
संजय कुमार सिंह
आज अखबार देखने से पहले एक्स पर रजत शर्मा की यह पोस्ट दिखी। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा का इको सिस्टम संसद में राहुल गांधी ने जो कहा उसके प्रभाव को कम करने के लिए लगा दिया गया है। रजत शर्मा ने जो कहा उसका यह जवाब मैंने उन्हें दिया है, दोनों बातें आप ही कर रहे हैं – कांग्रेस ने अपने चुनाव आयुक्त बनाए, तब बूथ लूटे जाते थे लेकिन बार-बार चुनाव रद्द भी होते थे। पुनर्मतदान कराना पड़ता था। मेरा कहना है कि यही तो मुद्दा है। अब चुनाव आयोग शिकायत तो करता है, जांच का नाटक भी करता है लेकिन सीआईडी की चिट्ठी का जवाब नहीं दे रहा है। असल में जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। जांच भाजपा नेता की तरफ बढ़ रही है। पैसे देकर वोट कटवाने का मामला लग रहा है। चुनाव आयोग से दूसरी शिकायत है कि पांच बजे के बाद वोट बढ़ते हैं। चुनाव आयोग उसका वीडियो नहीं दे रहा है। उसके लिए कानून भी बनाया गया है। एक्स पर दूसरी पोस्ट अमित मालवीय की है। उन्होंने कहा है कि 1950 के दशक में, उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में, चुनाव आयोग ने नियम बनाया था: चुनाव परिणामों को केवल 45 दिनों के भीतर ही चुनौती दी जा सकती है। इन 45 दिनों के बाद, सर्वोच्च न्यायालय भी चुनाव प्रक्रिया की जांच का आदेश नहीं दे सकता। तो फिर कानूनी रूप से चुनौती देने योग्य अवधि के बाद सीसीटीवी फुटेज रखने का क्या उद्देश्य है? जाहिर है 45 दिन में चुनौती देने का नियम था (है) पर इसके बाद रिकार्ड नष्ट करने का नियम नहीं था।
अगर होता तो सोनिया गांधी का 1980 का रिकार्ड नहीं मिलता और उसपर आपराधिक जांच का मामला नहीं बनता और उन्हें उनके जन्म दिन पर कल ही अदालत का नोटिस नहीं मिलता। इसलिए सरकारी रिकार्ड जो जनता के पैसे से तैयार हो नष्ट करने का कोई मतलब नहीं है। तमाम रिकार्ड रखे जाते हैं तो चुनाव के क्यों नहीं? नागरिकों से उनके पुराने रिकार्ड मांगने का नियम है, मांगे जाते रहे हैं और पुराने मामलों में कार्रवाई होती रही है। चुनाव के मामले में क्यों नहीं? 45 दिन का नियम क्यों नहीं बदला गया खासकर तब जब इस सरकार ने तमाम नियम बदले हैं। चुनाव आयुक्त के चयन और सुरक्षा का भी? जाहिर है कि सरकार के पास बचाव के तर्क नहीं हैं लेकिन सत्ता, पैसा और प्रचारक बचाव में लगा दिए गए हैं। अखबारों की खबरों के मामले में चर्चा थी कि प्रधानमंत्री कार्यालय से निर्देश जाते हैं और खबरें उसी अनुसार छपती हैं। मैं यहां यही बताने और साबित करने की कोशिश करता हूं। अभी उस अधिकारी को हटा दिए जाने और फिर हंगामा मचने पर वापस रख लिए जाने तथा संसद में चर्चा को रिकार्ड से हटा दिए जाने जैसे मामले हैं और पता नहीं जोशी जी अपना काम कर रहे हैं या नहीं और कर रहे हैं तो कितनी गंभीरता से या उन्हें कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है। इसलिए भाजपा के उपरोक्त बचाव और प्रचार के बावजूद चुनाव सुधार पर चर्चा तथा इस बहाने वोट चोरी की खबरें कई अखबारों में पहले पन्ने पर है। मेरे नौ में से दो ही अखबार ऐसे हैं जिनमें ये खबर आज पहले पन्ने पर नहीं है। ये अखबार हैं, अंग्रेजी में द हिन्दू और हिन्दी में अमर उजाला।
कई अखबारों में यह लीड है और कुछेक में सेकेंड लीड। रजत शर्मा ने लिखा है, कांग्रेस ने एसआईआर पर चर्चा की मांग बड़े ज़ोर-शोर से की थी। लगा था राहुल गांधी के पास काफी मसाला होगा, पर उन्होंने कोई नई बात नहीं बताई। तथ्य यह है कि राहुल गांधी की जो बातें पूर्व में पहले पन्ने पर नहीं छपी थीं आज छप गईं। इसलिए कांग्रेस को तो फायदा हुआ ही है लेकिन प्रचार कुछ और हो रहा है। आइए देखें कि आज चुनाव सुधार पर चर्चा और राहुल गांधी के आरोपों की खबर कैसे छपी है। अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स में यह खबर टॉप पर दो कॉलम में है। इसका शीर्षक है, “वोट चोरी सबसे बड़ा राष्ट्र विरोधी कृत्य : राहुल गांधी”। देशबन्धु में यह खबर छह कॉलम की लीड है। शीर्षक है, चुनाव आयोग के जरिए लोकतंत्र खत्म कर रही सरकार। अखबार ने निशिकांत दुबे का जवाब भी साथ में पर्याप्त प्रमुखता से छापा है। रजत शर्मा ने लिखा है, बीजेपी ने निशिकांत को राहुल के तुरंत बाद बोलने के लिए रिजर्व रखा था। तीर निशाने पर लगा राहुल ने कहा कि बीजेपी ने चुनाव आयोग पर कब्ज़ा कर लिया है। निशिकांत ने गिनवा दिया कि कांग्रेस ने शेषन से लेकर गिल तक तक कैसे अपने लोगों को नियुक्त किया। राहुल ने इल्ज़ाम लगाया था कि बीजेपी सीबीआई, ईडी का इस्तेमाल करती है। निशिकांत ने गिनवा दिया कि कांग्रेस ने कैसे-कैसे लोगों को सीबीआई और ईडी में नियुक्त किया था। अखिलेश यादव भी क्रॉसफायर में आ गए। उन्होंने बैलेट से चुनाव की बात कह दी। निशिकांत ने याद दिलाया कि जब बैलेट था तो कैसे बूथ लूटे जाते थे।
मुद्दा यह है कि बूथ लूटे जाते थे तो कार्रवाई भी होती थी। पुनर्मतदान भी होते थे और तब अम्पायर की बेईमानी या लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं होने की शिकायत नहीं थी। वैसे भी कांग्रेस ने गलत किया तभी तो भाजपा यहां तक पहुंच पाई। वरना कांग्रेस ने भी यही किया होता तो भाजपा कैसे बढ़ती? यही नहीं, कांग्रेस ने गलत किया तो भाजपा को भी गलत करने का अधिकार नहीं है। भाजपा कांग्रेस को कोस कर ही तो सत्ता में बनी है और काम वही कर रही है या उससे भी बुरा। घोषित इमरजेंसी बनाम अघोषित इमरजेंसी – लेकिन अभी वह मुद्दा नहीं है। अंग्रेजी अखबारों में द हिन्दू में यह खबर पहले पन्ने पर है ही नहीं और इंडियन एक्सप्रेस में सेकेंड लीड है। फ्लैग शीर्षक है, लोकसभा चुनाव सुधार पर चर्चा में आरोपों की बरसात। मुख्य शीर्षक है, विपक्ष ने बैलट पेपर पर वापस जाने की मांग की, राहुल ने चुनाव आयुक्तों को दी गई सुरक्षा पर सवाल उठाया। इसके साथ छपी दो खबरों में सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, विपक्ष के नेता ने कहा कि चुनाव आयोग सत्ता में बैठे लोगों के साथ मिलकर चुनाव को आकार दे रहा है। दूसरी खबर दो कॉलम में है, भाजपा और सहयोगियों ने पलटवार किया : लोकतंत्र का गला घोंटा, जनता ने खारिज कर दिया तो ईवीएम का विरोध कर रहे हैं।
यहां मुद्दा यह है कि ईवीएम का विरोध भाजपा ने भी किया था और सत्ता में आने के बाद तमाम भ्रष्ट नेताओं के साथ ईवीएम भी वाशिंग मशीन में धुल गई है। इस पर मेरी एक किताब है, ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली। हालांकि, यह अलग मुद्दा है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, लोकसभा में चुनाव सुधार पर चर्चा में वोट चोरी, एसआईआर पर गर्मी। यहां भी सिंगल कॉलम में राहुल गांधी का आरोप है और लगभग वही है जो इंडियन एक्सप्रेस में है। दो कॉलम की खबर भाजपा की है। इसका शीर्षक है, मुस्लिम समर्थक पार्टियां मतदाता सूची की सफाई का विरोध कर रही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में एसआईआर पर दो कॉलम की एक और खबर है। इसका शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा चुनाव आयोग मतदाता की नागरिकता नहीं तय कर सकता है, लेकिन इसकी जांच जरूर कर सकता है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर सेकेंड लीड है शीर्षक लगभग वही है जो टाइम्स ऑफ इंडिया में है। दि एशियन एज में यह खबर लीड है। शीर्षक है, राहुल ने वोट चोरी को ‘सबसे बड़ा राष्ट्र-विरोधी कृत्य’ बताया, भाजपा और चुनाव आयोग पर निशाना साधा। द टेलीग्राफ का मुख्य शीर्षक वह है जो मेरे किसी और अखबार का शीर्षक नहीं है – राहुल ने कहा (यह) आईडिया ऑफ इंडिया पर हमला है। इसका फ्लैग शीर्षक है, विपक्ष के नेता ने सदन में ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उठाया, चुनाव आयोग को ‘कब्जे में लिए जाने’ पर सवाल किया।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


