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आज के अखबार : मनमानी का सरकारी रवैया और नए नियमों के प्रति इंडिगो की आना-कानी संकट का कारण

संजय कुमार सिंह

आज के अखबार भले सीधे नहीं कह रहे हैं लेकिन घुमा-फिर कर जो कह रहे हैं उससे साफ है कि इंडिगो संकट का सारा मामला नियमों में बदलाव के कारण है। इसके लिए क्रू की आवश्यकता बढ़नी थी। इंडिगो ने कहा है कि उसने इस संबंध में गलत अनुमान लगाया। नियम लागू होने से पहले क्रू की संख्या में वृद्धि की जरूरत थी तो इसे सुनिश्चित करना नए नियम बनाने और उन्हें लागू करने वालों का ही काम होगा। बेरोजगारों के इस देश में जब वर्षों से स्किल इंडिया चल रहा है तो इसकी जरूरत का एक अलग आयाम भी है। खबरों से लगता है कि उसकी भी अनदेखी की गई है। क्रू की व्यवस्था साधारण या आसान नहीं है और नियम लागू करने की तारीख की ही तरह इसकी भी तारीख तय होनी चाहिए थी और अब अकेले इसके लिए इंडिगो को दोषी ठहरा दिया जाए या बलि का बकरा बन भी जाए तो कुछ किया नहीं जा सकता है। सोचना होगा कि इस नालायकी से हिन्दुत्व का कितना भला हुआ या कितने मुल्ले कसे गए। इंडिगो मामले में अब लगता है कि सब कुछ संस्थानों के भरोसे छोड़ दिया गया था और इंडिगो चूक गया था। अब इंडिगो का जो भी किया जाए, नुकसान तो देश और जनता को हो चुका। अखबारों ने भले नहीं बताया – सरकार की पोल भी खुल गई है। आज द टेलीग्राफ की खबर का संदेश यही है कि इंडिगो ने शुतुर्मुर्ग की तरह रेत में सिर छिपा लिया और तूफान के जाने का इंतजार कर रहा है। मुझे नहीं लगता है कि मामला ऐसा ही है। हो सकता है, नए नियम इंडिगों को महंगे पड़ते हों, वह नहीं चाहता हो कि ऐसे नियम बनें या यह सरकार जैसा करती रही है, किसानों के लिए नियम बना दिया कह दिया उनके फायदे के लिए है और वे आंदोलन कर पाए तो वापस ले लिया फिर सन्नाटा। इस मामले में भी यही हुआ है और नियमों को 10 फरवरी तक स्थगित कर दिया गया है। लेकिन नए श्रम कानूनों का पता नहीं चला।

खबर थी कि लागू हो गए, फिर खबर आई कि इसके विरोध के कारण सरकार इसपर राय लेगी। अंततः क्या हुआ पता नहीं, व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी ने प्रसारित कर दिया कि सरकार ने क्रांतिकारी और नए श्रम कानून लागू कर दिए हैं जबकि तथ्य यह है कि इससे श्रमिकों का भला हो या नहीं, लालाओं को फायदा होगा। इसकी आलोचना करने वाली प्रेस कांफ्रेंस और उससे संबंधित सोशल मीडिया की पोस्ट को पीआईबी फैक्ट चेक ने मिसलीडिंग करार दिया और सरकार जैसे काम करती रही है उस क्रम में एक कहानी बन गई, प्रचार हो गया। हाल के समय में खबरें आ रही थीं कि रेल कर्मचारियों के काम के घंटे बहुत ज्यादा और अमानवीय हैं। रिक्तियां हैं आदि आदि। काम के घंटे ज्यादा होने से यहां भी जान-माल के नुकसान का डर है। लेकिन इस मामले में क्या हुआ, पता नहीं पायलट और क्रू के लिए नए नियम आ गये। यह सब नियमानुसार और बिल्कुल उचित भी हो तो लागू करने का संकट ऐतिहासिक रहा। आम जनता को जो परेशानी हुई उसकी कोई सीमा नहीं है। पर यह नया भी नहीं है। नया यह है कि वोट चोरी और चुनाव चोरी के आरोपों के बीच यह सवाल नहीं उठा कि सरकार ऐसे काम करने का जोखिम कैसे उठा पाती है। क्या वोट चोरी वाकई हो रही है या फिर व्हाट्सऐप्प और सोशल मीडिया के प्रचार से ही सरकार जीत रही है। मुद्दा यह सब नहीं है क्योंकि मीडिया यानी वाचडॉग अब लैप डॉग हो गया है। हालांकि वह अलग मुद्दा है।

द टेलीग्राफ ने आज इस मामले में दो खबरें छापी हैं। एक का शीर्षक है, नियुक्ति पर लोग और कुम्भकरण की नीन्द। दूसरा शीर्षक है, क्रू के आराम से संबंधित नियमों में ढील, परेशानियों में नहीं। लेकिन रेल कर्मचारियों की परेशानी की चिन्ता सरकार को तो नहीं ही है। नवोदय टाइम्स की खबर में अन्य बातों के अलावा नागर विमानन मंत्री, किंजरापु राममोहन नायडू का यह दावा भी है कि हालात तीन दिन में सामान्य होंगे। दूसरी ओर, इंडिगो के सीईओ ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी करके कहा है स्थिति 10 से 15 दिसंबर तक सामान्य हो पाएगी। उन्होंने यह भी कहा है कि यात्रियों को उड़ान रद्द होने की सूचना भेजी जा रही है और उनसे गया है कि यात्रा के लिए एयरपोर्ट न आएं। इससे भीड़ नहीं होगी, फोटो नहीं होगी, वीडियो नहीं होगा, खबर नहीं होगी पर समस्या बनी रहेगी। आपको लगेगा कि विमानन मंत्री ने जो कहा वह पूरा हुआ। और यही इस सरकार की कार्यशैली है। देश में यह मुद्दा बना ही नहीं कि सरकार ऐसे आदेश देती ही क्यों है? क्या सरकार को अपने ऐसे आदेशों से होने वाली परेशानियों की जानकारी नहीं है या परवाह ही नहीं है। जो भी हो, चिन्ताजनक है क्योंकि मीडिया रिपोर्ट नहीं करता और सरकारी चुनाव जीतती जा रही है। पता नहीं वोट चोरी से या लोकप्रियता के कारण। पर ऐसी लोकप्रियता क्या हिन्दुत्व के कारण हो सकती है? जो भी हो, यह अलग मुद्दा है। मुझे बचपन में सुना, राम भरोसे हिन्दू होटल जैसा जुमला याद आ रहा है। सरकार जैसी काम कर रही है उसमें पूरा देश हिन्दू होटल होता दिख रहा है जैसा पाकिस्तान के बारे में कहा जाता रहा है। अमर उजाला में आज इंडिगो की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। संभवतः आधा पन्ना विज्ञापन के कारण। स्थिति सामान्य होने के मामले में यहां इंडिगो का अनुमान बताया गया है और खबर के अनुसार, 10-15 तक स्थिति सामान्य होने की उम्मीद है।  

पेश है आज के अखबारों की खास बातें – देशबन्धु – हवाई अड्डों पर उड़ानें रद्द होने से हाहाकार। खबर के अनुसार, उड़ानें रद्द होने से सरकार पर भी दबाव बढ़ा है। इसके बाद से केंद्र सरकार शुक्रवार को बैकफुट पर आ गई है। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने एयरलाइंस खासकर इंडिगो को 10 फरवरी 2026 तक अस्थायी राहत दी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है, इंडिगो की अस्त-व्यस्तता ने सरकार को सुरक्षा नियम स्थगित करने के लिए मजबूर किया। नए नियमों से कोशिश की गई थी कि पायलट के काम के समय कम किए जाएं पायलट के संगठन ने नियमों में ढील देने के डीजीसीए के फैसले के लिए डीजीसीए की आलोचना की है और इस बात पर गंभीर चिन्ता जताई है कि कृत्रिम संकट खड़ा किया गया था। द हिन्दू – सरकार को देश की सबसे बड़ी विमान सेवा को 10 फरवरी तक नए नियमों का पालन करने से छूट देनी पड़ी। इंडिगो ने इस मामले में अपनी गलती मानी है और स्वीकार किया है कि क्रू की बढ़ी हुई आवश्यकता को उसने कम करके आंका। हिन्दुस्तान टाइम्स – डीजीसीए ने इंडिगो की मांग मानी, ड्यूटी नियमों में ढील दी। खबर में हाईलाइट करके बताया गया है कि उड़ान की बाधाओं को दूर करने के लिए डीजीसीए ने परिचालन संबंधी नियम लागू किए। क्रू के आराम करने के नियमों में छूट दी गई है और चार सदस्यों वाली एक उच्च स्तरीय समिति बनाई गई है जो इंडिगो का परिचालन बैठ जाने की स्वतंत्र समीक्षा करेगा और अपने निष्कर्ष 15 दिन के अंदर जमा करेगा। इंडियन एक्सप्रेस – डीजीसीए ने इंडिगो को नए नियमों से राहत दी। सरकार ने कहा 10 फरवरी तक एक बार की छूट है इसके बाद नए नियमों को हल्का नहीं किया जाएगा। दि एशियन एज – जांच जारी है, मामला संसद में उठाया गया। इससे पहले डीजीसीए ने पायलट और उनके एसोसिएशन से सहयोग करने की अपील की थी। इसमें इस बात का ख्याल रखने के लिए भी कहा था कि यह यात्रा का समय है, मौसम खराब है और यात्रियों की संख्या बढ़ रही है।  

कुल मिलाकर, हालत यह है कि देश नए नियमों की भूलभुलैया में फंसा हुआ है। इंडिगो संकट से लेकर श्रम-कानून, किसान-कानून और लॉकडाउन तक — क्या यह शासन-शैली का पैटर्न है? भारत में पिछले एक दशक में जिस तरह नियम, कानून और सरकारी निर्देश आते-जाते रहे हैं, उससे एक मूलभूत प्रश्न बार-बार उभरता है—क्या यह केवल प्रशासनिक असावधानी है या शासन-शैली का एक स्थायी पैटर्न? मीडिया वाले बताएं या नहीं इंडिगो संकट भी इसी सवाल की कड़ी बनकर सामने आया है। नए एयरक्रू फटीग नियम लागू किए गए, एयरलाइन ने समय रहते तैयारी नहीं की, यात्रियों को भारी परेशानी हुई, और अंत में सरकार को नियमों को आंशिक रूप से “फ्रीज़” करना पड़ा। इससे संबंधित अखबारों की खबरों के बारे में ऊपर लिख चुका हूं। समस्या सिर्फ इंडिगो या उसके मामले में किए गए सरकारी फैसले से नहीं है। कानून जैसे बनाए जाते रहे हैं और बड़े फैसलों के क्रियान्वयन में असंगतता, इनकी गति और कभी-कभी मनमानेपन का यह सिलसिला कई क्षेत्रों में दिखता है। हाल में श्रम कानून उससे पहले किसान कानून, नोटबंदी, जीएसटी, आधार-संबंधित नीतियाँ, कोविड प्रबंधन, पीएम केयर्स, पेगासस और अब यह नया एयरक्रू फटीग नियम। पारदर्शिता की कमी और संवादहीनता की स्थिति अपनी जगह है। इंडिगो संकट भी ऐसा ही लगता है। समस्या नियमों से नहीं, सरकार –एयरलाइन – नियामक में तालमेल न होने या मनमानी या सरकार की कार्यशैली से है। पायलट और क्रू के लिए नए नियमों का उद्देश्य स्पष्ट था। उन्हें आराम के लिए पर्याप्त समय देना। इस तरह सुरक्षा बढ़ाना। लेकिन नियामक (डीजीसीए) ने जो समय दिया था, उसका उपयोग इंडिगो जैसे सबसे बड़े ऑपरेटर ने नहीं किया—न नई भर्ती, न पर्याप्त रोस्टर-योजना। बेशक यह अकारण नहीं होगा और पूरे संकट से उसका नुकसान हुआ ही है। फिर भी वही पुराना रास्ता अपनाया गया —नियमों में त्वरित छूट। सवाल उठता है: जब नियम लागू करने की तैयारी नहीं थी, तो नियम बनाए क्यों? और अगर नियम सुरक्षा के लिए थे, तो एक एयरलाइन की अव्यवस्था के कारण नियम “फ्रीज़” क्यों हुए? यह एक ऐसी प्रशासनिक अस्पष्टता है जो इस सरकार में बार-बार देखने को मिलती है। कई घटनाएँ गवाह हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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