संजय कुमार सिंह
आज हिन्दी के मेरे तीनों अखबारों के साथ द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया की भी लीड दो सड़क दुर्घटनाओं की खबरें हैं। अमर उजाला के शीर्षक के अनुसार – नशे में धुत्त डंपर चालक ने पांच किमी तक वाहनों को रौंदा, 19 की जान गई और ट्रक व बस की टक्कर में 13 महिलाओं समेत 19 की मौत। इनमें एक मामला तो नशे में धुत डंपर चालक का है ही, दूसरा भी ट्रक और बस की आमने सामने की टक्कर का है। जाहिर है, चालकों ने आवश्यक सावधानी नहीं बरती या सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं रही होगी। अगर ऐसा था तो दोनों चालकों को सतर्क रहना था और जाहिर है कि दुर्घटना हुई तो कोई न कोई चूक होगी। इससे पहले भी कई घटनाएं हुई हैं जिससे लगता है कि मानसिक रूप से बीमार-परेशान लोगों की संख्या बढ़ रही है। या ऐसे लोग आम लोगों की तरह रह रहे हैं जिससे हादसे हो जाते हैं। हाल में मुंबई में 17 बच्चों के अपहरण का मामला ऐसा ही था। पुलिस ने उसे बेकाबू करके पकड़ने की कोशिश की बजाय मार दिया जबकि उसने कहा था कि वह आतंकी नहीं है। मुझे लगता है कि मानसिक रूप से बीमार लोगों की संख्या बढ़ रही है जो अपने और दूसरों के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। एक अच्छे समाज का काम है कि ऐसे मामलों पर नजर रखे, पहले कई गैर सरकारी संस्थाएं ऐसे काम करती थीं। विदेशी चंदा और दान लेने के नियम सख्त किए जाने से संभव है ऐसे काम करने वाले संस्थान बंद हो गए हों, काम नहीं कर पा रहे हों। ऐसे हजारों संस्थान बंद हुए हैं और जाहिर है कि इससे कइयों की नौकरी गई होगी और वे भी परेशान होंगे। अगर किसी को लगे कि वह अपनी स्थिति सुधारने के लिए कुछ कर नहीं सकता है, कोई उपाय नजर नहीं आए तो वह मानसिक तौर पर परेशान और बीमार हो सकता है। देशबन्धु की लीड है, बेकाबू डंपर ने ली 19 लोगों की जान। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, डंपरों का आतंक। इससे आप समझ सकते हैं कि सड़क पर चलना कितना खतरनाक है। खासकर हिन्दुओं की रक्षा करने वाली सरकार सत्ता में है तब।
दिल्ली में प्रदूषण का मामला भी इस सरकार की मेहरबानी है। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे लाखों लोग परेशान हैं। कई साल से हैं, सरकार के लिए यह मुद्दा ही नहीं है। दीवाली पर पटाखे चलाने की इजाजत दिलाने की अपनी राजनीति कर रही है। यही हाल यमुना की सफाई का है। और मामला इतना ही नहीं है। हम सब लोगों ने पढ़ा और देखा कि सरकार इस दिशा में कुछ ठोस करने की बजाय कैसे सब कुछ ठीक होने का प्रचार करने और उसके उपाय में लगी है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार पर जिस तरह झूठे आरोप लगाकर और वोट चोरी से उसकी सरकार हटाई गई उसमें उसके समर्थकों के बीमार होने की आशंका है। प्रदूषण से परेशान लोगों की बात अलग है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री की राजनीति में बदलाव की कोई संभावना ही नहीं दिख रही है। कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगाकर सत्ता में आए लेकिन किसी को सजा नहीं हुई। तब भी नहीं हुई जब अदालत पर दबाव बनाने के मामले अब साफ हो चुके हैं। दूसरी ओर तबके सीएजी को ईनाम दिए गए अब सीएजी की रिपोर्ट का पता ही नहीं चलता है। ऐसे में आज दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने दावा किया कि राजद के तेजस्वी लालू के पापों को छिपा रहे हैं, कांग्रेस पर निशाना साधा। कहने की जरूरत नहीं है कि राजनीति में यह सब थोड़ा बहुत तो चलता है। इसे देखने के लिए चुनाव आयोग है। लेकिन अब सब लाचार हो गए हैं और प्रधानमंत्री जो चाहें सो कहें विपक्ष के लोग सही भी कहें तो कहानी बदल कर चुनाव आयोग से शिकायत भी की जाएगी। एक चुनाव में यह सब होता तो लोग झेल लेते। मुझे लगता है कि लगातार तीन लोकसभा और कई विधानसभा चुनाव एक ही तरीके से जीतते जाने के कारण लोग खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं और मानसिक रूप से परेशान होकर बीमार हो रहे हैं।
वैसे भी, विमान चालकों की ड्यूटी पर स्वीकार किए जाने से पहले जांच होती है कि उनने शराब तो नहीं पी रखी है। लेकिन बस, ट्रक और बुलडोजर चालकों के लिए ऐसी जांच का कोई नियम नहीं हैं। जब हादसे बढ़ रहे हैं या कम नहीं हो पा रहे हैं तो कुछ ना कुछ किए जाने की जरूरत है। सरकार ऐसा कुछ कर रही है – पता नहीं है और एनजीओ से अब उम्मीद नहीं है। ऐसे हादसों में जो घायल होगा, जिसका करीबी घायल होगा वह पूरी तरह लाचार महसूस करेगा और बीमार हो सकता है। यह लाचारी आम लोगों के लिए ही नहीं है। चुनाव लड़ने वाले सभी लोगों को तमाम आरोपों और अपमान का सामना करना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने बिहार में चुनाव लड़-लड़वा रहे इंडिया ब्लॉक के नेताओं को बंदर कह दिया। यह देश की राजनीति का ही नहीं राजनीति कर रहे लोगों का स्तर भी बताती है और इससे देश के भविष्य के बारे में कोई क्या उम्मीद बनाएगा और खुद को लाचार ही महसूस करेगा। और बात सिर्फ राजनीति की नहीं है। इलेक्टोरल बांड की वसूली कौन भूला होगा। तब हुआ था जब उद्योग व्यवसाय नोटबंदी और जीएसटी की मार सह रहे थे। उसमें बहुत सारे लोग बर्बाद हो गए, देश छोड़कर भाग गए। जो नहीं भागे, उनकी मदद करने की बजाय उन्हें भी परेशान किया गया। अनिल अंबानी उनमें एक हैं। पहले इन्हें लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई अब इनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है जबकि सरकारी सेठ के खिलाफ कार्रवाई तो छोड़िए, लाभ पहुंचने में कोई कसर नहीं है। इससे हो यह रहा है कि देश में एक ही उद्यमी को संरक्षण है। बाकी सब के लिए मुश्किलें। वह भी तब जब एक उद्यमी के परेशान होने का मतलब है सैकड़ों लोगों की नौकरी चली जाना। पर सब हो रहा है। सरकार प्रचार के अलावा कुछ कर रही हो तो उसका लाभ नहीं दिख रहा है और ऐसे में लोगों के हताश निराश होने की आशंका बढ़ती जा रही है। ऐसे लोगों की खबरें आती रही हैं और निश्चित रूप से पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई हैं।
आज टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार गुजरात के राजकोट स्थित पायल मैटरनिटी हॉस्पीटल अस्पताल से शुरू हुआ कई महिला अस्पतालों का सीसीटीवी फुटेज पॉर्न बाजार में पहुंच गया है। हैकर्स ने जनवरी से दिसंबर 2024 के बीच नौ महीने से ज्यादा समय में 50,000 से ज्यादा क्लिप चुरा लिए और इन्हे पॉर्न बाजार में बेच दिया। ये वीडियो मातृत्व और शिशु रोग विभाग में महिलाओं की जांच के हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें अस्पताल प्रशासन की लापरवाही तो है ही, हैकर्स की मानसिकता का भी सवाल है। खासकर तब जब देश का चुनाव आयोग माताओं बहनों के मतदान करने के वीडियो देने को तैयार नहीं है और साइबर चोर स्त्रीरोग विभाग में माताओं-बहनों की जांच के वीडियो न सिर्फ चुरा रहे हैं उसे सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए बेच भी रहे हैं। यह भी परेशान और बीमार मानसिक स्थिति का उदाहरण है जो भले पैसे के लिए हो या नौकरी के दवाब में। मुझे नहीं पता है कि यह सामान्य अपराध है या पैसे कमाने की मजबूरी। जो भी हो, पैसे कमाने के लिए आदमी क्या करता है यह भी उसकी मानसिकता और मानसिक अवस्था से तय होता है।
इन और ऐसी खबरों के बीच आज एक राहत वाली खबर हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने सीएक्यूएम से देश की राजधानी की खराब होती हवा पर एक रिपोर्ट देने और यह बताने के लिए कहा है कि हवा की गुणवत्ता को और खराब होने से रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की लीड भी दिलचस्प है। इसके अनुसार रूस से भारत को निर्यात होने वाले तेल की मात्रा में भारी कमी आई है। आप जानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने हाल में ऐसा दावा किया था। भारत सरकार ने इसपर अपना पक्ष स्पष्ट नहीं किया। अब जब रूस से आयात कम होने की खबर है तो वह सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक दिल्ली की एक अदालत ने कोल ब्लॉक आवंटन मामले में पूर्व सचिव को आरोपों से बरी कर दिया है और कहा है कि इस मामले में जरा भी सबूत नहीं है और यह तय होने में 11 साल लग गए। मामला 2014 का है। द हिन्दू में खबर है कि दिल्ली दंगा मामले में अभियुक्त और पांच साल से जेल में पड़े उमर खालिद व दूसरे अभियु्क्तों ने दिल्ली पुलिस के इस दावे से इनकार किया है कि ट्रायल में उनकी वजह से देरी हुई। मुझे लगता है कि देश के न्यायिक इतिहास में यह अपनी तरह का पहला मामला होगा जब पुलिस अभियुक्तों पर ट्रायल में देरी का आरोप लगा रही है। मेरा मानना है कि पुलिस को अपना काम निष्पक्ष रहकर करना चाहिए और अभियुक्त को ट्रायल में देरी का मौका भी क्यों दिया जाए। इसे देखना और ऐसा नहीं होने देना भी पुलिस का ही काम है। द टेलीग्राफ की लीड अंतरराष्ट्रीय खबर है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


