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सियासत

स्वच्छ समाज के निर्माण का सपना बिखरते देख संघ में उपजी छटपटाहट!

केपी सिंह-

क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपनी नियामक हैसियत खो चुका है और मोदी के सामने उसने हार मान ली है और बेबसी को स्वीकार कर लिया है। क्या उसे यह एहसास कचोटने लगा है कि अभी तक समाज में नैतिक, संयमी, त्यागमय जीवन पद्धति पर बल देने वाले भद्र संगठन के रूप में उसके संगठन की जो पहचान स्थापित थी उसमें बहुत बड़ी दरार आ गई है। चरित्र निर्माण का उसका अभियान पटरी से उतर चुका है और उसके अपने ही लोग इन चीजों को लिजलिजा मानकर तिलांजलि देने में किसी तरह से शर्म महसूस नहीं कर रहे।

मोदी के नेतृत्व ने भारतीय जनता पार्टी को, जिसे संघ की मानस संतान माना जाता था युद्धोन्माद से ग्रसित ऐसे उच्छृंखल समूह में बदल दिया है जिसके लक्ष्य बर्बर और लोलुप भावनाओं से सने हुए हैं। युद्ध और प्रेम में सब जायज है की नसीहत उसके लिए अपने जीवन का मंत्र बन गई है। तात्कालिक तौर पर आज का दौर भले ही उपलब्धिपूर्ण लगे लेकिन वर्तमान की रीति नीति कहीं भाजपा समेत संघ को इतिहास की कलंकित खाई में गर्क न कर दे।

संघ का यह शताब्दी वर्ष है। उसके जैसे संगठन का 100 वर्ष पूर्ण कर लेना उसकी दुर्लभ जीवटता का प्रमाण है। आजादी के आंदोलन के समय संघ के सांप्रदायिक की स्वीकृति के लिए बहुत कम गुंजाइश थी। आजादी के बाद भी कई दशकों तक व्यापक समाज में संघ के विचारों के लिए हिकारत बनी रही। भारतीय जनता पार्टी को संघ के राजनैतिक चेहरे के रूप में पहचाना जाता रहा है, नतीजतन संघ के प्रति जनमानस की हेय भावनाओं की कीमत उसे भी चुकानी पड़ी जबकि अटल बिहारी वाजपेयी ने जब जनसंघ को भारतीय जनता पार्टी के रूप में पुनर्जन्म दिया था तब काफी कुछ उन्होंने बदल दिया था ताकि संघ के जिन विचारों का समाज में विरोध है उनकी छाया से वे भारतीय जनता पार्टी को मुक्त रख सकें।

उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के गठन के समय गांधीवादी समाजवाद की बात कही थी जिससे संघ को असहज हो जाना पड़ा था। इसके बावजूद उन्हें राजनीति में अछूतपन का दंश झेल रही भारतीय जनता पार्टी को मुख्यधारा में स्वीकृति दिलाने के लिए लंबे समय तक प्रयास करने पड़े। अंततोगत्वा भारतीय जनता पार्टी केन्द्र में सत्ता के शिखर तक पहुंची लेकिन धर्मनिरपेक्ष दलों के समर्थन की बैसाखियों पर टिककर। इसके लिए उन्हें संघ और पार्टी के मूल एजेण्डे को स्थगित करने की सहमति देनी पड़ी। उनके समय भारतीय जनता पार्टी के लिए खुला खेल फर्रूखाबादी खेलने की नौबत बिल्कुल भी नहीं बन पायी थी।

लेकिन मोदी ने इस बाधा दौड़ को आसान बनाने का ऐसा करिश्मा कर दिखाया कि अकेले दम पर बहुमत जुटाने में सफल होकर अपने कट्टर एजेंडे को सीना ठोककर फलीभूत करने की असीम सामर्थ्य भारतीय जनता पार्टी को मिल गई। हालांकि इस बार मोदी अपने दम पर बहुमत के बिंदु से फिसल गये हैं लेकिन फिर भी कोई बहुत फर्क नहीं आया है। मिली जुली सरकार में भी मोदी अपना एजेण्डा चलाने में सफल हैं। वक्फ विधेयक जैसे मुद्दे आये तो विरोधी दल मोदी की सरकार के लड़खड़ा जाने और वैकल्पिक सरकार के गठन के सपने देखने लगे थे पर मुस्लिम समर्थन पर आश्रित सहयोगी दलों ने कसमसाने की बजाय मोदी के सामने समर्पण कर देने में ही गनीमत समझी।

हिन्दुत्व की विचारधारा का आज जो वर्चस्व स्थापित हुआ है वह अकल्पनीय है। जाहिर है कि संघ भी यह मानता है कि यह स्थिति मोदी के नेतृत्व की वजह से बनी है। पहले हिन्दू समाज की पहचान दब्बू कौम के रूप में थी लेकिन आज हिन्दू दबंग हो गया है। पहले वह प्रतिकार के समय सक्रिय होता था लेकिन आज हिन्दुओं की ज्यादती की चर्चा हो रही है। हिन्दू समाज को इस पर कोई अफसोस नहीं है बल्कि हिन्दू समाज अपनी आततायी छवि पर घमंड करने लगा है और इसके चलते मोदी के प्रति उसकी निष्ठा ने दीवानगी की हद को पार कर लिया है। बर्बरता को गुण मानने वाली इस आम हिन्दू मानसिकता के मामले में संघ के नेता भी अपवाद नहीं थे।

पर संघ की नींद तब खुली जब मोदी कंपनी उसकी भी हेठी की जुर्रत दिखाने लगी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से दिलवाया गया यह बयान कि भारतीय जनता पार्टी को अब संघ की जरूरत नहीं रह गई संघ के कर्ता धर्ताओं को यह एहसास दिलाने वाला रहा कि मोदी की स्वेच्छाचारिता पर टोकाटाकी न करना कितना महंगा साबित होने लगा है। संयोग से देश के मतदाताओं ने मोदी का गुरूर तोड़ने का काम कर दिया तो संघ को मौका मिल गया। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सार्वजनिक तौर पर मोदी की स्वयं को ईश्वर का अवतार घोषित करने की हरकत पर टिप्पणी कर डाली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह एहसास दिलाने के लिए कि हर किसी को अनुशासन के महत्व का ज्ञान होना चाहिए। सर्वोपरिता और मनमानी की भावनायें अनर्थकारी बन सकती हैं। इसी सोच के तहत संघ ने भारतीय जनता पार्टी के सक्षम राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए हस्तक्षेप किया ताकि सरकार और संगठन के बीच शक्ति संतुलन कायम करके आदर्श व्यवस्था के निर्माण के लक्ष्य को सुचारू तरीके से गति दी जा सके।

जाहिर है कि अपने निरंकुश मिजाज के चलते मोदी के लिए संघ के इस प्रस्ताव को हरी झंडी दिखाना सहज नहीं था। उन्होंने संघ को भुलावे में डालकर इस आग्रह को छोड़ने के लिए रजामंद करने हेतु तमाम नटखट किये। इसके तहत 11 वर्षों के अपने प्रधानमंत्रित्व काल में पहली बार वे संघ मुख्यालय गये ताकि सर संघ चालक के अहम को सहलाकर अपने उद्देश्य की पूर्ति कर सकें। इस मौके पर उन्होंने संघ के प्रति असीम भक्ति भाव भी दिलाया जो कि गर्ज पड़े तो….. को भी बाप बना लेने की उनकी फितरत के अनुरूप था। पर इसके बाद फिर जब अध्यक्ष पद के लिए चर्चा हुई तो मोदी ने देखा कि मोहन भागवत अभी भी सक्षम और स्वतंत्र सोच वाले नामों पर आग्रह करने के लिए डटे हुए हैं।

इसी बीच पहलगांव में टूरिस्टों को आतंकवादियों द्वारा शहीद किये जाने और इसका जबाव देने के लिए आपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी प्रशिक्षण केन्द्रों पर भारतीय सेना के हमले की घटनायें हुई जो अध्यक्ष पद का चुनाव टाल देने के लिए अच्छा बहाना बन गई। इस बीच नरेन्द्र मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि अध्यक्ष वही बनाया जायेगा जो उनकी सुविधा का हो भले ही संघ इसमें नाराज हो या प्रसन्न हो। इसी के साथ साफ हो गया कि नरेन्द्र मोदी ने संघ की अवहेलना का इरादा बना लिया है।

इसके संकेत तब और स्पष्ट हो गये जब यह खबर आयी कि संघ ने भी इसका जबाव देने के लिए भारतीय जनता पार्टी को अपने प्रचारक देने की नीति खत्म करने का फैसला किया है। संघ के ये प्रचारक भारतीय जनता पार्टी का संगठन मंत्री बनकर मार्गदर्शन करते थे जिनसे भाजपा काफी लाभान्वित होती रही थी।

संघ यह मान रहा है कि मोदी की मनमानी के अंधे समर्थन से उसके सामने 100 वर्षों की कमाई लुट जाने का खतरा पैदा हो गया है। यह कमाई थी संघ के माध्यम से दीक्षित होने वाले भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के संस्कारों की जो दूसरों से असहमति जताते थे या दूसरी विचारधारा की आलोचना भी करते थे तो सौम्यता से परे नहीं हो पाते थे। यह संस्कार थे आडंम्बरपूर्ण जीवन शैली से अपने को दूर रखने के ताकि वे फिजूलखर्ची में फंसकर भ्रष्टाचार के दलदल में गिरने से बचे रहें। अगर भाजपा के किसी नेता पर मानवीय कमजोरियां हावी भी होती थी तो लोकलाज से डर की भावना रहने के कारण वह एक सीमा से ज्यादा पतित नहीं हो सकता था। लेकिन आज तो जैसे आदर्श और नैतिकता को भारतीय जनता पार्टी में मूर्खता करार दिया जा चुका है।

भाजपा के छुटभैये नेता तक अपने यहां मांगलिक कार्यक्रम हो या मृत्यु भोज तामझाम के प्रदर्शन की इंतहा पार कर देने में कसर नहीं छोड़ते। चूंकि वे कितनी ही परिसंपत्ति अर्जित कर ले पार्टी उनको टोकेगी नहीं बल्कि पार्टी के कितने भी समर्पित सादा कार्यकर्ता को साधनहीन होने के कारण जलालत का अनुभव कराया जाता है। क्या ऐसे में कोई ईमानदार बने रहने की आत्मघाती नीति मानेगा और लोगों के ईमानदार न रह जाने पर क्या कोई व्यवस्था टिकी रह पायेगी।

चाहे निशिकांत दुबे हों, चाहे विजय शाह या पिछली लोकसभा में बसपा के तत्कालीन सदस्य दानिश अली को गाली देने वाला विधूड़ी या दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जिन्होंने महिलाओं के शील को कलंकित करने वाले अरविन्द केजरीवाल के अपनी मां से उनके पैदा होने का वीडियो मांगने संबंधी कुत्सित बयान को देने में किसी तरह की हिचक महसूस नहीं की थी के बोल अभी तक रही संघ और भाजपा की भद्र छवि के अनुरूप कहे जा सकते हैं। संघ जिस तरह के स्वच्छ समाज के निर्माण के लिए तपस्या करता रहा है आज का माहौल उस पर पानी फेर देने वाला है तो संघ को निराशा क्यों न हो। निश्चित रूप से एक व्यक्ति की अहम्मन्यता की पूर्ति का उपकरण बन जाने की अपनी नियति देखकर अगर संघ को छटपटाहट महसूस होने लगी है तो यह अन्यथा नहीं है।

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