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सारे सुन्नी स्टेट चाहते हैं ईरान की मुल्ला रिजीम का अंत हो!

विश्व दीपक-

जिस दिन यह तस्वीर आई थी उसी दिन मैं समझ गया था कि ईरान का टाइम आ गया. अगर सीरिया में असद की सत्ता बनी रहती तो इजराइल की हिम्मत नहीं होती ईरान पर हमला करने की. लेकिन असद के पतन ने प्रतिरोध की धुरी को कमजोर कर दिया.

ऊपरी तौर पर भले ही यह लड़ाई इजराइल बनाम ईरान की दिख रही है लेकिन अंदर से सारे सुन्नी स्टेट इजराइल का साथ दे रहे हैं. सभी चाहते हैं कि ईरान की मुल्ला रिजीम का अंत हो. इस घटना को मैं इस्लाम के अंदरूनी संघर्ष के तौर पर भी देखता हूं.

याद कीजिए हमास के इस्माइल हानिया को इजराइल ने तेहरान में, IRGC के सेफ हाउस में घुसकर कैसे मारा था.

जिस कमरे में इस्माइल हानिया सोता था उसको मोसाद ने ब्लास्ट में उड़ा दिया. बगल वाले कमरे का प्लास्टर तक नहीं उखड़ा. इसके बाद इजराइल ने हिजबुल्ला का सफाया किया. नसरुल्ला को उसके बंकर में घुसकर मारा. पेजर ब्लास्ट करके सैकड़ों हिजबुल्ला नेताओं का सफाया किया. किसी अरबी मुल्ला स्टेट ने इस पर कुछ बोला था क्या? नहीं.

इससे क्या साबित होता? यही कि इजराइल की पहुंच ईरान और उसके सहयोगियों के पेट तक है. इजराइल जब चाहता है ईरान के परमाणु वैज्ञानिको को, मिलिटरी लीडरशिप को उड़ा देता है.

मैंने पहले ही लिखा था कि इजराइल-अमरीका का असली टारगेट ईरान है. 7 अक्टूबर का हमला करके हमास ने इजराइल को वो मौका दे दिया जिससे मध्य एशिया का भूगोल, इतिहास सब बदल गया. जिन्हें अभी भी लगता है कि हमास क्रांतिकारी संगठन है उन्हें आत्मावलोकन करना चाहिए.

दुखद यह है कि अब रूस भी कुछ नहीं कर सकता. यूक्रेन में फंसा है. चीन की औकात अरुणांचल प्रदेश में जगहों का नाम बदलने और पाकिस्तान को घटिया एयर डिफेंस बेचने से आगे की नहीं है.

भारत के माओ भक्तों को बेशक लगता है कि चीन दुनिया का दादा बन चुका है लेकिन हर दूसरी वैश्विक घटना यही साहित करती है कि दादागीरी की ठेका तो अभी भी अमरीका के ही हाथ में है.

बाकी सुन्नी स्टेट्स तो अमरीका की जेब में पहले से ही थे. सउदी को साथ लेकर अमरीका ने जुलानी को भी साध लिया. इधर ट्रंप बातचीत का स्वांग रचता रहा. उधर इजराइल तैयारी करता रहा. इसीलिए जब हमला हुआ तो ईरान कुछ नहीं कर सका.

आज उन लोगों की भावुकता पर दया आ रही है जो पहले ग्रेटा थनबर्ग और अब ईरान के नाम पर मध्य एशिया के सुन्नी स्टेट्स को को लानतें भेज रहे हैं. उनका दर्द यह है कि अरब के देश एक होकर अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ क्यों नहीं रहे?

अरे भाई अरब देशों को अमरीका के खिलाफ क्यों लड़ना चाहिए ? सारे देश इस्लामिक हैं इसलिए? ऐसा नहीं होता. अगर अमरीकी साम्राज्यवाद के पिट्ठुओं की लिस्ट बनाई जाय तो उसमें अरबी मुल्लों का नाम टॉप पर आएगा.

अमरीकी सम्राज्यवाद के खिलाफ कोई भी संघर्ष, चाहे वो भारत में हो या मध्य एशिया में हो, सचाई को स्वीकर किये बिना नहीं हो सकती. वर्तमान की निर्मम व्याख्या हमें भविष्य के संताप से बचा सकती है.


ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदिनेजाद मुझे ठीक लगते थे. हार्ड लाइनर माने जाते थे लेकिन उनकी साधारण जीवन शैली अपीलिंग थी. धार्मिक कट्टरता और मुल्लावाद से मुझे सख्त चिढ़ है लेकिन अहमदीनेजाद के बारे में मेरी राय थी कि बंदे में ईमानदारी और साहस है.

वो ईरान के पहले राष्ट्रपति थे जो इजराइल की सीमा तक गए. लेबनान में उन्हें भाषण देना था. काफी भीड़ थी. उनसे कहा गया कि बुलेटप्रूफ शीशे के अंदर से भाषण दीजिए. इजराइल हमला कर सकता है. अहमदीनेजाद ने मना कर दिया. अपने अनुवादक को बुलेट प्रूफ शीशे के अंदर बिठाया. खुद शीशे के बाहर से खड़े होकर भाषण दिया.

कुछ इस तरह कहा था कि अगर मरना है तो सीने पर गोली खाकर अपने लोगों के सामने मरूंगा. एक बार उनसे उनकी संपत्ति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि बैंक से लोन लिया है घर बनवाने के लिए ताकि पूरा परिवार एक साथ रह सके. तब वो राष्ट्रपति थे.

उन्हीं अहमदिनेजाद ने एक इंटरव्यू में बताया कि मोसाद को काबू करने के लिए ईरान ने एक काउंटर इंटलीजेंस यूनिट बनाई. बाद में पता चला कि उस इंटलीजेंस यूनिट का चीफ ही मोसाद का एजेंट था.

इजराइल और ईरान के बीच यह एक निर्णायक फर्क है जिससे इस युद्ध का रूख तय होगा.

ईरान ने इजराइल पर हाइपरसोनिक मिसाइल से तगड़ा हमला किया लेकिन हमले का पैटर्न बताता है कि वह प्रतिशोध से संचालित है. उसमें कोई स्ट्रैटेजिक थिंकिग नहीं बल्कि गुस्सा और बदहवाशी दिखती है. हाइफा पोर्ट फिर बन जाएगा. इमारतें फिर खड़ी हो जाएंगी.

लेकिन इसके उलट इजराइल ने ईरान को जो नुकसान पहुंचाया है वह संघातक है.अंदर से तोड़ने वाला है.भरपाई होने में कई दशक लग जाएंगे. 9 परमाणु वैज्ञानिकों को और देश के दसियों टॉप मिलिटरी कमांडर्स को कुछ घंटों के अंदर मार देना हाइपरसोनिक मिसाइल मारने से बहुत ज्यादा खतरनाक है. एक वैज्ञानिक तैयार करने में बहुत वक्त, पैसा और संसाधन लगता है.

हालांकि अभी पुष्टि नहीं हुई है लेकिन खबरें आ रही हैं कि इजराइल ने ईरान के रक्षा मंत्री को ही मार दिया है. परमाणु संयंत्रों को तबाह करना, राडार बनाने वाली कंपनी को उड़ा देना ज्यादा बड़े नुकसान हैं. युद्ध के बीच किसी देश के रक्षा मंत्री को ही मार देना बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत है.

मानव संसाधन का नुकसान, मेरे हिसाब से ज्यादा बड़ा है. इजराइल, ईरान को पिछले कई सालों से ऐसे संघातक झटके देता आ रहा है. ऐसा लगता है कि ईरान के अंदर, मोसाद की जितनी पैठ और समर्थन है उतनी पैठ और समर्थन तो आईआरजीसी का भी नहीं.

2020 में इजराइल ने ईरान के सबसे बड़े परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फखरिजादे को ऑटोमैटिक मशीन गन से छलनी कर दिया. मशीनगन को रिमोट से संचालित किया जा रहा था.

सोचिए इजराइल की पहुंच ईरान के अंदर कितनी गहरी है. यह तब हुआ जबकि फखरिजादे अपनी पत्नी के साथ बुलटप्रूफ कार में जा रहे थे. इजराइल की प्लानिंग, हथियारों का चयन, उनकी प्लेसिंग, फखरिजादे के डेली रूटीन की जानकरी, बुलेटप्रूफ कार की स्पीड से लेकर उसकी बनावट आदि बारे में इजराइल को सब पता था.

ये सारी घटनाएं एक बहुत बडे तथ्य की ओर इशारा कर रही हैं और वो यह है कि ईरानी समाज में मुल्ला रिजीम को लेकर भयंकर असंतोष है. वहां इतनी फॉल्ट लाइन्स हैं कि इजराइल जब चाहे, जहां चाहे घुसकर मारता और निकल जाता है.

ईरान अंदर से टूटा हुआ है. इजराइल उसे अंदर और बाहर दोनों जगहों से और तोड़ रहा है. ईरान को अगर बचना है तो उसे सबसे पहले मुल्ला रिजीम से पिंड छुड़ाना होगा क्योंकि ईरान में जो भी फॉल्ट लाइन्स बनी हैं वो पिछले 45 सालों की मुल्ला रिजीम के दौरान और उसकी वजह से ही बनी हैं.

नेतन्याहू ईरान की जनता से बगावत की अपील हवा में नहीं कर रहा.


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