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आज के अखबार : नरवणे की किताब से सरकार की नाराजगी के बाद अब मुख्य न्यायाधीश नाराज हुए

संजय कुमार सिंह

यह खबर आज हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर नहीं है। मामला विचारधारा का लगता है। इससे इस आरोप या डर या शक को शक्ति मिलती है कि देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं का नेतृत्व एक ही विचारधारा के लोग कर रहे हैं (या उन्हें दे दिया गया है)। यह न सिर्फ संविधान के लिए, बल्कि नागरिकों की स्वतंत्रता के लिए भी खतरनाक है। सबसे बड़ी बात यह कि विचारधारा के आधार पर सरकार (और उसके जरिए पुलिस) के पक्षपाती व्यवहार तथा उसके समर्थन के उदाहरण दिख रहे हैं। चुनाव आयोग की मनमानी और जबरदस्ती तो दुनिया देख ही रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा अभी जो सब कर रही है और इसमें झूठे आरोप लगाना शामिल हैं, पहले की सरकारों ने किया होता तो भाजपा का जन्म ही नहीं होता, यहां तक पहुंचना तो असंभव था। यहां मुझे, “खैर, खून, खांसी, खुशी, बैर, प्रीति, मदपान, रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान” याद आता है।

आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, एनसीईआरटी की किताब से हटेगा न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का पाठ। इंडियन एक्सप्रेस की लीड भी इसी विषय पर है लेकिन शीर्षक थोड़ा अलग है। हिन्दी में यह कुछ इस तरह होता, एनसीईआरटी की किताब पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, किसी को संस्थान को बदनाम नहीं करने दूंगा। आज यह खबर दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने पर है लेकिन जिन अखबारों ने इस खबर को पहले पन्ने पर नहीं छापा या प्रमुखता नहीं दी उनके बारे में क्या समझा जाए? हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने या उससे पहले के अधपन्ने पर आज यह खबर नहीं है। क्या न्यायपालिका से संबंधित सूचना जानकारी देना उसे बदनाम करना है? क्या मुख्य न्यायाधीश का काम किसी संस्था (या न्यायपालिका) को बदनाम किए जाने से रोकना है, क्या रोकने का यह तरीका उचित है, क्या किताब से अध्याय हटा देना पर्याप्त है – बेशक सबकी राय अलग होगी। सर्वश्रेष्ठ का पालन किया जाना चाहिए और सर्वश्रेष्ठ का फैसला विचारधारा या सोच से होता है। आपके पास पूरी, स्वतंत्र सूचना होगी तो आप उस आधार पर फैसला करेंगे। जाहिर है उसपर विचारधारा का प्रभाव भी होगा। कांग्रेस के जमाने में मीडिया सूचना देने के लिए अपेक्षाकृत स्वतंत्र था। इतना कि देश को आरटीआई कानून तक दिया। मुझे लगता है कि देश को इसका जो लाभ मिलना था वह नहीं मिला। नुकसान हुआ सो अलग। कारण जो हो, उसके कुछ ही समय बाद देश में दूसरी विचारधारा की सरकार सत्ता में आ गई। आज की खबरों से मैं सत्ता बदलने के बाद आए अंतर को रेखांकित करना चाहता हूं।

इस सरकार को मीडिया से परेशानी सर्वविदित है। नतीजे में कुछ किताबें आईं। कम से कम एक के लेखक को तो परेशान किया ही गया किताब चर्चित हो गई। पहले की किताबों और बाद की चर्चा से यह तय किया गया लगता है कि किताबों की चर्चा नहीं करनी है या उन्हीं की करनी है जिससे फायदा हो। लेकिन वह अलग मुद्दा है। जनरल एमएम नरवणे की किताब चर्चा में आने से पता चला कि सरकार ने उसके प्रकाशन की अनुमति नहीं दी थी। हालांकि, मना भी नहीं किया था और यह फैसला नहीं करने के अधिकार का उपयोग (या दुरुपयोग) है। राज्यपालों के इस अधिकार के लिए सुप्रीम कोर्ट में चर्चा हुई। इसे मुद्दा बनाया गया और यह भी विचारधारा का मामला था। किताब नहीं छपने देना और छपी हुई किताब की चर्चा नहीं करने देने के साथ खबर आई कि सरकार रिटायर होने वाले सरकारी बाबुओं को 20 साल तक किताब नहीं लिखने देने का नियम बनाने पर विचार कर रही है। यही नहीं, सरकारी जानकारी देने पर आधिकारिक गोपनीयता कानून के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई। मेरा मानना है कि ऐसा किया जाए तो कानून और अधिकार का दुरुपयोग होगा लेकिन यह अलग मामला है पर विचारधारा से जुड़ा है। ऐसे में एनसीईआरटी जैसी सरकारी संस्था स्कूली बच्चों के लिए अपनी किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसे विषय पर अध्याय डाल सकती है तो यह अलग विचारधारा का मामला है। मुख्य न्यायाधीश ने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश माना तो यह विचारधारा की समानता है। हालांकि, अभी इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि ऐसा हुआ।  इसका मतलब (यह भी) है कि विचारधारा नीचे तक नहीं पहुंची है। लोगों को अभी भी पहले जैसी उदारता की उम्मीद है या दूसरी विचारधारा के लोग अभी भी निर्णायक स्थिति में हैं। जहां तक मुख्य न्यायाधीश की नाराजगी का मामला है यह उनके अधिकार और विवेक के तहत है। मैं यहां उसकी चर्चा नहीं कर रहा हूं।

मैं चाहता हूं कि हर विषय पर चर्चा हो। इसलिए खबर यह है कि टाइम्स ऑफ इंडिया में मुख्य न्यायाधीश की खबर सेकेंड लीड है। दि एशियन एज में यह खबर पहले पन्ने पर छह कॉलम में है।  नवोदय टाइम्स में यह सात कॉलम में बॉटम है। इसके बावजूद किताब के अध्याय पर या किताब पर रोक लगाकर क्या समस्या का समाधान हो जाएगा? यह संभव नहीं है। अब कहां, किस पर कौन चर्चा कर रहा है इसपर नजर रखी जाती है और इसका विरोध होता रहता है। बैंगलोर में अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के खिलाफ कल ही प्रदर्शन किया गया। इसमें आरोप लगाया गया कि संस्थान में आयोजित एक कार्यक्रम, अलगाववाद और जम्मू-कश्मीर के विभाजन को बढ़ावा दे रहा था और यह भारतीय सेना का अपमान था। नारे लगाते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने विश्वविद्यालय की नेमप्लेट पर काली स्याही पोत दी और दावा किया कि यह घटना भारत और कश्मीर को “बांटने” के एक बड़े एजेंडे का हिस्सा थी। कहने की जरूरत नहीं है कि अगर कुछ गैर कानूनी हो रहा था तो उसकी शिकायत पुलिस में की जानी चाहिए थी। हालांकि, पुलिस का पक्षपाती रुख भी कल ही सामने आया। खबर है कि एआई समिट में युवक कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में दिल्ली पुलिस ने शिमला से तीन युवकों को गिरफ्तार किया और उन्हें लेकर वापस आ रही थी तो हिमाचल पुलिस ने एक नाके पर उन्हें रोक लिया। नियम है कि किसी भी क्षेत्र में बाहर की पुलिस स्थानीय पुलिस को जानकारी दिए बगैर कार्रवाई नहीं कर सकती है। इस मामले में हिमाचल प्रदेश की पुलिस ने दिल्ली पुलिस के करीब 20 अधिकारियों-कर्मचारियों की तीन गाड़ियों को रोक लिया है। जाहिर है, राज्यों की पुलिस के इस टकराव को कोई तीसरा ही निपटा सकता है। मुख्य न्यायाधीश इनमें शामिल हैं लेकिन न्यायपालिका के भ्रष्टाचार के अध्याय से होने वाली बदनामी को रोकने को उन्होंने प्राथमिकता दी। मुझे लगता है कि यह सब इस सरकार की कार्यशैली का परिणाम है और खबर तो है ही। ऐसी कोई खबर पहले पन्ने पर नहीं है यह भी खबर है। प्रतीकात्मक विरोध से सरकार को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। लेकिन दिल्ली में प्रतीकात्मक विरोध से सरकार परेशान है। युवाओं के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई की जा रही है और जबरदस्ती के गैर जरूरी विरोध तथा नाम की तख्ती पर कालिख पोतने जैसी कार्रवाई की गई है या होने दी गई। दिलचस्प यह है कि भाजपा के लोग युवक कांग्रेस के प्रदर्शन का तो विरोध कर रहे हैं लेकिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदर्शन का समर्थन कर रहे हैं। जो भी हो, खबरें मिली-जुली नहीं, अलग-अलग हैं।

देशबन्धु में कल यह खबर पहले पन्ने पर थी और मैंने कल यहां इस बारे में लिखा था। आज यहां यह खबर पांच कॉलम की लीड है। शीर्षक है, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार चैप्टर पर सुप्रीम कोर्ट नाराज। मेरा मानना है कि मुद्दा न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है और अगर अभी तक मुख्य न्यायाधीश की जानकारी में नहीं था तो उन्हें अब इस पर काम करना चाहिए या कहना चाहिए यह गलत है। तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। अगर सही है तो उसकी चर्चा बदनाम करना नहीं है, उसे खत्म करने की कोशिश भी हो सकता है। हालांकि, यह सब मेरी चिन्ता का विषय नहीं है और मैं सिर्फ खबरों की बात करता हूं। आज खबर है, मुख्य न्यायाधीश ने कहा, संस्था का प्रमुख होने के नाते किसी को भी संस्था को बदनाम करने उसकी गरिमा को धूमिल करने की अनुमति नहीं देंगे। किसी भी कीमत पर इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। लेकिन खबर से यह पता नहीं चलता है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर मुख्य न्यायाधीश ने क्या कहा या क्या सोचते हैं। तमाम अखबारों की खबरों में बहुत सारी बातें हैं पर यह नहीं है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार एक गंभीर मुद्दा है और नहीं है तो उसकी चर्चा क्यों है और है तो उसे दूर कैसे किया जाएगा। द हिन्दू में एक खबर जरूर है, पूरे पश्चिम बंगाल में न्यायिक कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि सैकड़ों न्यायिक अधिकारी एसआईआर में व्यस्त हैं। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस सांसद साकेत गोखले ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा है,  अमित शाह के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बंगाल में एसआईआर को इस तरह मैनिपुलेट किया:

1. एसआईआर प्रक्रिया, जिसमें आठ महीने लगते हैं, उसे तीन महीने में जल्दबाजी में पूरा किया गया।

2. 1.67 करोड़ वोटर्स को हटाने की कोशिश करने के लिए रहस्यमयी एआई सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया।

3. जब वह फेल हो गया, तो ज्ञानेश कुमार ने भाजपा समर्थक अधिकारियों को “माइक्रो-ऑब्जर्वर” नियुक्त किया और उन्हें “व्हाट्सऐप्प पर गैर आधिकारिक ऑर्डर” के ज़रिए वोटर्स को हटाने के गैर-कानूनी अधिकार दिए।

4. जब हमारी नेता ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट जाकर अपील की तो आखिरकार सर्वोच्च अदालत ने दखल दिया।

इस तरह, ईसीआई और ज्ञानेश कुमार की वजह से, 80 लाख वैध मतदाताओं की सुनवाई सिर्फ़ तीन दिनों में पूरी करनी पड़ी क्योंकि उन्हें “लॉजिकल डिसक्रिपेंसीज़” के नाम पर अलग करने के लिए एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया था। आज, बंगाल में आठ मिलियन वोटर्स के नाम सिर्फ़ ईसीआई की हेराफेरी और धोखाधड़ी की वजह से डिलीट होने का खतरा है। इसलिए सीईसी ज्ञानेश कुमार को बीजेपी की मदद करने और भारत की  चुनावी प्रक्रिया को बर्बाद करने के लिए जेल जाना चाहिए। मुझे लगता है कि यह मुख्य चुनाव आयुक्त को बदनाम करने के लिए नहीं, सच्चाई है। द टेलीग्राफ की खबर है, मुख्य मंत्री को डर है कि एसआईआर के तहत 1.2 करोड़ मतदाता हटा दिए जाएंगे। ममता बनर्जी ने कहा है, पहले 58 लाख नाम (अनुपस्थित, निवास बदल लिया, मृत या डुपलीकेट कहकर) हटाए गए। इसके बाद एक ऐसे नियम के तहत जो पहले नहीं था, गुप्त तरीके से 50 लाख नहीं, 80 लाख नाम हटाए जाएंगे। यह लॉजिकल डिसक्रिपेंसी (तार्किक विसंगति) के तहत किया जा रहा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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