्लीनचिट मिलने की भी है। आप जानते हैं कि उनपर भ्रष्टाचार का मामला चल रहा था अब लोकायुक्त पुलिस ने कहा है कि सबूतों के अभाव में उनके ऊपर लगे आरोप साबित नहीं हो सके। इस संबंध में फाइनल रिपोर्ट आज दी जायेगी। इस मामले में अक्तूबर 2024 की एक खबर का शीर्षक था, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया जमीन घोटाले में और घिरे, लोकायुक्त और ईडी की एफआईआर से डरी सीएम की पत्नी की अंतरात्मा जागी, करोड़ों के 14 प्लॉट लौटाने की पेशकश ने खोली पोल। एक और शीर्षक था, कर्नाटक के मुख्यमंत्री को बड़ा झटका, हाई कोर्ट ने सिद्दारमैया के खिलाफ जांच के राज्यपाल के फैसले को रखा बरकरार। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे मामलों में सक्षम अधिकारी की अनुमति के बाद ही मुकदमा चलाने का नियम है ताकि राजनीतिक कारणों से किसी को परेशान नहीं किया जा सके। केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद देखा जा रहा है कि तमाम (नये-पुराने) आरोपियों के खिलाफ मामले साबित नहीं हुए अनुमति तो दी ही गई जबकि भाजपा से जुड़े लोगों के खिलाफ जांच ही नहीं हुई और जो लोग भाजपा में शामिल हो गए उनके खिलाफ जांच रुक गई या वे भी बच गये। इसलिए भाजपा को वाशिंग मशीन पार्टी भी कहा जाता है और भ्रष्टाचार के तमाम आरोपी भिन्न पदों पर हैं जबकि दूसरे दलों के तमाम निर्वाचित लोगों पर शीश महल जैसे आरोप लगाये जाते हैं। इन्हें इतना प्रचार दिया जाता है कि सरकारी घर में सरकारी पैसा लगाना गलत मान लिया जाता है जबकि पद पर आते ही नाम लिखा सूट उपहार लेना गलत नहीं माना जाता है।
आज इंडियन एक्सप्रेस,


