विवेक कुमार-
यह स्वतंत्र भारत का इकलौता ऐसा आदेश होगा जो एक पिता की दो बेटियों के लिए जारी हुआ। किसी को पता भी नहीं चलने दिया और जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने पिछले साल अक्टूबर में बहुत कम अनुभव के बावजूद अपनी दो वकील बेटियों को सुप्रीम कोर्ट के लिए केंद्र सरकार के Group -A Panel Counsel में शामिल करा लिया। यह भ्रष्टाचार नहीं है, उपहार है।
संजय के सिंह-
केंद्र की भाजपा सरकार जब खुलेआम कॉलेजयम सिस्टम को खत्म करने में लगी है, उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति भी सरकार के समर्थन में काम कर चुके हैं और अब जेडीयू नेता संजय झा की दो बेटियों की नियुक्ति का मामला चर्चा में है तो एक पुराना मामला याद करना बनता है। खासकर इसलिये कि नरेन्द्र मोदी पूछते रहे हैं 70 साल में क्या हुआ, दावा किया है, ना खाउंगां, ना खाने दूंगा और भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद व वंश वाद तो दूर करना ही था।
पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरामन ने अपनी किताब, माई प्रेसिडेंशियल ईयर्स में स्वामी से संबंधित एक मामले का जिक्र किया है। पेश है उस अंश का हिन्दी अनुवाद, पुस्तक के हिन्दी संस्करण, “जब मैं राष्ट्रपति था” में जैसा है।
“…. अक्तूबर के शुरू में मेरे पास एक और फाइल आई जिसमें रुखसाना सुब्रमण्यम स्वामी को दिल्ली हाईकोर्ट का अतिरिक्त जज बनाने की सिफारिश थी। इस फाइल पर सभी सांविधानिक अधिकारियों की सिफारिश दर्ज थी। श्रीमती स्वामी ने बार में दस साल चार माह पूरे कर लिए थे। यह समय संविधान द्वारा तय न्यूनतम अहर्ता से कुछ ही महीने ज्यादा है। 1989-1990 के दौरान उनकी आय 20,000 रुपए प्रतिमाह बताई गई थी। दिल्ली हाईकोर्ट में कई और महिलाएं प्रैक्टिस कर रही थीं जो ज्यादा बेहतर थीं और जिनकी आय भी ज्यादा थी। उन सभी को नजरअंदाज करके श्रीमती स्वामी जैसी महिला की नियुक्ति बार का निरादर करना था।
इसलिए मैंने पुनर्विचार के लिए वह फाइल प्रधानमंत्री को लौटा दी। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने संसद के केंद्रीय कक्ष में और बाहर मेरे खिलाफ अभियान छेड़ दिया। जिसे मैंने नजरअंदाज किया। मुझे अपनी इच्छा के विरुद्ध काम करने के लिए कभी दबाया या मनाया नहीं गया था।” काश जांच इसकी भी होती और इतने समय में व्यवस्था दुरुस्त की गई होती।


