वोट चोरी की आज की खबर और उसके कथित जवाब से पता चलता है कि राजनीति और पत्रकारिता का कैसा ह्रास हुआ है। वोट चोर गिरोह का अमृतकाल चल रहा है। इसमें राहुल गांधी पहले पन्ने पर तो आ गए हैं लेकिन पहले पन्ने की खबर का शीर्षक भी ढंग से नहीं लगाया गया है। ज्यादातर में खबर को कायदे से पेश ही नहीं किया गया है। कई शीर्षक तो बहुत ही गैर जिम्मेदार हैं।
संजय कुमार सिंह
राहुल गांधी पहले पन्ने पर आ गए हैं। मजबूरी में ही सही, सरकार समर्थकों और प्रचारकों को ऐसा करना पड़ा। इससे पता चलता है कि वे पप्पू नहीं, प्रधानमंत्री मटेरियल हैं। पर वह अलग मुद्दा है। आज बिहार चुनाव के पहले चरण का मतदान है और नीतिश कुमार राजग गठबंधन के भाजपा उम्मीदवार घोषित नहीं किए गए हैं। इसकी तुलना महाराष्ट्र में शिन्दे का जो हाल हुआ उससे की जाती है पर नीतिश शिन्दे नहीं हैं। वो हस्ती हैं जो अटल बिहारी सरकार में मंत्री होने के बावजूद नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने का विरोध कर पाए थे। बाद में बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके लिए जीतन राम मांझी का नाम सुझाया था और मांझी बिहार के 23वें मुख्यमंत्री बने थे। मनोनीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर जीतन राम मांझी को बधाई दी थी और बिहार के विकास में हर तरह के सहयोग का वादा किया था। बीबीसी की खबर के अनुसार मांझी के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद भाजपा के दो विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था। दोनों नीतीश कुमार के समर्थक माने जाते थे। इसके बाद, मोदी शासन में नीतिश कुमार पल्टू राम हो गए, मांझी नीतिश से अलग होकर भाजपा समर्थक बने रहे। इस बार उनकी बहू और समधन पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। यह भाजपा की राजनीति का चरित्र और स्तर है। जाहिर है नीतिश कुमार वैसे नहीं रहे जैसे थे, वैसे भी नहीं दिखे जैसा दिखना चाहते थे और शिन्दे बनाने की भाजपा की राजनीति को लगातार चुनौती दे रहे हैं। ऐसे में जब मतदान है और भाजपा पर वोट चोरी से सरकार बनाने या चुनाव ही चोरी करने का आरोप है तो नीतिश, लालू (या उनके वंश) और बिहार चुनाव के मायने हैं क्योंकि इंदिरा गांधी का विरोध और भाजपा (तब जनसंघ) को राष्ट्रीय स्तर पर बिहार से ही साथ मिला था। जयप्रकाश नारायण का योगदान सही हो या गलत उनके परिवार को राजनीतिक लाभ की खबर नहीं है और तब की जनता पार्टी ढाई साल में बिखर गई थी।
भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी। इनका विरोध लोकनायक जयप्रकाश नारायण के शिष्यों ने खुलकर किया था। उस समय नीतिश के मित्र, लालू यादव ने तो आडवाणी को गिरफ्तार कर इस राजनीति को रोकने की कोशिश ही की थी लेकिन आडवाणी की गिरफ्तारी के लिए जिसे चुना गया वह भाजपाई हो गया। कैबिनेट सचिव के रूप में संघ (आरएसएस) के खिलाफ पुख्ता सबूत होने का दावा करने के बाद। इससे आप देश में संघ और भाजपा की राजनीति, दबदबा और उसपर नरेन्द्र मोदी का प्रभाव समझ सकते हैं। विस्तार में इसका विवरण मेरी किताब, ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली में है। पर अभी यह सब मुद्दा नहीं है। अब आता हूं आज के अखबारों पर। सबसे पहले अमर उजाला। आज इस प्रस्तुति सबसे अच्छी कही जा सकती है लेकिन निष्पक्ष या आदर्श नहीं है। सबसे पहले तो शीर्षक – राहुल का दावा हरियाणा में 25 लाख फर्जी वोट पड़े। मुझे नहीं लगता और मैंने नहीं सुना कि राहुल गांधी ने 25 लाख फर्जी वोट वोट पड़ने की बात की। उन्होंने कई बार कहा और उनके कहने का मतलब था कि हरियाणा की मतदाता सूची में 25 लाख फर्जी वोट हैं। वोट होने और पड़ने में फर्क है। मतदाता सूची में नाम होना, वोट होना है। उसे वोट कहा जाएगा और चुनाव हो गए मतलब वोट पड़ गए। जिसका नाम था उसके वोट पड़ गए का मतलब है चुनाव हो गये। यह नहीं कि सबके वोट पड़ गए। जिसके नहीं पड़े उसके अब नहीं पड़ सकते लेकिन वोटर लिस्ट में वोट है चुनाव उन्हीं वोटों से हुए हैं, जो नाम है वह वोटर है। वैसे भी, चुनाव आयोग नहीं बताता है कि किसके वोट पड़े और किसके नहीं। बाद में प्रतिशत बढ़ता जाना भी समस्या है और यही सब मुद्दा है।
मुद्दा देश हित और लोकतंत्र बचाना है। राहुल गांधी, उनका शहजादा होना या प्रधानमंत्री का चाय वाला या उनकी जाति नहीं है। तथ्य है कि किसी शहजादे या सिंधिया ने इतनी जहमत नहीं उठाई है। अगर उनके आरोप हल्के हैं, वे अगंभीर हैं तो निश्चिंत रहिए, चुनाव आयोग से कहिए कि जरूरी कार्रवाई करे और अधिकार नहीं है तो अधिकार मांगे। पर यह सब भी मुद्दा नहीं है। तथ्य है कि मीडिया को राहुल गांधी के आरोपों में दम या मतलब समझ में आ रहा है तो उन्हें पहले पन्ने पर जगह मिली है। अमर उजाला ने आरोप और जवाब दोनों को लगभग बराबर जगह दी है। चुनाव आयोग के हास्यास्पद सवाल को शीर्षक बनाया है। इसमें कुछ गलत नहीं है पर यह सवाल ऐसा नहीं है कि इसे तीन कॉलम जगह दी जाए। दूसरे अखबारों ने सिंगल कॉलम में निपटा दिया है। मुख्य मामला यह है, राहुल गांधी ने कहा (या आरोप लगाया) कि चुनाव आयोग ने लोकतंत्र की हत्या कर दी। जवाब या बचाव में (एफआईआर दर्ज करने वाला) पूछ रहा है, पहले क्यों नहीं बताया? मुझे लगता है कि निष्पक्षता दिखाने की चीज नहीं है वह निष्पक्ष होने से ही दिखती है। इसलिए कोशिश भले अच्छी है शीर्षक निष्पक्ष दिखने वाले नहीं हैं। इसके अलावा, मीडिया का काम निष्पक्ष दिखना ही नहीं है उसे पाठकों को जागरूक भी करना है। अखबारों का काम था कि वह राहुल गांधी के आरोपों, चुनाव आयोग के जवाब (और अभी तक की कार्रवाई) के संदर्भ में उसकी गंभीरता बताता। अगर यह बिहार में मतदान के पहले जान बूझकर भी किया गया हो तो गैरकानूनी या अनैतिक नहीं है।
अमर उजाला में उपशीर्षक है, निर्वाचन आयोग ने पूछा – राहुल सबूत का दावा कर रहे.. अगर गड़बड़ी हुई थी तो चुनाव के वक्त कांग्रेस के बूथ एजेंट क्या कर रहे थे। जवाब मैं ही दे सकता हूं – चुनाव के वक्त बूथ एजेंट चुनाव आयोग या चुनाव लड़ने वालों के गुलाम नहीं होते हैं, वेतन भोगी कर्मचारी भी नहीं। उनका काम ही नहीं है कि मतदाता सूची की गलती बताएं। मतदान के समय अगर एजेंट की सुनी जाती और हर मतदान केंद्र पर हर उम्मीदवार का एजेंट होता ही तो जमानत जब्त होती? उसका प्रावधान होता? स्पष्ट है कि, चुनाव आयोग मूल आरोपों का जवाब देने की बजाय बचकाना सवाल कर रहा है। इंडियन एक्सप्रेस में खबरों को समझाने का काम बेहतर करता है। यह काम एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड से भी किया जाता है। दुर्भाग्य से आज एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड कुछ और है। मुख्य शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह है – राहुल ने हरियाणा में वोट चोरी का आरोप लगाया; भाजपा ने कहा वे बिहार हार चुके हैं। वैसे तो यह खबर लीड है, मुझे नहीं लगता है कि शीर्षक में पर्याप्त गंभीरता है। हालांकि इससे मौजूदा राजनीतिक स्थिति का पता चलता है और चुनाव आयोग का जवाब अलग से है। इसका शीर्षक है, “चुनाव आयोग ने कहा कोई अपील नहीं की गई; रिजिजू बोले : 2004 की हार के बाद चुनाव आयोग को गाली नहीं दी”। कहने की जरूरत नहीं है कि राहुल गांधी ने भी गाली नहीं दी है। सबूत पेश किए हैं, समय और धन लगाकर जांच की है, उसके 100 प्रतिशत सही होने का दावा किया है। अगर गलत है तो चुनाव आयोग कार्रवाई कर सकता है लेकिन प्रचारक काम पर लग गये हैं या लगा दिए गये हैं।
इंडियन एक्सप्रेस का आज का एक्सप्लेन्ड इस प्रकार है, कर्नाटक, महाराष्ट्र के बाद – हरियाणा चुनाव परिणामों पर राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ के आरोप उनके ऐसे ही आरोपों के बाद आए हैं। उन्होंने इसका इस्तेमाल चुनाव आयोग और भाजपा पर निशाना साधने के लिए किया है, जिसे दोनों ने खारिज कर दिया है। मुझे लगता है कि इससे अगर कुछ एक्सप्लेन (स्पष्ट) हुआ भी हो तो भी यह खबर है। आधी बासी या पुरानी। दोनों ने खारिज कर दिया भी खबर कम औपचारिकता ज्यादा है और उस अखबार में है जिसके संपादक अरुण शौरी थे और यह दिलचस्प है कि अरुण शौरी टाइम्स ऑफ इंडिया के भी संपादक थे और वहां ऐसी स्थिति नहीं है। भले उसकी अलग कहानी है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सेकेंड लीड है और वही सब बातें हैं जिसकी चर्चा ऊपर कर चुका हूं। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर सेकेंड लीड है। लेकिन शीर्षक कुछ अलग है – राहुल ने अब हरियाणा में चुनाव धांधली का आरोप लगाया; चुनाव आयोग ने खारिज किया। द हिन्दू में यह खबर लीड है और शीर्षक पूरी गंभीरता से – राहुल ने आरोप लगाया कि हरियाणा में चुनाव आयोग की मदद से वोट चोरी हुई। मामला असल में यही है और चुनाव आयोग का जवाब बेमतलब या निराधार। अखबार ने इसे सिंगल कॉलम में छापा है। यह इसी लायक है।
कहने की जरूरत नहीं है पर सच है कि पूरे मामले की गंभीरता खत्म करने की कोशिश चल रही है। इसलिए यह बताना जरूरी है कि चुनाव आयोग भाजपा की मदद कर रहा है। इसके लिए भाजपा ने उस ईवीएम का समर्थन और प्रचार किया जिसका वह सत्ता में नहीं होने पर विरोध करती थी। इस ईवीएम से छोटी-मोटी चोरी तो हो जाती है पर चुनाव चोरी के लिए नई व्यवस्था की गई और वह है मतदाता सूची से विरोधियों के नाम हटाना, समर्थकों के जोड़ना और जरूरत भर फालतू वोट रखना ताकि पांच बजे के बाद खेल हो सके। बिहार के एसआईआर में यही किया गया दिख रहा है। इसमें सरकार और भाजपा की दिलचस्पी, नए कानून, नए चुनाव आयुक्त, उनके चयन से संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होना सबको मालूम है और यह सब मुद्दा ही नहीं है। इतना कि राहुल गांधी ने कहा कि बिहार में भी यही दोहराया जाएगा, चुनाव के बाद हम उसकी भी रिपोर्ट देंगे। इससे पता चलता है कि राहुल गांधी क्या कर रहे हैं और सरकार क्या कर रही है या चुनाव आयोग क्या चाहता है। इसमें कुछ अगर-मगर है ही नहीं। हिन्दुत्व की ताकत और पूर्व तड़ीपार गहमंत्री की व्यवस्था का मामला है। इसके लिए बेटे को ईनाम दिया जा चुका है और यह सार्वजनिक है। अभी मुद्दा यह है खबरें राजनेता या विपक्ष कर रहा है सौरभ भारद्वारा और राहुल गांधी। इसके बावजूद बिहार के कई लोगों ने कहा कि बिहार में वोट चोरी मुद्दा नहीं है। उनकी चिन्ता यह नहीं है कि क्यों नहीं है।
मेरी समझ से इसलिए कि प्रचारक गिरोह राहुल गांधी और उनके आरोपों की गंभीरता कम करने में लगा है। दि एशियन एज ने इस खबर को पांच कॉलम में छापा है। खबर और शीर्षक वही सब है। नई बात उपशीर्षक का एक हिस्सा है – रिजिजू बोले, भारत को बदनाम करने की कोशिश। यह भाजपा का घिसा पिटा बचाव है। अंग्रेजी में चुनाव आयोग का भी कोई कायदे का बयान नहीं दिखा। दुनिया भर में बदनामी तो बहाना है। एक ही पार्टी के बार-बार जीतने पर भी होगी। स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के प्रचार के बावजूद लोकपालों को बलेनो छोड़कर बीएमडब्ल्यू देने से भी होगी। पर वह अलग मुद्दा है। द टेलीग्राफ में भी यह आम खबरों की तरह है। हालांकि शीर्षक दिलचस्प है, “वोट चोरी की सीमा : सुदूर ब्राजील तक”। नवोदय टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम में है। हाईलाइट किया हुआ अंश है, राहुल का तीसरा वोट चोरी बम। दूसरा हाईलाइट किया हुआ अंश है, ब्राजील की मॉडल की तस्वीर से 10 बूथों पर 22 फर्जी वोट। राहुल गांधी ने यही कहा है। उन्होंने नहीं कहा कि ये वोट पड़े। भिन्न वोटर की जगह एक ही वोटर या मॉडल की फोटो का उपयोग किया जाना सामान्य नहीं है। राहुल गांधी ने इसे रेखांकित किया – इसका मतलब यह नहीं है कि ये वोट पड़े और ये फर्जी हैं। यह भी नहीं है कि इस नाम का वोटर दिए गए पते पर या दुनिया भर में कहीं भी है ही नहीं। उनके कहने का मतलब है कि मतदाता सूची में गड़बड़ियां है और इसका मकसद फर्जी वोट डलवाना हो सकता है। आखिर फोटो नहीं होने का कारण क्या है? पर मीडिया ने मुद्दा घुमा दिया कि नाम सही है, वोटर सही हैं। होंगे। पर मतदाता सूची तो गड़बड़ है। इस खुलासे के लिए राहुल गांधी पर आरोप लगाने की भी सीमा नहीं है। किरेन रिजिजू ने कहा और नवोदय टाइम्स ने पहले पन्ने पर फोटो के साथ छापा है तो अंदाजा लगता है कि इससे संघ परिवार का वोट चोरी का पूरा गांव ही दो फाड़ हो गया है। शीर्षक है, वोट चोरी के आरोप जेन जेड को भड़काने का प्रयास : भाजपा। तथ्य यह है कि राहुल गांधी ने ऐसा कुछ नहीं किया है। उन्होंने जो कहा है वह (उनके एक्स हैडल से) इस प्रकार है – मैं हिंदुस्तान के युवाओं, देश के Gen-Z से आग्रह करता हूं – सत्य और अहिंसा का हाथ थाम कर चलें और भारी संख्या में निकल कर मतदान करें। इसके बावजूद गिरोह परेशान है तो समझा जा सकता है कि गिरोह के गांव में आग लगी हुई है। पर वह अलग मुद्दा है। देशबन्धु ने भी राहुल गांधी के आरोप को लीड बनाया है। मामला हिन्दू की तरह है। चुनाव आयोग का पक्ष सिंगल कॉलम में है। यह दिलचस्प है राहुल गांधी से तो लोग पूछ रहे हैं कि कोर्ट क्यों नहीं जा रहे हैं पर किसी पत्रकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त से नहीं पूछा है कि राहुल गांधी ने पिछले आरोपों पर मांगने के बाद भी शपथपत्र नहीं दिया और नए आरोप लगा दिए। आप कुछ करते क्यों नहीं हैं?

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


