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उत्तर प्रदेश

अर्जियों से लेकर अनशन में बीत गए सत्रह साल, विकलांग अध्यापक को नहीं मिली स्थायी नियुक्ति

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रविन्द्रपुरी स्थित सांसद/प्रधानमंत्री कार्यालय में पत्रक सौंपते डॉ. केशव ओझा

वाराणसी। 17 साल के कड़वे अनुभवों को परे रखकर विकालांग अध्यापक डॉ. केशव ओझा ने बीते 8 सितंबर को जब प्रधानमंत्री मोदी के रविन्द्रपुरी कार्यालय पहुंच अपने अच्छे दिनों के लिए दस्तक देते हुए अर्जी दी थी तो शायद उन्हें नहीं मालूम था, कि सत्ता की सूरत भले ही बदल गयी हो पर सीरत नहीं बदली, महीना भर बीत जाने के बाद भी डॉ. ओझा का प्रार्थना प्रत्र सत्ता की अंधी गलियों में कही गुम हो कर रह गया है और डॉ. ओझा का संघर्ष वहीं का वहीं खड़ा है।

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रविन्द्रपुरी स्थित सांसद/प्रधानमंत्री कार्यालय में पत्रक सौंपते डॉ. केशव ओझा

वाराणसी। 17 साल के कड़वे अनुभवों को परे रखकर विकालांग अध्यापक डॉ. केशव ओझा ने बीते 8 सितंबर को जब प्रधानमंत्री मोदी के रविन्द्रपुरी कार्यालय पहुंच अपने अच्छे दिनों के लिए दस्तक देते हुए अर्जी दी थी तो शायद उन्हें नहीं मालूम था, कि सत्ता की सूरत भले ही बदल गयी हो पर सीरत नहीं बदली, महीना भर बीत जाने के बाद भी डॉ. ओझा का प्रार्थना प्रत्र सत्ता की अंधी गलियों में कही गुम हो कर रह गया है और डॉ. ओझा का संघर्ष वहीं का वहीं खड़ा है।

लोकतंत्र में सब्र की हद क्या होती है, ये शायद केशव ओझा से बेहतर कोई नहीं बता सकता, एक, दो नहीं पूरे 17 साल हो गये सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के साहित्य विभाग के विकलांग अध्यापक डॉ. केशव ओझा को अपने हक के लिए लड़ते हुए। इस दौरान राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर स़क्षम मंत्रालयों तक उनकी अर्जिया दौड़ती रहीं, अनशन से लेकर राष्ट्रपति से सपरिवार इच्छा मृत्यु की गुहार लगाने के बाद भी न तो तंत्र जागा और न उन्हें कहीं से राहत मिली। शोध करने लायक हो चलीं डॉ. ओझा की अर्जियों और दरख्वास्तों की फाइलें भी अब कहने लगी हैं कि स्रब की हद होती है, तब्बजों तो दिजीए साहब!!

साहित्य विभाग में अंशकालिक अध्यापक के तौर पर नियुक्त डॉ. ओझा की स्थायी नियुक्ति के सन्दर्भ में 19 अप्रैल 2006 को तत्कालीन कुलपति अशोक कालिया की मौजूदगी में कार्यपरिषद की बैठक में बकायदा निर्णय तो लिया गया लेकिन 8 साल बीतने के बाद भी निर्णय जुबानी जमा खर्च के आगे डॉ. ओझा की मुसीबतों को हल करने का रास्ता न बन सका।

डॉ. ओझा का कहना है कि राश्ट्रपति भवन से मिले तमाम निर्देशों के बाद भी विश्वविद्यालय प्रशासन का रवैया उनके मामले में नकारात्मक ही बना हुआ है। ऐसे में उनके लिए साल के आठ महीनें विश्वविद्यालय की ओर से मिलने वाले मामूली रकम में परिवार के साथ गुजारा करना लोहे के चने चबाने जैसा है। जिदंगी उनके लिये रोज एक मुठभेड़ सी है, जिसे वो अपने हौसले से लड़ तो रहे है, पर कब तक?

गौर करने की बात है कि विकलांगजनों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने और उनकी सृजनशीलता का सदुपयोग करने के लिए बनाये गये तमाम सरकारी कानून के तहत क्या डॉ. ओझा का मामला नहीं आता? या फिर लाल फीताशाही के फंदे, विश्ववि़द्यालय प्रशासन की अंसेवदनशीलता के दो पाटो के बीच एक विकलांग अध्यापक के जायज अधिकारों का दम तोड़ देना ही इस तंत्र के अच्छे दिनों की उपलब्धि। 

 

भाष्कर गुहा नियोगी
09415354828

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1 Comment

1 Comment

  1. Rajhansh

    October 15, 2014 at 4:04 pm

    The encroachment of the righ 🙁 ts of disabled people is the biggest spot on our society. Gandhi once told “if you want to find out the development of a society than look at the condition of minorities (bottom level people)”, India , no matter how much boast of its success but this is the actual condition of our attitude towards most needy people. Social justice of our constitution is not being ensured. 😮 😐

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