प्रियदर्शन-
सुबह एक मिस कॉल थी- नंबर अपरिचित। क्रम देखकर अनुमान लगाया कि रांची का नंबर है। पलट कर फोन किया तो उधर सम्माननीय पत्रकार बलबीर दत्त निकले। उन्होंने सुबह ‘दैनिक भास्कर’ में मेरा लेख पढ़ा था।
सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशकों की रांची जिन्हें याद है, उन्हें यह भी याद होगा कि बलबीर दत्त के होने का क्या मतलब होता था। तब वे रांची से निकलने वाले पहले अकेले- और फिर सबसे बड़े- दैनिक ‘रांची एक्सप्रेस’ के संपादक थे। अपने दक्षिणपंथी रुझानों के बावजूद ‘रांची एक्सप्रेस’ अपने चरित्र में सत्ता-प्रतिष्ठान विरोधी अख़बार था। वह उन दिनों की रांची का आईना हुआ करता था। बलबीर दत्त की उपस्थिति इतनी वज़नी होती थी कि वे रांची की सबसे बड़ी शख़्सियत लगते थे।
मुझे याद है कि एक बार उन्हें आकाशवाणी आना था। मैं उन दिनों ‘रांची एक्सप्रेस’ में नियमित लिखने के अलावा आकाशवाणी में युववाणी के कैजुअल एनाउंसर के रूप में महीने में कुछ दिन ड्यूटी भी करता था। वे आए तब मेरे अलावा उन्हें कोई नहीं मिला। उन्होंने कहा कि वे लौट कर आ रहे हैं। मैंने सहज भाव से कहा कि ठीक है।
उनके जाते ही जो कार्यक्राम अधिशासी आए, उनके यह सुन कर ही हाथ-पांव फूल गए कि बलबीर दत्त आकर आकर चले गए हैं। एक हड़कंप सी मच गई जिसमें केंद्र निदेशक भी शामिल दिखे। सब सोच ही रहे थे कि क्या करें कि बलबीर जी लौट आए। सबकी सांस में सांस आई।

उन्होंने ऐसे समय में अखबार निकाला, जब पत्रकारिता की बुनियादी समझ रखने वाले लोग भी शहर में नहीं थे। उन्होंने ईंट-पत्थरों को भी रगड़-रगड़ कर पत्रकार बनाया। उनसे असहमति या असंतोष के अपने बिंदु रहे होंगे, लेकिन रांची की पत्रकारिता का वह दौर बलबीर दत्त का ही दौर था।
बेशक, बाद में कुछ दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों में ‘रांची एक्सप्रेस’ से अलग होकर उन्होंने ‘देशप्राण’ शुरू किया, हालांकि इसे वे वह कामयाबी और प्रतिष्ठा नहीं दिला सके जो ‘रांची एक्सप्रेस’ को हासिल थी। लेकिन उनकी अनुपस्थिति में रांची एक्सप्रेस नाम का बरगद भी सूखता-सूखता नष्ट हो गया। दिखता यही है कि मालिकान की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने एक शानदार समूह को कहीं का नहीं छोड़ा।
बहरहाल, बलबीर जी की सक्रियता और उनके जीवट में कोई कमी नहीं है। वे लगातार लिख रहे हैं। आपातकाल पर किताब लिख डाली, भारत विभाजन को लेकर किताब लिख डाली। अब भी खूब पढ़ते और लिखते हैं।
आज की बातचीत में उन्होंने बताया कि वे 90 पार के हो चुके हैं। मेरे लेख की उन्होंने तारीफ़ की। मैंने लिखा था कि इंटरनेट ने हमारी स्मृति ले ली है, एआई हमारी कल्पनाशीलता न छीन ले। उन्होंने एक और बात जोड़ी- एआई सबकुछ कर सकता है, सपना नहीं देख सकता। जबकि दुनिया में जो कुछ भी बदला है, वह सपनों की वजह से बदला है।
उन्होंने बताया कि आज़ादी की लड़ाई का आखिरी दौर उन्होंने देखा है। तब बहुत कम लोगों को उम्मीद थी कि अंग्रेज़ इस लड़ाई के आगे झुक जाएंगे। वे दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक ताक़त थे। लेकिन देश को आज़ाद कराने का सपना न होता तो यह सच्चाई में नहीं बदलता। तब किसी एआई से सलाह मांगी जाती तो वह सभी स्थितियों का विश्लेषण कर यही कहता कि यह लड़ाई बेकार है, इसे छोड़ देना चाहिए। लेकिन आज़ादी का सपना था इसलिए सच हुआ।
मुझे खयाल आया। कभी उन्होंने सपना देखा होगा, तभी रांची का पहला अख़बार निकाला।


