लखनऊ/प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के दो वरिष्ठ अधिकारियों के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाते हुए कड़ी टिप्पणियां की हैं। एक ओर अपर मुख्य सचिव (गृह) एवं वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजय प्रसाद के आचरण को लेकर अदालत ने केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को उनकी भविष्य की जिम्मेदारियों की उपयुक्तता पर विचार करने का सुझाव दिया है, वहीं दूसरी ओर गाजियाबाद के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर एवं आईपीएस अधिकारी अजय कुमार मिश्रा को गैंगस्टर एक्ट के कथित दुरुपयोग के मामले में सख्त चेतावनी दी है। अदालत की इन टिप्पणियों ने एक बार फिर प्रशासनिक जवाबदेही और पुलिस की कार्यप्रणाली पर बहस छेड़ दी है।
संजय प्रसाद पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने पुलिस सुधार और जांच प्रक्रिया से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजय प्रसाद के आचरण पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह प्रतीत होता है कि न्यायिक निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने के प्रयासों में बाधा उत्पन्न हुई, जिससे अदालत की गरिमा और अधिकार प्रभावित हुए।

हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को निर्देश दिया कि वह संजय प्रसाद के आचरण को ध्यान में रखते हुए भविष्य में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपे जाने की उपयुक्तता पर विचार करे। हालांकि अदालत ने उनके खिलाफ किसी दंडात्मक कार्रवाई का आदेश नहीं दिया है।
संजय प्रसाद वर्ष 1995 बैच के यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी हैं और उन्हें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बेहद भरोसेमंद अधिकारी माना जाता है। प्रशासनिक हलकों में उन्हें मुख्यमंत्री का “डेटा मैन” भी कहा जाता है। वह लंबे समय से मुख्यमंत्री कार्यालय और गृह विभाग समेत कई अहम जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं।
आईपीएस अजय कुमार मिश्रा को चेतावनी
दूसरे मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा के कामकाज के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत के सामने यह मामला 35 वर्षीय ललिता त्यागी से जुड़ा था, जिन्हें एक सिविल और व्यावसायिक प्रकृति के विवाद में गैंगस्टर एक्ट लगाकर करीब 80 दिनों तक जेल में रखा गया था।
हाईकोर्ट ने पाया कि ललिता त्यागी के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट लगाने के समर्थन में कोई ठोस तथ्य या साक्ष्य मौजूद नहीं था। इसके बावजूद उनके खिलाफ गैंगस्टर चार्ट तैयार किया गया और कार्रवाई की गई।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि “पूरी तरह अवैध गिरफ्तारी और गैंगस्टर चार्ट के तहत उसका अनुमोदन अजय कुमार मिश्रा की निगरानी में हुआ।” हाईकोर्ट ने इसे गंभीर मामला मानते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को चेताया कि कठोर कानूनों का प्रयोग तथ्यों और कानून के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की इन दोनों टिप्पणियों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए अधिक प्रभावी व्यवस्था की आवश्यकता है, ताकि कानून के शासन और नागरिक अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।


