लखनऊ। राजधानी में एक बार फिर लखनऊ विकास प्राधिकरण की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ताज़ा मामला एक अधिवक्ता से जुड़ा है, जिनके प्लॉट की बाउंड्रीवाल को कथित रूप से बिना किसी पूर्व नोटिस के बुलडोज़र चलाकर गिरा दिया गया। घटना के बाद अधिवक्ता समुदाय में नाराज़गी और आक्रोश का माहौल है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार संबंधित अधिवक्ता का आरोप है कि उन्हें किसी प्रकार की पूर्व सूचना या नोटिस नहीं दिया गया। इसके बावजूद विकास प्राधिकरण की टीम भारी मशीनरी और बुलडोज़र के साथ मौके पर पहुंची और बाउंड्रीवाल को ध्वस्त कर दिया। अधिवक्ता का कहना है कि अगर कोई आपत्ति या तकनीकी आपत्ति थी तो नियमानुसार नोटिस जारी कर जवाब का अवसर दिया जाना चाहिए था।
इस कार्रवाई के बाद स्थानीय लोगों के बीच भी चर्चा है कि क्या बिना नोटिस इस तरह की कार्रवाई नियमों के अनुरूप है। सवाल उठ रहा है कि क्या प्राधिकरण आम नागरिकों के साथ कठोर और निरंकुश रवैया अपना रहा है। अधिवक्ता समुदाय का कहना है कि प्रशासनिक संस्थाओं का दायित्व कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करना है, न कि एकतरफा निर्णय लेकर संपत्ति को क्षति पहुंचाना।
घटना से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर भी प्रसारित हो रहे हैं, जिनमें बुलडोज़र द्वारा दीवार गिराए जाने का दृश्य देखा जा सकता है। वीडियो सामने आने के बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया है। अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि इस प्रकरण में पारदर्शिता और जवाबदेही तय नहीं की गई तो वे संगठित होकर आंदोलन की राह भी अपना सकते हैं।
कानूनी जानकारों का मानना है कि किसी भी प्रकार की ध्वस्तीकरण कार्रवाई से पहले विधिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक होता है, जिसमें नोटिस, सुनवाई का अवसर और आदेश की प्रति शामिल होती है। यदि ऐसा नहीं हुआ है तो यह गंभीर प्रशासनिक चूक मानी जाएगी।
अब देखना होगा कि उच्च अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेते हैं या नहीं। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो यह मुद्दा बार काउंसिल चुनाव के दौरान बड़ा विवाद बन सकता है और प्राधिकरण के खिलाफ व्यापक मोर्चाबंदी देखने को मिल सकती है।
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