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आज के अखबार:नहीं बताते कि चुनाव आयोग की अकड़ ढीली हुई, विज्ञप्ति जारी की, प्रेस कांफ्रेंस करेगा 

संजय कुमार सिंह

आज देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, वोट चोरी की लड़ाई सड़क पर आई। खबर है कि बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की वोट अधिकार यात्रा आज शुरू होगी और चुनाव आयोग ने प्रेस विज्ञप्ति जारी की है। आज प्रेस कांफ्रेंस भी करेगा। पहली बार चुनाव आयोग प्रेस कांफ्रेंस कर रहा है जो चुनाव की तारीख की घोषणा के लिए नहीं है। किसलिये है उसपर अटकलें हैं। खास बात यह है कि राहुल गांधी को जिस आरोप के लिए नोटिस दिया गया, चुनाव आयोग को बदनाम करने का आरोप लगा, शपथ पूर्वक लिखकर देने या माफी मांगने के लिए कहा गया, भाजपा की ट्रोल सेना ने इसका समर्थन किया लगभग वैसे ही आरोप लगाने वाले अनुराग ठाकुर के मामले में पवन खेड़ा के आरोपों के बाद से सन्नाटा है। सिर्फ सन्नाटा रहता तो शायद कोई खबर नहीं बनती लेकिन चुनाव आयोग की ओर से प्रेस विज्ञप्ति जारी हुई है, आज प्रेस कांफ्रेंस की सूचना है लेकिन हिन्दी अखबार नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, अब कल जेलेंस्की से मिलेंगे ट्रम्प (क्योंकि?) अमेरिकी और रूसी राष्ट्रपतियों की बैठक बेनतीजा। इसमें पहले पन्ने पर, ‘राहुल की वोटर अधिकार यात्रा आज से’ खबर जरूर है लेकिन चुनाव आयोग की विज्ञप्ति और प्रेस कांफ्रेंस की खबर नहीं है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “जेलेंस्की को करना होगा समझौता… पुतिन से अलास्का में बैठक के बाद बदला ट्रम्प का रुख”। ऐसे में राहुल गांधी की अधिकार यात्रा और चुनाव आयोग की प्रेस विज्ञप्ति तथा प्रेस कांफ्रेंस की खबर ज्यादा महत्वपूर्ण है लेकिन आज के अखबारों में उसे पहले पन्ने पर कम ही जगह मिली है। विदेशी खबर को लीड बनाने से बचने के लिए जनसत्ता ने केंद्र सरकार की इस दलील को लीड बनाया है कि, “राष्ट्रपति-राज्यपालों पर समय सीमा थोपने से ‘संवैधानिक अव्यवस्था’ पैदा होगी”।

इंडियन एक्सप्रेस में आज तमिलनाडु के एक मंत्री के करीबी के यहां छापे की खबर है और शीर्षक में ही लिखा है, डीएमके ने इसे वोट चोरी से ध्यान हटाने की कोशिश कहा है। इसे हेडलाइन मैनेजमेंट कहा जाता है और जाहिर है, ऐसा होता रहा है। अब यह समझ में आ जाता है। फिर भी आज के अखबारों में न तो राहुल गांधी के अधिकार यात्रा की खबर को अपेक्षित प्रमुखता मिली है और न चुनाव आयोग की प्रेस विज्ञप्ति तथा प्रेस कांफ्रेंस करने की घोषणा का महत्व बताया गया है। वह भी तब जब इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक बिहार में मतदाता सूची में नाम दर्ज करवाने के इच्छुक लोग समय खत्म होने की स्थिति में अब यह जानना चाहते हैं कि नाम दर्ज करवाने के लिए आवश्यक ग्यारह या आधार समेत 12 दस्तावेजों में से कोई न होने की स्थिति में पिताजी के बैंक पासबुक से काम चल जायेगा? इस खबर या स्थिति से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार में एसआईआर का आतंक कैसा है। पर दिल्ली के अखबारों में आज यह भी खबर भी पहले पन्ने पर नहीं है। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने अपनी कल की विज्ञप्ति में कहा है, ऐसा लगता है कि कुछ राजनीतिक दलों और उनके बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) ने समय रहते मतदाता सूची की जांच नहीं की। अगर समय रहते गलतियां (अगर थीं) बताई जातीं तो उन्हें ठीक किया जा सकता था। यह दिलचस्प है कि चुनाव आयोग ने ऐसा अनुराग ठाकुर की प्रेस कांफ्रेंस के बाद कहा है और राहुल गांधी की शिकायत पर सुनवाई या कार्रवाई करने के लिए ही तैयार नहीं था। निश्चित रूप से यह उसकी अकड़ ढीली होना है और बड़ी खबर है। लेकिन ऐसे छपी नहीं है। चुनाव आयोग की विज्ञप्ति में ऐसी और भी कई बातें हैं जिनकी चर्चा आग है। जनसत्ता में भी अधिकार यात्रा की खबर तो है लेकिन चुनाव आयोग की प्रेस विज्ञप्ति और प्रेस कांफ्रेंस की घोषणा यानी अकड़ ढीली होने की खबर नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का यह कहना कि वह स्वायत्त संस्था है, वह सब करने के लिए स्वतंत्र है जिसपर तमाम लोगों और संस्थाओं को एतराज है। यह सब उसने तब कहा है जब उसके मुखिया की नियुक्ति के खिलाफ मामला भी सुप्रीम कोर्ट में ही लंबित है। उसे कैसे लटकाया गया है यह सार्वजनिक है। इसके बावजूद, बिहार में एसआईआर रोकने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर के तरीकों की समीक्षा होती रही है तथा राहुल गांधी के आरोप लगाने पर उनसे शपथ पत्र मांगा जाये और देना जरूरी बताने वाले लोगों की कमी न हो तो अखबारों का काम है कि पाठकों को यह बताये कि अनुराग ठाकुर के वैसे ही आरोप लगाने पर चुनाव आयोग ने न तो शपथ पत्र मांगा न झूठे आरोप लगाने के लिए माफी मांगने के लिए कहा। दो दिन की चुप्पी के बाद प्रेस विज्ञप्ति जारी की, सफाई दी और प्रेस कांफ्रेंस की घोषणा की है। द टेलीग्राफ में विज्ञापन नहीं है पर ज्यादा जगह अंतरराष्ट्रीय खबरों को दी गई है। इसमें  भारत से संबंधित मामला भी है। दूसरी खबरें कम हैं, छोटी हैं या कम जगह में हैं। फिर भी राहुल गांधी, वोट चोरी, अधिकार यात्रा, उसका विज्ञापन और चुनाव आयोग सब एक साथ आठ कॉलम में है। एशियन एज में भी तमाम खबरें हैं और इनमें राहुल गांधी कि बिहार यात्रा, वोट चोरी के वीडियो या विज्ञापन की खबर तो है लेकिन चुनाव आयोग की खबर नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर है। भले शीर्षक यह नहीं है कि चुनाव आयोग की अकड़ ढीली हुई पर अंग्रेजी में जो शीर्षक है वह हिन्दी में कुछ इस तरह होता, राहुल की यात्रा शुरू होने वाली है तो चुनाव आयोग आज ‘दुष्प्रचार’ से इनकार करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करेगा। चुनाव आयोग ने अपनी विज्ञप्ति में कहा है, मतदाता सूची के प्रारूप के प्रकाशन के बाद, उसकी डिजिटल और भौतिक प्रतियाँ सभी राजनीतिक दलों के साथ साझा की जाती हैं। सबों के देखने के लिए चुनाव आयोग की वेबसाइट पर डाल दी जाती हैं। मसौदा मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद, अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले, मतदाताओं और राजनीतिक दलों के पास दावे तथा आपत्तियाँ दर्ज करने के लिए पूरे एक महीने का समय होता है। मुझे नहीं लगता है कि इसमें कुछ नया है और संबधित लोगों को बताने की जरूरत भी है। लेकिन प्रेस विज्ञप्ति के जरिये इसे बताने का मकसद आम आदमी की बदल रही राय को प्रदूषित करना जरूर हो सकता है और इसलिए मीडिया का काम था कि वह अपने पाठकों को तथ्य या सच्चाई बताता। आमतौर पर सरकार का समर्थन और प्रचार करने वाले अखबारों ने ऐसा नहीं किया है तो समझा जा सकता है कि वे यह मान या जान रहे हैं कि चुनाव आयोग यह सब किसके लिए या क्यों कर रहा है। इसीलिए अखबारों ने यह नहीं बताया है कि चुनाव आयोग ने विज्ञप्ति जारी करके कहा है कि अंतिम ईआर (मतदाता सूची) के प्रकाशन के बाद, डिजिटल और भौतिक प्रतियां पुनः सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ साझा की जाती हैं और ईसीआई की वेबसाइट पर प्रकाशित की जाती हैं। अंतिम ईआर के प्रकाशन के बाद, अपील की दो-स्तरीय प्रक्रिया उपलब्ध है। इसमें पहली अपील जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) के पास और दूसरी अपील प्रत्येक राज्य/संघ राज्य क्षेत्र के सीईओ के पास की जा सकती है।

इसका मतलब यही है कि मतदाता सूची में गलतियां हैं, फर्जी नाम हैं, एक नाम कई बार हैं तो यह सब बताने का काम संबंधित मतदाता या राजनीतिक दलों का है। उसका समय निकल गया और अब बताया जा रहा है तो हम क्या करें? चुनाव आयोग न तो यह बतायेगा कि ऐसी गलतियां क्यों हुईं ना उन्हें मशीन से पढ़कर ठीक करने की कोशिश करेगा ना ऐसा नहीं करने का कारण बतायेगा। वह यही कह रहा है कि वह काम नियमानुसार करता है और कर रहा है। लेकिन यह भूल जा रहा है कि बिहार के एसआईआर में नये सिरे से नाम जुटाने का कोई मतलब नहीं है और अगर यह नियमानुसार था तो आवेदन आने से पहले नाम कैसे अपलोड हो गये या दूसरी विसंगतियां क्यों थीं। यही नहीं नाम शामिल करने के लिए 11 दस्तावेजों की शर्त क्यों रखी गई। आधार को स्वीकार करने की सलाह क्यों नहीं मानी गई। जाहिर है यह सब उसका अधिकार है और उसका कर्तव्य यही है कि इसके बाद इसपर जनता से गलतियां बताने के लिए कहा जाये (जिसकी जरूरत ही नहीं होनी चाहिये) और नहीं बताया जाये तो यह कहता रहे कि लोग नहीं बता रहे हैं और फिर जैसे है उसे ही अंतिम मान ले और जब कहा जाये कि गलतियां है तो कह दे कि नियमानुसार बनाया गया है आपने गलतियां समय पर क्यों नहीं बताईं। उसका अधिकार चले तो वह इसे चुनाव के बाद नष्ट भी कर दे ताकि ना रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी जैसा वीडियो रिकार्ड के मामले मे किया गया है। फिर भी उसने यह कहने की हिमाकत की है, ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ राजनीतिक दलों और उनके बूथ स्तरीय एजेंटों (बीएलए) ने उचित समय पर मतदाता सूचियों की जांच नहीं की तथा यदि कोई त्रुटि थी तो उसे एसडीएम/ईआरओएस, डीईओ या सीईओ को नहीं बताया।

इस तरह बिहार में गैर जरूरी एसआईआर करना उसका अधिकार है, क्यों और कैसे कर रहा है बताना जरूरी नहीं मानता ना ही किसी की (सु्प्रीम कोर्ट की भी) सलाह मानने के लिए तैयार है। इसके बाद बनी प्रारूप मतदाता सूची के बारे में शुरू में कहता रहा कि कोई शिकायत नहीं आई है और बाद में कहा कि इतनी ही आई है। जाहिर है इससे प्रारूप मतदाता सूची की गलतियां ठीक नहीं हो जायेंगी और उसके लिए कोई कोशिश नहीं दिख रही है फिर भी पहले की गलतियों के लिए इन नियमों और तथाकथित पारदर्शिता की आड़ लेकर संबंधित लोगों को ही दोषी ठहरा रहा है और अपनी कोई जिम्मेदारी स्वीकार नहीं कर रहा है। यही नहीं, उसने यह भी कहा है, निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों और किसी भी मतदाता द्वारा मतदाता सूचियों की जाँच का स्वागत करता है। इससे एसडीएमएस / ईआरओ को त्रुटियों को दूर करने और मतदाता सूचियों को शुद्ध करने में मदद मिलेगी, जो हमेशा से भारत निर्वाचन आयोग का उद्देश्य रहा है। यानी भविष्य की या बिहार की गलतियों के लिए भी वह जिम्मेदार नहीं होगा। इस तथ्य के बाद भी कि सबको पता है कि प्रारूप मतदाता सूची कैसे बनी है और अगर उसकी गलतियां बताने के लिए लोग दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं तो क्यों?  

इसके बावजूद हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्न पर न तो अधिकार यात्रा की खबर है न चुनाव आयोग की विज्ञप्ति अथवा प्रेस कांफ्रेंस की। ऐसा तब है जब पहले पन्ने पर विज्ञापन ज्यादा नहीं हैं और कई खबरें हैं। इनमें एक खबर मिन्ट की है जो तीन कॉलम में छपी है और बताती है कि स्वतंत्रता दिवस पर घोषित जीएसटी में बदलाव (अखबार ने ओवरहॉल लिखा है) से व्यापार की मुश्किलों के बीच निर्यातकों पर बोझ कम होगा। यहां सवाल यह पैदा होता है कि जीएसटी के ये नियम बनाये किसने थे, क्या इनसे राहत की मांग अब तक हुई ही नहीं और नहीं हुई तो ये राहत क्यों दी जा रही है या इसकी जरूरत क्यों पड़ी। यही नहीं, जीएसटी में इस सुधार की मांग तो राहुल गांधी ने कई साल पहले की थी। 15 अगस्त को सोशल मीडिया पर राहुल गांधी का पुराना ट्वीट घूम रहा था। संभव है संबंधित रिपोर्टर और संपादक को नहीं पता हो पर सरकार को तो पता ही होगा फिर भी सरकार ने यह नहीं बताया है कि अपने ही बनाये इस गलत या अनुचित या अव्यावहारिक नियम को इतने दिन चलने क्यों दिया गया? कार्रवाई उसके बाद या कई वर्ष तक क्यों नहीं की गई और अब जब यह सब किया जा रहा है तो मेडीक्लेम के प्रीमियम पर भारी जीएसटी को कम करने की मांग का क्या हुआ? जाहिर है, प्रधानमंत्री की घोषणा मतदाताओं में सरकार की अच्छी (असल में काम करने वाली) छवि बनाने के लिए है। आज अखबारों ने उस कोशिस का प्रचार किया है।

द हिन्दू में विज्ञापन है, खबरें कम हैं और ये दोनों खबरें तो नहीं ही हैं। जो खबर लीड है वह यह कि सरकार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट राज्यपालों के साथ एलियन या विदेशियों जैसा व्यवहार नहीं कर सकता है। यह विधेयकों को मंजूरी देने के मामले में राज्यपालों के लिए समय सीमा तय किये जाने मामले में केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है। इसके साथ यह भी कि उनपर समय सीमा नहीं थोपनी चाहिये। हालांकि, इसका व्यावहारिक मतलब यही होगा कि उन्हें निर्णय नहीं करने की आजादी दी जाये। समय सीमा का मतलब है कि जो करना है वह कर दिया जाये लटकार नहीं रखा जाये। यानी हां या ना समय पर कहा जाना चाहिये। अगर इसके लिए समय सीमा होगी तो एक निश्चित समय के अंदर राज्यपालों को विधेयकों को मंजूर करना होगा। तमाम मामलों में जब नामंजूर करने का अधिकार नहीं होता है और मंजूर नहीं करना होता है तो देर की जाती है। ऐसे में यह कहना कि समय सीमा थोपने से अव्यवस्था होगी मुझे गलत लगता है। मेरी राय है कि नहीं थोपने से भी अव्यवस्था ही होगी। उसी का विरोध संबंधित राज्य सरकारों ने किया था जिसके जवाब में पहली बार राज्यपाल की मंजूरी के बिना कानून बने और समय सीमा तय की गई। अब सरकार अपने बनाये राज्यपालों को अनुचित अधिकार दिलाना चाहती है। आज यह खबर उसी का प्रचार है। राज्यपालों को अगर ना कहना है या ना कहने का अधिकार होना चाहिये तो यह प्रत्यक्ष तौर पर हो न कि अनिश्चित समय तक निर्णय नहीं करने के अधिकार के रूप में हो या न हो तो ऐसा कुछ किया जाये। जो भी हो, यह सरकार का एक पक्ष है और इसलिये खबर तो है ही लेकिन इसमें जनहित कहां है और बहुमत का मतलब जबरदस्ती ही है तो इसे अदालत की मंजूरी दिलाने की यह कोशिश उल्लेखनीय है और रेखांकित की ही जानी चाहिये। इसके मुकाबले वोटों की चोरी से बनी सरकार और उसके समर्थन का मामला ज्यादा गंभीर तथा जनहित से जुड़ा है लेकिन उसकी परवाह नहीं की गई है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का भी अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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