हिन्दू और मुसलमान दोनों पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव आज तक सहला रहे हैं

किसी व्यक्ति परिवार या समाज में कुछ घटनाएं ऐसी हो जाती हैं कि वे सब कई पीढियों तक उस घटना से प्रभावित होते रहते हैं। ये प्रभाव अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। ऐसी ही एक घटना है सन १७६१ में हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई। इस लड़ाई के बारे में जानने से पहले लड़ाई क्यों हुई, यह जानना दिलचस्प होगा। इतिहास की एक धारा के मुताबिक उत्तर भारत में अंतिम महान हिन्दू सम्राट हर्ष वर्धन और दक्षिण भारत में रायरायान कृष्णदेव राय थे। मुस्लिम आक्रांताओं के हमले भारत पर आठवीं-नवीं शताब्दी से ही शुरू हो गए थे। लेकिन ११वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ ही भारत में उनके साम्राज्य की शुरूआत हो गई।

मुस्लिम राजा जब आए तो निरूसन्देह उन्होंने हिन्दुओं पर अत्याचार किए। लेकिन ऐबक के दामाद और दूसरे सम्राट इल्तुतमिश के साथ ही मुस्लिम आक्रमणकारी राजाओं ने यहां की हिन्दू बाहुल प्रजा के साथ मेल मिलाप शुरू कर दिया और कोशिश की कि हिन्दुओं की भावनाएं आहत नही हों। यह प्रवृत्ति बढ़ती ही गई और १८वीं-१९वीं शताब्दी तक हिन्दू-मुसलमान खिचड़ी के दानों की तरह आपस में मिल गए।

लेकिन इस प्रवृत्ति के अपवाद भी रहे और वर्चस्व की लड़ाई में कई बार धर्म को भी हथियार बनाया गया। साथ ही यह भी हुआ शासक मुस्लिम वर्ग के विरुद्ध एक स्वाभाविक नाराजगी यहां के पुराने प्रभुवर्ग हिन्दुओं में बनी रही। यही नाराजगी औरंगजेब के शासन के बाद बहुविध तरीके से सामने आई। मुगलों के जमाने तक भी देश की अर्थव्यवस्था का आधार मुख्यतरू खेती ही था। कई वजहों से, जिनको गिनाना यहां अप्रासंगिक है, शाहजहां के अंतिम दिनों में खेती के संकट के दिन शुरू हो गए। कोढ़ में खाज यह भी हुआ कि औरंगजेब ने अपनी साम्राज्य लिप्सा में इस संकट को न केवल उत्तर भारत वरन दक्षिण भारत में भी बढ़ा दिया।

परिणाम स्वरूप पहला विद्रोह खेतिहर जाट बिरादरी ने किया। जिसका नेतृत्व गोकुल जाट ने किया। विद्रोही भविष्य में भी सिर न उठा पाएं इसलिए औरंगजेब ने गोकुल जाट को बड़ी कठोर पीड़ादायी सार्वजनिक मौत दी। लेकिन जब जीवन का आधार ही नष्टड्ढ हो रहा हो तो मौत का खौफ नहीं रह जाता। परिणाम स्वरूप ज्यादातर खेतिहर जातियां देश भर में मुगल शासन के खिलाफ उठ खड़ी हुईं। जिनमें सबसे ज्यादा सफल रहे जाट और मराठे। इस बगावत के तार्किक परिणाम स्वरूप मराठा क्षत्रपति शिवाजी और राजा सूरजमल जाट शासकों के रूप में सामने आए। महाराजा रणजीत सिंह को भी एक हद तक इसी श्रेणी में रख सकते हैं।

इन सबमें भी सबसे पहले व सबसे अधिक सफलता मराठों को मिली। हालाकि इसके लिए उन्होंने बड़ी कीमत भी चुकाई। शिवाजी जिन्दगी भी औरंगजेब से लड़े। उनके पुत्र सम्भाजी को भी औरंगजेब ने मार डाला और पौत्र साहू को अपने यहां नजरबंद कर लिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र बहादुर शाह प्रथम ने साहू को सशर्त रिहा कर दिया और उन्होंने पूना पहुंचकर क्षिन्न भिन्न और विखंडित मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली। शिवाजी के बाद किसी केन्द्रित नेतृत्व के अभाव में मराठा साम्राज्य एक ढीला ढाला सा संगठन था। जिसमें सिंधिया, होलकर और गायकवाड़ समेत पांच बड़े घराने थे जो लगभग स्वतंत्र थे।

इन सब को एकत्रित कर अपने प्रधानमंत्री पेशवा, जो ब्राह्मण थे, की मदद से साहू ने मराठा साम्राज्य को मुगलों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश शुरू की। मुगलों के खिलाफ अपने संघर्ष को न्यायोचित, प्रभावी और व्यापक बनाने के लिए जब ब्राह्मड्ढण पेशवा बाजीराव ने हिन्दू स्वराज की बात की तो उसका जनमानस पर खासा असर पड़ा। बाजीराव बड़े योद्धा थे, उन्होंने मराठा साम्राज्य को लगभग आधे हिन्दुस्तान में प्रभावी बना दिया। लेकिन मराठा शासक एक काम नहीं कर पाए। जो जगहें उन्होंने जीती वहां पर प्रभावी शासनतंत्र स्थापित कर वे जनता के प्रिय नहीं बन सके। दूसरे उस समय मराठों से इतर जो दूसरी ताकतें सक्रिय थीं उनकी आपसी लड़ाई का फायदा उठाकर भारत सम्राट मुगल ही बने रहे।

इन्हीं सब परिस्थितियों में अपने अंतकाल में साहू जी ने घोषणा की कि उनके बाद मराठा साम्राज्य के अधिपति पेशवा ही होंगे। और मराठा क्षत्रप पेशवा के अधीन मराठा शासन को विस्तार देकर मुगलों को अपदस्थ करेंगे। इस तरह साहू राजा की मृत्यु के बाद खेतिहर जाति मराठों के साम्राज्य के अधिपति ब्राह्मड्ढण पेशवा हो गए। मुगल साम्राज्य भी उस समय लग रहा था कि अस्त होने वाला ही है, बस एक सांघातिक धक्के की जरूरत है। साथ ही उस समय की अराजकता से फायदा उठाकर साहसी और लूटमार करने वाले शासक और लुटेरे भी सिर उठाने लगे थे।

ऐसा ही एक शासक था अफगानिस्तान का अहमद शाह अब्दाली। वह लूटमार के इरादे से कई बार भारत आ चुका था। लेकिन ऐसा नहीं था कि वह महमूद गजनवी की तरह केवल लुटेरा ही था। वह एक कूटनीतिक शासक भी था। ऐसे में कई हिन्दू-मुस्लिम शासकों के साथ उसके मित्रता के संबंध थे। ऐसी स्थिति में १७६१ में जब एक बार फिर अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया तो उसका सामना न ही भारत सम्राट मुगलों ने किया और न ही किसी और क्षत्रप ने। पेशवा के अधीन मराठों ने रणनीति बनाई कि अगर अब्दाली का सामना कर उसे हरा देते हैं तो फिर स्वाभाविक रूप से जो परिस्थितियां बनेंगी उनमें मुगलों को सांघातिक धक्का देने में पेशवा सफल रहेंगे। साथ ही हिन्दू स्वराज का उनका सपना भी पूरा हो जाएगा।

इस सोच के तहत पानीपत की तीसरी लड़ाई में अब्दाली और पेशवा की सेनाओं ने युद्ध का फैसला किया। मराठों ने निरूसन्देह बहुत अच्छी सेना सजाई और वह जीत के प्रति इतने अधिक अश्वस्त थे कि इस लड़ाई में पहली बार मराठा सरदारों की पत्नियां और परिवारीजन भी उनके साथ आए कि लड़ाई जीतने के बाद उत्तर भारत के तीर्थों की यात्रा करने के बाद तब पूना वापस जाएंगे। लेकिन मराठों के शत्रुओं ने भी इस लड़ाई में अवसर देखा। उन्होंने अब्दाली की सहायता की। उनमें से कई आमने-सामने मराठों से संघर्ष का सामर्थ्य नहीं रखते थे। इसलिए सोचा कि अब्दाली जीता तो अफगानिस्तान लौट जाएगा और मराठों को नष्ट कर देगा साथ ही वे स्थानीय राजा मराठों के प्रकट शत्रु भी नहीं बनेंगे। इसी पृष्ठड्ढभूमि में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई और अपराजेय मराठा सेना बुरी तरह हारी, इस हद तक कि लड़ाई में तत्कालीन पेशवा के भाई व बेटे भी मारे गए।

अब परिदृश्य बदल गया था। सांघातिक धक्का मुगलों के बजाय मराठों को लग चुका था। साथ ही प्लासी और बक्सर की लड़ाईयां जीतकर अब अंग्रेज भारत के अधिपति बनने की ओर अग्रसर थे। मुगलों का गौरव और पेशवा का हिन्दू स्वराज का सपना चकनाचूर हो चुका था। अब शासन अंग्रेजों को करना था और जाहिर है कि उनकी अपनी प्राथमिकताएं थी। गौर से देखें तो तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप के हिन्दू और मुसलमान दोनों आज तक पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव सहला रहे हैं। लेकिन काल की गति निराली है। कई बार मनुष्य की सोच काल की गति के सामने धराशायी हो जाती है। फिर भी दोनों अपनी फितरत से बाज नहीं आते।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम किया. घुमक्कड़ी, यायावरी और किस्सागोई इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

अनेहस शाश्वत का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व संसद से भी बड़ी हो गई है!

आकाशवाणी के दोहरे मापदंड एवं हठधर्मिता के चलते लंबे समय से काम रहे आकस्मिक उद्घोषकों का नियमितिकरण नहीं किया जा रहा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट भी संविधान पीठ भी दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश दे चुकी है। आकाशवाणी में आकस्मिक कलाकार/ कर्मचारी सन 1980 से अर्थात प्रसार भारती के लागू होने के वर्षों पहले से स्वीकृत एवं रिक्त पड़े पदों के स्थान पर आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर के रूप में काम कर रहे हैं।

विज्ञापन निकलने के बाद ही आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर नियुक्त किए जाते हैं, विज्ञापन में पात्रता की शर्तों के अनुसार आवेदन देने वाला किसी भी केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार एवं पब्लिक सेक्टर का कर्मचारी नहीं होना चाहिए।  आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर की नियुक्ति की प्रक्रिया भी स्थाई उद्घोषक / कम्पीयर की नियुक्ति के समान ही है। आकस्मिक उद्घोषकों / कम्पीयर की भी काम करने की अवधि 7 घंटे 20 के ही समान है।

वर्तमान में एक आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर को 3 से 4 असाइनमेंट को पूर्ण करने में पूरा महीना काम करना पड़ता है। वेज़ेज़ एक्ट के हिसाब से व्यावहारिक एवं वास्तविक विधि द्वारा असाइनमेंट से कार्य दिवस की गणना का नया विधान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नई दिल्ली की सहमति से निर्धारित किया गया है, लेकिन इसका लाभ आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर को नहीं दिया जा रहा है।

आकाशवाणी महानिदेशालय भारत सरकार नई दिल्ली ने आदेश संख्या – 102(14)/78-SVII , दिनांक 8 सितंबर 1978 के तहत कैज़ुअल कलाकारों/ कर्मचारियों के नियमितिकरण के लिए एक नियमितिकरण योजना/ स्कीम दिनांक 08/09/ 1978 को बनाई गई थी जिसमें आकस्मिक प्रोडक्शन असिस्टेंट, आकस्मिक जनरल असिस्टेंट/ कॉपिस्ट, आकस्मिक संगीतकार के साथ आकस्मिक उद्घोषकों को भी नियमित किया गया है।

6 मार्च 1982 के पहले आकाशवाणी के सभी पद अनुबंध यानी कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित थे, वर्तमान में उद्घोषक/ कम्पीयर के सभी पद स्थाई पद हैं। इसी स्वीकृत एवं नियमित पदों की जगह आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर वर्षों से सेवाकार्य कर रहे हैं। O.A./563/1986 के मामले में ऑनरेवल CAT, प्रधान शाखा नई दिल्ली द्वारा पारित आदेश पर दूरदर्शन के सभी आकस्मिक कलाकारों का नियमितिकरण किया गया है और किया जा रहा है। O.A./563/1986 के मामले में 14 फरवरी 1992 को बनाई गई नियमितिकरण योजना को ही सादर दुहराने की बात ऑनरेवल CAT ने ही आकाशवाणी के आकस्मिक कलाकार सुरेश शर्मा एवं अन्य के मामले में O.A. 822/1991 में उल्लिखित की।

आकाशवाणी महानिदेशालय, नई दिल्ली ने दोहरे मापदंड के संग सिर्फ आवेदकों के संवर्गों के नियमितिकरण के लिए ही नियमितिकरण योजना बनाई और वर्ष में 72 असाइनमेंट्स पूरा करने वाले आकस्मिक कलाकारों, आकस्मिक प्रोडक्शन असिस्टेंट एवं आकस्मिक जनरल असिस्टेंट को नियमित कर नियमितिकरण का लाभ दिया जा चुका है, इतना ही नहीं O.A. 601/2006 कंचन कपूर एवं अन्य के मामले में ऑनरेवल CAT द्वारा 6 जुलाई 1998 एवं पुनः 20 मार्च 2007 को पारित आदेश में वर्ष में 72 से भी कम दिन कार्य करने वाले आकस्मिक कलाकारों की सेवाओं का नियमितिकरण किया जा चुका है।

आकाशवाणी त्रिवेंद्रम के कैज़ुअल कम्पीयर पी. रामेन्द्र कुमार की सेवाओं का नियमितिकरण O.A. 743/ 2000 में पारित आदेश के अनुपालन में प्रोडक्शन असिस्टेंट/ ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिव के पद पर किया जा चुका है। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा उमा देवी के मामले में 10 अप्रैल 2006 में पारित आदेश में दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश के बावजूद तथा समान रूप से समान सेवा शर्तों पर सेवारत हम आकस्मिक उद्घोषकों/ कम्पीयर का नियमितिकरण आज तक नहीं किया गया है।

आकस्मिक उद्घोषकों के अधिकार को हाशिये पर डाल दिया गया है। अवैध अंडरटेकिंग के सहारे आकाशवाणी पहले ही देश के अधिकांश आकस्मिक उद्घोषक और कम्पीयर से एफिडेविट पर हस्ताक्षर ले चुकी हैं और अब स्क्रीनिंग में उन्हें फेल करके हमेशा के लिए आकाशवाणी से बाहर करना शुरू भी कर दिया है, ये सब महज़ इसलिए कि अपना जायज़ अधिकार मांगने लायक भी कोई न रहे कोई न बचे।

पंद्रहवी लोक सभा में संसद की संयुक्त संसदीय समिति ने भी प्रसार भारती और आकाशवाणी को ये निर्देश दिया था कि आकस्मिक उद्घोषकों और कम्पीयर के साथ भेद भाव और शोषण को तत्काल ख़तम किया जाए। देश की दो सर्वोच्च संस्था एक माननीय सर्वोच्च न्यायालय और दूसरी हमारी संसद, हैरानी होती है जब इनका आदेश और निर्देश प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय नहीं मानती है और वही काम करती है, जो इनके मन में आता है और जब कभी प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय को ये याद दिलाया जाता है, कि आप माननीय सर्वोच्च न्यायालय और संसद के निर्देश को न मान कर उनकी अवमानना कर रहे हैं, तब ये अपना बदला आवाज़ उठाने वाले की ड्यूटी बंद करके निकालते हैं।

क्या प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व संसद से भी बड़ी हो गई है जो इनके आदेश और निर्देश का अनुपालन नहीं करती ? अगर ऐसा है तो ये ग़लत है, इसके लिए प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय से मैंने सवाल किया था और परिणाम ये रहा कि मेरी बुकिंग (ड्यूटी) बंद कर दी गई है। सच बोलने पर सुना था इनाम मिलता है लेकिन मुझे तो सज़ा मिली है और पूछने पर आज तक मेरा क़ुसूर नहीं बताया गया है,अगर प्रसार भारती सही है और उसके दावे सच्चे हैं तो Honourable Supreme Court of India,  Central Administrative Tribunal  और संसद की संयुक्त समिति की रिपोर्ट प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय के ख़िलाफ़ क्यों है? आशा करता हूँ सच का साथ आप देंगे वरना संभव है आज सच बोलने की मुझे सज़ा मिली है कल आपका कोई अपना भी मेरी तरह फ़रियाद कर रहा होगा, आप ऐसा होने देंगे?

Ashok Anurag 
casual hindi announcer
AIR Delhi

जाने माने आकाशवाणी उदघोषक अशोक अनुराग का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं>

जहां सच्चाई दम तोड़ देती है उसे आकाशवाणी कहते हैं…

आकाशवाणी से संबंधित अन्य खबरें नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं>

नियमितीकरण के लिए आकाशवाणी के उद्घोषकों का जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन

xxx

आह आकाशवाणी, वाह आकाशवाणी…

xxx

बे-मन की बात : आकाशवाणी के कैजुअल एनाउंसरों पर लटक रही छंटनी की तलवार

xxx

केंद्र सरकार ने केबल एक्ट 1995 में चुपचाप संशोधन कर चैनलों को नोटिस जारी कर दिया, हम सब कब जगेंगे!

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकारों पर हो रहे हमले के विरोध में प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ कानपुर में पत्रकारों का हल्ला बोल

विगत एक वर्ष से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर बढ़ रहे अत्याचारों और उत्पीड़न ने तोड़ा पत्रकारों के सब्र का बांध। कानपुर में आज कई पत्रकार संगठनों ने मंच साझा कर सांकेतिक धरना प्रदर्शन करते हुए प्रदेश की सपा सरकार और बीजेपी के प्रदेश नेतृत्व को जमकर कोसा। कानपुर में विभिन्‍न पत्रकार संगठनों द्वारा आज फूलबाग स्थित गांधी प्रतिमा पर धरना प्रर्दशन कर पत्रकारों का उत्पीड़न न रुकने पर बड़े आंदोलन का बिगुल फूंक दिया।

इस धरने में प्रदेश सरकार को आड़े हांथो लेते हुए चेतावनी दी गयी कि अगर प्रदेश में पत्रकारों का उत्पीड़न नहीं रोक गया तो जल्द ही प्रदेश के पत्रकार मिलकर लखनऊ विधानसभा का घेराव करेंगे। इस धरने में मुख्य रूप से कानपुर, उन्‍नाव, लखनऊ, कन्‍नौज, वाराणसी और फतेहपुर आदि जिलों से पत्रकार संगठनो के प्रमुखों ने एक साथ शिरकत की।

शिरकत करने वाले पत्रकार संगठन

आल मीडिया एण्‍ड जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन के अध्‍यक्ष आलोक कुमार।
आल इण्डिया रिर्पोटर्स एसोसिएशन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता तारिक आजमी।
कानपुर प्रेस क्‍लब के महामंत्री अवनीश दीक्षित।
आइरा के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष एड. पुनीत निगम।
मीडिया रिपोर्टर्स एसोसिएशन के राष्ट्रिय महासचिव बलवन्त सिंह।
सहित कई पत्रकार संगठनो ने एक मत होकर प्रदेश की सरकार की आलोचना की।

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की जमकर हुई निंदा

आपको बता दें हाल ही में भाजपा प्रदेश अध्‍यक्ष द्वारा नेशनल चैनल पर पत्रकार आलोक कुमार के खिलाफ दिये वक्‍तव्‍य को निन्‍दनीय बताते हुये उनसे तत्‍काल सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की। उन्‍होंने कहा कि माफी न मांगे जाने की सूरत में पत्रकार भाजपा से जुड़े सभी कार्यक्रमों का बहिष्‍कार करेंगे और अगले चरण में लखनऊ में भाजपा कार्यालय का घेराव किया जायेगा। कार्यक्रम में प्रमुख अवनीश दीक्षित, तारिक आजमी, पुनीत निगम, बलवन्त सिंह, आशीष त्रिपाठी आलोक कुमार, इब्ने हसन जैदी, श्रावण गुप्ता, दीपक मिश्रा अखलाख अहमद, नीरज लोहिया, उमेश कुमार सहित सभी पत्रकार उपस्थित रहे।

एस.आर.न्यूज़ के लिए जीतू वर्मा की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राजस्थान पत्रिका में मजीठिया वेज बोर्ड के साइड इफेक्ट : डीए सालाना कर दिया, सेलरी स्लिप देना बंद

कोठारी साहब जी, मन तो करता है पूरे परिवार को लेकर केसरगढ़ के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर लूं

जब से मजीठिया वेज बोर्ड ने कर्मचारियों की तनख्‍वाह बढ़ाने का कहा व सुप्रीम कोर्ट ने उस पर मोहर लगा दी तब से मीडिया में कार्य रहे कर्मचा‍रियों की मुश्किलें बढ रही हैं. इसी कड़ी में राजस्‍थान पत्रिका की बात बताता हूं। पहले हर तीन माह में डीए के प्‍वाइंट जोड़ता था लेकिन लगभग दो तीन वर्षों से इसे सालाना कर दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए तनख्‍वा बढ़ी तो जहां 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी होनी थी तो मजीठिया लगने के बाद कर्मचारियों की तनख्‍वाह में मात्र 1000 रुपए का ही फर्क आया। किसी किसी के 200 से 300 रुपये की बढ़ोतरी।

इसके बाद बारी आई सालाना वेतन वृद्धि की जो इंक्रीमेंट के साथ डीए आदि मिलाकर देखा जाए तो कम से कम भी 1500 रुपये के लगभग बढती थी। राजस्‍थान पत्रिका में सालाना वेतन वृद्धि जनवरी एवं जुलाई में होती है। आज सालाना वेतन वृद्धि के बढ़ी हुई सैलेरी मिली लेकिन सैलेरी लेकर हंसी आ रही थी व दुख हो रहा था। अब डीए भी बंद व तनख्‍वाह बढी मात्र 200 रुपए यानि एक माह का सोलह रुपए 67 पैसा और एक दिन का हुआ लगभग 22 पैसा।

इतना वेतन एक साथ बढ़ने से मैं तो धन्‍य हो गया। अब तो मेरे बच्‍चे हमारे शहर की सर्वोच्‍च शिक्षण संस्‍था में पढ सकेंगे। मैं छुट्टियों के दौरान घूमने के लिए विदेश भी जा सकूंगा। अपने लिए एक गाड़ी व घर भी ले सकूंगा। आखिर लूं भी क्‍यों ना सकूंगा। आखिर एक साल में 200 रुपए की वेतन वृद्धि जो हुई है जो मैंने कभी सपने में नहीं सोचा था। खैर व्‍यंग्य को छोड़ दें।

कोठारी साहब जी, मन तो करता है पूरे परिवार को लेकर केसरगढ़ के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर लूं ताकि दूसरे भाईयों का शायद कुछ भला हो जाए मेरा तो जो होगा देखा जाएगा बाकि पूरा परिवार साथ में होगा तो पीछे की चिंता भी नहीं रहेगी। एक बात और यदि सैलेरी के लिए पैसे कम हो तो कर्मचारियों से कह देना वो शायद चंदा इकठा करके आपके ऐशो आराम की जिंदगी जीन का प्रबंध कर ही देंगे इतने बुरे भी नहीं है कर्मचारी।

इसके अलावा राजस्‍थान पत्रिका ने सैलेरी स्लिप भी देना बंद कर दी। क्‍या यह वही राजस्‍थान पत्रिका है जिसमें गुलाब कोठारी जी का संपादकीय छपता है। क्‍या यह वही राजस्‍थान पत्रिका है जिसके संस्‍थापक कुलिश जी ने उधार रुपए लेकर अखबार की शुरुआत की। लेकिन कुलिश जी ने कभी कर्मचारियों का बोनस नहीं रोका अब तो सरकार से मिलने वाली सुविधाएं खुद तो ले रहे हैं लेकिन कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाएं रोकने का प्रयास किया जा रहा है। यह सत्‍य भी कि यदि कुलिश जी उधार के पैसे से अखबार चला सकते हैं कर्मचारी उधार रुपए लेकर क्‍या अपना जीवन निर्वाह नहीं कर सकते क्‍योंकि सबको पता है कि पत्रिका के कर्मचारी को दिया उधार वो चुकाएगा कैसे।

यहां एक बात का ओर उल्‍लेख करना चाहता हूं कि वितरण विभाग में जो टैक्सियों का पेमेंट होता है उसमें टेक्सियों का बिल तो ज्‍यादा बनता है लेकिन उनके चैक को पत्रिका के वितरण विभाग के कर्मचारी साथ जाकर कैश करवाते हैं व उसमें से लगभग दो रुपये प्रति किलोमीटर का पैसा गुलाब जी के घर पहुंचता है जो हर ब्रांच से कम से कम 10 लाख बनता है। ये है इनकी सच्‍चाई।

एक पत्रिका कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया वेज बोर्ड के लिए भड़ास की जंग : लीगल नोटिस भेजने के बाद अब याचिका दायर

Yashwant Singh : पिछले कुछ हफ्तों से सांस लेने की फुर्सत नहीं. वजह. प्रिंट मीडिया के कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से उनका हक दिलाने के लिए भड़ास की पहल पर सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करने की प्रक्रिया में इनवाल्व होना. सैकड़ों साथियों ने गोपनीय और दर्जनों साथियों ने खुलकर मजीठिया वेज बोर्ड के लिए भड़ास के साथ सुप्रीम कोर्ट में जाने का फैसला लिया है. सभी ने छह छह हजार रुपये जमा किए हैं. 31 जनवरी को दर्जनों पत्रकार साथी दिल्ली आए और एडवोकेट उमेश शर्मा के बाराखंभा रोड स्थित न्यू दिल्ली हाउस के चेंबर में उपस्थित होकर अपनी अपनी याचिकाओं पर हस्ताक्षर करने के बाद लौट गए. इन साथियों के बीच आपस में परिचय हुआ और मजबूती से लड़ने का संकल्प लिया गया.

(भड़ास की पहल पर मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर शुरू हुई लड़ाई के तहत मीडिया हाउसों के मालिकों को लीगल नोटिस भेज दिया गया. दैनिक भास्कर के मालिकों को भेजे गए लीगल नोटिस का एक अंश यहां देख पढ़ सकते हैं)

ताजी सूचना ये है कि लीगल नोटिस संबंधित मीडिया संस्थानों को भेजे जाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की प्रक्रिया चल रही है. पांच और छह फरवरी को पूरे दिन यह प्रक्रिया चली और चलेगी. बचा-खुचा काम सात फरवरी को पूरा हो जाएगा जो कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में याचिका दायर करने का अंतिम दिन है. जितने भी साथियों ने खुलकर या गोपनीय रूप से लड़ने के लिए आवेदन किया है, उन सबके नाम पता संस्थान आदि को चेक करते हुए उनकी एक फाइल बनाकर अपडेट रखने का काम हम लोग करते रहे. कोई संस्थान नोटिस भेजने और याचिका में छूट न जाए इसलिए हर एक के अथारिटी लेटर व आवेदन को बार-बार चेक करते रहे. उधर, एडवोकेट उमेश शर्मा लीगल नोटिस बनाने, भेजने से लेकर याचिका तैयार करने में दिन रात जुटे रहे. अपने सहायक यशपाल के साथ एडवोकेट उमेश शर्मा ने दिन के अलावा रात-रात भर काम किया. परसों रात 11 बजे मैं खुद बाराखंभा रोड से लौटा क्योंकि गोपनीय रूप से लड़ने वाले लोगों की याचिका पर मुझे साइन करना था, साथ ही सभी याचिकाओं पर संबंधित संस्थानों के मालिकों के नाम-पते सही हों, यह चेक करना था.

इस तरह कड़ी मेहनत रंग लाने लगी है. नई खबर ये है कि कई पत्रकार साथियों ने अलग-अलग वकीलों के जरिए भी अपने अपने संस्थानों के खिलाफ खुलकर याचिकाएं दायर की हैं. जो याचिकाएं पहले से दायर हो चुकी हैं, उन पर आज सुनवाई है. जो याचिकाएं कल और आज में दायर हो रही हैं या दायर की जा चुकी हैं, उनकी लिस्टिंग आदि की प्रक्रिया होने के बाद पता चलेगा कि सुनवाई की तारीख कब है. यह संभावना जताई जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से मजीठिया वेज बोर्ड मामले से जुड़ी सारी याचिकाओं को एक साथ मिलाकर सुनवाई करने का फैसला लिया जाएगा ताकि सुनवाई में देरी न हो, सुप्रीम कोर्ट का भी टाइम बचे और मीडिया मालिकों को अलग-अलग झूठ बोलने गढ़ने का मौका न मिल सके. इस तरह सभी पीड़ितों के साथ न्याय होने की पूरी संभावना है.

आज यानि छह फरवरी को मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई केसों की सुनवाई है.. आज सुप्रीम कोर्ट में अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना के तीन और मामले सुनवाई के लिए आ रहे हैं. इन मामलों की सुनवाई माननीय न्‍यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्‍यायमूर्ति अरूण मिश्रा की खंडपीठ वाली अदालत संख्‍या 7 में होगी. केस नंबर 33, 34 और 38 ऑफ 2015 को सुनवाई का आइटम नंबर 10 है. सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर डिटेल इस प्रकार है…

COURT NO. 7
HON’BLE MR. JUSTICE RANJAN GOGOI
HON’BLE MR. JUSTICE ARUN MISHRA
PART A – MISCELLANEOUS MATTERS
10. CONMT.PET.(C) NO. 33/2015 IN
W.P.(C) NO. 246/2011
X FRESH-E
1ST LISTING
LAKSHMAN RAUT AND ORS
VS.
SHOBNA BHARTI AND ORS
(WITH OFFICE REPORT)
MR. AVIJIT
BHATTACHARJEE
WITH
CONMT.PET.(C) NO. 34/2015 IN
W.P.(C) NO. 246/2011
X FRESH-E
JAGJEET RANA
VS.
SANJAY GUPTA AND ANR
(OFFICE REPORT)
MR. DINESH KUMAR GARG
CONMT.PET.(C) NO. 38/2015 IN
W.P.(C) NO. 246/2011
X FRESH-E
RAJIV RANJAN SINHA & ANR.
VS.
CHAIRMAN D.B. CORP. LTD. & ANR.
(OFFICE REPORT)
DR. KAILASH CHAND

ज्ञात हो कि 6 फरवरी को हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स की मालकिन याोभना भरतिया के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने के मामले की सुनवाई है. भरतिया के खिलाफ कोर्ट नंबर 7 में आइटम नंबर 10 के तहत सुनवाई होगी. इसका केस नंबर 33 है. इसके शिकायतकर्ता लक्ष्‍मण राउत एवं अन्‍य हैं. हिमांशु शर्मा ने फेसबुक पर लिखा है: ”There are 6 fresh Contempt petitions filed in Supream Court of india. Three are against Daink Jagran with Diary No. 2515/15, 2795/15 and 3370/15. Two are against Dainik Bhaskar DN. 3633/15 and 3634/15 . And one against Patrika DN 2643/15. I hope many more to come in few days.”

कुल मिलाकर कहने का आशय ये है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अखबारों के मालिक बुरी तरह घिर गए हैं और इन्हें अब दाएं बाएं करके निकल लेने का मौका नहीं मिलने वाला. रही सही कसर भड़ास ने पूरी कर दी है. खासकर गोपनीय लोगों की लड़ाई को लड़ने का तरीका इजाद कर भड़ास ने मीडिया मालिकों को बुरी तरह बैकफुट पर ला दिया है. इस पूरे अभियान के लिए तारीफ के जो असली हकदार हैं वो हैं एडवोकेट उमेश शर्मा. इन्होंने यूं ही बातचीत के दौरान एक रोज एक झटके में यह फैसला ले लिया कि वह बेहद कम दाम पर देश भर के मीडियाकर्मियों के लिए मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ेंगे. उनके फैसला लेते ही भड़ास ने इस पहल को हर मीडियाकर्मी तक पहुंचाने का फैसला लिया और इस तरह हम सब आप मिल जुल कर अभियान में लग गए, जुट गए.  

(मीडियाकर्मियों को उनका हक दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील उमेश शर्मा ने दिन-रात एक कर लीगल नोटिस भिजवाने के बाद अब याचिका दायर करा दिया है. उमेश शर्मा का कहना है कि उन्हें पीड़ित मीडिया कर्मियों को जीत दिलाने और मालिकों को हारत-झुकता देखने में खुशी होगी, ताकि एक मिसाल कायम हो सके कि जो न्याय के लिए लड़ेगा, वह जीतेगा और बेइमानी करने वाले अंततः हारेंगे.)

एक बात और कहना चाहूंगा. वो ये कि जिन लोगों ने अभी तक खुलकर या गोपनीय रूप से लड़ने के लिए आवेदन नहीं किया है, उन्हें भी साथ जोड़ने की योजना बनाई जा रही है. एडवोकेट उमेश शर्मा जी ने आश्वासन दिया है कि जो साथी बच गए हैं या सोचते ही रह गए हैं, उनके लिए भी रास्ता निकाला जाएगा. इस बारे में सूचना जल्द दी जाएगी. इसलिए जो साथी जुड़ चुके हैं, वो तो प्रसन्न रहें ही, जो नहीं जुड़ पाए हैं, वो निराश न हों, उनके लिए एक नया फारमेट तैयार किया जा रहा है, जिसकी सूचना जल्द भड़ास के माध्यम से दी जाएगी.

आखिर में… मजीठिया के लिए भड़ास की लड़ाई पर एक साथी ने भड़ास के पास अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए जो मेल भेजा है, उसे नीचे दिया जा रहा है. इस उदगार में नोटिस मिलने वाला है, का जो जिक्र किया गया है, उसको लेकर यह बता दूं कि इन दोनों अखबारों के मालिकों समेत ज्यादातर मीडिया मालिकों को लीगल नोटिस जा चुका है और याचिका दायर लगभग की जा चुकी है… पढ़िए, भड़ास के साथ मजीठिया के लिए लड़ रहे एक साथी के उदगार…


” हल्ला बोल : जयपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, बारां, बूंदी, झालावाड़ के पत्रकार हुए एकजुट… अब क्या बतायें. जिंदगी में कभी नहीं सोचा था कि राजस्थान के इन खबरदारों के अंदर कभी खुद के लिये भी कोई इंकलाब आएगा। लेकिन जो खो गया था या मर गया था, वो जिंदा हो गया है। देर से ही सही, दोनों अखबारों के पत्रकारों ने अबकी बार हल्ला बोल मचा दिया है। जयपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, बारां, बूंदी, झालावाड़ से सूचना है कि राजस्थान पत्रिका व दैनिक भास्कर के पत्रकार भाईयों ने प्रबंधन के खिलाफ एकजुट होकर मजीठिया आयोग की सिफारिशों को लागू करने की एकजुट मांग को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में गुहार लगा दी है। जल्द ही मालिकों को नोटिस पर नोटिस मिलने वाले है। इस गुहार के बाद प्रबंधन का प्रकोप अब किस रूप मे और कैसे निकलता है, ये देखना होगा। इसके इंतजार में वे तमाम पत्रकार कैसे हल्ला बोल करते हैं, ये उनके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेवारी है क्योंकि अब सबसे बड़ा सवाल उनकी एकजुटता तोड़ने के लिये किया जायेगा। पत्रकारों का बढा हुआ कदम अब आगे और कितना पुख्ता होगा यह सब भविष्य की मुट्ठी में कैद है।

जो हाथों में कलम और कंधो पे आँखे रखते है
राजनीति कि भट्टी में जो गर्म सलाखें रखते है
ऐसे देश के वीरों को में शत शत शीश झुकाता हूँ
आंसू भी लिखना चाहूँ तो अंगारे लिख जाता हूँ

अखबारों के दफ्तरों की ऊँची अट्टालिकाओं पे तुमने ये जो इंकलाब की झंडियां लगाई है, ये बड़े हिम्मत की कोशिश है, इन कोशिशों को बनाये रखना। उपर वाला करे, इन्साफ तुम्हारे हक में हो…। यशवंत सिंह, आपके नाम का इस्तमाल करने की गुस्ताखी कर रहा हूं… माफ़ करना बड़े भाई… लेकिन आज आपकी वजह से हमें हिम्मत है…. अब हम आपके नाम को जिंदा रखेंगे…. अखबार के मालिकों, अब करो मुकाबला… अब यहां का हर पत्रकार यशवंत सिंह है… ”


भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

मजीठिया के लिए भड़ास की जंग : दैनिक भास्कर, हिसार के महावीर ने सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए हस्ताक्षर किया

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: