विकास मिश्रा-
‘चन्दन किवाड़’ जबसे खोला था तबसे लेकर अब किवाड़ बंद करने तक एक अद्भुत सुगंध की अनुभूति कर रहा हूं। जानी मानी लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी जी की किताब ‘चन्दन किवाड़’ पढ़ते समय हमेशा ये लगा कि सामने कोई गीतांजलि फिल्म की तरह चल रही है और बैकग्राउंड में अनगिनत वाद्य बज रहे हैं।
‘चन्दन किवाड़’ के माध्यम से मालिनी अवस्थी अपनी जीवन यात्रा के बहाने हमारी परंपराओं और लोक संस्कृति की जड़ों तक ले जाती हैं, जहां जीवन के हजार रंग बिखरे हुए हैं। मंच पर उनके गायन को न जाने कितने पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं, लेकिन एक बच्चे का मंच पर आकर 10 रुपये दे जाना और ये कहना- ‘बस मंदिर में चढ़ाते हैं, इसलिए आपको दे दिया।‘ इससे बड़ा सम्मान भला और क्या हो सकता है। ऐसी ही तमाम अनुभूतियां इस किताब में हैं, जो भाव विह्वल कर देती हैं।
मालिनी अवस्थी जी के जितने लोकगीत लोक में प्रचलित हैं, अपनी किताब में सबकी कहानियां उन्होंने बताई हैं, जिन्हें पढ़कर कभी गुदगुदी होती है तो कभी रोमांच होता है तो कभी टीस भी उठती है। अटरिया सूनी पड़ी, रेलिया बैरन पिया को लिये जाए रे.., काहे को ब्याही बिदेस अरी हो लखिया बाबुल मोहे, सैयां मिले लरकइयां मैं क्या करूं, कचौड़ी गली सून कइला बलमू जैसे उनके गीतों की कहानियां दिल में उतर जाती हैं।
2000 में मॉरीशस के विश्व भोजपुरी सम्मेलन में आदरणीय बड़का बाबूजी पंडित विद्यानिवास मिश्र ने उन्हें आदेशित किया कि कार्यक्रम में यह गीत गाओ- छापक पेड़ छियुलिया..। एक हिरनी के विरह और उसके दर्द को किस तरह इस गीत में बांधा गया है, इस गीत के पीछे की कहानी पढ़कर आंखें बरसने लगीं, मन भीग गया।

चंदन किवाड़ में मालिनी अवस्थी की जीवन यात्रा है, गीत यात्रा भी है तो इस पड़ाव में मिले मील के पत्थरों से मुलाकात भी रोमांचक है। असगरी बाई से भेंट, राहत अली से मुलाकात, उस्ताद अफजल हुसैन नगीना साहब, रायबरेली के सामूहिक विवाह कार्यक्रम में गिरिजा देवी जी की सखी छुन्नी देवी से अचानक हुई मुलाकात का वर्णन भावुक कर देता है।
चूंकि मेरा भी जन्म वहां हुआ है, जहां भोजपुरी और अवधी का लगभग संगम है तो चंदन किवाड़ में वर्णित अधिकांश गीत मैंने अपने घर-गांव में सुने हैं। किताब पढ़ते हुए सभी गीतों की यादें ताजा हो गईं। हमारे यहां भी विवाह, जनेऊ, मुंडन, बरही जैसे उत्सवों में संझा उठती है, भोर गाया जाता है, सोहर गाया जाता है। धान की रोपाई में भी महिलाएं गाना गाती हैं, शादियों में बारातियों के लिए गारी गाई जाती है।
एक बात मैं समझ नहीं पाता था कि उत्सवों में खूब गाने होते थे, अचानक मेरी मां कहती थी- हे.. कौनो नकटा कढ़ाउ रे (हे कोई नकटा सुनाओ रे)। फिर नकटा गाया जाता था। नकटा कभी समझ में नहीं आया। चंदन किवाड़ पढ़कर ही जाना कि क्या है नकटा, क्या है नकटा के पीछे का दर्द और दर्शन। चंदन किवाड़ से ही नकटा का एक उदाहरण देता हूं। परदेस से 12 बरस के बाद लौटा पति पत्नी से पूछता है-
काहे को रानी मोरी, खुसमुस ठाड़ी
काहे खड़ी मनमारी चुनरिया भीजै तुम्हारी
अपने 12 वर्षों का दर्द बयान करते हुए पत्नी कहती है-
सास ननद मोसे पनिया भरावैं
बूढ़ा ससुर दै गारी चुनरिया भीजै हमारी
सास ननद मोसे चकिया चलवावैं
देवरा बुलावै अटारी चुनरिया भीजै हमारी
साफ है कि पति के बिना स्त्री की घर में कोई कद्र नहीं है। देवरा बुलावै अटारी.. से भी साफ है कि उसकी इज्जत भी सुरक्षित नहीं है। यह दर्द नकटा के माध्यम से वह स्त्री बयान करती है। एक वक्त था, जब ऐसे ही विरह के लिए अधिकांश महिलाएं अभिशप्त थीं। तब उनका दर्द नकटा जैसे गीतों के माध्यम से छलकता था। मालिनी अवस्थी लिखती हैं- ‘नकटा गीत अपने अवसाद, कुंठाओं और शिकवे-शिकायतों के सहज उत्सर्जन के लिए लिखे गए।‘
चंदन किवाड़ को आए काफी दिन हो गए, कई ऑनलाइन प्लेटफार्म पर उपलब्ध है। तमाम सम्मान इस किताब को मिल चुके हैं। कई समीक्षाएं लिखी जा चुकी हैं। मैं इस मामले में बहुत पीछे रह गया। क्या करूं, चंदन किवाड़ को बंद करने का कभी मन नहीं हुआ। पढ़ लिया, गुन लिया तो कुछ भाव यहां व्यक्त कर रहा हूं।
यह पोस्ट इस पुस्तक की कोई समीक्षा नहीं है। बस मनोभाव हैं। अगर आपने मालिनी अवस्थी के गीत सुने हैं तो यह किताब पढ़ते हुए आपको लगेगा कि पीछे गीत गंगा प्रवाहित हो रही है। अवध-पूर्वांचल की सभ्यता, संस्कृति, परंपरा, संस्कार और त्योहारों को समेटे हुए यह किताब एक धरोहर की तरह है। यह धरोहर हर घर में होनी चाहिए। अपने संस्कार, त्योहार और परंपराओं से थोड़ी दूर होती पीढ़ी को यह किताब वापस उन परंपराओं से जोड़ने की क्षमता रखती है। मैं तो कहता हूं कि अपनी लड़की की शादी में विदाई के वक्त एक-दो गहने भले ही कम दीजिए, लेकिन यह किताब जरूर दीजिए। अपनी बहू को मुंह दिखाई में भी चंदन किवाड़ दीजिए, क्योंकि यह किताब प्यार देगी, लोकगीतों की बहार देगी, परिवार देगी और संस्कार भी देगी।


