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भावनाएं सिर्फ अपनी नहीं, दूसरों की भी आहत होती हैं, स्पष्टीकरण के बावजूद ‘आहत’ रहना जबरदस्ती है

आज के अखबार (10.10.2025) – दो  

संजय कुमार सिंह

इसलिए अखबारों की जिम्मेदारी कितनी बड़ी है, बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी और बताया जाए तो उसे भी नहीं सुना जाए या समझ में ही नहीं आए तो स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। आज पहली किस्त में दो खबरों की बात कर चुका और इसमें मुख्य न्यायाधीश पर हमले से जुड़ा यह शर्मनाक तथ्य है कि सरकार के समर्थक और प्रचारक यह माने बैठे हैं कि सीजेआई ने जो कहा उससे उनकी भावनाएं आहत होना सामान्य है और आहत भावनाओं के साथ वे कुछ भी कर सकते हैं, उन्हें सरकार का संरक्षण मिल जाएगा। एक प्रचारक पत्रकार को शिकायत है कि कर्नाटक और पंजाब में एफआईआर लिखी जा रही है और यह सत्ता में होने का दुरुपयोग है। मैं भी इसे दुरुपयोग ही मानता हूं लेकिन इसकी स्थिति या मजबूरी इसलिए आई कि दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई नहीं की और समर्थक प्रचारक बाकायदा लोगों को गाली देते रहे।

दूसरी ओर, भाजपा के लोग ऐसा खूब करते रहे हैं और आम कांग्रेसी या सरकार विरोधी को तो छोड़िए राहुल गांधी की संसद सदस्यता जिस मामले में गई थी वह दूसरे राज्य का मामला दूसरे राज्य में सुना गया था और फैसला जो था सो था ही – सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया। उसी सुप्रीम कोर्ट ने जिसने अरविन्द केजरीवाल, हेमंत सोरेन को जमानत नहीं दी, सिद्दीक कप्पन को महीनों जेल में रहना पड़ा लेकिन अर्नब गोस्वामी को हफ्ते भर में जमानत दे दी थी। सब होने के बाद भी दिल्ली दंगे के कई आरोपी पांच साल से भी ज्यादा समय से जमानत के इंतजार में हैं। ठीक है कि कानून का मामला है और समझना आसान नहीं है या सबके बूते का नहीं हो लेकिन दबाव तो दिख रहा है। वह मुख्य न्यायाधीश के घर जाकर पूजा करने और पहले या बाद में ऐसा नहीं करने से तो समझ में आ ही जाएगा। इसी तरह, मुख्य न्यायाधीश की मां को किसी आयोजन में भले उनकी अपनी योग्यता और क्षमता के लिए ही बुलाया जाए, उसके पहले और बाद में जो सब होगा उससे स्थिति समझ में आ ही जाएगी। दूसरी तरफ मीडिया के मुद्दे अलग और अपने होते हैं जो सरकार और उसके काम का प्रचार ही होता है। इसमें हमेशा प्रचार किया जाए और पहले के कहे-लिखे को याद नहीं रखा जाए तो पुराने अखबार रहते ही हैं। जरूरत पड़ने पर मिलाकर पुष्टि की जा सकती है या संतुष्ट हुआ जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने जो कहा उससे अलग रिपोर्टिंग और उसके लिए सब कुछ होने के बावजूद पी चिदंबरम के साथ वही हुआ। इसपर मैं कल यहां लिख चुका हूं लेकिन आज उसपर खबर कहां है? अखबारों का काम था कि वे चिदंबरम के कहे को भी उतनी ही प्रमुखता देते जितनी कल प्रधानमंत्री के कहे या सवाल को दी थी। आज यह खबर देशबन्धु में पहले पन्ने पर है। फ्लैग शीर्षक है, प्रधानमंत्री के बयान पर चिदंबरम का पलटवार। मुख्य शीर्षक है, मोदी (जी) ने जो बातें की, वे पूरी तरह गलत। देशबन्धु ने इस खबर के साथ मुख्य न्यायाधीश वाली खबर को भी बराबर में छापा है।

कहने की जरूरत नहीं है कि अखबार अमूमन भाजपा के पक्ष में काम करते हैं और इसके लिए बयान को तोड़ मरोड़ कर छापना शामिल है। पलटवार तो भाजपा नेताओं और सरकार का ही छपता है। स्थिति यह है कि हमला या विरोध तो विपक्ष के नेता का भी नहीं छपता है और जो हो रहा है वह सब दिख रहा है। इस अंधेरगर्दी का आलम यह है कि पी चिदंबरम ने मुंबई हमले के समय जो हुआ – का वर्णन पहलगाम हमले के बाद की स्थिति से तुलना करने के लिए किया होगा लेकिन कल के बच्चे और रिपोर्टर भी चिदंबरम की राजनीति या उनकी राजनीतिक समझ पर उंगली उठाने लगे। इसमें ना तो मुख्य न्यायाधीश के बयान को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया या स्थिति स्पष्ट की और ना चिदंबरम के बयान को लेकर। इसमें प्रधानमंत्री से लेकर आम प्रचारक तक फंसे और भाजपा भले अपने लोगों को बचा ले लेकिन जो नुकसान हो रहा है वह कम नहीं है। फिर भी आज एसआईआर पर खबर नहीं है तो वह चिन्ता की बात है। खबर का शीर्षक है, एसआईआर की कार्रवाई को चुनौती देने के लिए मुफ्त कानूनी सहायता। खबर इस प्रकार है, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को निर्देश दिया कि बिहार की अंतिम मतदाता सूची से बाहर रखे गए अनुमानित 3.66 लाख लोगों को चुनाव आयोग के समक्ष अपनी अपील दायर करने के लिए निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान की जाए। इसने कहा कि चुनाव आयोग अपीलों पर विचार करते हुए एक “तर्कसंगत आदेश” पास करेगा। शीर्ष अदालत ने बिहार विधिक सेवा प्राधिकरण को जन जागरूकता के लिए, प्रत्येक जिले, तालुका और गाँव में पैरालीगल स्वयंसेवकों और निःशुल्क कानूनी सहायता परामर्शदाताओं के मोबाइल नंबर और अन्य संपर्क विवरण पुनः अधिसूचित करने को कहा है। पैरालीगल स्वयंसेवकों और निःशुल्क कानूनी सहायता परामर्शदाताओं को ब्लॉक स्तर के अधिकारियों से संपर्क करना होगा और अपील दायर करने के लिए बाहर रखे गए मतदाताओं का विवरण एकत्र करना होगा। अपील की पूरी प्रक्रिया निःशुल्क होगी।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह निर्देश देते हुए कहा कि बिहार में विधानसभा चुनावों (6 और 11 नवंबर को) की घोषणा के साथ समय कम होता जा रहा है। अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और कई राजनीतिक दलों, राजनेताओं और व्यक्तियों द्वारा दायर कई याचिकाओं में बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को अवैध और असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी गई है। इसमें तर्क दिया गया है कि नागरिकता के दस्तावेज़ी प्रमाण की मांग करने वाली यह प्रक्रिया बड़ी संख्या में गरीब, हाशिए पर पड़े और कम पढ़े-लिखे लोगों को मताधिकार से वंचित कर देगी। बुधवार को एक हलफनामे में, चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि यह सुनिश्चित करना संवैधानिक रूप से उसका दायित्व है कि केवल भारतीय नागरिकों को ही मतदान का अधिकार मिले। इसमें यह भी कहा गया है कि आधार नागरिकता या अधिवास (किसी राज्य में निवास) का प्रमाण नहीं है। 8 सितंबर को, सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को एसआईआर के लिए पहचान के प्रमाण के रूप में आधार कार्ड को स्वीकार करने का निर्देश दिया था। चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा है कि उसने “उपरोक्त निर्देशों के अनुपालन में, 9 सितंबर को बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को निर्देश जारी किए थे” कि “सूचीबद्ध 11 दस्तावेजों के अलावा आधार कार्ड को 12वें दस्तावेज के रूप में माना जाएगा”। इसमें आगे कहा गया है कि आधार को “नागरिकता के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार और उपयोग किया जाएगा”। यह भी कि, “आयोग अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेत है कि मतदाता सूची की शुद्धता और अखंडता बनी रहे और केवल अनुच्छेद 326 के अनुसार पात्र व्यक्ति, अर्थात 18 वर्ष की आयु के, भारत के नागरिक और निवास की आवश्यकता को पूरा करने वाले, मतदाता सूची में नामांकित हों।” एक अन्य हलफनामे में, चुनाव आयोग ने देश भर में एसआईआर करने के अपने इरादे की पुष्टि की है और कहा है कि देश के बाकी हिस्सों के लिए एसआईआर के आयोजन का कार्यक्रम यथासमय अलग से जारी किया जाएगा।

मतदाता सूची को शुद्ध करने निकलने चुनाव आयोग ने भाजपा के चुनाव जीतने की व्यवस्था कर दी है। ऐसा सुप्रीम कोर्ट को झांसे में रखकर की हो या सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार किया हो – मुद्दा वह नहीं है। सच्चाई यह है कि वोट चोरी की शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। बिहार के लाखों मतदाताओं के मताधिकार पर बुलडोजर चला दिया गया है। एसआईआर ने बिहार में वोटर लिस्ट को बेहतर बनाने के बजाय देखकर भी मक्खियां निगल रहा है और दूसरों को भी मजबूर कर दिया है। वोट चोरी के आरोपों और राहुल गांधी के खुलासों से यह स्पष्ट है कि भाजपा ने महाराष्ट्र का चुनाव फर्जी वोट से जीता है तो बिहार में जीतने के लिए उसे मतदाता कम करने थे। एसआईआर ने वही किया है। यह तथ्य है कि मतदाताओं की संख्या वयस्क आबादी से कम है और चुनाव आयोग ने नहीं कहा है कि वे घुसपैठिए हैं, विदेशी हैं या रोहिग्या हैं। ऐसे में चुनाव आयोग आम निवासी को वोटर बनाने के अपने मूल काम से चूक गया है। मतदाता पहचान पत्र बनाना – चुनाव आयोग का काम तो बाद में हुआ और यह तब की बात है जब आधार नहीं था। मतदाता या नागरिकों को एक पहचान पत्र की जरूरत थी इसलिए आधार आया और वह निश्चित रूप से मतदाता पहचान पत्र के मुकाबले, पहचान का बेहतर दस्तावेज है भले नागरिकता का पहचान नहीं हो। चुनाव आयोग ने नागरिकों को ही मतदाता बनाने के जबरदस्ती प्राप्त किए अधिकार के तहत आम निवासियों को मतदाता बनाने की अपनी जिम्मेदारी छोड़ दी है और जो मतदाता सूची बनाई है उसमें तमाम गलतियां-खामियां हैं। उसपर चुनाव आयोग का जवाब तो नहीं ही है, मीडिया ने उसकी जांच करने की जरूरत ही नहीं समझी। विपक्ष को मांगने पर डिजिटल वोटर लिस्ट नहीं दे रहा है और राजनीतिक दलों को धमका रहा है कि, बिहार चुनाव में एआई का गलत इस्तेमाल नहीं चलेगा (देशबन्धु)। इस डिजिटल भारत में जनगणना नहीं हुई है लेकिन मतदाता सूची का शुद्धिकरण होगा, आधार को नहीं माना जाएगा क्योंकि सत्तारूढ़ दल यही चाहता है।  

सुप्रीम कोर्ट ने जब हटाए गए मतदाताओं को मुफ्त कानूनी सहायता देने की बात की है तो चुनाव आयोग ने बताया है और देशबन्धु ने प्रमुखता से छापा है कि बिहार में करीब 8.5 लाख चुनाव अधिकारी तैनात किए जाएंगे। जब चुनाव निष्पक्ष होते या माने जाते थे – तब इस सूचना का मतलब था अब इसका क्या महत्व जब दिख रहा है कि चुनाव आयोग सरकार या सत्तारूढ़ दल के पक्ष में न सिर्फ झुका हुआ है, बल्कि सेवा कर रहा है। (समाप्त)

पहला पार्ट पढ़ें – आज के अखबार : बता रहे हैं कि वोट चोरी को गंभीरता से नहीं लेते और जो चल रहा है वह ‘सामान्य’ है

लिंक – https://www.bhadas4media.com/bata-rahe-hain-ki-vote-chori-ko-gambhirta-se-nahee/

लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected] के ज़रिए किया जा सकता है।

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