प्रकाश के रे-
क्या ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान’ भी ढह जायेगा? इज़रायली हमले में शीर्ष कमांडरों और वैज्ञानिकों का मारा जाना ईरान के लिए बहुत बड़ा झटका है. परमाणु और सैनिक ठिकानों को भी इज़रायल ने निशाना बनाया है. ईरान ने जवाबी हमले की बात कही है, तो इज़रायल हवाई हमलों के साथ-साथ सेना को भी तैयार कर रहा है.
यदि ईरान ने अमेरिका और इज़रायल को ठीक से जवाब नहीं दिया, तो ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान’ का अस्तित्व बहुत जल्दी ख़त्म हो जायेगा, जो अमेरिका, यूरोप और इज़रायल का ही उद्देश्य नहीं है, बल्कि अरब देशों और तुर्की की भी चाहत है. ईरान को न केवल इज़रायल को जवाब देना है, बल्कि उसे अपने बचाव के लिए लड़ाई को फ़ारस की खाड़ी में भी ले जाना होगा.
ईरान ने बहुत सारा समय परमाणु समझौते में तो गँवा दिया, अन्यथा आज उसके पास परमाणु बम होता, तो उस पर हमला नहीं होता. ईरान को अपने भीतर बैठे इज़रायली और अरबी एजेंटों से भी निपटना है. आज ईरान के समर्थन में पश्चिम एशिया में केवल यमनी हूथी हैं, जिनकी ताक़त सीमित है.
ईरान के लिए संभावित स्थिति: इज़रायल लगातार हमलों से उसके महत्वपूर्ण ठिकानों और शीर्ष के लोगों को निशाना बनाता रहेगा. जवाबी कार्रवाई में ईरान के हथियार घटते जायेंगे.
फिर खाड़ी देशों, तुर्की और कुछ यूरोपीय देशों के सहयोग से अमेरिका युद्ध में आयेगा. अंतत: ईरान में शासन बदल जायेगा. फिर ईरान में भी लीबिया, सूडान, इराक़, सीरिया और यमन जैसे हालात बन जायेंगे. ग्रेटर इज़रायल का सपना साकार करने की दिशा में इज़रायल और आगे बढ़ जायेगा.
शीतल पी सिंह-
ईरान पर इज़रायली हमले के चलते भारत का यूरोप से हवाई संपर्क लगभग अवरुद्ध हो गया है। पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र पहले से ही बंद था और अब ईरान और साथ लगे हुए क्षेत्रों में भी सवारी और माल ढोने वाले हवाई जहाज़ उड़ नहीं सकते इसलिए अनेक फ्लाइट्स या तो कैंसिल हो गई हैं या उन्हें खाड़ी के देशों में ग्राउंड किया गया है।
कुछ को वापस लौटा लिया गया है और कुछ का रूट बदल दिया गया है।


मोहम्मद ज़ाहिद-
ईरान समझ ही नहीं पा रहा है कि वह कहां फंसा हुआ है? फिलहाल उसके साथ एक भी देश नहीं हैं। इज़राइल ईरान में घुसकर उसके टाप लीडरशिप को मार रहा है और ईरान सिर्फ थोथे बाजी करता रहा है।

फिलिस्तीन से लेकर सीरिया तक ईरान के बहकावे में आकर बर्बाद हो गये , और अब अकेला पड़ने के बाद ईरान अमेरिका से समझौते के लिए बातचीत कर रहा है और अमेरिकी सहयोग से ही इज़राइल आज ईरान पर 200 से अधिक लड़ाकू विमानों के साथ हमला कर रहा है।
ईरान इस मुश्किल मे अकेला है , पाकिस्तान के साथ तो फिर भी चीन से लेकर तुर्की तक साथ खड़े थे मगर ईरान के साथ कोई नहीं।
दरअसल ईरान ने अपनी विश्वसनीयता खुद खोई है….
याद करिए कि 1991 में प्रथम खाड़ी युद्ध के दौरान, इराक के तत्कालीन नेता सद्दाम हुसैन ने अपने 140 मिग-29, मिराज F1, और सुखोई-24 लड़ाकू विमानों को अमेरिकी और गठबंधन सेनाओं के हमलों से बचाने के लिए ईरान भेज दिया। यह एक रणनीतिक कदम था, क्योंकि इराक को डर था कि उसके हवाई बेड़े को अमेरिकी गठबंधन सेनाएँ नष्ट कर देंगी।
ईरान ने उसे मदद के रूप में अपने यहां छिपा लिया, मगर जब ईराक को उन विमानों की जरूरत पड़ी तो उसने इराक को वह देने से मना कर दिया।
दरअसल आज का दौर सनकी शासकों का है , मिल जुलकर ही इनसे लड़ा जा सकता है, ईरान ने इसकी कोई कोशिश नहीं की।
अब वह मुश्किल में है तो उसके साथ कोई खड़ा नहीं…..


