संजय कुमार सिंह
जीएसटी बढ़ाकर कम करने के सरकारी विज्ञापनों से वोट बटोरने की खुली कोशिश और निजी क्षेत्र के विज्ञापनों में फोटो के साथ प्रधानमंत्री की गैर जरूरी प्रशंसा – वोट चोरी क्यों नहीं है। इसे चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन क्यों नहीं माना जाये – यह चुनाव आयोग का मुद्दा होना चाहिये था। अभी वह एसआईआर में उलझा हुआ है और उसने स्वतंत्र, निष्पक्ष, चुनाव कराने की अपनी मूल जिम्मेदारी छोड़कर मां-बेटियों के वीडियो की सुरक्षा और विदेशियों (असल में घुसपैठियों) की पहचान की जिम्मेदारी ओढ़ ली है। इतने भर से इसके कारणों पर विचार करने की जरूरत समझ में आती है। मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। वह मुद्दा नहीं है उसकी कोई चर्चा नहीं है। वोट चोरी तो नहीं ही है। इसके बावजूद यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री दबाव में हैं। जीएसटी कम करना और जैसा प्रचार किया जा रहा है, अगली पीढ़ी का बेहतर व आसान जीएसटी लागू करना तथा इसके बाद अब मणिपुर जाना इसका उदाहरण है। आज मणिपुर दौरे की खबर जैसे छपी है उससे कुछ अखबारों का हेडलाइन मैनेजमेंट अश्लील ढंग के उजागर हो गया है। उसपर आने और उसकी चर्चा से पहले बता दूं कि आज की दूसरी महत्वपूर्ण खबरें क्या हैं। आप जानते हैं कि नेपाल में प्रधानमंत्री और भारत में उपराष्ट्रपति के शपथग्रहण की खबरें आज प्रमुख हैं। इसके अलावा आज के अखबारों में छपी खबरें आपने कल शाम-रात सोशल मीडिया पर देख ही ली होंगी। इसके बावजूद आज कई अखबारों के पहले पन्ने की खबर, असल में लीड और सेकेंड लीड – यही दोनों खबरें है। प्रधानमंत्री का मणिपुर दौरा तीसरे नंबर की महत्वपूर्ण खबर है। आइये देखें आज अखबारों की प्रस्तुति कैसी है।
आज की खबरों में पूर्व उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का 53 दिनों बाद अचानक राष्ट्रपति भवन में प्रकट होना भी महत्वूर्ण है। उपराष्ट्रपति के शपथग्रहण समारोह में कल पूर्व उपराष्ट्रपति (यों) को देखा जाना सुखद आश्चर्य रहा। यह बड़ी खबर है। लेकिन इसे भी आज अखबारों में वह महत्व नहीं मिला। इससे संबंधित खबर उनकी कल की इस फोटो से ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसमें उनके अचानक प्रकट होने या गायब रहने का उल्लेख, कारण और चर्चा सब खबर है। आज अखबारों में यह वैसे नहीं है जैसे होना चाहिये। इंडियन एक्सप्रेस ने इस फोटो को सबसे प्रमुखता से छापा है। दि एशियन एज में भी लगभग वैसे ही है। इससे खबर को जरूरी महत्व मिला है। वैसे, यह फोटो हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर सबसे ऊपर भी है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने फोटो छोटी छापी है लेकिन शीर्षक में ही लिखा है, लापता धनखड़ प्रकट हुए। देशबन्धु में यह खबर सिंगल कॉलम में और अमर उजाला में टॉप पर तीन कॉलम में है। इस एक फोटो की प्रस्तुति पत्रकारिता का स्तर या गुणवत्ता बताने लायक है। द हिन्दू में विज्ञापन के कारण नेपाल में प्रधानमंत्री के शपथग्रहण के अलावा एक ही खबर है। यह खबर खुदरा मुद्रास्फीति कम होने की है। इसे न्यूज18 के शीर्षक से समझा जा सकता है, “महंगाई की हल्की मार: जुलाई से बढ़कर अगस्त में खुदरा मुद्रास्फीति 2.07% पर पहुंची”। जुलाई के मुकाबले अगस्त में खुदरा महंगाई दर में हल्की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। आंकड़ों के अनुसार, यह दर 1.55% से बढ़कर 2.07% पर पहुंच गई
प्रधानमंत्री के मणिपुर दौरे की खबर दि एशियन एज में लीड है और टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड। खबर यह है कि प्रधानमंत्री आज मणिपुर जाने वाले हैं या आज वहां रहेंगे। अखबारों की खबर कल की है और इसलिए इस खबर को दी गई प्रमुखता खबर के लिए नहीं, प्रधानमंत्री और उनकी राजनीति के लिए है। इसी कारण कुछ अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अगर दो साल से भी ज्यादा बाद प्रधानमंत्री के मणिपुर दौरे की खबर उनकी राजनीति या किसी अन्य कारण से पहले पन्ने की खबर है तो निश्चित रूप से उससे महत्वपूर्ण खबर एडीआर के संस्थापक जगदीप छोकर के निधन की खबर ज्यादा पठनीय है। आप जानते हैं कि जगदीप छोकर लंबे समय से स्वच्छ चुनावों के पैरोकार रहे हैं और चुनाव से संबंधित विश्लेषण करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के संस्थापक हैं। देश में चुनाव से संबंधित कई न्यायिक हस्तक्षेप में एडीआर की भूमिका रही है और चुनाव चोरी के आरोपों पर सरकार और चुनाव आयोग की भूमिका या प्रतिक्रिया के मद्देनजर एडीआर की बड़ी जरूरत है। ऐसे समय में उनका निधन निश्चित रूप से बड़ी खबर है। इसीलिए नवोदय टाइम्स ने इसे तीन कॉलम में छापा है। यहां प्रधानमंत्री के मणिपुर दौरे की खबर पहले पन्ने पर नहीं है।
दि एशियन एज में प्रधानमंत्री के आज के मणिपुर दौरे की खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री आज मणिपुर में प्रगति और शांति के लिए जोर लगायेंगे। आप समझ सकते हैं कि यह एक आशावादी शीर्षक है। दो साल से ज्यादा समय तक ऐसी कोई पहल नहीं करने के बावजूद अखबार को यह उम्मीद है और अपने पाठकों को वह यह जानकारी दे रहा है। शीर्षक में यह नहीं है कि प्रधानमंत्री दो साल बाद ऐसा कुछ कर रहे हैं जिससे अखबार को या मणिपुर में लोगों को ऐसी उम्मीद बनी है। मणिपुर दौरे से संबंधित एक फ्लैग शीर्षक है, हिंसा से प्रभावित राज्य में प्रधानमंत्री मोदी विस्थापितों से मिलेंगे। खबर में बताया गया है कि प्रधानमंत्री के दौरे की घोषणा करते हुए मणिपुर के मुख्य सचिव पुनीत कुमार गोयल ने इंफाल में कहा, …. प्रधानमंत्री का दौरा राज्य में शांति और विकास के साथ सामान्य स्थिति बहाल करने का मार्ग प्रशस्त करेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि मुख्य सचिव इसके अलावा या इससे अलग क्या कह सकते थे जो खबर बनती। अगर यह खबर है तो सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री ने यह नेक काम पहले क्यों नहीं किया या पहले जो सब करते रहे क्या वो सब इससे जरूरी थे। जो भी हो, अगर सवाल किये जाते या किये जा सकते तो निश्चित रूप से यह सब पूछा, देखा या सोचा जाता। अभी तो सिर्फ प्रचार किया जा सकता है और किया जा रहा है। लेकिन जरूरी नहीं है कि सभी अखबार ऐसा करें। जैसा मैंने पहले कहा, बहुत सारे अखबारों को यह पहले पन्ने की लीड नहीं लगी और लीड या पहले पन्ने पर नहीं है।
टाइम्स ऑफ इंडिया के शीर्षक से ही लग रहा है कि उसने इस खबर को सेकेंड लीड क्यों बनाया है या लीड क्यों नहीं बनाया है। जाहिर है कि वे समय पर जा रहे होते, हिंसा की खबर मिलते ही प्रधानमंत्री या कोई दूसरा मंत्री घटना स्थल के लिए रवाना हो जाता है तो खबर लीड होती है, हो सकती है। आज जब प्रधानमंत्री के दो साल से भी ज्यादा बाद जाने की खबर है तो यह उसी दिन जैसी नहीं हो सकती है और खबर यह है कि वे 864 दिन तो नहीं ही गये, आज उन्हें (पूरी व्यवस्था को) जाने की जरूरत लग रही है। ऐसे में यह बताना भी जरूरी है कि किस लिये जा रहे हैं। खबर का इंट्रो है, तीन उत्तर पूर्वी राज्यों में 36,000 करोड़ रुपये मूल्य की परियोजनाओं का अनावरण करेंगे। दि एशियन एज ने लिखा है, तीन दिन के उत्तर पूर्व, पश्चिम बंगाल और बिहार के दौरे के दौरान 72,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएं शुरू करेंगे। आप समझ सकते हैं कि दौरा सिर्फ मणिपुर का नहीं है, वहां की हिंसा और लोगों पर मलहम लगाने के लिए ही नहीं है। असल में बिहार और बंगाल में तो चुनाव करीब हैं, मणिपुर जाना लंबे समय से जरूरी था। इसलिए, प्रधानमंत्री अपने सभी लंबित काम निपटा रहे हैं। उनके इन कामों में भूपेन हजारिका की 100वीं जयंती पर आयोजित समारोह में भाग लेना शामिल है। अगर किसी को लग रहा है कि वे मणिपुर में हिंसा पीड़ितों से मिलने, उनके घाव पर मलहम लगाने जा रहे हैं तो ठीक ही लग रहा है। प्रधानमंत्री के बारे में जिस तरह यह प्रचारित किया गया है कि वे छुट्टी नहीं लेते हैं, रोज 18 घंटे काम करते हैं आदि उसी तरह अब यह प्रचारित किया जा सकता है कि वे एक साथ कई काम लेकर गये हैं ताकि उनकी यात्रा पर होने वाला खर्च सार्थक रहे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर के साथ एक बॉक्स में खास बातों का उल्लेख किया है। शीर्षक है, बंद की अपील। इनमें पहला बिन्दु है :
– छह प्रतिबंधित मैतेई संगठनों के समूह कॉरकॉम ने राज्यव्यापी बंद की घोषणा की
– आईएमडी ने बारिश और गरज के साथ छींटे पड़ने की भविष्यवाणी की है। इससे मौसम से संबंधित खतरा मंडरा रहा है
– 10,000 से ज़्यादा पुलिस, सीआरपीएफ, बीएसएफ, असम राइफल्स और आपदा प्रबंधन कर्मी तैनात किये गये हैं
– मोदी मिज़ोरम में 8,070 करोड़ रुपये की लागत वाले बैराबी-सैरांग रेल मार्ग का उद्घाटन करेंगे
– असम के दरंग में कई परियोजनाओं की शुरुआत करेंगे
आप समझ सकते हैं कि दौरे का उद्देश्य क्या है और आपको अगर मणिपुर जाना बताया गया है तो वह कितना सही है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर में लिखा है, मई 2023 में जातिय हिंसा की शुरुआत के बाद से यह प्रधानमंत्री मोदी की पहली राज्य यात्रा है। इसकी शुरुआत राज्य सरकार को हाईकोर्ट के आदेश के बाद हुई थी जब मैतेई को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने पर विचार करने के लिए कहा गया था। इस आदेश से संख्यात्मक रूप से प्रभावशाली मैतेई समुदाय के लोगों को आरक्षित नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का हिस्सा कम करने में मदद मिलेगी, इससे नाराज़ होकर, कुकी समुदाय ने हिंसक विरोध शुरू कर दिया। इसके परिणामस्वरूप राज्य में आग लग गई तथा एक दशक से चली आ रही शांति नष्ट हो गई। इसके बाद डबल इंजन की सरकारों ने क्या किया और क्या नहीं वह अलग मामला है। इसलिए मणिपुर दौरा खबर के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अमर उजाला में यह खबर, हिन्सा के बाद आज पहली बार मणिपुर पहुंचेंगे पीएम मोदी शीर्षक से चार कॉलम में छपी है। उपशीर्षक से खबर की गंभीरता स्पष्ट होती है, राज्य को 8500 करोड़ रुपये की सौगात देंगे, मिजोरम से शुरू करेंगे पांच प्रदेशों का दौरा। इसके साथ की एक और खबर का शीर्षक है, चुराचांदपुर और इंफाल में जानेंगे विस्थापितों का दर्द। देशबन्धु में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है।
अंग्रेजी अखबारों में कोलकाता के द टेलीग्राफ में प्रधानमंत्री के दौरे की खबर का शीर्षक है, मणिपुर ने प्रधानमंत्री से पूछा इतना लंबा समय? अखबारों ने आमतौर पर यह तो नहीं ही बताया है कि वे दो साल से भी ज्यादा समय के बाद मणिपुर जा रहे हैं। टेलीग्राफ की खबर से लगता है कि अपने अखबारों की खबरों से उसके पाठक चाहे जो समझें, जो राय बनायें प्रधानमंत्री का यह दौरा किसी हिन्सा प्रभावित क्षेत्र में लोगों की तकलीफ पर मलहम लगाने वाला तो नहीं है। भले प्रधानमंत्री के पद और उनके साथ के ताम-झाम या लावा जामा के कारण लोगों को ऐसी उम्मीद हो। इंफाल डेटलाइन से उमानंद जयसवाल की खबर के अनुसार, हवाई अड्डे से कंगला किले तक 7 किलोमीटर का रास्ता 8,500 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं का प्रचार करने वाले विशाल होर्डिंग्स से अटा पड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को अपनी चिर प्रतीक्षित मणिपुर यात्रा के दौरान इसका उद्घाटन करेंगे। इसके लिए कंगला किले के आसपास सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। मोदी आज दिन में चुराचांदपुर में अपनी जनसभा के बाद दूसरे पड़ाव पर हैं। सड़कों की सफाई की गई है, बैरिकेड्स लगाए गए हैं और शहर को एक नया रूप दिया गया है। हालाँकि, निवासियों – खासकर दो साल से चल रहे जातीय संघर्ष के कारण विस्थापित हुए लोगों – के बीच मिश्रित भावनाएँ बनी हुई हैं। कई लोगों के लिए ये विस्तृत होर्डिंग्स और सुरक्षा व्यवस्था उस दर्द और उपेक्षा के बिल्कुल विपरीत है जो उन्होंने 24 महीनों तक झेली है।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज एक महत्वपूर्ण खबर को सेकेंड लीड बनाया है। केंद्र सरकार जब विपक्ष को कमजोर करने और विपक्षी सरकारों में काबू करने के लिए एक महीने भर जमानत नहीं मिलने पर पद चले जाने का कानून बना रही है तब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि जमानत की अर्जी का निपटारा दो महीने में हो जाये। दिल्ली दंगे के आरोपियों को पांच साल से जमानत नहीं हुई है तब इस आदेश के अपने मायने हैं और जमानत नहीं होने के कारण भी विचारणीय हैं। पर वह सब मीडिया की चिन्ता का विषय नहीं है और आज इस खबर को हिन्दुस्तान टाइम्स ने अच्छी प्रमुखता दी है। यहां गौर तलब है कि केंद्र सरकार राज्यपालों के लिए भी यह अधिकार मांग रही है कि वे फैसला नहीं करें, फाइल पर बैठे रहें। दिल्ली के उपराज्यपाल को जो अधिकार दिलाये गये वो आपको याद ही होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निर्णय लेना टालना किसी भी तरह से उचित नहीं हो सकता है। यह सरकार की चाहत और कानूनी स्थिति में विरोध का बढ़िया उदाहरण है। लेकिन मोदी सरकार की नीतियों से मेल नहीं खाता है इसलिए आज खबर नहीं है और यह वैसे ही है जैसे राहुल गांधी की खबरों को प्रमुखता नहीं मिलती है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


