संजय कुमार सिंह
देश के प्रधानमंत्री 11 साल से प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं, सरकारी खर्च पर ‘मन की बात’ करते हैं। अब दिल्ली में तालिबानी प्रेस कांफ्रेंस हुआ, उसमें महिलाओं को शामिल नहीं होने दिया गया। इसका विरोध हुआ पर खबर दिल्ली के अखबारों में ढूंढ़नी पड़ रही है। सरकारी पार्टी, उसकी ट्रोल सेना और प्रचारकों ने सवाल उठाने वालों को उलटे-सीधे जवाब दिए। कुतर्क किया, पुराने मुद्दे उठाए, जवाब भी पाया लेकिन प्रत्यक्ष व परोक्ष ढंग से महिलाओं को नहीं बुलाने का बचाव किया। एक्स पर प्रधानमंत्री से सीधे पूछे गए राहुल गांधी का जवाब विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दिया। इसे बहुत सामान्य बताया क्योंकि यह दूतावास में हुआ था और राहुल गांधी की राजनीति की जरूरत बताया जबकि भाजपा के आईटी सेल प्रमुख ने 2012 में जो ट्वीट किया था वह भी निकल आया। इसमें लिखा था, तालिबान के भारत की प्रशंसा की। कांग्रेस की विदेश नीति की एक और उपलब्धि (अंग्रेजी के ट्वीट का अनुवाद)। अब स्थिति यह है कि अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद भारत ने संबंध तोड़ लिए थे। दूतावास बंद हो गए थे और भारत ने तालिबान को मान्यता नहीं दी। कल के अखबारों में खबर थी कि कि अफगानिस्तान के तालिबानी विदेश मंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस की और बताया कि अफगानिस्तान भारत में अपने दूतावास फिर से शुरू करेगा। भारत तालिबान को मान्यता नहीं देता है लेकिन प्रेस कांफ्रेंस हुई। विदेश मंत्री दिल्ली आए, देवबंद भी गए और प्रेस कांफ्रेंस में महिलाओं को आने से मना कर दिया। विरोध करने वालों से कहा गया कि दूतावास में था इसलिए सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। जाहिर है, यह सब बड़ी खबर है। आज अखबारों में प्रमुखता से होनी चाहिए थी। लेकिन ढूंढ़नी पड़ रही है। कुल मिलाकर भारत में तालिबानी प्रेस कांफ्रेंस की खबर को भी प्रमुखता नहीं मिली और यह भारत में मीडिया को वाच डॉग से लैप डॉग बनाने की एक उपलब्धि है। इसे आप अमृतकाल की पत्रकारिता और भ्रष्टाचार मुक्त शासन में हुआ विकास भी कह सकते हैं। हालांकि, यह सब अलग मुद्दा है।
आज यह खबर देशबन्धु में लीड है। शीर्षक है, “नारी शक्ति के नारे खोखले : राहुल”। इस खबर का हाईलाइट किया हुआ हिस्सा है – महुआ मोइत्रा, प्रियंका गांधी और पी चिदंबरम ने भी सरकार को घेरा। एक खबर यह भी है, “महिला पत्रकारों की ‘नो एंट्री’ पर भड़कीं तस्लीमा नसरीन”। अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स की भी यही स्थिति है। हिन्दी के इन दोनों अखबारों में दिल्ली में हुई तालिबानी प्रेस कांफ्रेंस में महिलाओं को प्रतिबंधित करने की खबर तो नहीं है लेकिन पश्चिम बंगाल में मेडिकल छात्रा से समूहिक दुष्कर्म की खबर है। उत्तर प्रदेश में पुलिस अत्याचार, दंबगई, बुलडोजर न्याय और दलितों की हत्या-अपमान की खबरें भले दिल्ली में पहले पन्ने पर न हो पश्चिम बंगाल की जरूर होती है। कोलकाता से छपने वाले द टेलीग्राफ में आज दोनों खबरें हैं। मेडिकल छात्रा से बलात्कार की खबर तो है ही, भारत में तालिबानी आदेश लागू होने की खबर भी उसी प्रमुखता से है और यह पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन होने के बावजूद है। यही नहीं, टेलीग्राफ ने कल की मूल खबर में लिखा था कि प्रेस कांफ्रेंस में महिलाएं नहीं थीं। दिल्ली के मेरे अखबारों में आज इंडियन एक्सप्रेस के अलावा दि एशियन एज में यह खबर पहले पन्ने पर है। यह खबर असल में महिलाओं को प्रेस कांफ्रेंस में नहीं आने देने या बुलाने के खिलाफ तथा इस शर्त पर प्रेस कांफ्रेंस होने या होने देने से संबंधित होनी चाहिए थी। जैसे इंडियन एक्सप्रेस में है।
दि एशियन एज में यह खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। शीर्षक है, तालिबान की प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकारों की अनुपस्थिति पर विवाद। उपशीर्षक है – राहुल, प्रियंका ने प्रधानमंत्री पर हमला किया। दूसरा उपशीर्षक इसका जवाब है, विदेश मंत्रालय ने कहा, उसकी कोई भागीदारी नहीं है। वैसे तो यह और गंभीर बात है कि विदेश मंत्रालय की जानकारी या भागीदारी के बिना तालिबानी विदेशमंत्री ने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर ली लेकिन जिम्मेदारी से भागने का यह भाजपाई रवैया है। मेरी चिन्ता भाजपा की राजनीति से ज्यादा आज की पत्रकारिता है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी तालिबानी प्रेस कांफ्रेंस की खबर तो नहीं है लेकिन पश्चिम बंगाल के कॉलेज में छात्रा से बलात्कार की खबर दो कॉलम में है। द हिन्दू में तालिबानी मंत्री के हवाले से खबर है कि भारत अफगानिस्तान के संबंध आने वाले दिनों में और बढ़ेंगे। इसके साथ छोटी सी सूचना है कि महिला पत्रकारों की अनुपस्थिति पर विवाद छिड़ गया है और विस्तृत खबर पेज सात पर है। इंडियन एक्सप्रेस ने पूरी खबर पहले पन्ने पर पांच कॉलम की लीड के साथ बराबर तीन कॉलम में दी है। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, देवबंद में मीडिया मीट रद्द कर दी गई। मुख्य शीर्षक है, तालिबान टीम ने महिलाओं को बाहर रखा, दूतावास परिसर ने कवच का काम किया। सूत्रों के हवाले से उपशीर्षक है, विदेश मंत्रालय ने मौजूदा कर्मचारियों के भरोसे मुत्ताकी को दूतावास में प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन करने दिया।
इस खबर के साथ एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड का शीर्षक है, महिलाएं बेड़ियों में। इसमें कहा गया है, 2021 में काबुल की सत्ता में वापसी के बाद से, तालिबान ने महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों को सीमित करने वाले 100 से ज़्यादा फ़तवे जारी किए हैं: उन्हें उच्च शिक्षा और काम से प्रतिबंधित किया गया है; सार्वजनिक स्थानों पर जाने पर प्रतिबंध लगाया गया है। पुरुष अनुरक्षकों के बिना उनकी यात्रा पर भी प्रतिबंध है; यहाँ तक कि उनके घरों के अंदर से गाने या ज़ोर से पढ़ने पर भी रोक है। ऐसे तालिबानी सत्ता से संबंध तोड़ चुकी हमारी सरकार अब उसे मान्यता दिए बगैर संबंध फिर से बहाल करने की ओर अग्रसर है और संभव है, यह सब विरोध का स्तर देखने के लिए हो। लेकिन वह अलग मुद्दा है और खबर तो होनी ही चाहिए थी। इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर के अनुसार, भारतीय दौरे पर आए तालिबानी प्रतिनिधिमंडल ने तय किया था कि शुक्रवार को मीडिया ब्रीफिंग में महिलाओं को शामिल नहीं किया जाए। (दूतावास के) मौजूदा कर्मचारियों ने इसका जोरदार विरोध किया था। विवाद के केंद्र में प्रेस कांफ्रेंस की जगह है जो शांतिपथ स्थित दूतावास में हुई और राजधानी के चाणक्यपुरी क्षेत्र में है। इस समय इसके लगभग 23 कर्मचारी हैं। इनमें छह अफ़ग़ान हैं और ये सभी पूर्ववर्ती शासन, राष्ट्रपति अशरफ़ गनी के नेतृत्व वाले इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे अगस्त 2021 में देश छोड़कर भाग गए थे। अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री और तालिबान नेता अमीर ख़ान मुत्ताकी के गुरुवार के दौरे से पहले, इन कर्मचारियों ने चार्ज डी’अफ़ेयर्स (सीडीए) सैयद मोहम्मद इब्राहिमखिल, जो पूर्ववर्ती शासन के प्रतिनिधि भी हैं, से अनुरोध किया कि वे वहाँ तालिबान की ब्रीफ़िंग आयोजित न होने दें।
एक सूत्र ने कहा, “हमें पता था कि वे इस दूतावास को अमीरात (तालिबान इसे अमीरात कहता है, गणराज्य नहीं) घोषित करना चाहेंगे, हमारा झंडा उतारकर अपना झंडा लगाना चाहेंगे और महिलाओं को वहाँ प्रवेश नहीं देंगे… इसलिए हम दूतावास में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने के कदम का विरोध कर रहे थे और इसके बजाय, एक पाँच सितारा होटल का सुझाव दिया था जहाँ तालिबान प्रतिनिधिमंडल ठहर रहा है।” विदेश मंत्रालय ने शनिवार को कहा कि प्रेस वार्ता में उसकी “कोई भागीदारी” नहीं थी और कुछ अधिकारियों ने दावा किया कि उन्होंने अफ़ग़ान पक्ष को यह सुझाव भी दिया था कि महिला पत्रकारों को भी आमंत्रित किया जाना चाहिए। लेकिन एक अधिकारी ने बताया कि विदेश मंत्रालय ने सीडीए से “सहयोग करने और तालिबान को दूतावास में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने देने” का अनुरोध किया है। चूँकि यह आयोजन दूतावास में हुआ था, न कि किसी बाहरी निजी परिसर में, इसलिए तालिबान ने वियना संधि के तहत संरक्षित दूतावास की राजनयिक पवित्रता का इस्तेमाल महिलाओं को बाहर रखने के लिए किया। एक सूत्र ने कहा, “इससे उन्हें उन लोगों को अंदर आने से रोकने की छूट मिल गई जिन्हें वे अंदर नहीं आने देना चाहते थे। शुरुआत में, 12 लोग थे, और बाद में इसे 16 लोगों तक कर दिया गया – सभी पुरुष।” टाइम्स ऑफ इंडिया में ना तो तालिबानी प्रेस कांफ्रेंस में महिलाओं को नहीं बुलाने की चर्चा है और न ही पश्चिम बंगाल में छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म की।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


