संजय कुमार सिंह
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एकता दिवस पर जो कहा वह कल के अखबारों में प्रमुखता से छपा था। प्रधानमंत्री ने 1947 की बात 2025 में कही, 11 साल तक देश का प्रधानमंत्री रहने के बाद की। इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से उनकी दोस्ती रही, आईएसआई का भारत दौरा हुआ, पुलवामा हुआ, बालाकोट हुआ, पहलगाम और ऑपरेशन सिन्दूर हुआ, अचानक युद्ध विराम हुआ, उसपर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्र्म्प का दावा और राहुल गांधी की चुनौती है लेकिन मीडिया में यह सब कुछ भी मुद्दा नहीं है। ऐसे में प्रधानमंत्री ने जो कहा और कल जैसे छपा उसपर क्रिया-प्रतिक्रिया होनी नहीं थी आज अखबारों में पहले पन्ने पर कुछ है नहीं लेकिन रेखांकित करना तो बनता है। आश्चर्यजनक रूप से आंध्रप्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के काशीबुग्गा स्थित वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में भगदड़ मचने से नौ लोगों की मौत की खबर आज द टेलीग्राफ और दि एशियन एज को छोड़कर मेरे बाकी सात अखबारों में लीड है। भगदड़ में मौत की खबर के साथ हेडलाइन मैनेजमेंट होता रहा है। दो मामलों में सुप्रीम कोर्ट का दो तरह का फैसला है। कुम्भ के दौरान नई दिल्ली स्टेशन पर हादसे की खबर को अंगभीर बनाने के लिए लाखों का मुआवजा नकद बांट दिया गया था। कुम्भ में मौत की खबरें पूरी तरह दबाई और छिपाई गईं। धीरे-धीरे बाहर आईं, पता नहीं अभी कितनी दबी पड़ी हैं। करुर हादसे की खबरों को खूब तूल दिया गया। तब राज्य सरकार ने कहा था कि भीड़ और रैली से निपटने के एसओपी बनने तक अब राज्य में रैली की अनुमति नहीं दी जाएगी और पहले के हादसों के मद्देनजर यह नियम तो बन ही जाना चाहिए था कि जहां भीड़ होती है वहां विशेष चौकसी बरती जाए और भीड़ न होने दी जाए। पता नहीं ऐसा कुछ हुआ या नहीं लेकिन आंध्रप्रदेश में नौ लोगों की मौत की खबर दिल्ली के अखबारों में लीड है। यह हेडलाइन मैनजमेंट, पत्रकारिता के नियम का पालन न होने और आज दूसरी कोई खबर नहीं होने जैसे कारणों से हो सकता है। बाकी के बारे में मैं नहीं जानता लेकिन खबरों की बात तो करनी ही है।
आज जो खबरें लीड बन सकती थी उनमें पहली तो प्रधानमंत्री के दावे की चर्चा है ही, मुंबई में वोट चोरी पर कल एक बड़ी रैली हुई वह भी लीड हो सकती थी (देशबन्धु)। सरकार के प्रचार वाली खबर को ही लीड बनाना था तो बिहार में दुलारचंद की हत्या के मामले में जदयू के उम्मीदवार अनंत सिंह की गिरफ्तारी की खबर भी लीड हो सकती थी (अमर उजाला) जीएसटी की दर कम किए जाने के बावजूद जीएसटी संग्रह 1.96 लाख करोड़ हुआ भी बड़ी खबर है (नवोदय टाइम्स)। द हिन्दू में आज एक और खबर रेखांकित करने योग्य है। इस खबर के अनुसार, लखनऊ अब यूनेस्को का ‘रचनात्मक पाक कला वाला शहर’ बन गया है। लखनवी स्ट्रीट फूड में टुंडे कबाब भी एक है। प्रधानमंत्री हाल में छठ को यूनेस्को की सूची में शामिल करवाने के लिए प्रयास करने का दावा कर रहे थे और जाहिर है, बिहार में चुनाव छठ के मौके पर होने के कारण छठ के नाम पर वोट बटोरने की कोशिश कर रहे थे पर काम टुंडे कबाब का हो गया है। इसलिए यह महत्वपूर्ण खबर है। लेकिन पत्रकारिता के नियमों और आदर्शों की जब दशा ही बुरी है तो इसे रेखांकित ही किया जा सकता है। भगदड़ में मौत के अलावा जो दो खबरें लीड हैं उनमें एक द टेलीग्राफ में बिहार चुनाव की खबर है। इसका मुख्य शीर्षक है, डॉन की छत्रछाया में चुनाव। फ्लैग शीर्षक है, जंगल राज की सीट के लिए संघर्ष में गैंगस्टर-राजनेता अनंत सिंह ने मोदी के साथ पोस्टर की जगह साझा किया।
डॉन की छत्रछाया में चुनाव

जेपी यादव की इस तस्वीर का कैप्शन है – मोकामा में जेडीयू उम्मीदवार अनंत सिंह के चुनाव कार्यालय के प्रवेश द्वार पर शनिवार को एक अस्थायी गेट। इस पर गैंगस्टर-राजनेता अनंत सिंह, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरें लगी हैं।
दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है – प्रधानमंत्री ने कहा, किसी भी वैश्विक संकट पर प्रतिक्रिया करने में भारत हमेशा पहला होता है। इसपर मुझे भारत में कोविड की शुरुआत से पहले राहुल गांधी की चेतावनी की याद आई और लगा कि (मोदी शासन में) भारत अपने मामले में पीछे ही नहीं रहता है, ताली-थाली बजवा कर संकट से निपट भी पाता है। हालांकि, कल ही मैंने एक वीडियो देखा जिसमें एक युवक कह रहा था, पोलियो को जड़ से मिटाने की जगह अगर ताली-थाली बजवाई गई होती तो आधे से ज्यादा अंधभक्त कुरकुरे की तरह टेढे़-मेढे़ पैदा होते। जो नहीं जानते उन्हें पता करना चाहिए कि पोलियो को दुनिया भर से खत्म करने के लिए कितना बड़ा अभियान कैसे-कितने समय तक चला था। हालांकि यह अलग मुद्दा है लेकिन प्रधानमंत्री का दावा दिलचस्प है। छत्तीसगढ़ में नई असेम्बली बिल्डिंग का उद्घाटन करते हुए मोदी ने यह भी कहा कि भारत जल्दी ही लाल आतंक (नक्सलियों) से मुक्त हो जाएगा। यह अलग बात है कि वे भगवा आतंक के बारे में नहीं बोलते हैं और कश्मीर में आतंकवाद को खत्म करने के दावे के बाद पहलगाम हुआ। नाम पूछकर मारे जाने का प्रचार होता रहा बदला लेने वाले अभियान का नाम ऑपरेशन सिन्दूर रखा गया और इससे पहले ट्रेन में भी धर्म देखकर मारा गया था उसे भुला दिया गया।
इंडियन एक्सप्रेस ने आज पहले पन्ने की खबर से बताया है कि जीएसटी की दर कम किये जाने और (त्यौहारों के समय) बचत उत्सव के कारण बैंक का कर्ज दूना हो गया क्योंकि ऑटो, व्हाइट गुड्स, आवास की मांग सितंबर-अक्तूबर में दूनी हो गई। इस खबर के साथ नवोदय टाइम्स की खबर महत्वपूर्ण है। इसके तथ्यों की जांच इन दावों के साथ की जानी चाहिए कि तैयार उत्पाद पर जीएसटी कम हुआ है तो उसे बनाने में लगने वाले कच्चे माल पर जीएसटी बढ़ गया है और लाभ असल में कुछ नहीं होने वाला है। जो भी हो, खबर तो होनी ही चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया में बिहार चुनाव पर भाजपा नेता, राज्य चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान के हवाले से कहा गया है कि बिहार चुनाव में टक्कर कड़ी है, लेकिन राजग जीतेगा। यह स्वीकारोक्ति तब आई है जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार मोदी-शाह से अलग हो गए लगते हैं और इसपर मुख्यधारा की मीडिया में कोई खबर होती नहीं है। मुझे जनतादल एकीकृत के ट्वीटर हैंडल पर एक पोस्टर मिला जो चर्चा में है। इसमें कहा गया है, 13 दिनों बाद फिर लौटेगी नीतीश सरकार। भले इसमें नहीं कहा है पर इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है, इनकी तेरहवीं कर फिर लौटेगी नीतिश सरकार। बिहार में एक और पोस्टर घूम रहा है। इसमें भी लिखा है – 25 से 30 फिर से नीतिश। एक पोस्टर और है, हालांकि वह पुराना है फिर से घुमाया जा रहा है – नीतिश सबके हैं। इससे लगता है कि नीतिश भाजपा से अलग हो चुके हैं और इसका असर, बिहार चुनाव के बाद केंद्र सरकार पर भी पड़ सकता है। अभी यह खबर भले नहीं है पर ऐसी भी नहीं है कि इसकी चर्चा नहीं की जाए।
हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर सीटों के बंटवारे को लेकर राहुल तेजस्वी के बीच बढ़ते तनाव की खबर है। एक खबर और है जो बताती है कि बिहार के बाद देश के 12 राज्यों में घोषित एसआईआर के लिए बंगाल में बूथ स्तर के कर्मचारियों ने केंद्र सरकार की सुरक्षा मांगी है। अगर चुनाव आयोग का काम जनता को अपने हित में होता लगता तो कर्मचारियों को सुरक्षा की जरूरत क्यों होती। और केंद्रीय सुरक्षा मांगने का मतलब है कि कर्मचारी जानते हैं कि वे केंद्र सरकार के लिए काम कर रहे हैं, जनता के लिए नहीं। जाहिर है, कर्मचारियों को राज्य की पुलिस या सुरक्षा बलों से खतरा नहीं हो सकता है और खतरा अगर है तो आम लोगों से होगा और उससे बचाव के लिए राज्य पुलिस होती ही है। केंद्र की सुरक्षा मांगने का मतलब साफ है और यह भी बड़ी खबर है। जनगणना समय पर नहीं होना और उससे पहले एसआईआर कराना, पहले से मौजूद आधार का उपयोग नहीं किया जाना – बहुत कुछ कहता है। खबर इसपर भी होनी चाहिए। खासकर तब जब आज ऐसी ही खबरों में एक खबर है, मुंबई में वोट चोरी के खिलाफ रैली। द हिन्दू की एक खबर के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस 4 नवंबर को एसआईआर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेगी। यही नहीं, महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मतदाता सूची में हेराफेरी के खिलाफ मुंबई में हुई महा विकास अघाड़ी (एमवीए) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने एक रैली की। देशबन्धु की खबर के अनुसार, रैली में शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में वोट चोरी की गई। हमारी पार्टी, नाम और चुनाव चिन्ह चोरी हो गए हैं, अब वोट चोरी हो रही है। डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे और सीएम देवेंद्र फडणवीस कहते हैं कि विरोधियों को बेनकाब करेंगे। मैं देवेंद्र फडणवीस को खुली चुनौती देता हूं कि मुझे बेनकाब करें, दिखाएं कि हमें कैसे फायदा हो रहा है। इस दौरान मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने कहा कि कल्याण, डोंबिवली, भिवंडी और पालघर के साढ़े 4 हजार मतदाताओं ने मालाबार हिल में भी मतदान किया था। इसकी पूरी लिस्ट मेरे पास है। इसमें एनसीपी, एससीपी प्रमुख शरद पवार, कांग्रेस नेता बालासाहेब थोराट भी शामिल हुए। शरद पवार ने कहा कि आज का मार्च मुझे 1978-89 के दौर की याद दिलाता है। उस दौरान मैं कॉलेज में पढ़ता था। संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के दौरान काला घोड़ा इलाके में भी इसी तरह के मार्च निकाले गए थे। उन मार्च में विचारों की एकता और लोगों का दृढ़ संकल्प साफ दिखाई देता था। आज आपने जो एकता दिखाई है, वह मुझे उस समय की याद दिलाती है। आज यह खबर, पहले नाम-सिंबल चुराए, अब वोट चुरा रहे : उद्धव शीर्षक से छपी है। बाकी अखबारों में नहीं है लेकिन इससे एसआईआर और चुनाव आयोग से नाराजगी का अनुमान लगाया जा सकता है। (जारी)
दूसरा भाग – सोशल मीडिया पर पत्रकार ही नहीं, कोई भी, कुछ भी लिख देता है, गलती बताने पर भी नहीं मानता
लिंक – https://www.bhadas4media.com/patrakaar-hee-nahee-social-media-par-koi-bhi-kutch-bhee/

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


