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क्या प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व संसद से भी बड़ी हो गई है!

आकाशवाणी के दोहरे मापदंड एवं हठधर्मिता के चलते लंबे समय से काम रहे आकस्मिक उद्घोषकों का नियमितिकरण नहीं किया जा रहा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट भी संविधान पीठ भी दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश दे चुकी है। आकाशवाणी में आकस्मिक कलाकार/ कर्मचारी सन 1980 से अर्थात प्रसार भारती के लागू होने के वर्षों पहले से स्वीकृत एवं रिक्त पड़े पदों के स्थान पर आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर के रूप में काम कर रहे हैं।

आकाशवाणी के दोहरे मापदंड एवं हठधर्मिता के चलते लंबे समय से काम रहे आकस्मिक उद्घोषकों का नियमितिकरण नहीं किया जा रहा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट भी संविधान पीठ भी दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश दे चुकी है। आकाशवाणी में आकस्मिक कलाकार/ कर्मचारी सन 1980 से अर्थात प्रसार भारती के लागू होने के वर्षों पहले से स्वीकृत एवं रिक्त पड़े पदों के स्थान पर आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर के रूप में काम कर रहे हैं।

विज्ञापन निकलने के बाद ही आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर नियुक्त किए जाते हैं, विज्ञापन में पात्रता की शर्तों के अनुसार आवेदन देने वाला किसी भी केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार एवं पब्लिक सेक्टर का कर्मचारी नहीं होना चाहिए।  आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर की नियुक्ति की प्रक्रिया भी स्थाई उद्घोषक / कम्पीयर की नियुक्ति के समान ही है। आकस्मिक उद्घोषकों / कम्पीयर की भी काम करने की अवधि 7 घंटे 20 के ही समान है।

वर्तमान में एक आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर को 3 से 4 असाइनमेंट को पूर्ण करने में पूरा महीना काम करना पड़ता है। वेज़ेज़ एक्ट के हिसाब से व्यावहारिक एवं वास्तविक विधि द्वारा असाइनमेंट से कार्य दिवस की गणना का नया विधान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नई दिल्ली की सहमति से निर्धारित किया गया है, लेकिन इसका लाभ आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर को नहीं दिया जा रहा है।

आकाशवाणी महानिदेशालय भारत सरकार नई दिल्ली ने आदेश संख्या – 102(14)/78-SVII , दिनांक 8 सितंबर 1978 के तहत कैज़ुअल कलाकारों/ कर्मचारियों के नियमितिकरण के लिए एक नियमितिकरण योजना/ स्कीम दिनांक 08/09/ 1978 को बनाई गई थी जिसमें आकस्मिक प्रोडक्शन असिस्टेंट, आकस्मिक जनरल असिस्टेंट/ कॉपिस्ट, आकस्मिक संगीतकार के साथ आकस्मिक उद्घोषकों को भी नियमित किया गया है।

6 मार्च 1982 के पहले आकाशवाणी के सभी पद अनुबंध यानी कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित थे, वर्तमान में उद्घोषक/ कम्पीयर के सभी पद स्थाई पद हैं। इसी स्वीकृत एवं नियमित पदों की जगह आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर वर्षों से सेवाकार्य कर रहे हैं। O.A./563/1986 के मामले में ऑनरेवल CAT, प्रधान शाखा नई दिल्ली द्वारा पारित आदेश पर दूरदर्शन के सभी आकस्मिक कलाकारों का नियमितिकरण किया गया है और किया जा रहा है। O.A./563/1986 के मामले में 14 फरवरी 1992 को बनाई गई नियमितिकरण योजना को ही सादर दुहराने की बात ऑनरेवल CAT ने ही आकाशवाणी के आकस्मिक कलाकार सुरेश शर्मा एवं अन्य के मामले में O.A. 822/1991 में उल्लिखित की।

आकाशवाणी महानिदेशालय, नई दिल्ली ने दोहरे मापदंड के संग सिर्फ आवेदकों के संवर्गों के नियमितिकरण के लिए ही नियमितिकरण योजना बनाई और वर्ष में 72 असाइनमेंट्स पूरा करने वाले आकस्मिक कलाकारों, आकस्मिक प्रोडक्शन असिस्टेंट एवं आकस्मिक जनरल असिस्टेंट को नियमित कर नियमितिकरण का लाभ दिया जा चुका है, इतना ही नहीं O.A. 601/2006 कंचन कपूर एवं अन्य के मामले में ऑनरेवल CAT द्वारा 6 जुलाई 1998 एवं पुनः 20 मार्च 2007 को पारित आदेश में वर्ष में 72 से भी कम दिन कार्य करने वाले आकस्मिक कलाकारों की सेवाओं का नियमितिकरण किया जा चुका है।

आकाशवाणी त्रिवेंद्रम के कैज़ुअल कम्पीयर पी. रामेन्द्र कुमार की सेवाओं का नियमितिकरण O.A. 743/ 2000 में पारित आदेश के अनुपालन में प्रोडक्शन असिस्टेंट/ ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिव के पद पर किया जा चुका है। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा उमा देवी के मामले में 10 अप्रैल 2006 में पारित आदेश में दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश के बावजूद तथा समान रूप से समान सेवा शर्तों पर सेवारत हम आकस्मिक उद्घोषकों/ कम्पीयर का नियमितिकरण आज तक नहीं किया गया है।

आकस्मिक उद्घोषकों के अधिकार को हाशिये पर डाल दिया गया है। अवैध अंडरटेकिंग के सहारे आकाशवाणी पहले ही देश के अधिकांश आकस्मिक उद्घोषक और कम्पीयर से एफिडेविट पर हस्ताक्षर ले चुकी हैं और अब स्क्रीनिंग में उन्हें फेल करके हमेशा के लिए आकाशवाणी से बाहर करना शुरू भी कर दिया है, ये सब महज़ इसलिए कि अपना जायज़ अधिकार मांगने लायक भी कोई न रहे कोई न बचे।

पंद्रहवी लोक सभा में संसद की संयुक्त संसदीय समिति ने भी प्रसार भारती और आकाशवाणी को ये निर्देश दिया था कि आकस्मिक उद्घोषकों और कम्पीयर के साथ भेद भाव और शोषण को तत्काल ख़तम किया जाए। देश की दो सर्वोच्च संस्था एक माननीय सर्वोच्च न्यायालय और दूसरी हमारी संसद, हैरानी होती है जब इनका आदेश और निर्देश प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय नहीं मानती है और वही काम करती है, जो इनके मन में आता है और जब कभी प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय को ये याद दिलाया जाता है, कि आप माननीय सर्वोच्च न्यायालय और संसद के निर्देश को न मान कर उनकी अवमानना कर रहे हैं, तब ये अपना बदला आवाज़ उठाने वाले की ड्यूटी बंद करके निकालते हैं।

क्या प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व संसद से भी बड़ी हो गई है जो इनके आदेश और निर्देश का अनुपालन नहीं करती ? अगर ऐसा है तो ये ग़लत है, इसके लिए प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय से मैंने सवाल किया था और परिणाम ये रहा कि मेरी बुकिंग (ड्यूटी) बंद कर दी गई है। सच बोलने पर सुना था इनाम मिलता है लेकिन मुझे तो सज़ा मिली है और पूछने पर आज तक मेरा क़ुसूर नहीं बताया गया है,अगर प्रसार भारती सही है और उसके दावे सच्चे हैं तो Honourable Supreme Court of India,  Central Administrative Tribunal  और संसद की संयुक्त समिति की रिपोर्ट प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय के ख़िलाफ़ क्यों है? आशा करता हूँ सच का साथ आप देंगे वरना संभव है आज सच बोलने की मुझे सज़ा मिली है कल आपका कोई अपना भी मेरी तरह फ़रियाद कर रहा होगा, आप ऐसा होने देंगे?

Ashok Anurag 
casual hindi announcer
AIR Delhi

जाने माने आकाशवाणी उदघोषक अशोक अनुराग का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं>

जहां सच्चाई दम तोड़ देती है उसे आकाशवाणी कहते हैं…

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