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आज की इन खबरों पर अफसोस कीजिये, देखिये समझिये हमारा समाज और मीडिया कैसा हो गया है!

संजय कुमार सिंह

आज सुबह कंप्यूटर जल्दी ऑन कर लिया, एक ट्वीट दिखा, “अगर कायर नेहरू पहला प्रधानमंत्री ना बनता तो आज भारत का हिस्सा चीन पास ना होता”। मुझे ख्याल आया कि 60, 70 और 80 के दशक में अच्छे कंडोम बन रहे होते, परिवार नियोजन कार्यक्रम ठीक से चला होता तो आज के बहुत सारे लोग पैदा ही नहीं होते। मैं उलझन में था, इसपर मुझे खुश होना चाहिये या अफसोस करना चाहिये? मुझे लगता है कि यह निजी मामला है और कोई चाहे तो अपने पैदा होने पर अफसोस कर सकता है जो किसी से पिट (हार) चुका है पीटने वाले के पैदा होने पर अफसोस कर सकता है पर मुद्दा वह नहीं है। देश में परिवार नियोजन का काम ठीक से हुआ या नहीं इस पर तो बात की ही जा सकती है। 1975 में इमरजेंसी के समय नसबंदी में जबरदस्ती जरूर हुई थी पर उसका विरोध भी भरपूर हुआ और इस चक्कर में परिवार नियोजन का मुद्दा पीछे रह गया। उस जमाने में लाल तिकोन और निरोध बच्चा-बच्चा जानता था। शायद 15 पैसे में तीन। फिर भी बहुतों को अफसोस है कि आबादी ज्यादा है, इसी कारण रोजगार नहीं है आदि आदि

इसलिए अच्छा कंडोम पहले नहीं बना इसका अफसोस कोई नहीं करता। पहले के नेता अच्छे नहीं थे यह अफसोस सबको है जबकि कंडोम अच्छे होते तो आबादी ज्यादा नहीं होती और आज की बहुत सारी समस्याएं नहीं होतीं। इसके लिए भी पहले के नेताओं को कोसा जा सकता है पर वह भी मुद्दा नहीं है। कंडोम की बात मैं यूं ही नहीं कर रहा हूं, बहुत बाद में पढ़ा और जाना कि लोग कंडोम का इस्तेमाल नहीं करते हैं क्योंकि ‘मजा नहीं आता है’ या कम हो जाता है। तब तरह-तरह के कंडोम बाजार में थे। महंगे थे यह अलग बात है। अफसोस इसका भी हो सकता है सरकार ने उसपर सबसिडी देकर उसे सस्ता नहीं किया। हालांकि उसका विज्ञापन, फ्लेवर वाले कंडोम के विज्ञापनों से केले के फ्लेवर का पता चला तो बहुतों को उपयोग का फायदा पता चला होगा और उसका लाभ भी हुआ ही होगा। यह सच्चाई है कि सरकार मुफ्त कंडोम बांटती थी, सस्ता बेचती थी और बाद में जब अच्छे कंडोम आ गये तो ज्यादा बच्चे होने को धर्म से जोड़ दिया गया। मुझे पहला अफसोस इसका है। जो पैदा होने से रह गये उसके लिए भी अफसोस किया जा सकता है।

आज मैं उन खबरों की चर्चा करूंगा जिससे पता चलेगा कि काम करने, सोचने का तरीका गड़बड़ हो सकता है और हमें उसपर भी अफसोस करना चाहिये और उसे भी ठीक करने की जरूरत है। एक गलती को ठीक करने के लिए दूसरी गलती या दूसरे किस्म की गलती को अपना लेने से अफसोस करने वाले मुद्दे कम नहीं होंगे। आप जानते हैं कि इस समय देश में चुनावों के अलावा और भी कई मुद्दे चल रहे हैं। मैं पहले अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण मुद्दों की चर्चा कर लेता हूं, राजनीतिक मुद्दों की चर्चा अंत में।

1. पुणे पोर्श कार दुर्घटना

आप जानते हैं कि एक पैसे वाले परिवार के नाबालिग बेटे ने मंहगी कार चलाई जिससे दो लोगों की मौत हो गई। पहले उसे निबंध लिखवाकर छोड़ दिया गया था। यह व्यवस्था है, जहां खरोंच आने पर लोग जेल में हैं। हंगामा मचा तो नाबालिग के पिता और दादा भी गिरफ्तार कर ये गये। कुल नौ लोग गिरफ्तार हैं। परिवार की कोशिश थी कि ड्राइवर दुर्घटना की जिम्मेदारी ले और परिवार के लाड़ले को बचा लिया जाये। अफसोस इस बात पर होनी चाहिये कि नाबालिग को कार दी गई, दुर्घटना हुई, दो लोग मर गए। बच्चे को बचाने की कोशिश उलझती जा रही है। ठीक है कि बचाया नहीं गया तो उसका करियर, जीवन सब बर्बाद हो जायेगा। लेकिन यह तो पहले सोचना चाहिये था। अब खबर है कि नाबालिग चालक के नशे में होने की पुष्टि के लिए खून के नमूने की जांच में गड़बड़ी हुई और इसके लिए डॉक्टर गिरफ्तार हुए हैं। कोई डॉक्टर ऐसा क्यों करे और पैसे के लिए करे तो कितना भी अफसोस कीजिये कम है। 

2. राजकोट गेमिंग जोन में आग

आप पढ़ चुके हैं कि अग्निशमन विभाग के एनओसी के बिना चल रहा था, सुरक्षा नियमों का पालन नहीं किये जाने की खबर कल ही थी। हाईकोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया और कहा है कि निर्दोष लोगों के मारे जाने के बाद हरकत में आता है तंत्र। नवोदय टाइम्स के शीर्षक के अनुसार हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकारी मशीनरी पर भरोसा नहीं है। इस मामले में छह अफसरों को निलंबित किया गया है। जी हां, 27 लोगों की मौत के बावजूद निलंबित। गिरफ्तारी तीसरी हुई है और यह गेम जोन चलाने वाली कंपनी के साझेदार हैं। अभी तक जो हुआ है उससे यह तो तय है कि अग्निशमन विभाग के प्रमुख की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे यह सुनिश्चित करे कि भीड़ वाली जगहों पर उनका एनओसी हो और सुरक्षा व बचाव के पर्याप्त उपाय। ऐसा होता तो सबसे पहले उन्हें गिरफ्तार किया जाता। लेकिन उनका काम सिर्फ एनओसी देना है। मुझे इस व्यवस्था का अफसोस है।

3. दिल्ली के शिशु अस्पताल में आग

आज खबर है कि इसका मालिक बिना लाइसेंस ऐसे तीन अस्पताल चला रहा था। नियमों को कूड़ेदान में डाल दिया गया था। सवाल है कि जब लाइसेंस लेना होता है तो देखा क्यों नहीं जाता है कि लाइसेंस है कि नहीं? और अगर बिना लाइसेंस या एनओसी ऐसे अस्पताल, संस्थान, खेल जोन चल रहे हों तो जिम्मेदार चलाने वाला ही क्यों है? लाइसेंस देने वाला क्यों नहीं? आप जानते हैं कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के प्रचार के बावजूद किसी भी कारोबार व्यवसाय के लिए ढेरों लाइसेंस, अनुमति, पंजीकरण आदि की आवश्यकता है। अगर इनके बिना भी काम चल सकता है और इसका पता किसी दुर्घटना या वारदात के बाद ही चलता है तो इनका क्या मतलब है? क्यों नहीं सबके बिना लाइसेंस, बिना इजाजत काम करने दिया जाये और जोर दुर्घटना-हादसा रोकने पर रखा जाये। सरकार और व्यवस्था तो वेश्यावृत्ति नहीं रोक पाई है। खासकर तब जब तमाम जागरूक, सक्रिय और प्रतिभाशाली लोग अपने जन्म से पहले की घटनाओं पर अफसोस कर रहे हैं। हादसे के बाद अफसोस किस-किस बात पर करूं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है कि आग लगने की सूचना अग्नि शमन विभाग को 35 मिनट बाद दी गई। इसका कारण एनओसी नहीं होना भी हो सकता है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर है लाइसेंस 31 मार्च को खत्म हो गया था, फिर भी यहां क्षमता से ज्यादा मरीज थे, अग्निशमन का कोई उपाय नहीं था, आपातकालीन निकास नहीं था, 20 ही ऑक्सीजन सिलेंडर रखने की इजाजत थी पर 32 रखे थे। दिल्ली के 1000 नर्सिंग होम में सिर्फ 24 के पास फायर एनओसी है। आवेदन खारिज कर दिये जाते हैं क्योंकि इमारत अनुकूल नहीं होती। आज के अखबारों में ऐसी कई खबरें हैं जो पहले हुई होतीं तो शायद आग नहीं लगती। अफसोस कि अखबारों ने ये खबरें पहले नहीं कीं।

4. यौन अपराध का आरोपी सांसद प्रज्वल रेवन्ना

यौन अपराध के आरोपी प्रज्वल रेवन्ना ने कहा है और यह कई अखबारों में पहले पन्ने पर है कि वे 31 मई को विशेष जांच दल के समक्ष उपस्थित होंगे (होने की कृपा करेंगे नहीं लिखा इसका भी अफसोस है)। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री इसके लिए वोट मांग चुके हैं और केंद्रीय गृहमंत्री कह चुके हैं कि कर्नाटक सरकार ने पहले या समय रहते कार्रवाई नहीं की। कर्नाटक सरकार मांग करती रही है कि प्रज्वल का पासपोर्ट रद्द कर दिया जाये। आज की खबर (शीर्षक) में इस बारे में कोई सूचना नहीं है। कर्नाटक के हसन से सांसद 26 मई को मतदान के तुरंत बाद विदेश भाग गये थे। अब अपनी सुविधा से लौटने की सूचना दी है और यह पहले पन्ने की खबर है। मुझे अफसोस है कि उसका पासपोर्ट रद्द नहीं किया जा सका।     

5.समुद्री तूफान रेमल

पूर्व सूचना के बाद आये इस तूफान से छह लोगों के मारे जाने की खबर है। बाकी नुकसान को छोड़ भी दिया जाये तो छह लोगों की मौत, बड़ी खबर है। अफसोस इन्हें बचाया नहीं जा सका। इससे पहले गुजरात तट पर आये समुद्री तूफान से बचाव के लिए बहुत सारे काम किये गये थे। अखबारों में उसका पूरा विवरण था। याद नहीं है कि तब कोई चुनाव था या नहीं। यह सरकारी पक्षपात हो सकता है। खबर नहीं देना तो मीडिया का पक्षपात है ही। किस स्तर पर है कितना यह सब मेरा काम नहीं है। अफसोस की मीडिया के साथ-साथ सरकार भी खबर देने का अपना काम ठीक से नहीं कर रही है।

6. भाजपा के अमानजनक विज्ञापन

द हिन्दू में आज पांच कॉलम की लीड है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा : तृणमूल के खिलाफ भाजपा के विज्ञापन पहली नजर में अपमानजनक”। बंगाल और हाईकोर्ट से संबंधित पुराने मामले आप जानते हैं। उसी क्रम में यह मामला दिलचस्प है। अफसोस, किसी और हाईकोर्ट ने भाजपा के विज्ञापन या बयान पर ऐसा फैसला नहीं दिया है। हालांकि इसका कारण यह भी हो सकता है कि हाईकोर्ट से अपील ही नहीं की गई हो। इन दिनों अदालतों के फैसले अटपटे लगते हैं अफसोस उसका भी है पर मुद्दा यह है कि राहुल गांधी को यह पूछने के लिए सजा हो गई कि सभी चोरों के नाम XXXX क्यों होते हैं पर प्रधानमंत्री ने अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ सबूत नहीं होने पर कहा है कि वे अनुभवी चोर हैं इसलिए सबूत नहीं है।

8) प्रधानमंत्री की रीति-नीति

यही नहीं, प्रधानमंत्री ने धमकाने वाले अंदाज में कहा है, (तेजस्वी) जेल जायेंगे। ऐसे जैसे सरकार या प्रधानमंत्री ही लोगों को जेल भेजते हैं, अदालतों की कोई भूमिका नहीं है और इसमें डबल इंजन वाले राज्य का बुलडोजर न्याय और कथित माओवादियों की मुठभेड़ में हत्या भी अफसोस करने लायक है। अरविन्द केजरीवाल और तेजस्वी के मामले में भी समाज को दिक्कत नहीं है, मीडिया में मुद्दा नहीं है और दोनों लोग अदालत गये, ऐसी खबर नहीं है। दूसरी ओर, माओवादी क्या आतंकवादी को भी अदालत के आदेश के बिना सजा नहीं होनी चाहिये, हत्या तो बहुत दूर। कसाब के मामले में यही हुआ था। तब बिरयानी खिलाने की झूठी खबर बनवाई गई और इसके लिए जो मुख्य रूप से गुनाहगार है (और प्रक्रिया पालन का लाभार्थी) वह भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ रहा है। इसका भी अफसोस है।

द हिन्दू की खबर का उपशीर्षक है, “लोकसभा चुनाव प्रकिया के दौरान चर्चा के विषय का क्षरण मतदाताओं के हितों को नुकसान पहुंचायेगा; भाजपा ने कहा है कि विज्ञापन तथ्यों पर आधारित हैं; पीठ ने कहा कि आपका प्रतिद्वंद्वी आपका दुश्मन नहीं है; पार्टी को चुनाव आयोग के नोटिस का जवाब आज देना है”। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भाजपा की अपील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। एक अन्य मामले में कहा है कि मजिस्ट्रेट की सुनवाई योग्य मामले में जमानत नहीं दिया जाना चौंकाने वाली बात है। यह कलकत्ता हाईकोर्ट का मामला है। मुझे लगता है कि इन दिनों, खासकर सरकार से संबंधित या राजनीतिक मामलों में जमानत देने में ज्यादातर अदालतें बेहद संकीर्ण हैं और अगर सबको न्याय (जमानत) सुप्रीम कोर्ट से ही मिले तो न्याय महंगा, मुश्किल तो होगा ही देर से होगा और इसे न्याय मिलना नहीं माना जाता है। मेरे ख्याल से इस मामले को सुप्रीम कोर्ट को ही देखना है।   

प्रधानमंत्री ने कहा है कि विपक्षी नेताओं के लिए पाकिस्तान के समर्थन की जांच होनी चाहिये। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार विपक्षी नेताओं को पाकिसतान से समर्थन मिलने पर प्रधानमंत्री ने आश्चर्य जताया है और कहा है कि इस तरह की प्रवृत्ति गंभीर मुद्दा है और विस्तृत जांच का विषय है। आईएएनएस से इंटरव्यू में उन्होंने कहा है, मैं नहीं जानता कि क्यों कुछ लोगों को वो पसंद करते हैं जो हमारे प्रति विद्वेष रखते हैं। आपको याद होगा कि 2014 के शपथ ग्रहण में नवाज शरीफ आये थे। उन्हें किसने बुलाया होगा और वे क्यों आये होंगे इसे समझना मुश्किल नहीं है। बाद में बिना बुलाये जाने तो सबको पता है। चीन के प्रमुख को झूला झुलाने के बाद जो सब हुआ उसकी जांच की जरूरत क्यों नहीं महसूस हुई। प्रधानमंत्री के खिलाफ न सिर्फ ऐसे मामले हैं बल्कि इलेक्टोरल बांड का मामला भी है। मुझे इसका भी अफसोस है कि यह मुद्दा नहीं है। खबर भी नहीं रही।

9. स्वाति मालीवाल का मामला

ऊपर लिखा है, कई लोगों के मरने में गिरफ्तारी भी नहीं। ऐसी स्थिति में स्वाति मालीवाल पर कथित हमले के आरोपी, मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवल के सहायक बिभव को जमानत नहीं मिलने की खबर आज के अखबारों में है। मूल रूप से यह मामला समय लिये बिना मिलने जाने पर रोकने से खरोंच आने का है और इसमें अगर अपमान हुआ या पिटाई हुई तो उसकी शिकायत देर से की गई है। मालीवाल न्याय चाहतीं तो केजरीवाल से मांग सकती थीं। एक व्यक्ति के कारण पार्टी छोड़ने का कोई मतलब नहीं है पर अभी तक उनका रुख अपनी पार्टी के खिलाफ और भाजपा के हक में लग रहा है। वाशिंग मशीन की जरूरत का मामला बताने के बावजूद ना उसपर कोई सवाल है ना जवाब फिर भी खबर है कि पहले पन्ने से हट नहीं रही है। ऐसी खबरें पहले पन्ने पर छपने का अफसोस है।

10. वादे को वोट के लिए रिश्वत नहीं माना जा सकता

कांग्रेस उम्मीदवार और कर्नाटक के मंत्री बीए जमीर अहमद खान के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उपरोक्त टिप्पणी की है। एक मतदाता ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। यह फैसला तो इस मामले में है लेकिन अफसोस कि देश के किसी मतदाता ने सत्ता मिलने पर स्विस बैंक में रखे पैसे वापस लाने और सबको 15 लाख मिलने जैसे जुमले पर केस नहीं किया। यही नहीं, बहुप्रचारित जनधन खाते खुलवाये गये थे, बीमा कराया गया था पर बीमा का लाभ किसे मिला इसका कोई ब्यौरा नहीं है। कोविड से मरने वालों को मुआवजा नहीं मिला, बीमा राशि मिली कि नहीं यह भी खबर नहीं है। अफसोस उसपर किसी ने याचिका दायर नहीं की।  

11. बीमार थे तो पंजाब क्यों गये

टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, मेडिकल टेस्ट के लिए ‘बीमार’ मुख्यमंत्री ने 9 जून तक के लिए समय मांगा”। मैं नहीं जानता इसमें कितनी बीमारी है और कितनी राजनीति। मुझे ‘बीमार’ (अनवेल) को इनवर्टेड कॉमा में लिखने से भी दिक्कत नहीं है। मेरा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट सही निर्णय करेगा, जैसे पहले करता रहा है जिसके बारे में  बोलकर अमित शाह राजनीति कर चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट ने जवाब भी दिया है। यह सबको पता है, संपादक को भी होगा ही। ऐसे में,  गृहमंत्री ने जो कहा था वह न्याय के मार्ग में बाधा है। आज का शीर्षक भी ऐसा ही है। इसमें ‘बीमार’ शब्द रखना और उसे सिंगल कोट में लिखना अफसोसजनक पत्रकारिता है। वाकई  बीमार हैं तो और नहीं हैं तो भी। शीर्षक बीमार शब्द के बिना भी हो सकता था। यही नहीं, दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेन्द्र सचदेव ने कहा है, केजरीवाल को बताना चाहिये कि वे बीमार थे तो तीन दिन के लिए पंजाब क्यों गये। मुझे लगता है कि यह भी अफसोस करने वाली राजनीति है

केजरीवाल को चुनाव प्रचार के लिए ही जमानत मिली है। बीमार होने का मतलब यह नहीं है कि चल नहीं सकते या बोल नहीं सकते, खबर यही है कि जांच कराने हैं इसलिए जमानत बढ़ाने की अपील की है। बीमार तेजस्वी भी हैं और व्हील चेयर पर चुनाव प्रचार कर रहे हैं। इसलिए उसका अपना महत्व है। वैसे भी, जमानत चुनाव प्रचार के लिए मिली है तो वही सर्वोच्च प्राथमिता है। जांच टल सकती है इसलिए टाली गई है। अदालत से अपील की गई है, जबरदस्ती तो की ही नहीं जा सकती है। तो किसी वीरेन्द्र सचदेव को कुछ भी स्पष्ट करने की जरूरत कहां है। मुझे राजनीति के इस स्तर पर आ जाने का अफसोस है।  

12. इस चुनाव प्रचार के इस स्तर के लिए अफसोस है

नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर एक खबर है, जाने वाली है कांग्रेस अध्यक्ष की नौकरी। यह अमित शाह ने कहा है और कुशीनगर, बलिया, चंदौली डेटलाइन से है और अंतिम चरण के मतदान के लिए प्रचार है और आप जानते हैं कि बनारस भी अंतिम चरण में है और प्रधानमंत्री के लिए वोट पड़ने हैं। इस खबर के अनुसार …. चार जून को लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कांग्रेस की हार का ठीकरा पार्टी नेताओं – राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा पर नहीं मल्लिकार्जुन खरगे पर फूटेगा और उनकी नौकरी जाने वाली है।

अफसोस इसका भी कि अगर केजरीवाल की जमानत अवधि बढ़ गई तो कहा जा सकेगा या कुछ लोगों को लग सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने विशेष मेहरबानी की है। नहीं मिले तो अफसोस होगा कि न्याय नहीं हुआ। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ऐसा कुछ करता होता तो हेमंत सोरेन और मनीष सिसोदिया को भी जमानत मिल गई होती। पर वह मुद्दा नहीं है उसका भी अफसोस है अरविन्द केजरीवाल से राजनीतक मुकाबले का यह तरीका अफसोस नाक है। इसके बाद भी लोगों को यकीन नहीं है कि हम तानाशाही की तरफ जा रहे हैं। दूसरी ओर, ऐसे लोग भी हैं जिन्हें तानाशाही से दिक्कत नहीं है। और ऐसे लोगों को आप अनपढ़-अज्ञानी भी मान लें तो टू-मच डेमोक्रेसी की चर्चा आपको याद होगी।

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