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आज के अखबार : नहीं समझ रहे हैं कि भारत की विदेश नीति बच्चों से ‘परीक्षा पर चर्चा’ जैसी नहीं हो सकती है

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों से लग रहा है कि बिहार चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी संकट में है और जीतने के लिए उसके पास ऑपरेशन सिन्दूर ही मजबूत’ सहारा है। पर वह भाजपा का संकट है। संपादक और लाला लोग क्यों परेशान हैं। यह परेशानी सिर्फ लालाओं की नहीं है, संपादकों की भी है और यह भी दिख रहा है। इसलिए स्थिति चिन्ताजनक है। मेरी नजर में इससे बचने का एक ही तरीका है और वह है, भारतीय जनता पार्टी के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध। कोई वरिष्ठ संपादक जब कहे कि वह नरेन्द्र मोदी का (अब भी) सम्मान करता है तो स्थिति नाजुक लगती है। अगर वे सम्मान की जगह समर्थन कहते तो मैं ऐसा नहीं कहता। मुझे लगता है कि प्रचारकों ने देश का जो हाल बनाया है और जो प्रचार कर रहे हैं उसमें देश की रक्षा के लिए सबको सच्चाई या वास्तविकता समझने की जरूरत है। अगर नरेन्द्र मोदी अभी भी देश के एक भी संपादक के लिए सम्मान के पात्र हैं तो विपक्ष के नेता का सम्मान कौन करेगा? वे तो सच ही बोल सकते हैं और जो नरेन्द्र मोदी बोलते रहे हैं वह सच भी हो तो शायद ही बोल पाएं। इसीलिए वरिष्ठ पत्रकार राकेश पाठक ने लिखा है, राहुल गांधी सात जनम मोदी जी के स्तर तक नहीं पहुंच सकते (गिर सकते)। राहुल गांधी में दम नहीं है कि किसी महिला को पचास करोड़ की गर्ल फ्रेंड कहें, किसी को बीजेपी की विधवा कहें, किसी नरेंद्र, अमित की मां को जर्सी गाय कहें..! न राहुल कभी मोदी से मुकाबला कर सकते हैं। इतने ‘काबिल’ नहीं हैं राहुल। ऐसे में नरेन्द्र मोदी को चुनाव जिताने में लगे लोगों ने आज फिर (क्रिकेट में भी ऑपरेशन सिन्दूर के बाद) ऑपरेशन सिन्दूर को याद किया है। इस पर वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन का सुझाव है, एयरफोर्स और आर्मी चीफ को कम से कम तीन सप्ताह के लिये बिहार शिफ्ट हो जाना चाहिये और ऑपरेशन सिंदूर के तमाम आयामों पर रोज़ शाम चार बजे पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी चाहिये। इससे आप समझ सकते हैं कि देश किसके लिए क्या कर रहा है या किन लोगों से कौन से काम लिए जा रहे हैं।

आइये आज के कुछ शीर्षक देख लें फिर उससे संबंधित तथ्यों की चर्चा करूंगा। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, हमने पाकिस्तान के एफ-16 व जेएफ-17 सरीखे एक दर्जन लड़ाकू विमान नष्ट किये। वायुसेना प्रमुख ने यह भी कहा है कि भारतीय विमान गिराने का पाकिस्तानी दावा मनोहर कहानिया है। गनीमत यह कि उन्होंने नहीं कहा वैसे ही है जैसे भारतीय चैनलों ने पाकिस्तान के शहरों पर कब्जे के दावे किए थे और ऐसी खबरें दी थीं। अमर उजाला में टॉप पर आज एक और खबर है। इसका शीर्षक है, दुनिया के नक्शे में रहना है तो आतंक को बढ़ावा देना बंद करे पाकिस्तान। मुझे याद आता है कि ऐसा ही कुछ पुलवामा के बाद कहा गया था। घुस कर मारा भी गया था। लेकिन हुआ क्या और होता भी क्यों जब 2014 के शपथ ग्रहण के समय नवाज शरीफ भी आमंत्रित थे। बिन बुलाये मेहनमानवाजी आपको याद ही होगी। उसी भारत ने अब अपने तब के मित्र को उसी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में (दुनिया के) भूगोल से मिटा देने की चेतावनी दी है और नवोदय टाइम्स ने लीड के रूप में खबर दी है। ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान 10 पाकिस्तानी जेट मार गिराने का दावा, आज द टेलीग्राफ में भी लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक वायु सेना के प्रमुख के ही हवाले से है। इसमें 12-13 पाकिस्तानी जेट नष्ट किए जाने की खबर लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया में अंदर के पन्ने पर 12-13 विमान डाउन करने की खबर है। पहले पन्ने की खबर और डरावनी है, दुनिया के नक्शे पर बने रहना चाहते हो तो आंतक का समर्थन करना बंद करो। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, भारतीय वायु सेना प्रमुख ने पाकिस्तान को हुए नुकसान का विवरण दिया। मुझे लगता है कि खबर के लिहाज से यह शीर्षक ठीक हो सकता है लेकिन बाकी कई अखबारों ने तो आज हद कर दी है। द हिन्दू में वायु सेना, ऑपरेशन सिन्दूर, पाकिस्तानी विमान पहले पन्ने पर नहीं है। दि एशियन एज में भी वायु सेना प्रमख, ऑपरेशन सिन्दूर, पाकिस्तानी विमान पहले पन्ने पर नहीं है।

कहने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान को दुनिया के नक्शे से मिटा देने की चेतावनी उसे इस आश्वासन के बाद दी गई है कि हम सिर्फ आतंकी ठिकानों पर हमला करेंगे। इसे अब जीता हुआ युद्ध कहा जा रहा है। वह भी तब जब पाकिस्तान जम्मू में जान-माल का भारी नुकसान करने में सफल रहा था और भारत उसकी चर्चा नहीं करता है। कुल मिलाकर, ऑपरेशन सिन्दूर युद्ध था जो अमेरिकी राष्ट्रपति के दावे के अनुसार उनकी पहल पर रुका या युद्ध विराम हुआ। सार्वजनिक चुनौती के बावजूद नरेन्द्र मोदी ने यह नहीं कहा है कि ट्रम्प का दावा झूठा है। फिर भी क्रिकेट में ऑपरेशन सिन्दूर होना बताया गया और माहौल वहां भी खराब हो गया है। इससे पहले कि आज के कुछ और दावों तथा चेतावनियों को सत्य के तराजू पर कसूं, आइये देखें कि करुर हादसा दिल्ली के हिन्दी अखबारों में भी क्यों कई दिनों तक पहले पन्ने पर रहा। इसका अंदाजा आज इंडियन एक्सप्रेस की खबर से लग रहा है और यही अंदेशा मैं पहले दिन से जता रहा हूं। अखबार ऐसा किसी के आदेश पर डर से, दबाव में या लालच के कारण कर रहे हों तब भी ठीक नहीं है। अगर अखबार के लोगों को भाजपा हित में ही देश हित लगने लगा है तो वह और चिन्ताजनक है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर के अनुसार, करुर की भगदड़ में 41 लोगों की मौत के बाद अभिनेता से नेता बने विजय दबाव में हैं। भाजपा को तमिलनाडु में मौका नजर आ रहा है। उनसे संचार की लाइन शुरू की है। भगदड़ की राजनीति और मौत के सौदे की इन कोशिशों के बीच द हिन्दू की एक खबर बताती है कि मद्रास हाईकोर्ट ने करुड़ भगदड़ की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया है।

आज एक दिलचस्प खबर पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के दमनकारी रवैए की है। अमर उजाला की खबर के अनुसार भारत ने कहा है कि प्रदर्शनकारियों पर क्रूरता के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया जाए। मुझे लगता है कि 370 हटाने के बाद सोनम वांगचुक का रुख, उनकी मांग और आंदोलन, उससे भारत सरकार का प्रेम और फिर भाजपा दफ्तर जला दिए जाने का आंदोलन, पुलिस की गोलियों से मौत और फिर सोनम वांगचुक के साथ जो किया गया, उनकी पत्नी ने जो चिट्ठी लिखी और फिर सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा – लिखने और पढ़ने के लिए आज की इस खबर से ज्यादा दिलचसप होता लेकिन स्वतंत्र मीडिया पर ज्ञान का यह बोझ कौन लाद सकता है। एआई के जमाने में जब संपादकों की समझदारी और बौद्धिकता से संबंधित सवाल रोज सामने आते हैं तो ऑपरेशन सिन्दूर के प्रचार और सेना प्रमुख के दावों से निकला एक अच्छा शीर्षक दि एशियन एज में है। खबर के अनुसार, सेना प्रमुखों ने कहा है कि पाकिस्तान के अंदर घुसकर आतंकी ठिकानों पर हमला किया जा सकता है। सच यह है कि इसके बावजूद पुलवामा का पता नहीं चला, पहलगाम पर युद्ध विराम हो गया। वैसे, खबर तो आज यह थी कि लेह के स्कूल, दुकानें आदि नौ दिन बाद खुलीं। टाइम्स ऑफ इंडिया के जरिए सेना प्रमुख ने पाकिस्तान से यह जरूर कहा है कि वह आतंकवाद का समर्थन करना छोड़े। सच्चाई यह है कि हम समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट के दोषियों का पता नहीं लगा पाए या जो दोषी मिले थे उन्हें सजा नहीं हुई। ऐसा ही मालेगाव ब्लास्ट में हुआ। एक आरोपी को तो दोष मुक्त होने से पहले जनता ने सांसद बना दिया था।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली दंगों को अब पाँच साल हो रहे (चुके) हैं। इस दौरान कुछ लोगों की ज़िंदगी में बहुत कुछ बदल गया है। हिंसा के आरोप में कई लोग जेलों में बंद हैं, तो कई महीनों जेल में रहने के बाद बरी हो चुके हैं। पुलिस में दंगों से जुड़े 758 एफ़आईआर दर्ज़ हुए थे। अब तक जितनों में फ़ैसला आया है, उनमें 80% से ज़्यादा मामलों में लोग बरी या डिस्चार्ज हो रहे हैं। हमें 20 ऐसे मामले मिले जिनमें लोगों को दोषी पाया गया और 106 मामलों में लोगों को बरी या डिस्चार्ज कर दिया गया। इससे आप समझ सकते हैं कि देश में हालात कैसे हैं और उसकी जो रिपोर्ट हो रही है वह अपनी जगह है। बीबीसी या पत्रकारिता और पत्रकारों के साथ सरकार ने जो किया है वह बहुत कुछ कहता है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected] के ज़रिए किया जा सकता है।

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