प्रकाश के रे-
अमेरिका फिर से अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट को तैयार कर रहा है. इस बार उसका निशाना चीन है, पर यह फ़ितना दक्षिण एशिया में भी पसरेगा, यानी भारत में भी. सीरिया में आतंकियों को सबसे अधिक समर्थन देने वाला देश तुर्की है. तुर्की अब पाकिस्तान का सहयोगी है.

अब जब सीरिया का आतंकवादी शासन चीन में पैंतरा करेगा, तो क्या भारत में असर नहीं पड़ेगा? क्या तुर्की और खाड़ी देश यह गारंटी देंगे कि ये शैतान भारत में परेशानी पैदा नहीं करेंगे? क्या भारत को इस मामले में गंभीर नहीं होना चाहिए? क्या भारत की विदेश नीति केवल भारत के भ्रष्ट, विचारहीन और इलीट लोग ही तय करते रहेंगे?
अफ़ग़ानिस्तान में जो अस्सी और नब्बे के दशक में खेल हुआ, उससे हमारा देश आज तक भी नहीं उबरा है. आधा से अधिक देश अब भी बंदूकों के साये में है.
लिख रहा हूँ ख़त ख़ून से
इसे स्याही न समझना
नदीम अख्तर-
जो खबर देख और सुन रहा हूं, वह किसी बड़े खतरे की आहट तो नहीं! यूक्रेन ने जिस तरह और जिस आकार का हमला रूस पर बोला है, ये तय मानिए कि रूस उसे मुआफ़ नहीं करेगा। यानि दुनिया एक बड़ी तबाही देखने जा रही है। ये तबाही क्या होगी और किस स्तर की होगी, उसका मुझे अंदाज़ा है लेकिन अंदाजे को लिखना ठीक नहीं।
एक बड़ी रणनीतिक चाल चल दी गई है। सनकी राष्ट्रपति को चुनना अमेरिका के लिए क्या भारी पड़ने वाला है? जिस तरह पुतिन ने ट्रंप के युद्ध रुकवाने के दावे का गुब्बारा फोड़ा था, उसके नतीजे में बहुत बड़ा रिस्क ले लिया गया है। आप सोचिए ना कि रूस के सामने यूक्रेन क्या पानी भरता है? फिर उसकी इतनी बड़ी हिम्मत कैसे हुई? अभी हाल तक वह अमेरिका और नाटो से हथियारों की भीख मांग रहा था। तो जब घर पे नहीं दाने तो यूक्रेन क्यों चला भुनाने? क्या भुनवा के खाएगा? बस यहीं पे सारे राडार फेल हो रहे हैं।
क्या अमेरिका और नाटो की शह पे रूस को उकसाकर कोई बड़ा गेम किया गया है? अगर ये हिमाकत हुई है तो रूस और पीछे से चीन का जवाब उनको झेलना होगा। तुर्की नाटो में है, लेकिन मामला बिगड़ने पे वह खुलकर रूस और ईरान के साथ आ सकता है। तो रूस के सामने क्या ऑप्शंस हैं? ज़ाहिर है, इतनी बड़ी बेइज्जती का बदला तो वह लेगा, या यूं कहें कि उसे कुछ करने को मजबूर किया गया है। तब फिर भाई लोग तैयार रहें। पुतिन कहते नहीं हैं, कर के दिखा देते हैं। और जो भी होगा, वह ट्रंप के मत्थे होगा। यूक्रेन गिरोह का लीडर वही है। अगर भाई लोग मुगालते में हैं कि रूस के हाथ पैर बांधकर उसे दमभर पीट लेंगे, तो लगता है कि ये दूसरी गैलेक्सी से अभी अभी पृथ्वी पे उतरे हैं और यहां के बारे में उनको कुछ नहीं पता।
मैं व्यक्तिगत रूप से चाहता हूं कि रूस जवाब दे। यूक्रेन को पपेट राष्ट्रपति चुनने का नतीजा भुगतना चाहिए। जिस आदमी ने अपने देश को युद्ध का मैदान बनवा दिया और जनता अगर अभी भी उसके साथ है तो यूक्रेन की जनता से मुझे कोई सहानुभूति नहीं। जो देश भीख मांगकर युद्ध लड़ता है, उससे सहानुभूति होनी भी नहीं चाहिए। अमेरिका और यूरोप के उकसावे में आकर यूक्रेन ने रूस से पंगा लिया तो नतीजा तो उसे भुगतना ही पड़ेगा। अब तक मामला चलताऊ टाइप चल रहा था पर अब रूस को ललकारा गया है। तो इसका जवाब सुनने के लिए भी दुनिया तैयार रहे। जंग के मैदान में कोई मुरव्वत नहीं। कोई दया दृष्टि नहीं। ये सेना का भी उसूल होता है और विदेश नीति का भी।
अब रूस, भारत और पाकिस्तान तो है नहीं कि ट्रंप वॉर रुकवा देंगे और ट्विटर पे घोषणा कर देंगे। घायल शेर को समझाना मौत को दावत देना है। रूस ने अब तक संयम से काम लिया है लेकिन शायद अब नहीं लेगा। अगर लेगा तो दुनिया में उसकी धाक और साख दोनों कम होगी। बाकी बड़े लोग जानें।


