आज मेरे नौ में से आठ अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर है। इंडियन एक्सप्रेस में यह पहले पन्ने पर नहीं है जबकि अकेले यही अकखबार बिहार में एसआईआर पर लगातार रिपोर्टिंग करता रहा है। तकरीबन रोज पहले पन्ने पर एक खबर रही। आज तेजस्वी या चुनाव आयोग की खबर पहले पन्ने पर नहीं होने का मतलब आप चाहे जो लगाइये। मैं यही समझता हूं कि यह खबर पहले पन्ने लायक नहीं है। चुनाव आयोग पहली बार इस तरह की कोई जाच कर रहा है इसलिए जरूर खबर है पर तब खबर यही होनी चाहिये थी। तथ्य यह है कि तेजस्वी के वोटर कार्ड की जांच से ज्यादा जरूरी है, महत्वपूर्ण पदों पर तैनात लोगों के शपथ पत्रों की जांच करने की कि वे गलत या झूठे तो नहीं हैं। इसमें प्रधानमंत्री की डिग्री का मामला भी आयेगा। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट इस मामले में तो गंभीर नहीं हैं पर चुनाव आयोग के इस अधिकार के प्रति हैं कि वह नागरिकता जांच कर ही मतदाता बनाने के लिए संवैधानिक रूप से अधिकृत है।
संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में बिहार के उपमुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्रियों – लालू यादव तथा राबड़ी देवी के बेटे, उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी, तेजस्वी यादव के के दो वोटर आईडी (या एपिक नंबर) का मामला छाया हुआ है। इसमें चुनाव आयोग की कार्रवाई भी शामिल है। भले यह खबर है पर असल में चुनाव आयोग का खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाला हाल बता रहा इससे पहले यह देखना और बताना जरूरी है कि देश का स्वतंत्र मीडिया कैसे चुनाव आयोग की सरकारी लाइन पर चल रहा है। खबरों के साथ विचार (या तथ्य) पेश करने का रिवाज है नहीं, इसलिए यह नहीं कहा जा रहा है कि चुनाव आयोग अगर दो आईडी या एपिक नंबर के लिए तेजस्वी के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है तो उसे बाकी लोगों के खिलाफ भी करना चाहिये जिनके नाम उसने हटाये हैं। इनमें उन्हीं को छोड़ा जा सकता है तो दुनिया से कूच कर गये हैं। नियमानुसार, किसी एक चुनाव क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने वाले मतदाता को नये क्षेत्र में नामांकन कराने के साथ-साथ चुनाव आयोग को सूचित करना होता है कि उसका नाम पहले फलां चुनाव क्षेत्र में था जो उसने कटवा दिया है या उसके लिए आवेदन कर दिया है। मैंने अभी तक नहीं सुना कि ऐसा नहीं करने के लिए किसी के खिलाफ कार्रवाई हुई हो फिर भी तेजस्वी के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई है और इसलिये यह खबर तो है ही विचारधारा के अनुसार लीड भी है और उन संपादकों के लिये तो जरूरी जो ऐसे ही काम करने के लिए नब्बे के दशक में मीडिया में प्लांट कर दिये गये थे। पर यह सब अलग मुद्दा है। आइये देखें आज की यह खबर क्या है और कैसे छपी है।
पहले हिन्दी के मेरे तीन अखबारों की बात करूं तो सबसे पहले अमर उजाला में यह खबर लीड है। शीर्षक है, तेजस्वी यादव के दो वोटर कार्ड पर चुनाव आयोग सख्त, नोटिस भेजा। खबर में कहा गया है कि जांच के लिए कार्ड सौंपने को कहा गया है। यहां यह बता दूं कि वोटर आईकार्ड नोट नहीं है कि नकली दिखाकर वोट डाल आये। वोट आप तभी डाल सकते हैं जब आपका नाम मतदाता सूची में हो। आपके पास कार्ड हो और नाम मतदाता सूची में नाम न हो यह संभव है। ऐसा आपके निवास बदलने से हो सकता है और आप दो या ज्यादा जगह पर रहते हों और सभी जगह की मतदाता सूची में नाम लिखवाना चाहें तो लिखवा सकते हैं – पर यह नियमतः गलत है। लेकिन इससे वोटर आई कार्ड नकली या अवैध नहीं हो जायेगा। जिस ढंग से चुनाव होते हैं उसमें आप दोनों जगह वोट डाल सकते हैं। इसीलिए वोट डालने के बाद उंगली पर निशान लगाया जाता है। वैसे वह इसलिए भी लगाया जाता है कि आप किसी और के नाम पर वोट न डाल सकें और यह तबके लिये था जब वोटर आई कार्ड नहीं होते थे और लोग दूसरों के नाम पर वोट डाल पाते थे। इसलिये अब दो जगह नाम होने का मतलब है। गाजियाबाद में रहते हुए लोक सभा चुनाव में मतदान के बाद जब दिल्ली के लिए मतदान था तो मेरी उंगली के निशान खत्म हो चुके थे और मेरा नाम दो जगह होता तो मैं वोट दे सकता था और मेरे पास दिल्ली का वोटर आईकार्ड है फिर भी मैं नहीं दे सकता था क्योंकि कार्ड तो है पर मतदाता सूची में नाम नहीं है (होगा)। अब मेरे पुराने कार्ड को कोई ‘नकली’ कैसे कह सकता है पर वह असली जैसा उपयोगी भी नहीं है।
कुल मिलाकर, मामला यह है कि मतदाता बनाने और मतदाताओं के लिए वोटर आईकार्ड की जरूरत पहले थी और एक समय ऐसा भी था जब आपका नाम मतदाता सूची में तो था पर आपके पास वोटर आईकार्ड नहीं थे। जरूरत इसकी थी कि इस लाइन पर काम किया जाता और मतदाता सूची बनाने की जरूरत खत्म होती। जब हर नागरिक वोटर है और उसके पास आधार कार्ड है तथा कार्ड में उम्र भी दर्ज है तो 18 साल से ऊपर वाले बगैर मतदाता सूची के वोट डाल सकते थे। इससे मतदाता सूची बनाने से लेकर सबके लिये गैर जरूरी कार्ड बनाने का खर्च और संसाधन बच जाता, व्यवस्था भी बनी रहती या ठीक रहती। अगर ऐसा नहीं भी हुआ तो मतदाता और मतदाता कार्ड बनाने के मामले में नियमों में आवश्यक संशोधन नहीं हुआ है और इस बार चुनाव आयोग मतदाता सूची बनाने की बजाय नागरिकता की जांच करने लगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी उसे ऐसा करने दिया। उसने चुनाव आयोग को सलाह दी, चुनाव आयोग नहीं माना और अपनी दलीलें देता रहा। इसमें चुनाव आयोग ने यह दावा भी किया कि उसे नागरिकता जांच कर मतदाता बनाने का अधिकार है। हालांकि, उसका मुख्य काम मतदाता बनाना है, नागरिकता जांचना नहीं। अगर कुछेक गैर नागरिक मतदाता बन जाते हैं तो उसकी शिकायत करने और कार्रवाई की व्यवस्था पहले से है। इस बार चुनाव आयोग ज्यादा सतर्क हो सकता था लेकिन इस सतर्कता में आम मतदाता को छोड़ देने या छूट जाने की आशंका न्यूनतम होनी चाहिये थी। जो नहीं है और चुनाव आयोग खुद कह चुका है कि जो मतदाता सूची में नहीं होंगे वे नागरिकता के अपने दावे और अधिकार से वंचित नहीं होंगे। जाहिर है, चुनाव आयोग मानता है कि नागरिक भी छूट जा सकते हैं। अंततः विदेशी शामिल होंगे कि नहीं यह बाद की बात है। जाहिर है, चुनाव आयोग विदेशियों को मतदाता नहीं बनाने के अपने कर्तव्य और अधिकार में कायदे से अंतर नहीं कर रहा है।
इसके बावजूद अब चुनाव आयोग तेजस्वी यादव के वोटर कार्ड की जांच करेगा और यह खबर नवोदय टाइम्स में भी लीड है। उपशीर्षक है, राजद नेता के दावे के बाद निर्वाचन आयोग ने ईपीआईसी कार्ड सौंपने को कहा। उपशीर्षक के बाद खबर शुरू होने से पहले चुनाव आयोग के (अनाम) अधिकारी का यह दावा भी प्रमुखता से छपा है, प्रेस कांफ्रेंस में जिक्र किये नंबर का कार्ड आधिकारिक रूप से जारी नहीं किया गया है। जैसा मैंने ऊपर कहा, अनधिकृत रूप से कार्ड जारी करवाने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि उसे लेकर आप वोट देने जाएंगे तो आपका नाम मतदाता सूची में नहीं होगा और आप कार्ड होने के बावजूद वोट नहीं दे सकेंगे क्योंकि वोट मतदाता सूची के अनुसार ही पड़ते हैं और इसीलिए मतदाता सूची बनती है। अगर कार्ड जारी किया गया है तो नाम होगा ही और उसके अनधिकृत रूप से जारी होने का न कोई मतलब है ना किसी के लिए इसकी जरूरत है। बशर्ते कि किसी को फर्जी कार्ड दिखाकर कोई और काम कराना हो। हालांकि, अब जब कार्ड की जांच इंटरनेट पर की जा सकती है तो कोई नकली भी कैसे और क्यों पेश करेगा। चुनाव आयोग तेजस्वी के कथित अनधिकृत कार्ड की जांच तो कर रहा है पर उस शपथ पत्र की जांच नहीं कर रहा है जिसमें एक उम्मीदवार ने अपनी शिक्षा के बारे में गलत दावा किया है। यह उसका काम है, फिर भी।
हिन्दी के मेरे तीसरे अखबार, देशबन्धु में यह खबर लीड तो नहीं है पर चार कॉलम में छपी है। शीर्षक है, तेजस्वी को चुनाव आयोग ने नोटिस जारी किया। उपशीर्षक है, दो वोटर आईडी कार्ड पर जवाब मांगा। यह उल्टा भी हो सकता था और अगर तेजस्वी ने दो बार आवेदन किया है तो उनकी गलती है और कार्रवाई दो बार और दो जगह मतदाता सूची में नाम के लिए आवेदन करने पर की जा सकती है लेकिन उनके आवेदन के बिना (या आवेदन करने पर भी) चुनाव आयोग अगर किसी कारण से दो वोटर आईकार्ड जारी करे दे तो क्या उसकी कोई जवाबदेही नहीं है? न भी हो तो कार्ड मांगने से क्या मिलेगा और कार्ड का नंबर जब सार्वजनिक है तो सारे विवरण चुनाव आयोग के पास ही हैं, सिर्फ कार्ड के अलावा। चुनाव आयोग सिर्फ नंबर से यह जांच कर सकता है और करना चाहिये कि दो कार्ड कैसे जारी हुए हैं। अगर तेजस्वी ने दो आवेदन किये हैं तो खबर यह होनी चाहिये थी और बिना आवेदन दो कार्ड जारी हुए हैं तो खबर यह होती। पर हमेशा हर समय मुद्दे को घुमा देना या लेना भाजपा सरकार और उसके समर्थकों की नीति रही है। उसके ऊपर, हेडलाइन मैनजमेंट का ही असर है कि आज जो खबर इतनी प्रमुखता से छपी है, हर कोई चर्चा कर रहा है वह असल में कुछ है ही नहीं। देशबन्धु में तेजस्वी का कहा छपा है, गंभीर सवालों पर आयोग चुप है। यही नहीं, कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने कहा है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता संदिग्ध है और यह भी इस खबर का भाग है। इन खबरों के बिना मूल खबर का कोई मतलब नहीं है लेकिन हेडलाइन मैनेजमेंट भी तो कुछ है ही।
इन तमाम तथ्यों, तर्कों के बावजूद आज टाइम्स ऑफ इंडिया, दि एशियन एज, द हिन्दू में यह खबर लीड है। द टेलीग्राफ में यह खबर लीड तो नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर दो कॉलम की खबर जरूर है और वह भी टॉप पर। शीर्षक वही है जो चुनाव आयोग चाहता होगा – तेजस्वी के वोटर आईकार्ड पर चुनाव आयोग की ‘सघन जांच’। लेकिन इसमें सघन जांच सिंगल कोट में है और इसका अर्थ समझा जा सकता है। यह भी हो सकता है कि जांच का नाटक हो रहा है या नाटक सिर्फ प्रचार के लिए है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर दो कॉलम में है। शीर्षक है, आधिकारिक तौर पर जारी नहीं हुआ : चुनाव आयोग ने तेजस्वी से वोटर आईडी सौंपने के लिए कहा। आप जानते हैं कि बिहार में चुनाव आयोग ने अभी मतदाता सूची का प्रारूप ही जारी किया है, मतदाता सूची बनने के बाद वोटर आईकार्ड बनने होंगे तो बनेंगे और मतदाता सूची से नाम हटने के बाद या हटवाने के लिए भी वोटर आईकार्ड सौंपने की जरूरत नहीं होती है। मेरा पुराना वोटर आईकार्ड मेरे पास है और जिस कार्ड से (या जो नाम मतदाता सूची में है) मैंने वोट दिया वह 2012 से है। तेजस्वी का कार्ड भी पुराना ही होगा। चुनाव आयोग अब मांग और जांच रहा है तो आप समझ सकते हैं कि जांच की उसकी व्यवस्था क्या है और कितनी सक्रिय होगी। फिर भी मीडिया के लिए यह खबर है और इतनी बड़ी कि लीड ही है।
द हिन्दू का शीर्षक है, चुनाव आयोग ने जांच के लिए तेजस्वी से वोटर आई कार्ड देने के लिए कहा। उपशीर्षक है, आयोग ने कहा, राजद नेता ने प्रेस मीट में जो दस्तावेज दिखाये हैं वे औपचारिक तौर पर जारी किये गये नहीं लगते हैं। हैं। (तेजस्वी की) पार्टी ने कहा है कि आयोग भाजपा के इशारे पर काम कर रहा है ताकि मतदाता सूची से संबंधित सवालों पर से ध्यान हटाया जा सके। दि एशियन एज इस मामले में और अखबारों से आगे है। इसकी लीड भाजपा का यह दावा है कि तेजस्वी और राहुल भारत का कद खराब करने के लिए झूठ बोल रहे हैं। तीन कॉलम की इस मूल खबर के साथ दो कॉलम के बॉक्स का शीर्षक है, चुनाव आयोग ने कहा तेजस्वी के दिखाये एपिक नंबर का अस्तित्व नहीं है। लेकिन भाजपा के आरोप से ज्यादा महत्वपूर्ण सत्तारूढ़ दल का चुनाव आयोग के बचाव में डटा रहना है। चुनाव आयोग (या उसके काम) की बदनामी को देश के कद से जोड़ना है जबकि इससे देश का कद ऊंचा होगा कि लोकतंत्र में चुनाव आयोग की निष्पक्षता कितनी जरूरी है और भारत में उसे निष्पक्ष रखने के लिए क्या सब हो रहा है। जाहिर है, मामला देश के कद का नहीं, भाजपा और उसके नेता के कद का है और चुनाव आयोग के जरिये वोट की चोरी का आरोप अगर साबित हो गया तो देश का कद ऊंचा ही होगा, भले भाजपा और उसके नेता के बारे में नया खुलासा हो जाये।


