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आइएएस अशोक खेमका से सर्वप्रिया सांगवान की यह बातचीत सुननी चाहिए (देखें वीडियो)

ओम थानवी-

बीबीसी पर शाया हुई आइएएस अशोक खेमका से सर्वप्रिया सांगवान की यह बातचीत सुननी चाहिए। उन्होंने रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ़ के सौदे के झोल पकड़ कर उसे रद्द कर दिया था। उस वक़्त प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। भू-माफ़िया, अवैध निर्माण, भ्रष्टाचार आदि से खेमका निरंतर लोहा लेते रहे।

https://youtu.be/YBP4mzUw7C8

ईमानदार अधिकारी तलवार की धार पर चलते हैं। नीतियाँ भले नेता बनाते हों, पर लोकतंत्र के इदारों (institutions) को बनाने-बचाने में अधिकारियों की भूमिका अहम होती है।

अधिकारियों में लालच और भय की बात भी खेमका ने सच बताई है। मैं दस साल (1989–99) चंडीगढ़-जनसत्ता का संपादक रहा। तब अपेक्षया छोटा शहर था। अनेक अधिकारियों से दोस्ती हुई। कुछ को गिरते देखा। कुछ को ऊँचा उठते। जनसत्ता हरियाणा-हिमाचल में ज़्यादा पढ़ा जाता था, पंजाब में कम।

वहाँ के अनेक अधिकारियों से आज भी घरापा है। अशोक लवासा (पूर्व चुनाव आयुक्त) की किताब पर जयपुर में चर्चा हुई — उनका जन्म जयपुर का ही है — तो बोलने को बुलाया। हरियाणा के डीजीपी रहे केपी सिंह की लिखी दो किताबों का लोकार्पण करने उनके शहर पंचकूला गया। एसवाई क़ुरैशी (पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त) को भी मेरा नाम ख़याल आया, जब पिछले दिनों मीडिया फ़ोर यूनिटी की जूरी बैठी।

नेताओं में अधिकारियों को लेकर आग्रह-दुराग्रह रहते हैं। हालाँकि अच्छे अधिकारी की ख़ूबी होती है वह हर सरकार में अच्छा काम करेगा। यह बात मैंने एक बार चौधरी बंसीलाल को कही। वे चौथी बार मुख्यमंत्री बने थे। एक शाम मेरे घर धनेंद्र कुमार (जो बाद में विश्व बैंक में कार्यकारी निदेशक हुए) के बारे में कुछ कहने लगे। मुझे कहना पड़ा कि आप लोग कान के कच्चे होते हैं। अधिकारियों को सभी नेताओं के साथ निर्वाह करना पड़ता है।

मैंने उन दस वर्षों में हरियाणा में सात मुख्यमंत्रियों को शपथ लेते देखा। जब बीकानेर से चंडीगढ़ गया तब देवीलाल मुख्यमंत्री थे। एक बार उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज मूलतः बीकानेर की नोखा तहसील से चौटाला (अब हरियाणा में) गए। निपट बीकानेर की बोली में वे बोले थे, “म्हैं अबार बी गाँव में नोखाणी बाजाँ” (हम लोग चौटाला में अब भी नोखाणी — नोखा वाले — कहलाते हैं)।

स्मृति का यही खेल है कि भटका देती है। देखिए, खेमका के इंटरव्यू की डोर कैसे चंडीगढ़ की यादों की ओर खींच ले गई। ढेर संस्मरण हैं। फिर कभी।

(प्रसंगवश, सर्वप्रिया के पिता सर्वदमन सांगवान कभी जनसत्ता के चंडीगढ़ संस्करण में पत्रकार रहे।)

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