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आज के अखबार : प्रदूषण पर सरकार और सीजेआई की ‘मजबूरी’ का बेशर्म प्रचार; मतलब कुछ करना नहीं है

संजय कुमार सिंह

दिल्ली में प्रदूषण के मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय की सक्रियता की खबरों और प्रचार के बाद कल अखबारों की खबर थी, ग्रैप-3 हटाया गया। हालांकि कल ही खबर थी, “प्रदूषण के कारण डिजिटल सुनवाई पर कर रहे विचार : सीजेआई”। नवोदय टाइम्स ने दोनों खबरों को एक साथ छापा था। अमर उजाला ने सिर्फ ग्रेप-3 की पाबंदिया हटने की खबर दी थी। जाहिर है, मुख्य न्यायाधीश की खबर के बावजूद ग्रेप-3 की पाबंदियां हटने का प्रचार किया गया। इससे पहले प्रधानमंत्री कार्यालय के सक्रिय होने की खबर थी। इस बारे में मैं यहां लिख चुका हूं। आज अमर उजाला की टॉप की खबर है, प्रदूषण पर सीजेआई ने पूछा, कौन सी जादुई छड़ी घुमा सकते हैं। पांच कॉलम की यह खबर यही बताती है कि प्रदूषण कम करना इतना आसान नहीं है। जादू की छड़ी हो तो बात अलग है। मैं मुख्य न्यायाधीश के बयान, उसके समय और उनके निर्णयों की बात नहीं कर रहा हूं – मैं अखबारों में खबरों की प्रस्तुति की बात कर रहा हूं। न्यायमूर्ति ने प्रदूषण की समस्या बताई तो वह खबर अमर उजाला में नहीं छपी। लेकिन प्रदूषण कम होने की खबर छपी। एनसीआर में रहने वाला कोई भी जानता-समझता है कि ग्रेप थी की पाबंदियां हटाना – तकनीकी मामला है और प्रदूषण की समस्या इतने भर से कम भले हो गई हो, स्थायी निदान नहीं है। ना ही यह खबर प्रदूषण पर सरकार की नीयत बताती है। फिर भी अमर उजाला ने इसे पहले पन्ने पर छापा, उसमें सीजेआई की चिन्ता नहीं थी। नवोदय टाइम्स ने दोनों को छापा और यही होना चाहिए था। कल अमर उजाला ने सीजेआई की बात (पहले पन्ने पर) नहीं छापी तो आज जब उन्होंने लाचारी बताई है और ‘जादू की छड़ी’ की बात की है तो उसे पांच कॉलम में तान दिया गया है। इससे जनता यह नहीं कहेगी या समझेगी कि सरकार कुछ नहीं कर रही है। सीजेआई भी कह रहे हैं कि ‘जादू की छड़ी’ का मामला है। नवोदय टाइम्स ने इसे टॉप पर दो कॉलम में छापा है और संदेश वही है। दोनों अखबारों ने वह नहीं छापा है जो दि एशियन एज ने टॉप पर छापा है।

खबर वही है, शीर्षक और प्रस्तुति का अंदाज अलग संदेश दे रहा है। दिल्ली का एक्यूआई 14वें दिन बेहद खराब, किसी राहत की उम्मीद नहीं। इसके साथ छपी तस्वीर का कैप्शन है – गुरुवार को नई दिल्ली में धुंध से घिरे जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम का हवाई दृश्य। राष्ट्रीय राजधानी में वायु गुणवत्ता लगातार 14वें दिन “बेहद खराब” श्रेणी में दर्ज की गई, जहाँ औसत एक्यूआई 377 रहा और पूर्वानुमानों के अनुसार आने वाले सप्ताह में कोई राहत मिलने की संभावना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके पास दिल्ली-एनसीआर में बिगड़ते वायु प्रदूषण को तुरंत ठीक करने के लिए “कोई जादू की छड़ी नहीं है” और राजधानी में बार-बार होने वाले ज़हरीले धुंध के विशिष्ट कारणों का पता लगाने की आवश्यकता पर बल दिया। मैं नहीं कह सकता कि सरकार का प्रचार या प्रदूषण की समस्या को कम करके दिखाने का काम इरादतन किया जा रहा है। सरकार का प्रचार और बचाव तो योजना का हिस्सा और एजंडा हो सकता है लेकिन प्रदूषण की समस्या खत्म करने के लिए जादू की छड़ी की बात को महत्व देना और यह नहीं बताना कि, दिल्ली का एक्यूआई 14वें दिन बेहद खराब, किसी राहत की उम्मीद नहीं – खबरों की समझ का मामला है। मैं नहीं जानता इसका कारण क्या है। संभव है कई हों। लेकिन पत्रकारिता और खबरों की समझ का यह गिरता स्तर चिन्ताजनक है।

अभी मुद्दा यह है कि कल ग्रेप -3 की पाबंदियां खत्म करने की खबरों को प्रमुखता देने वालों ने आज मुख्य न्यायाधीश के जादू की छड़ी के बयान को तो प्रमुखता दी है लेकिन कल जब यह सूचना देनी थी कि प्रदूषण कम हुआ है तो मुख्य न्यायाधीश का बयान कम महत्वपूर्ण था और उसे वैसी प्रमुखता नहीं मिली जैसी आज मिली है। कल की खबर थी, सुबह एक घंटे टहला तो प्रदूषण से तबीयत बिगड़ी। कहने की जरूरत नहीं है कि पत्रकारिता के नियम एक होंगे और खबरों का चयन सरकार के समर्थन या विरोध के आधार पर नहीं होगा। कायदे से कल और कल नहीं हुई तो आज यह खबर जरूर होनी चाहिए थी कि सरकार कह रही है कि प्रदूषण कम हुआ है, ग्रेप-3 की पाबंदियां हटा ली गई हैं और सीजेआई ने कहा है कि एक घंटे टहलने से तबीयत बिगड़ गई। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रदूषण से सीजेआई की तबीयत बिगड़ना और उनका यह कहना कि कौन सी जादुई छड़ी घुमा सकते हैं अलग तरह की खबरें हैं। मुद्दा यही है कि दिल्ली की हवा लोगों की तबीयत खराब कर रही है, सरकार ने कुछ किया नहीं है और जादू की छड़ी हो नहीं सकती है। अगर वाकई ऐसा है तो दिल्ली से लोगों को ऐसी जगह ले जाने-भेजने पर विचार किया जाना चाहिए जहां स्वास्थ्य का खतरा नहीं हो। यही नहीं, लोगों को यह बताए जाने की जरूरत हो सकती है कि जरूरी नहीं हो दिल्ली मत आइए, दिल्ली में मत रहिए और यहां रहते हैं तो कहीं और जाने के बारे में सोचिए। सरकार यह सब नहीं कर रही है तो खबर है। और अखबार जरूरत समझें तो खुद भी यह काम कर सकते हैं।

जागरण डॉट कॉम की एक नवंबर की खबर के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर इन दिनों खराब वायु प्रदूषण की गिरफ्त में है। राजधानी का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआइ) ‘खराब’ श्रेणी में है। दिल्ली की इस बिगड़ती स्थिति पर कैलाश अस्पताल नोएडा की वरिष्ठ पल्मोनरी विशेषज्ञ डॉ. एएस संध्या और पीएसआरआई इंस्टीट्यूट आफ पल्मोनरी, क्रिटिकल केयर एंड स्लीप मेडिसिन के अध्यक्ष डॉ. गोपी चंद खिलनानी की सलाह है कि अगर इस प्रदूषण से बचना है और आप सक्षम हैं तो छह से आठ सप्ताह के लिए दिल्ली से बाहर चले जाएं। ऐसा इसलिए क्योंकि दिल्ली में वायु प्रदूषण की यह स्थिति दिसंबर के मध्य तक बनी रह सकती है। साथ ही यह भी जोड़ा कि ‘हर कोई दिल्ली नहीं छोड़ सकता, लेकिन जिन्हें पुरानी बीमारी है या जो ऑक्सीजन पर हैं, अगर वह आर्थिक रूप से सक्षम हैं, तो दिसंबर के मध्य तक कम प्रदूषित जगह पर अस्थायी रूप से चले जाएं। यही इस समय उनके लिए सबसे सुरक्षित विकल्प है।’ कहने की जरूरत नहीं है कि इस सलाह को जितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए था नहीं लिया गया। इसकी चर्चा भी मीडिया में या सोशल मीडिया में नहीं के बराबर हुई। दूसरी ओर, जादू की छड़ी नहीं हो तो हाथ-पर-हाथ रखकर बैठा नहीं जा सकता है। कम से कम मीडिया यही कर रहा है और बता भी नहीं रहा है कि सरकार प्रदूषण कम करने के लिए क्या कर रही है या क्या नहीं कर रही है। दया शंकर मिश्र ने कुछ खबरों के हवाले से एक्स पर बताया है, सरकार ने 90% अरावली पहाड़ियों के बर्बाद होने का रास्ता बना दिया है। इन पहाड़ियों को ‘वन सर्वेक्षण ऑफ इंडिया’ ने रेत और धूल के पूर्व की ओर बहाव रोकने वाली बाधा बताया था! सरकार जंगलों को तबाह करने पर लगी है। एक और खबर है, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के अनुसार वायु प्रदूषण गर्भ तक में बच्चों को बीमार बना रहा है। हमारी स्थिति तो छोड़ दीजिए लेकिन सरकार एम्स तक की नहीं सुन रही है । इतने प्रदूषण में विदेशों में जनता, मीडिया सरकार का जीना मुश्किल कर देती है।

यहां सरकार और सरकारी पार्टी सोशल मीडिया पर राहुल गांधी को बदनाम करने, उनपर आरोप लगाने में लगी है। गनीमत है कि वह सब अखबारों में नहीं है। हालांकि सोशल मीडिया की खबरों पर सरकार की चिन्ता अखबारों की खबरों से दिखती है। अमर उजाला की आज की लीड का शीर्षक है, सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री किसी को तो लेनी होगी जिम्मेदारी। उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नियंत्रण के लिए स्वायत्त निकाय जरूरी… देशद्रोही कंटेंट भी हो जाता है वायरल। यहां मुझे कन्हैया कुमार से संबंधित जेएनयू का 2016 का मामला याद आता है। कार्यक्रम के कथित वीडियो और नारेबाज़ी से संबंधित क्लिप्स सबसे पहले सोशल मीडिया पर ही वायरल हुए थे। जिन वीडियो पर “देश-विरोधी नारे” लगाए जाने के दावे हुए, उनमें से कुछ की प्रामाणिकता पर बाद में सवाल उठे; कुछ वीडियो एडिटेड होने की बात मीडिया रिपोर्टों में आई थी। छात्रसंघ अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार को पुलिस ने गिरफ़्तार किया था, लेकिन उन्होंने लगातार कहा कि उन्होंने कोई देशविरोधी नारे नहीं लगाए। अदालत में उन्हें जमानत मिली, और बाद की कार्यवाही में भी यह मुद्दा कानूनी रूप से पूरी तरह निष्कर्ष तक नहीं पहुँचा है। यानी आरोप और प्रमाणित तथ्य अलग-अलग हैं। वीडियो की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल उठे, कई मीडिया रपटों में एडिटिंग का दावा किया गया। कन्हैया कुमार ने स्वयं नारे लगाने से इनकार किया था और उन्हें जमानत मिलते समय अदालत ने भी कहा था कि सीधा सबूत नहीं है (पर केस औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है)।

जाहिर है, इस बात की जांच ही नहीं हुई कि फर्जी वीडियो इरादतन, किसी खास मकसद से वायरल तो नहीं किया गया था। मुझे नहीं लगता इसके लिए कानून की जरूरत है। सरकार चाहती तो दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता था, किया जाना चाहिए था और नहीं किए जाने से शक की सुई कहां है समझना मुश्किल नहीं है। जाहिर है, सरकार सोशल मीडिया के कंटेट को लेकर चिन्तित है लेकिन प्रदूषण जैसी समस्या पर उसके काम की रिपोर्ट ही नहीं है या उसे वह महत्व नहीं मिला है जो सोशल मीडिया की अश्लील सामग्री पर उसकी चिन्ता को लेकर मिलता रहा है। सरकार की चिन्ता अश्लील सामग्री देखने वाले भी रहे हैं जबकि वयस्क बंद कमरे में क्या करते हैं इसकी चिन्ता सरकार को करने की जरूरत नहीं है और शिकायत आए तो कार्रवाई के लिए कानून हैं ही। पर्यावरण के प्रति सरकार के रुख से संबंधित एक खबर आज इंडियन एक्सप्रेस में है। खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने 2002 में सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी बनाई थी। यह 2023 से एक वैधानिक संस्था है जो पर्यावरण और वन मामलों से संबंधित याचिकाओं पर कोर्ट को सलाह देती है और कोर्ट के आदेश की निगरानी और अनुपालन में सहायता करती है। 19 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि उसके मंजूरी के बाद ही इसे खत्म किया जा सकता है। आज की खबर बताती है कि इसके एक पखवाड़े पहले मंत्रिमंडल सचिवालय ने पर्यावरण मंत्रालय से कहा था कि सीईसी के भविष्य से संबंधित मामले को विधि आयोग को भेजा जाए।

मंत्रिमंडल सचिवालय ने यह कहा बताते हैं कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के साथ सीईसी के भी काम करने से एजेंसियों का दोहराव के कारण संभव है कि दोनों के बीच क्षेत्राधिकार से संबंधित फैसले में देरी हो। इसलिए इसपर विचार किया जाना चाहिए कि सीईसी को काम करते रहना चाहिए या नहीं। द हिन्दू में पहले पन्ने पर पर्यावरण या प्रदूषण से संबंधित कोई खबर नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स में जादू की छड़ी वाली सुप्रीम कोर्ट का बयान ही खबर है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट से कहा गया कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं हुआ इसलिए प्रदूषण में कमी नहीं आई। इंट्रो है – हवा साफ करने के लिए जादू की छड़ी नहीं है। इसे पढ़ने से लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेशों का अनुपालन नहीं होने के संदर्भ में कहा है और तब बात बिल्कुल अलग हो जाती है। खबर इस प्रकार है, … एक तरह से यह स्वीकार करना है कि दशकों की न्यायिक सक्रियता से इस क्षेत्र पर जहरीली हवा के प्रभाव को कम करने में शुरुआती लाभ के बाद न्यूनतम परिणाम हासिल हुए हैं।…. मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर सहमति जताई कि संयोजित प्रयास के साथ पूरे साल चलने वाले दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता है। जाहिर है यह सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है और सरकार कुछ नहीं करे तो सुप्रीम कोर्ट के पास जादू की छड़ी नहीं है। देशबन्धु ने आज दिल्ली में प्रदूषण की समस्या को लीड बनाया है। इस खबर में जादू की छड़ी का मामला कहीं भी हाईलाइट नहीं किया गया है। गंभीर खबर पूरी गंभीरता से पेश की गई है। फ्लैग शीर्षक है, वायु प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त। मुख्य शीर्षक है, दिल्ली एनसीआर में स्वास्थ्य आपातकाल जैसे हालात। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इसकी लगातार निगरानी की जरूरत।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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