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जेपी एसोसिएट्स अधिग्रहण विवाद के बीच वेदांता समूह और इसके चेयरमैन अनिल अग्रवाल के यहाँ ईडी के ताबड़तोड़ छापे, अडानी-वेदांता प्रतिस्पर्धा पर उठे सवाल

Portrait of a man in a suit and glasses, paired with a Hindi news headline about ED raids on a prominent figure or location.

जेपी एसोसिएट्स की परिसंपत्तियों को लेकर चल रही लड़ाई के बीच वेदांता समूह के ठिकानों पर ईडी के छापों ने कॉरपोरेट जगत और राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है, जिसमें अडानी और वेदांता समूह के बीच बढ़ती कारोबारी प्रतिस्पर्धा को भी चर्चा के केंद्र में रखा जा रहा है।

वेदांता समूह और अडानी समूह लंबे समय तक अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी मजबूत मौजूदगी रखते रहे हैं। वेदांता का मुख्य कारोबार खनन, एल्युमिनियम, जिंक, तांबा तथा तेल-गैस क्षेत्रों में रहा है, जबकि अडानी समूह ने बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में अपनी पहचान बनाई। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में दोनों समूहों ने अपने पारंपरिक कारोबारी दायरों से बाहर विस्तार शुरू किया, जिसके बाद कई बड़ी परियोजनाओं और अधिग्रहणों में दोनों आमने-सामने दिखाई देने लगे हैं।

जयप्रकाश एसोसिएट्स यानी जेपी समूह की परिसंपत्तियों के अधिग्रहण को लेकर हालिया विवाद इसी प्रतिस्पर्धा का प्रमुख उदाहरण माना जा रहा है। चर्चाओं के अनुसार इस प्रक्रिया में वेदांता और अडानी दोनों ने रुचि दिखाई थी। वेदांता की ओर से अधिक बोली लगाए जाने के दावे भी सामने आए, लेकिन परिसंपत्तियों के आवंटन को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। इसके बाद वेदांता समूह ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया।

इसी घटनाक्रम के बीच वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल से जुड़े ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की कार्रवाई चर्चा का विषय बन गई है। सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में कुछ लोगों ने सवाल उठाए हैं कि जेपी परिसंपत्तियों के मामले में कानूनी चुनौती की घोषणा के तुरंत बाद ईडी की कार्रवाई का समय संयोग है या इसके पीछे कोई अन्य कारण है।

टिप्पणीकारों का एक वर्ग यह भी कह रहा है कि देश में कारोबारी घरानों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा केवल बाजार तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उसके प्रभाव को सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि ईडी की कार्रवाई के पीछे एजेंसी की ओर से जो भी आधिकारिक कारण बताए जाएं, उनके सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी।

वेदांता समूह का नाम इससे पहले ओडिशा के नियामगिरि क्षेत्र में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना को लेकर भी राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है। वर्ष 2013 में स्थानीय आदिवासी समुदायों के विरोध के बाद कंपनी को वहां खनन योजना छोड़नी पड़ी थी। उस दौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी परियोजना के विरोध में मुखर रहे थे।

फिलहाल जेपी एसोसिएट्स परिसंपत्ति विवाद, सुप्रीम कोर्ट में संभावित कानूनी लड़ाई और वेदांता पर ईडी की कार्रवाई ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में अदालत की कार्यवाही और जांच एजेंसियों की आधिकारिक जानकारी के आधार पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह घटनाक्रम महज संयोग है या इसके पीछे कोई व्यापक कॉरपोरेट और कानूनी संघर्ष चल रहा है।

News headline about Anil Agarwal challenging Adani's B bid for assets and an F1 track. Photo shows a man in a dark suit with clasped hands, Reuters watermark nearby.

ईडी की तुरंत सर्विस: 31 मई के इकोनॉमिक टाइम्स में खबर छपी कि वेदांत ग्रुप के अनिल अग्रवाल ने जेपी एसोसिएट्स की संपत्तियां अडानी को दिये जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे और 48 घंटे के अंदर ईडी अनिल अग्रवाल के यहां रेड मारने पहुंच गई. इन संपतियों में भारत का एकमात्र फॉर्मूला 1 ट्रैक भी शामिल है जिसपर अडानी की नज़र थी. यहां ये याद रखना भी ज़रूरी है कि ये अनिल अग्रवाल वहीं हैं जिनकी ओडिशा के नियामगिरि में माइनिंग लीज़ के ख़िलाफ राहुल गांधी 2010 में खड़े हुये थे और 2013 में वेदांत ग्रुप को नियामगिरि के आदिवासियों के विरोध के चलते बॉक्साइट माइनिंग छोड़नी पड़ी थी. राहुल गांधी को मीडिया के जरिये बदनाम करने का कॉरपोरेट प्रोजेक्ट भी तभी शुरू हुआ था. राहुल गांधी तक तो ठीक था लेकिन अडानी के खिलाफ याचिका कैसे बर्दाश्त होती ईडी को. सुप्रीम कोर्ट अडानी और अनिल अग्रवाल दोनों में से किसके पक्ष में फैसला देगा, कोई 10वीं क्लास का बच्चा भी बता देगा.

-प्रशांत टंडन


आख़िर वेदांता और अडानी में मामला क्या है? क्यों वेदांता के ठिकानों पर आज ED के छापे पड़ रहे हैं? आजकल अक्सर सवाल उठता है कि वेदांता समूह और अडानी समूह के बीच खींचतान क्यों दिखाई देती है? असल में यह किसी व्यक्तिगत दुश्मनी का मामला नहीं, बल्कि देश के संसाधनों को जीमने की बढ़ती गला काट प्रतिस्पर्धा का नतीजा है।

जयप्रकाश एसोसिएट्स (जेपी) के अधिग्रहण की लड़ाई इसका ताज़ा उदाहरण है, जहाँ दोनों समूहों ने बोली लगाई और विवाद भी सामने आया, वेदांता की बोली ज्यादा थी लेकिन टेंडर अड़ानी को मिला। खिसियाकर वेदांता ग्रुप सुप्रीम कोर्ट चला गया।

और इधर यह खबर आ गई। भारतीय एजेंसियों की भूमिका सिर्फ़ विपक्षी दलों में ही खलबली मचाने की नहीं है बल्कि वे कारपोरेट घरानों के युद्ध में भी अपना रोल निभा रही हैं!

-शीतल पी सिंह


कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का बयान-

आज अनिल अग्रवाल की वेदांता ग्रुप पर ED ने रेड की. ED का आरोप है वेदांता ने FEMA के नियमों का उल्लंघन किया है. कुछ दिनों पहले वेदांता ग्रुप के अनिल अग्रवाल ने अडानी को कोर्ट में चुनौती दी थी, आज रेड हो गई. अनिल अग्रवाल ने JP Associates के अधिग्रहण मामले में अडानी को चैलेंज किया था – सार्वजनिक बयान भी दिया था. JP Associates की करीब $4 बिलियन (लगभग ₹14,500-17,000 करोड़) की संपत्तियों (रियल एस्टेट, पावर, सीमेंट प्लांट और बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट F1 ट्रैक सहित) की बोली लगी.

वेदांता ने ₹16,726 करोड़ (करीब $1.8 बिलियन) की सबसे ऊंची बोली लगाई. अनिल अग्रवाल के अनुसार, उन्हें लिखित रूप से highest bidder घोषित किया गया था, लेकिन बाद में फैसला पलट दिया गया. अडानी ग्रूप ने ₹14,535 करोड़ की बोली लगाई, जिसमें अपफ्रंट पेमेंट ज्यादा था. Committee of Creditors ने इसे बेहतर माना और फिर NCLT इलाहाबाद बेंच ने 17 मार्च 2026 को अडानी की योजना को मंजूरी दे दी.

वेदांता का आरोप है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी और अडानी के पक्ष में थी, CoC ने Evaluation metrics अडानी के फेवर में बनाए गए. वेदांता ने इसे “कॉमर्शियल साजिश” बताया और इसे NCLAT में चुनौती दी. फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां SC ने भी अडानी डील पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. अभी कानूनी मामला NCLAT में चल रहा है. अनिल अग्रवाल ने X पर कहा कि “संपत्ति से attachment नहीं है, लेकिन fairness मायने रखती है”.

तो भाई सेठों के लिए भी सबक है – मोदी जी की कितनी भी तारीफ़ कर लो, कितनी भी भक्तों कर लो – लेकिन अगर उनके मालिक अडानी की तरफ आंख उठाई तो क़ीमत ज़रूर चुकानी पड़ेगी, सबक़ ज़रूर सिखाया जाएगा. अडानी से पंगा नहीं लेने का!

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