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आज के अखबार : व्यापार करार की प्रशंसा वाले प्रधान मंत्री के प्रचार से भरे हैं, राहुल गांधी के आरोप लापता

संजय कुमार सिंह

इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड बताती है कि राजधानी दिल्ली में एआई समिट की शुरुआत होने वाली है। इसमें चर्चा के लिए दुनिया भर के अग्रणी लोग, बड़ी टेक्नालॉजी कंपनियों के प्रतिनिधि आने वाले हैं। इस लिहाज से आज इंडियन एक्सप्रेस को छोड़कर ज्यादातर कंपनियों के पहले पन्ने की खबर और लीड व्यापार समझौते की तारीफ करने वाली है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, व्यापार समझौते विकसित भारत की नींव, निजी क्षेत्र अब आक्रामक होकर आगे आएं। इस खबर का उपशीर्षक है – पीएम मोदी ने कहा, शोध एवं अनुसंधान, आपूर्ति श्रृंखला निर्माण और गुणवत्ता पर खर्च बढ़ाए निजी क्षेत्र…. बजट लोकलुभावन नहीं, रोजगार और विकास को बढ़ावा देने वाला है। कहने की जरूरत नहीं है कि आज जब दुनिया भर के विदेशी मेहमान शहर में हैं तो यह प्रचार प्रभावी रहेगा और सोची समझी योजना का भाग हो या नहीं, बजट के साथ व्यापार करार की भी प्रशंसा है जबकि उससे संबंधित राहुल गांधी के आरोपों का संतोषजनक जवाब नहीं है और सरकार की ओर से निशिकांत दुबे ने लोकसभा में यह प्रस्ताव किया है कि राहुल गांधी की सदस्यता खत्म की जाए और उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य करार दिया जाए। दूसरी ओर, अमेरिका के साथ व्यापार करार किसानों और भारत के टेक्सटाइल उद्योग के खिलाफ है – इस आरोप का संतोषजनक जवाब अभी भी नहीं मिला है। खबर सिर्फ देशबन्धु में पहले पन्ने पर है।

राहुल गांधी ने व्यापार समझौते पर फिर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि किसानों के साथ धोखा हो रहा है और खबर है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता ने भारत अमेरिका करार पर पांच सवाल पूछे हैं। सरकार और मीडिया के बड़े वर्ग ने इससे बचने के लिए प्रधानमंत्री के बयान को आगे कर दिया और सवाल को भी प्रमुखता नहीं दी। वह भी तब जब राहुल गांधी ने कहा है कि यह मुद्दा देश की कृषि के भविष्य से जुड़ा है। खबरों के अनुसार, एक्स पर अपनी पोस्ट में कांग्रेस सांसद ने लिखा है, किसानों को यह जवाब तो मिलना ही चाहिए। यह सिर्फ आज की बात नहीं है भविष्य की भी बात है कि हम किसी दूसरे को भारत के कृषि उद्योग पर लंबे समय की पकड़ बनाने दे रहे हैं। जवाब तो नहीं है – हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है,  “सुधार से नवाचार तक : प्रधानमंत्री ने दशक का एजंडा सेट किया”टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सेकेंड लीड है और पता चलता है कि यह पीटीआई को दिए गए इंटरव्यू का हिस्सा है। इसका शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा – रक्षा खर्च, उन्नयन सब मौजूदा वास्तविकताओं के क्रम में है। द हिन्दू में भी यह खबर लीड है और शीर्षक हिन्दी में इस प्रकार होगा – मोदी ने कहा, व्यापार करार शक्ति की स्थिति में रहते हुए किया गया है। इस खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि व्यापर करार की यह श्रृंखला एमएसएमई के लिए वैश्विक बाजार पहुंच का विस्तार करेगी। उन्होंने निजी क्षेत्र से अपील की है कि नीति संरचना का लाभ उठाएं।

कहने की जरूरत नहीं है कि निजी क्षेत्र लाभ उठाने और कमाने के लिए ही मैदान में हैं। लेकिन मोदी सरकार ने जिस ढंग से नोटबंदी और जीएसटी लागू किया उसमें उनकी कमर ही टूट गई है और स्थितियां ऐसी नहीं रहीं कि किसी की शिकायत सुनी गई हो या सुधार किए गए हों। जो किए और सुने गए उनकी कहानी सबको पता है। अभी मैं उनपर नहीं जा रहा हूं। दिलचस्प यह भी है कि प्रधानमंत्री ने कहा है और द हिन्दू ने हाईलाइट किया है, “यह मजबूरी से पैदा हुआ ‘अभी या कभी नहीं’ वाला क्षण नहीं है। यह तैयारी और प्रेरणा से पैदा हुआ ‘हम तैयार हैं’ वाला क्षण है। यह बजट एक विकसित राष्ट्र बनने की हमारी इस प्रबल इच्छा को दर्शाता है”। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री ऐसी बातें करने में उस्ताद हैं। प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते और ‘मन की बात’ चल रही है। नोटबंदी के जो लाभ बताए गए थे और उनमें कितने पूरे हुए या नहीं हुए तो क्यों नहीं हुए या जो कहा था उसका क्या मतलब था – कुछ नहीं बताया गया ना उसपर कभी कोई (सार्वजनिक) चर्चा हुई ना किसी ने जरूरत समझी। वह भी तब जब उन्होंने कहा था, “अगर 30 दिसंबर तक मेरी मंशा/कार्रवाई में कोई गलती निकल जाए तो आप मुझे देश के किसी भी चौराहे पर सज़ा दे सकते हैं — मैं तैयार हूँ।” उन्होंने यह भी कहा था कि इस निर्णय से कठिनाई तो होगी पर इससे लाभ भी मिलेगा और सरकार भ्रष्टाचार एवं काले धन के विरुद्ध आगे और कदम उठाएगी। नोटबंदी के बाद जनता और विपक्ष इसकी आलोचना कर रहे थे तब, 13 नवंबर 2016 को गोवा में उन्होंने यह बात कही थी।

इससे पहले नोटबंदी से हो रही परेशानी को अपनी वीरता बताने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, … अगर इंदिरा गांधी ने उस समय नोटबंदी कर दी होती तो उन्हें यह कदम उठाना नहीं पड़ता — इसका व्यापक रूप से ज़िक्र 2016–2017 के भाषणों और रैलियों में हुआ था। अपने भाषण में उन्होंने यह भी कहा था, 1971 में तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंतराव चव्हाण की एक समिति ने नोटबंदी की सिफ़ारिश की थी, लेकिन इंदिरा गांधी ने इसे नहीं अपनाया। इसके साथ उन्होने इंदिरा गांधी की जो आलोचना की थी वही इनकी राजनीति है और अभी उसका उल्लेख करने की जरूरत नहीं है। यह बयान उन्होंने हिमाचल प्रदेश के एक चुनावी रैली में 2017 में दिया था जब वे नोटबंदी के फैसले का बचाव कर रहे थे। कहने की जरूरत नहीं है कि इंदिरा गांधी ने नोटबंदी से होने वाली परेशानी के मुकाबले इससे हो सकने वाले लाभ की तुलना करके नोटबंदी नहीं करने का निर्णय किया होगा। जो भी हो, इंदिरा गांधी की आलोचना तो इन्होंने कर दी, नोटबंदी से लाभ नहीं हुआ और उसका अफसोस भी नहीं है। आज भी वही तरीका अपनाया जा रहा है और अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हैं। अखबारों का पूरा सहयोग है सो अलग। ऐसा ही जीएसटी के साथ हुआ और इन दोनों वजहों से देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई लेकिन प्रचार पूरा है। हालत यह हो गई है कि सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता संदिग्ध है। आईएमएफ ने भारत के जीडीपी और नेशनल अकाउंट स्टैटिस्टिक्स की गुणवत्ता पर टिप्पणी की है और उन्हें “सी ग्रेड” दिया है। अरुण कुमार और प्रोणब सेन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत के जीडीपी आंकड़े “कम विश्वसनीय” हैं। वे कहते हैं कि यह सही आर्थिक वास्तविकता नहीं दिखाते, खासकर अनौपचारिक सेक्टर के कारण। ये आंकड़े औपचारिक सेक्टर के डेटा से अनौपचारिक सेक्टर का अनुमान लगाकर तैयार किए जाते हैं, जिससे वास्तविक स्थिति और सरकारी दावा के बीच बड़ा अंतर हो सकता है।सब कुछ सार्वजनिक होने के बावजूद प्रधानमंत्री दावे कर रहे हैं और अखबारों ने इन्हें प्रमुखता दी है।

सब कुछ सार्वजनिक होने के बावजूद प्रधानमंत्री दावे कर रहे हैं और अखबारों ने इन्हें प्रमुखता दी है। नवोदय टाइम्स में प्रधानमंत्री के साथ इंटरव्यू की यह खबर लीड है। शीर्षक है, संरचनात्मक सुधार देश के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता : मोदी। निजी क्षेत्र को साहसिक ढंग से आगे आना होगा – अलग खबर है। मुझे नहीं लगता कि सरकार के पास ऐसी अपेक्षा करने का कोई आधार है। जो स्थितियां हैं उसमें देश की तमाम उड्डयन या विमान सेवाएं बंद हो गईं। सरकारी विमान सेवा एयर इंडिया को बेच दिया गया और जो चल रही थीं उनके लिए नियम ऐसे कड़े कर दिए गए कि वह लागू नहीं कर पाया और जब सख्ती की गई तो उसकी परिचालन सेवा पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई। बाद में नियमों को लागू करने का समय बढ़ाया गया और न सिर्फ एयरलाइन कंपनी पर जुर्माना लगा जीएसटी का नोटिस भी ठोंक दिया गया है। नागरिकों और कंपनी को जो नुकसान हुआ सो अलग। ऐसी हालत में निजी क्षेत्र से बिना लाभ के निवेश की उम्मीद करना बेमतलब है लेकिन सरकार की ‘योजना’ का प्रचार तो किया ही जा सकता है। दि एशियन एज का शीर्षक और भी व्यापक है। हिन्दी में यह कुछ इस तरह होता – प्रधानमंत्री ने बजट, एफटीए (विदेशी व्यापार करार) की प्रशंसा की और यूपीएम शासन में अर्थव्यवस्था को गलत ढंग से संचालित किए जाने की आलोचना की। यह अपने ही बजट की खुद तारीफ करने के साथ 2013 में झूठ आरोपों और फर्जी प्रचार से बेदखल कर दी सरकार की आलोचना है ताकि राहुल गांधी व्यापार करार पर जो चोट कर रहे हैं उसका राजनीतिक लाभ न मिले। द टेलीग्राफ ने मोदी के दावे को जस का तस परोस दिया है। फ्लैग शीर्षक है, (व्यापार करार)   सुधार के लिए किए गए प्रयासों की पुष्टि है : मोदी। मुख्य शीर्षक है, भारत वैश्विक व्यापार की स्थिति में है : प्रधानमंत्री। 

यह दिलचस्प है कि प्रधानमंत्री जब तमाम आरोपों से घिरे हुए हैं, एक पूर्व सेना प्रमुख की कथित अप्रकाशित आत्मकथा का अंश संसद में नहीं पढ़ने दिया गया और अगले ही दिन सत्तारूढ़ दल के सांसद तमाम किताबों का उल्लेख कर पाए। तो मुद्दा यह बना या बनाया गया कि किताब अप्रकाशित है और इसमें प्रतिबंधित किताब की भी चर्चा हो गई। मुद्दा यह नहीं बना या बनने दिया गया कि सेना प्रमुख की किताब को लोकार्पण की अनुमति क्यों नहीं दी गई। जब किताब और उसकी सामग्री की चर्चा हुई तो प्रतिबंधित किताब और पहले की सरकार के खिलाफ मौजूद किताबों को भूलकर भविष्य में लोक सेवकों को किताब लिखने से रोकने की व्यवस्था करने का काम चल रहा है। 20 साल तक किताब नहीं लिखने देने का नियम वह सरकार बनवाना चाहती है जिसके प्रचार में किताबों की संख्या अनगिनत है। यही नहीं, किताब नहीं पढ़ने देने वाले लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव आया तो इसका मतलब यह है कि प्रस्ताव पेश करने वालों को वे निष्पक्ष नहीं लगते हैं। जाहिर है लोकसभा अध्यक्ष को निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए भले वे किसी भी दल के सदस्य हों या टिकट पर जीते हों। ओम बिरला की भूमिका हमेशा सवालों में रही है और अब जब उसपर विचार लंबित है सरकार ने उन्हें बांग्लादेश में नई सरकार के शपथग्रहण में भेजा है जबकि बांग्लादेश से ठीक-ठाक संबंध भारत के लिए भी जरूरी है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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