संजय कुमार सिंह
इस बार के बजट का सच सोशल मीडिया पर दिखा। किसी ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन से पूछा कि बजट में मध्य वर्ग के लिए क्या है? जवाब में वे कई सेकेंड तक कुछ बोल नहीं पाईं और चेहरे की अभिव्यक्ति आप अपने तरीके से पढ़ सकते हैं। बजट पेश करना शुरू होने से पहले टेलीविजन पर और सोशल मीडिया पर भी यही प्रचार था कि निर्मला सीतारमन रिकार्ड नौवीं बार बजट पेश करने का रिकार्ड बना रही हैं और मोदी सरकार ने 12 लाख तक की आय को कर मुक्त कर दिया है जबकि पहले इतने पर टैक्स लगता था। यह भी कि पहले सैनिकों के पास गर्म कपड़े नहीं होते थे अब बुलेट प्रूफ जैकेट हैं। बेशक यह विकास है लेकिन बजट के आकार का भी विकास हुआ है और वह रुपए के अवमूल्यन के कारण भी है। वरना भारत में रुपए से पहले पैसे भी चलते थे और बहुत सारे काम पैसों में ही निबट जाते थे। चीजों को पेश करने का अपना तरीका होता है और हेडलाइन मैनेजमेंट के इस जमाने में अखबारों के शीर्षक से बजट को समझना मुश्किल है। प्रचार पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का था। उसमें देरी हुई और जापान से आगे निकल जाने का प्रचार होने लगा। इसमें आंकड़ों को संदिग्ध कहा जाना शामिल है। इसके साथ यह तथ्य भी कि नोटबंदी के बाद 50 दिन में सपनों का भारत बनाया जाना था, 100 दिन में विदेश में रखा काला धन वापस आना था। उसका तो पता नहीं चला बजट 2026 में घोषणा की गई है कि विदेश में अघोषित संपत्ति/आय रखने वालों के लिए छह महीने की एकमुश्त समाधान योजना है। इसके तहत, एक करोड़ रुपये तक की विदेशी संपत्ति की घोषणा पर केवल 30% जुर्माना और टैक्स लगेगा, जेल नहीं होगी। आप जानते हैं कि दलालों के जरिए या अवैध तरीके से मेहनत करके कमाने गए लोगों को तो हथकड़ियों में वापास भेजा गया लेकिन कमाई की घोषणा नहीं करने वालों को जेल नहीं होगी, उन्हें सिर्फ हिस्सा देना होगा।
जो भी हो, नरेन्द्र मोदी ने सत्ता में आने से पहले कांग्रेस की सरकार को भ्रष्ट बताया था। कहा था कि स्विस बैंक में भ्रष्ट तरीकों से कमाया गया भारतीयों का इतना पैसा है कि उसे वापस ले आया जाए तो हर किसी को 15 लाख मिलेंगे। उनका यह भी आरोप था कि रिश्वत के पैसे विदेश में लिए जाते हैं और शेल कंपनियों के जरिए भारत में ही निवेश कर दिए जाते हैं। इसे रोकने के लिए शेल कंपनियां बंद करवाई गईं और इनकी संख्या लाखों में है। हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट में बताया गया था कि किनकी शेल कंपनियां बंद नहीं हुईं और उनकी जांच भी नहीं हुई। जांच की मांग करने वाले राहुल गांधी को सजा हुई, सदस्यता चली गई और बंगला खाली करा लिया गया। अब खबर है कि निचली अदालतों के जजों का तबादला सरकार के दबाव में नहीं होना चाहिए, पर होता है और हुआ है। इस तरह, मोटे तौर पर हुआ यह कि जिनपर भ्रष्टाचार से कमाने का आरोप था वह साबित नहीं हुआ और 10 साल की सरकार के दौरान विदेश में जिन लोगों ने कमाई की, धन-संपत्ति बनाई उन्हें अब छूट दी गई है कि वे घोषणा कर दें तो सजा नहीं होगी। इसके अलावा विदेशी संस्थागत निवेश और विनिवेशीकरण से संबंधित नियमों में ऐसे बदलाव किए गए हैं कि अब करोड़ों के विदेशी निवेश भारत आएंगे और सरकार के स्वामित्व वाली इकाइयों में निजी या विदेशी निवेश बढ़ जाएगा। दूसरी ओर, शेल कंपनियां बंद होने से पहले जो निवेश आ रहा था वह सही हो या गलत – अब उस तरीके से नहीं आएगा और असल में जो हुआ वह यह कि जो तरीका इस सरकार को पसंद है वह चलेगा और जो पसंद नहीं है वह बंद हो गया या कर दिया गया। शेल कंपनियां बंद करने के नुकसान या मकसद या जरूरत कोई मुद्दा नहीं है। जाहिर है, सरकार मनमानी कर रही है। और बात इतनी ही नहीं है।

पहले की सरकार पर जो आरोप लगाए गए वे सही साबित नहीं हुए और उन्हें मुफ्त में बदनाम किया गया। यह चुनावी राजनीति में अनुचित लाभ उठाना है और चुनाव में लेवल प्लेइंग फील्ड का ख्याल नहीं रखा जाता है। वोट चोरी और चुनाव चोरी के जो आरोप हैं, सो अलग। ऐसे में आज बजट की खबरों की द टेलीग्राफ की प्रस्तुति अनूठी है। कोलकाता के इस अखबार में बजट की खबरें दो हिस्से में हैं। पहली मुख्य खबर, ट्रम्प के टैरिफ की मुश्किलों के बीच विनिर्माण पर फोकस की है तो दूसरी पश्चिम बंगाल में शासन कर रही तृणमूल कांग्रेस का आरोप है। इसके अनुसार, बजट में बंगाल के लिए कुछ नहीं है, भाजपा जानती है कि वह चुनाव हारेगी। बंगाल से होकर गुजरने वाले फ्रेट कॉरिडोर से संबंधित घोषणा के बारे में ममता बनर्जी ने कहा है, इसका प्रस्ताव उन्होंने 2009 में ही किया था जब वे रेल मंत्री थीं। इस प्रस्तुति में बजट से संबंधित पहली खबर को प्रूडेंस कहा गया है। डिक्सनरी में इसका एक मतलब ‘सावधानी’ है तो ‘पिट्टन्स’ के लिए – अल्पमात्रा भी लिखा है। इस तरह, स्पष्ट है कि बजट में राजनीतिक सावधानी है और जहां लाभ की उम्मीद नहीं है वहां कुछ खास नहीं है। इसका कारण, सुप्रिया श्रीनेत ने बताया है और उनकी मानें तो यह कटौती का बजट है और उसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। इसी तरह योगेन्द्र यादव ने कहा है कि इस बजट में किसानों के लिए कुछ नहीं है। इस तरह साफ है कि बजट में किसी के लिए कुछ नहीं है और यह कटौती का बजट है। मध्यम वर्ग के लोगों की चर्चा ऊपर हो चुकी है। फिर भी आज अखबारों में बजट, चुनौतियों के बीच उम्मीदों को रफ्तार देने वाला है (अमर उजाला) और नवोदय टाइम्स के अनुसार, स्पीडी बजट चोखा रंग है। हालांकि खास बातों में बताया गया है कि शेयर बाजार की प्रतिक्रिया निर्मम रही। दि एशियन एज की एक खबर के अनुसार, चुनावी राज्यों के लिए रेल कॉरिडोर और संरचनाओं में वृद्धि की घोषणा और परियोजना है। इनमें बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल जैसे राज्य हैं। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, मध्य वर्ग को मायूसी। इसके अलावा, किसानों की अनदेखी और बाजार को रास नहीं आया बजट जैसी शीर्षक भी पहले पन्ने पर हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा – शांति रखिए, बढ़ते जाइए। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, रिफॉर्म एक्सप्रेस कर्तव्य पथ पर बढ़ा। वैसे, यह बात दि एशियन एज की लीड के शीर्षक में है। द हिन्दू की खबर के अनुसार, केंद्रीय बजट में केंद्र सरकार के व्यय का लक्ष्य 12.2 लाख करोड़ रुपए है। उपशीर्षक में वित्त मंत्री के हवाले से कहा गया है, भारत को वैश्विक बाजारों के साथ गहरे एकीकृत रहना चाहिए जिससे दीर्घ अवधि के लिए स्थिर निवेश आकर्षित किया जा सके। बेशक यह जरूरी है और यह आवश्यकता पहले से महसूस की जा रही है। दूसरी ओर तथ्य यह है कि विदेशी निवेश वापस गया है, देशी बचत और निवेश दोनों कम है तथा स्थायी या स्थिर निवेश की कमी के कई कारण हैं। इसमें टैक्स आतंकवाद और भ्रष्टाचार भी एक कारण है जो इलेक्टोरल बांड से साफ हो गया था और भाजपा को मिलने वाले चंदे की राशि तथा प्रतिशत से भी इसका संकेत मिलता है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि विदेशी निवेश एक दूर की कौड़ी है और उस दिशा में प्रयास नगण्य है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, बजट अपने रुख पर कायम रहा और करों के बोझ से बाजारों को झटका दिया।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


