ऋतु भंडारी-
मैं ऋतु भंडारी, अभी BHARAT UPDATE में कार्यरत हूँ। 30 मई को मैंने हिंदी खबर से इस्तीफा दिया था। जिसके बाद हिंदी खबर के सम्पादक की तरफ से ये पोस्ट किया गया। जोकि मेरी इमेज की खराब करने की कोशिश की जा रही है।
अब आप जरा कान खोलकर सुन लीजिए… अतुल अग्रवाल जी… मैं कल भी पत्रकार थी, आज भी पत्रकार हूँ और कल भी पत्रकारिता ही करूँगी। किसी एक संस्थान से मेरा करियर शुरू नहीं हुआ था और न ही किसी एक संस्थान पर खत्म होगा। ढाई साल तक मैंने पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम किया। जब तक मैं पूरी ईमानदारी के साथ काम कर रही थी। तब सब ठीक था, लेकिन जैसे ही मैंने आगे बढ़ने का फैसला किया, मेरे खिलाफ पोस्टर और झूठे आरोपों का सहारा लिया जाने लगा।
किसी की छवि खराब करने से न आपकी सच्चाई बड़ी हो जाएगी और न मेरी मेहनत छोटी। पत्रकारिता मेरे लिए नौकरी नहीं, मेरी पहचान है। मैं अपने काम से जवाब देना जानती हूँ और आगे भी देती रहूँगी।
हिंदी खबर से पहले भी मेरा अस्तित्व था, हिंदी खबर के दौरान भी था और हिंदी खबर के बाद भी रहेगा। नाम, पद और संस्थान बदल सकते हैं, लेकिन मेहनत, काबिलियत और सच बोलने का हौसला नहीं बदलता।”
याद रखिए, किसी की आवाज़ दबाने की कोशिश और किसी की छवि खराब करने की कोशिश में फर्क होता है। आवाज़ मेरी पहले भी बुलंद थी, आज भी है और आगे भी रहेगी।
आप पर इतने “प्यार भरे” अंदाज़ में लिखना शायद शोभा नहीं देता। आपका व्यक्तित्व और कार्यशैली मीडिया जगत के कई लोगों के लिए कोई नई बात नहीं है। आज यदि एक महिला पत्रकार के अपने अधिकारों के लिए खड़े होने से आपको असहजता महसूस हो रही है, तो यह वास्तव में विचारणीय है।
कल तक मैं आपके लिए “धोखेबाज़” थी और आज अचानक सम्मानजनक संबोधन मिलने लगा। यह बदलाव आपकी सोच और मानसिकता को ही दर्शाता है।
आप बार-बार नोटिस पीरियड की बात कर रहे हैं, इसलिए कुछ तथ्यों को सार्वजनिक करना ज़रूरी हो गया है।
5 नवंबर 2025 को भेजे गए अपने इस्तीफे की ईमेल में मैंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि मैं कंपनी की नीति के अनुसार एक महीने का नोटिस पीरियड सर्व करूंगी। यह मेरी लिखित प्रतिबद्धता थी।


लेकिन उसी दिन शाम को मुझे संस्थान के आधिकारिक ग्रुप से यह कहते हुए हटा दिया गया कि — “She is NOT with us anymore. तब कहां गई थी आपको नैतिकता, जिसका ढिंढोरा आप सोशल मीडिया पर पीट रहे हैं
अब मेरा सीधा सवाल है — जब मैं स्वयं लिखित रूप से नोटिस पीरियड सर्व करने की बात कर रही थी, तो मुझे वह नोटिस पीरियड सर्व करने क्यों नहीं दिया गया था। और आज आप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नोटिस पीरियड की बात कहकर नैतिकता की बात करते हैं। क्योंकि उस दौरान आपका इगो हर्ट हो गया था। की कैसे कोई कर्मचारी हमारे संस्थान को छोड़ कर जा सकता है। क्योंकि निकलने का अधिकार तो सिर्फ अतुल अग्रवाल जी के पास है।
ढाई साल तक मेरा काम मेरी मेहनत और मेरी पत्रकारिता ठीक थी लेकिन जैसे ही मैंने अपने करियर में कदम आगे बढ़ाए तो अचानक नियम अनुबंध और नैतिकता याद आने लगे आपको
आज सार्वजनिक मंच पर नोटिस पीरियड का मुद्दा उठाने वाले वही लोग हैं जिन्होंने कुछ घंटों के भीतर मुझे संस्थान से बाहर घोषित कर दिया था। और हाँ, नोटिस पीरियड सर्व करने की इच्छा मेरी थी, मौका देना संस्थान की जिम्मेदारी थी।
आज जब नोटिस पीरियड की बात हो रही है, तो क्या यह नियम केवल कर्मचारियों पर लागू होता है? जब किसी कर्मचारी को तत्काल प्रभाव से हटाया जाता है, तब क्या उसे नोटिस अवधि के बदले एक महीने का अतिरिक्त वेतन दिया जाता है? यदि कोई नीति है, तो वह दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। और यदि कोई स्पष्ट नीति है ही नहीं, तो फिर यह बहस किस आधार पर की जा रही है?
मुझे अपॉइंटमेंट लेटर तो दिया नहीं, ऑफर लेटर दिया जिसमें कहीं भी नोटिस पीरियड, वेतन त्यागने या ऐसी किसी अनिवार्य शर्त का उल्लेख नहीं है। मैंने संस्थान से केवल उतना ही वेतन लिया है जितना मैंने काम किया। एक दिन का भी अतिरिक्त पैसा नहीं लिया।

सच यह है कि इतिहास भी मौजूद है और स्क्रीनशॉट भी। फर्क सिर्फ इतना है कि शायद कुछ लोगों को उम्मीद थी कि मैं चुप रहूंगी।
मेरी तस्वीर और नाम का उपयोग करके मेरी छवि को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करना न तो पत्रकारिता है और न ही पेशेवर आचरण। आलोचना और चरित्र हनन में अंतर होता है।
मैं हर उस मंच और हर उस कानूनी प्रक्रिया का सहारा लूँगी जहाँ मुझे न्याय मिल सकता है। आवश्यकता पड़ी तो उच्चतम न्यायालय तक भी जाऊँगी, क्योंकि यह केवल मेरी लड़ाई नहीं है, बल्कि कार्यस्थल पर सम्मान और गरिमा की लड़ाई है।
मैं कल भी स्वतंत्र थी, आज भी स्वतंत्र हूँ और आगे भी रहूँगी। पत्रकारिता किसी व्यक्ति या संस्थान की जागीर नहीं है। और एक बात मुझे हमेशा हैरान करती है।
जब कोई महिला अपने अधिकारों, सम्मान और न्याय की बात करती है, तो अक्सर उसके तथ्यों का जवाब देने के बजाय उस पर “विक्टिम कार्ड खेलने” का आरोप लगा दिया जाता है।
जब तर्क कमजोर पड़ जाते हैं, तो कई लोग मुद्दे पर जवाब देने के बजाय महिला की मंशा पर सवाल उठाने लगते हैं। लेकिन इससे तथ्य नहीं बदलते, दस्तावेज़ नहीं बदलते और सच भी नहीं बदलता।
मैं किसी सहानुभूति की मांग नहीं कर रही हूँ। मैं केवल तथ्यों की बात कर रही हूँ, और तथ्यों का जवाब तथ्यों से ही दिया जाना चाहिए, आरोपों और विशेषणों से नहीं।
आप मुझे खरीद नहीं सकते, दबा नहीं सकते और न ही डरा सकते हैं। मैं पत्रकार थी, पत्रकार हूँ और पत्रकार ही रहूँगी। सत्यमेव जयते
क्या पक्ष रखा था अतुल अग्रवाल ने पढ़ें…




Ankush Sagar Saariya Thakur
June 2, 2026 at 8:17 pm
अम्मा चली गई बाबा चले गये।
बीवी चली गई बच्चे चले गये ।।
बचे थे सिर पर जो कुछ बाल वो बदनामी से चले गए ।।।
वाहवाही लूटने के चक्कर में सुना है संस्थान से कुछ और लोग थूक कर चले गये!
50 साल से ज़्यादा की पत्रकारिकता पर एक युवा लड़की ने “मानसिक रोगी अग्रवाल” को उनकी औकात दिखा दी और पुराने चैनल के साथ वाले चैनल मैं ही ज्वाइन कर लिया है ये तो ऐसा हुआ है जैसे थप्पड़ मार दिया और शान से सामने ही खड़ी है।
देख “मानसिक रोगी अग्रवाल” वो तुझ से कितनी बड़ी है।