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सोचिए, मोदीजी का ऐसा कार्टून भारत के किसी अखबार में छपता तो क्या होता?

Political cartoon of Narendra Modi with white beard, sitting cross-legged on a mat and smoking a long pipe connected to a hookah in a newspaper illustration.

ज्ञानेंद्र अवस्थी-

असल समस्या यह नहीं है कि नॉर्वे के अखबार ने मोदी जी पर कार्टून क्यों छापा। असल समस्या यह है कि भारत में लोग अब इतने “मैनेज्ड मीडिया” के आदी हो चुके हैं कि उन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता असभ्यता लगने लगी है।

वहाँ अखबार सरकार के डर से नहीं चलते। वे यह सोचकर खबर नहीं छापते कि “विज्ञापन बंद हो जाएगा”, “ED आ जाएगी”, “IT रेड पड़ जाएगी” या “देशद्रोही घोषित कर दिए जाएंगे।”

इसलिए वहाँ प्रधानमंत्री पर कार्टून भी बनता है, आलोचना भी होती है और कठिन सवाल भी पूछे जाते हैं। और सबसे बड़ी बात — सरकार इसे लोकतंत्र का हिस्सा मानती है, राष्ट्रीय अपमान नहीं।

भारत में पिछले कुछ वर्षों में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि नेता की आलोचना करना मानो देश की आलोचना हो।

टीवी चैनल पत्रकारिता कम और भक्ति ज्यादा करते दिखाई देते हैं। कठिन सवाल पूछने वाला पत्रकार “एजेंडा” कहलाता है और चापलूसी करने वाला “राष्ट्रवादी”।

यही कारण है कि अब लोगों को स्वतंत्र प्रेस अजीब लगने लगी है।

सोचिए — यदि किसी भारतीय अखबार ने ऐसा कार्टून छापा होता, तो क्या होता?

ट्रोल आर्मी टूट पड़ती। “हिंदू विरोधी”, “भारत विरोधी”, “विदेशी एजेंट” के नारे शुरू हो जाते।

सरकारी विज्ञापन बंद होने की चर्चा शुरू हो जाती। और टीवी चैनल कई दिनों तक “राष्ट्र का अपमान” चलाते रहते।

लेकिन लोकतंत्र में नेता भगवान नहीं होता। वह जनता का प्रतिनिधि होता है। उसकी आलोचना भी होगी, व्यंग्य भी होगा और सवाल भी होंगे।

असल में मजबूत नेता वह नहीं जो केवल प्रशंसा सुने। मजबूत नेता वह होता है जो आलोचना सह सके।

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