लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधान सभा सचिवालय के प्रधान सचिव प्रदीप कुमार दुबे पर भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और सेवा नियमों के उल्लंघन जैसे गंभीर आरोपों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। कर्मेश प्रताप सिंह नामक कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह के माध्यम से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राज्यपाल समेत अन्य उच्चाधिकारियों को शिकायत भेजी है। शिकायत में कहा गया है कि प्रदीप दुबे का कार्यकाल वर्षों पहले समाप्त हो चुका है, इसके बावजूद वे अवैध रूप से पद पर बने हुए हैं।
सेवा विस्तार का फर्जीवाड़ा?
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि प्रदीप दुबे की सेवानिवृत्ति 30 अप्रैल 2019 को निर्धारित थी और इसकी अधिसूचना भी जारी की गई थी। इसके बावजूद, बिना किसी वैध सेवा विस्तार या पुनर्नियुक्ति आदेश के वे अब तक पद पर बने हुए हैं। आरटीआई के जरिए प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, उनका कार्यकाल 2019 में समाप्त हो गया था, लेकिन उन्होंने अपने स्तर पर खुद को विस्तार दे दिया। इतना ही नहीं, 2019 में एक शपथपत्र में उन्होंने अपनी उम्र 57 वर्ष बताई जबकि वे तब 66 वर्ष पार कर चुके थे।
भ्रष्टाचार और नियुक्तियों में गड़बड़ी के आरोप
कर्मेश प्रताप सिंह का कहना है कि प्रदीप दुबे ने विधानसभा में नियुक्तियों की प्रक्रिया में व्यापक हेरफेर की। उन्होंने 2010-2011 में सेवा नियमों में गुप्त तरीके से संशोधन कर लोक सेवा आयोग की भूमिका समाप्त कर दी और नियुक्तियों का पूरा नियंत्रण विधानसभा अध्यक्ष को सौंप दिया। यह संशोधन कथित रूप से सदन में पेश भी नहीं किया गया।
इतना ही नहीं, 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान आचार संहिता लागू होने के बावजूद, उन्होंने हारे हुए विधानसभा अध्यक्ष से नियुक्ति आदेश प्राप्त किया, जो आचार संहिता का खुला उल्लंघन माना जा रहा है।
जांच आदेश दबाने और कर्मचारियों के उत्पीड़न का आरोप
शिकायत में यह भी आरोप है कि प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्यमंत्री कार्यालय, राज्यपाल सचिवालय समेत कई उच्चस्तरीय जांच आदेशों को प्रदीप दुबे ने अपने प्रभाव से दबा दिया। उनके कार्यकाल में कई कर्मचारियों का उत्पीड़न भी सामने आया। कर्मचारी संघ के अध्यक्ष लाल रत्नाकर सिंह को कथित रूप से झूठे मामलों में फंसाकर जेल भेजा गया, जबकि एक अन्य कर्मचारी प्रेमपाल ने उत्पीड़न से त्रस्त होकर आत्महत्या कर ली। सहायक चंद्रप्रकाश को भी मनमाने ढंग से बर्खास्त किया गया।
कर्मेश प्रताप सिंह की बहाली की मांग
कर्मेश प्रताप सिंह ने बताया कि वे 14 जुलाई 2016 को सूचना अधिकारी पद पर नियुक्त हुए थे और 2019 में स्थायी कर्मचारी घोषित किए गए थे। उनका सेवा रिकॉर्ड बेहतर था, लेकिन एक असफल अभ्यर्थी की याचिका के आधार पर बिना किसी जांच या विभागीय कार्रवाई के उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। शिकायत में उन्होंने अपनी तत्काल बहाली, लंबित पदोन्नति और सेवा लाभों की पुनः स्थापना की मांग की है।
मुख्यमंत्री से की सख्त कार्रवाई की मांग
कर्मेश ने मांग की है कि प्रदीप दुबे को तत्काल पद से हटाया जाए और उनके खिलाफ सीबीआई या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से निष्पक्ष जांच करवाई जाए। साथ ही विधान सभा सचिवालय में की गई अवैध नियुक्तियों की जांच भी त्वरित रूप से करवाई जाए।



